Sohagpur : जन आशीर्वाद और आक्रोश के बाद अब गोपाल आक्रोश रैली
written by Deepak Sharma | 01/10/2023
दीपक शर्मा / विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। मतदाता को रिझाने के लिए रैलियों का आयोजन किया जा रहा है। बीजेपी ने हाल ही में अपने विकास कार्यों की उपलब्धि गिनाने के लिए जन आशीर्वाद यात्रा निकाली। कांग्रेस ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए जन आक्रोश रैली निकाल दी। अब इसमें एक नया अध्याय जुड़ा है, नाम है गोपाल आक्रोश रैली। आशीर्वाद और आक्रोश के बीच नर्मदापुरम जिले की सोहागपुर विधानसभा में गायों के संरक्षण को लेकर निकाली गई इस रैली ने कई राजनीतिक समीकरणों की ओर इशारा कर दिया है।
आंचलखेड़ा से शोभापुर तक निकाली गई रैली
सोहागपुर विधानसभा से चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके सेमरीहरचंद निवासी उमेश मित्तल ने 1 अक्टूबर को गोपाल आक्रोश रैली निकालकर सबको चौंका दिया। गौमाता आर्शीवाद—गोपाल आक्रोश रैली विधानसभा के ही आंचलखेड़ा गांव से शुरू होकर शोभापुर तक पहुंची। रैली में कुछ राजनीतिक तो कुछ गैर राजनीतिक चहरे थे। 25 गाड़ी और 1 हजार लोगों के काफिले के साथ निकाली गई इस रैली ने त्रिकोणीय मुकाबले की नींव रख दी है।
एमपी की राजनीति का केंद्र रही है गाय
गाय ऐसा मुद्दा है जो प्रदेश की राजनीति में कभी ठंडा नहीं पड़ा। 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने गाय की दुर्दशा को मुद्दा बनाया। कांग्रेस 15महीने के लिए सत्ता में आई तो गौशालाओं का निर्माण कराया। सत्ता में बीजेपी की वापसी के साथ ही कांग्रेस पर गौशाला निर्माण को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप तक लग गए। अब इसी गाय के मुद्दे को उठाकर उमेश मित्तल ने चुनावी राजनीति का बिगुल बजा दिया है। रैली का जगह—जगह स्वागत भी किया गया।
रैली को संबोधित करते हुए उमेश मित्तल ने कहा कि यह सरकार के खिलाफ गोपाल का आक्रोश हैे जहां सरकार लाडली बहना जेसी योजनाओं करोड़ों खर्च कर रही है। वही गोमाता के नाम पर बस दिखावा है। इसलिए लाखों गाय रोड पर घूम रही है। इस यात्रा का मकसद लोगों को गायों की जो दुर्दशा हो रही उसके बारे जागृत करना और सरकार को गोपाल का आक्रोश दिखाना।
Narmadapuram:माखननगर का सरकारी अस्पताल, यहां गेहूं नहीं सिर्फ घुन पिसता है, वरिष्ठ अधिकारी खेल कर चलता बना, अधीनस्थ कर्मचारी फंस गए
written by Deepak Sharma | 01/10/2023
DenvapostExclusive : माखननगर के सरकारी अस्पताल को लेकर देनवा पोस्ट ने बड़ा खुलासा किया। अस्पताल में हुए भ्रष्टाचार को लेकर आप सभी ने बहुत कुछ पहले से ही देख, सुन और पढ रखा है। ऐसे में देनवा पोस्ट ने आप तक सटीक जानकारी पहुंचाने के लिए कुछ नया किया और वो था स्टिंग आपरेशन। इस आपरेशन का मुख्य मकसद यह बताना था कि आखिर माखननगर के सरकारी अस्पताल में इतना सब होता कैसे था। इस स्टिंग में हमने जिन कर्मचारियों से बात की, उनकी पहचान छुपाई, कारण किसी को बचाना नहीं, बल्कि असल गुनहगार का पर्दाफाश करना था। ये जो छोटे कर्मचारी है…उनमें इतनी हिम्मत नहीं कि वे अपने वरिष्ठ अधिकारी का विरोध कर पाते। हम उनकी यह मनोदशा अच्छे से समझते हैं और यही कारण है कि हम यह मानते हैं कि इस पूरे खेल में गेहूं बचकर निकल गया और घुन पिस गए हैं। जिस अधिकारी ने खेल किया वह चलता बना, रह गए तो ये छोटे कर्मचारी। देनवा पोस्ट का स्पष्ट मत है कि कार्रवाई जिम्मेदार अधिकारी पर होना चाहिए, न कि मजबूरी में काम करने वाले इन छोटे कर्मचारियों पर
आडियो: दो कर्मचारी अस्पताल के सामान के बारे में कर रहे बात
देनवा पोस्ट के पास एक आडियो है, जिसमें अस्पताल के दो कर्मचारी बात कर रहे हैं। पहला कर्मचारी कह रहा है… सर बोलकर समान ले आते हंै, नहीं तो लेके भाग जाये तो पैसे अपने को देने पड़ेंगे। आपका क्या समान रखा है मेरी तो कुर्सी है। जवाब में दूसरा कर्मचारी कह रहा है कि मेरे दो तीन समान रखे है। देखना पड़ेगा, सर फोन लगाएगें तब ही वह देगा। तीन चार समान रखे है तेरा भी आ जाएगा और मेरा भी आ जाएगा।
स्टिंग 1: बीएमओ अपने निजी अस्पताल ले गए सामान, सीसीटीवी कैमरे कर देते थे बंद
अस्पताल का एक कर्मचारी किसी सर को फोन लगाकर बोल रहा है। मुझे पता भी नहीं कब बीएमओं सर मेरी कुर्सी लेकर मायरा चले गए। वही एक कर्मचारी कह रहा है कि सीसीटीवी कैमरे का स्विच सर के कमरे मे है, वही से ऑपरेट होता था। वे वक्त बेवक्त इसे बंद कर दिया करते थे। जिससे सीसीटीवी होने के बाद भी सामान गायब होने की जानकारी नहीं मिल पाती थी।
स्टिंग 2: इंवेटर चोरी लेकिन इसलिए आवेदन के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई अस्पताल के एक अन्य कर्मचारी कह रहा है कि इंवेटर चोरी का आवेदन आया था। जिस शाखा से आया उसके कर्मचारी से बोला कि कार्यवाही करनी पड़ेगी। 25 से 30 हजार के चक्कर में तेरी बैंड बज जाएगी, तो उसने नया इंवेटर खरीद कर देने को कहा इसलिए थाने में शिकायत नहीं की गई।
बीएमओ डाॅ. रोहित शर्मा सरकारी अस्पताल से अपने निजी अस्पताल में सामान ले जाते रहे। किसी ने कभी कोई शिकायत क्यों नहीं की?
जाहिर सी बात है, जब सीसीटीवी कैमरे बंद ही रहेंगे तो आखिर वे अस्पताल की कारगुजारियों को कैसे कैद करेंगे। कभी इस पर जिम्मेदारों ने क्यों ध्यान नहीं दिया?
एक-दो चोरी की घटनाएं पकड़ाई तो उन पर सख्त कार्रवाई करने की जगह सामान बुलवाकर आपस में ही सेटलमेंट किसके कहने पर किया जा रहा था?
थाने में सिर्फ शिकायत आवेदन दिया गया, उसका फालोअप कर एफआईआर क्यों नहीं करवाई गई?
क्या अब जिले के अधिकारी लेंगे कोई एक्शन?
देनवा पोस्ट ने जब इस मामले में प्रभारी बीएमओ डॉ जीएस चैहान से बात की तो उन्होंने कहा कि मैने अभी अभी ज्वाइन किया। इस संबंध दो चार दिन बाद बात करते है। वही थाना प्रभारी प्रवीण उइके ने बताया कि अभी जांच चल रही है। जांच होने के बाद कार्यवाही की जावेगी। कुल मिलाकर देनवा पोस्ट के पास सारे तथ्य मौजूद है और सुरक्षित रखें है। सवाल यह है कि क्या अब जिले के अधिकारी कोई एक्शन लेंगे।
आप के सर्वे में उमेश मित्तल का नाम ! मैदान में उतरे तो गड़बड़ाएंगे कईयों के समीकरण
written by Deepak Sharma | 01/10/2023
Denva Post Exclusive. चुनावी साल है…ज्येष्ठ का महीना जाने को है और आषाढ़ दस्तक दे रहा है। इसी के साथ शुरू हो चुका है लोगों की नब्ज टटोलना। राजनीतिक पार्टियां और कुछ प्राइवेट फर्म चुनावी सर्वे शुरू कर चुकी है। कार्यकर्ताओं के साथ—साथ लोगों की नब्ज टटोलकर यह पता लगाए जाने की कोशिश की जा रही है कि जिताउ उम्मीदवार कौन हो सकता है। इस बीच आम आदमी पार्टी यानी आप के सर्वे में सेमरी हरचंद के उमेश मित्तल का नाम आने से राजनीतिक गलियारों में पारा हाई हो गया है, पारा हाई होने का एक कारण यह भी है कि बीजेपी से दूरियां बढने के बाद मित्तल ने कांग्रेस का हाथ थामा था, ऐसे में आप की ओर से आफर मिलना राजनीतिक पारे को हाई करने की पर्याप्त वजह माना जा सकता है। जानकारों का मानना है कि यदि उमेश मित्तल चुनावी समर में अपना भाग्य आजमाते हैं तो नतीजा भले ही कुछ हो लेकिन कईयों के समीकरण जरूर गड़बड़ा जाएंगे। देनवा पोस्ट की एक्सक्लूजीव स्टोरी में आज बात इसी मुद्दे पर होगी।
माखननगर की एक बैठक जिसने पैदा कर दी गहरी खाई
बात 2008 के चुनाव की है। सोहागपुर विधानसभा के गठन के बाद उमेश मित्तल खुद सोहागपुर विधानसभा से बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते थे। उस समय बीजेपी में कद्दावर नेता माने जाने वाले सरताज सिंह से उमेश मित्तल की काफी नजदीकियां भी थी, लेकिन टिकट लास्ट में मिला विजयपाल सिंह को। उमेश मित्तल ने बीजेपी के लिए काम भी किया। बीजेपी जीती भी, लेकिन इसके बाद 2009 में माखननगर में बीजेपी नेता संतोष अग्रवाल के यहां पार्टी की एक बैठक हुई, जिसमें कुछ ऐसा हुआ जिसने विधायक विजयपाल सिंह और उमेश मित्तल के बीज ऐसी खाई पैदा कर दी जो आज तक पाटी नहीं जा सकी है, बल्कि समय के साथ—साथ यह खाई और भी गहरी हो चुकी है और अब हालात यहां तक आ गए हैं कि उमेश मित्तल को विजयपाल सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ना पड़ा तो उससे भी कोई गुरहेज नहीं है।
सबसे बड़ा नुकसान बीजेपी को ही
मित्तल परिवार की पृष्ठभूमि बीजेपी की ही रही है। मित्तल परिवार शुरू से ही संघ के काफी नजदीक माना जाता रहा। उमेश मित्तल के छोटे भाई अनूप की अभी भी विधानसभा के कई स्वयंसेवक और संघ पदाधिकारियों से गहरी नजदीकियां है। सोहागपुर विधानसभा के गठन से पहले तक उमेश मित्तल बीजेपी के महत्वपूर्ण पदों पर रहे। जब विजयपाल सिंह ने अपना पहला चुनाव यहां से लड़ा तो उनके साथ सेमरी हरचंद से लेकर सोहागपुर तक उमेश मित्तल ने कदम से कदम मिलाया और बीजेपी को लीड दिलाई। उमेश मित्तल की आज भी क्षेत्र में काफी पकड़ है और ऐसे में इनके चुनाव मैदान में उतरने से सबसे बड़ा नुकसान बीजेपी को ही हो जाएगा।
कांग्रेस को भी आ सकती है दिक्कतें
विधायक विजयपाल सिंह से अनबन के बाद उमेश मित्तल बीजेपी से भी दूर होते चले गए, इसके बाद उन्होंने कांग्रेस का हाथ थामा। चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी सतपाल सिंह पलिया के समर्थन में खुलकर मैदान में भी उतरे। वैसे तो किसी कैंडिडेट के चुनाव में जीतने के पीछे सभी वर्गों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, लेकिन बीजेपी का मुख्य गढ़ माखननगर और बड़ा वोट बैंक यादव समाज को माना जाता रहा है, जो चुनाव में हमेशा तटस्थ ही रहा। ऐसे में जिन इलाकों में उमेश मित्तल की पेठ है, वहां पिछले चुनाव में बीजेपी कुछ खास कमाल नहीं कर पाई। ये वोट बैंक कांग्रेस को शिफ्ट हुआ। ऐसे में उमेश मित्तल यदि आप के साथ हो गए तो कहीं न कहीं कांग्रेस को भी नुकसान पहुंचा देंगे।
ऐसे गड़बड़ाएंगे राजनीतिक समीकरण
उमेश मित्तल सीधे तौर पर बीजेपी में ही सेंध लगा देंगे। बीजेपी के ऐसे सभी वरिष्ठ नेता जो अपने आपको अब ठगा महसूस कर रहे हैं, उनसे उमेश मित्तल सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। वहीं क्षेत्रीय सामाजिक और कांग्रेस नेताओं से भी अब उमेश मित्तल की नजदीकियां है। एक समाजसेवी के रूप में पहचान होने के कारण उमेश मित्तल के जगह—जगह अपने लोग भी हैं जो जीत—हार और दलगत राजनीति से परे होकर उमेश मित्तल का ही साथ देंगे। उमेश मित्तल के छोटे भाई अनूप मित्तल की व्यापारी वर्ग में पेठ है, वे यहां बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके अलावा व्यापारी वर्ग से उम्मीदवार मैदान में हुआ तो व्यापारी वर्ग का एक बड़ा तबका इनके समर्थन में आ सकता है। जिससे कईयों के राजनीति समीकरण गड़बड़ा सकते हैं।
आप से लगभग हरी झंडी, इन 4 वजहों से पार्टी की पंसद बने उमेश
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार आम आदमी पार्टी यानी आप की ओर से उमेश मित्तल के नाम पर सहमति बनने की संभावना जताई जा रही है । दो बार पार्टी ने मित्तल परिवार से संपर्क कर भी लिया है। आम आदमी पार्टी के लिए उमेश मित्तल का नाम फाइनल होने की चार बड़ी वजह मानी जा रही है। पहला छवि बेदाग है और लोगों की हक की लड़ाई के लिए किसी भी मोर्चे पर मित्तल आमने सामने की लड़ाई लड़ने से परहेज नहीं करते हैं। दूसरा विधानसभा में इनके कई जगह अपने लोग हैं, कुल मिलाकर पूरी टीम तैयार बैठी है। तीसरा चुनाव लड़ने के लिए फाइनेंशियल स्थिति मजबूत है और चौथा बीजेपी और कांग्रेस दोनो ही दलों में सेंध लगा सकते हैं।
गेंद उमेश मित्तल के पाले में
वर्तमान में जो स्थिति है उसमें यदि उमेश मित्तल आम आदमी पार्टी को अपनी सहमति दे देते हैं तो आप की सूची में पार्टी प्रत्याशी के रूप में उमेश का नाम डिक्लेयर हो सकता है। कुल मिलाकर गेंद उमेश मित्तल के पाले में ही है और फैसला उन्हें ही करना है। हालांकि उमेश अभी खामोश बैठे हैं। शायद ये वक्त की नजाक्त को पहचानने की एक कोशिश हो। समय पर कोई फैसला लें। लेकिन इतना तो तय है कि कांग्रेस हो या आम आदमी पार्टी उमेश मित्तल कहीं भी टिकट मांगने नहीं जाने वाले, पर आने वाले समय में अचानक कोई बड़ा फैसला कर मैदान में उतर भी जाएं तो चौंकिएगा मत…क्योंकि वजह तो हम आपको पहले ही बता चुके हैं।
World Environment Day:रेत के अवैध उत्खनन से इस बात का अंदाज़ा भी नहीं, कि आगे चलकर इसके क्या नतीजे भुगतने पड़ेगें
written by Deepak Sharma | 01/10/2023
Denva Post Exclusive: हम विश्व पर्यावरण दिवस पर पौधारोपण कर पर्यावरण पर यह बताने का प्रयास करते है। कि हम पर्यावरण के सबसे बड़े हितेशी है। खुद प्रदेश के मुखिया भी इस काम में पीछे नही हैं। उन्होने भी करीब 288 दिनों मेे 2500 पौधे लगाए है। हम यह भूल रहे है कि पर्यावरण का संबंध प्रकृति के उस हर संसाधन से है। जो प्रकृति ने हमे दिया है और उसकी सुरक्षा से ही पर्यावरण की रक्षा होगी। वृक्षों की हो रही अवैध कटाई की भरपाई कुछ पौधे लगाकर कर देते है लेकिन आसपास प्रक्रति का दिया हुआ एक सीमित संसाधन ओर है जिसकी ओर किसी का ध्यान नही जा रहा है। उसके हो रहे नुकसान की भरपाई करने तरीका भी किसी के पास नही है। वह सीमित संसाधन है हमारी नदियों में पाई जाने वाली रेत। अवैधरेत-उत्खनन के कारण गंभीर नतीजे सामने आने लगे हैं ,उत्खनन से होने वाले नुकसान का देश के साथ साथ दुनिया पर भी असर दिखना शुरू हो गया।
चट्टानों की अपक्षरण प्रक्रिया से होता है रेत का निर्माण।
लाखों साल की अवधि में चट्टानें स्वाभाविक रीति से अपक्षरित होती रहती हैं और उनका यही अपक्षरण नदियों में रेत के रूप में इकट्ठा होता है. नदी की पेटी से इस रेत का उत्खनन किया जाता है. नदी का रेत अब एक दुर्लभ वस्तु बनाता जा रहा है. निर्माण के लिए उपयोग की जाने वाली किसी भी अन्य रेत की तुलना में नदी (ताजे पानी) का रेत निर्माण-कार्य के उद्देश्य से बहुत बेहतर होता है और पानी के बाद दुनिया में दूसरा सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला संसाधन है: परिमाण के लिहाज से देखें तो धरती के नीचे से खनन करके निकाली जाने वाली तमाम चीजों में रेत का हिस्सा दो तिहाई से कुछ ज्यादा है और ध्यान देने की एक बात ये भी है कि रेत एक संसाधन के रुप में असीमित मात्रा में उपलब्ध नहीं है. दरअसल, संयुक्त राष्ट्रसंघ की एक रिपोर्ट कहा गया है कि जल्दी ही हमें रेत के अभाव का सामना करना पड़ सकता है.
विकासशील देशों में रेत के लिए रेत जरूरी है
लोग हर साल 40 बिलियन टन से अधिक रेत और बजरी का उपयोग करते हैं. मांग इतनी ज्य़ादा है कि दुनिया भर में नदी-तल और समुद्र तट खाली होते जा रहे हैं. (रेगिस्तानी रेत आम तौर पर निर्माण-कार्य के लिए उपयोगी नहीं; पानी के बजाय हवा की चोट से आकार ग्रहण करने के कारण रेगिस्तानी रेत इतना ज़्यादा गोल होता है कि इसके दो कण आपस में मज़बूती से बंध ही नहीं पाते) और खनन किये जा रहे रेत की मात्रा तेज़ी से बढ़ रही है. विकासशील देशों में रेत के महत्व की अनदेखी नहीं की जा सकती. जिन घऱों में हम रहते हैं उनके निर्माण के लिए हमें रेत की ज़रुरत होती है और जिस शीशे की ग्लास से हम पानी पीते है और जिन कंप्यूटरों के ज़रिये हम काम करते हैं उनके भी निर्माण के लिए हमें रेत की ज़रुरत पड़ती है. इसके बावजूद रेत को उस तेज़ी से निकाला जा रहा है कि शोधकर्ताओं के मुताबिक़ उसकी भरपाई नहीं की जा सकती.
रेत नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अनिवार्य
प्राकृतिक संसाधनो में रेत सबसे ज्य़ादा अनदेखी का शिकार हुआ है. जर्नल ‘नेचर’ में प्रकाशित एक शोध अध्ययन में वैज्ञानिकों के एक समूह ने लिखा है कि रेत के लिए एक वैश्विक एजेंडा तैयार करने की तत्काल ज़रुरत है. शहरीकरण और वैश्विक स्तर पर जनसंख्या के बढ़ते विस्तार के कारण रेत और बजरी की मांग में दिनों-दिन बढोत्तरी हुई है और और पूरी दुनिया से रेत को 32 बिलियन से 50 बिलियन टन प्रतिवर्ष निकाला जा रहा है. ये बात निस्संदेह कही जा सकती है कि रेत नदी के पारिस्थितिकी तंत्र का अनिवार्य हिस्सा है. नदी के जल-प्रवाह और मछलियों की ही तरह यह नदियों को सेहतमंद रहने में रेत भी जरूरी है. यह भू-जल के पुनर्भरण के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है और प्रवाही जल में पोषक-तत्वों की आपूर्ति करता है. नदियों में जल-प्रवाह की कमी के दिनों में रेत जल-प्रवाह को बनाये रखने में मदद करता है. विभिन्न प्रकार के जलीय जीव-जंतुओं के प्राकृतिक वास के लिहाज से भी रेत महत्वूर्ण है. पर्यावरणविदों का मानना है कि भारत नें पिछले पांच सालों में हुए अवैध रेत-उत्खनन के कारण गंभीर नतीजे उभरकर सामने आये हैं. शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में मकान बनाना आम इंसान के लिए बहुत महंगा हो चला है और आवासों के निर्माण-कार्य में लगे फर्म तथा आवासों के छोटे विक्रेताओं को रेत की तेजी से बढ़ती हुई कीमतों के कारण भारी नुक़सान उठाना पड़ा है.
मांग लगातार बढ़ती जा रही है
वैश्विक स्तर पर शहरीकरण की प्रक्रिया बड़ी तेजी से उभार पर है और इस कारण रेत की ख़पत भारी मात्रा में हो रही है क्योंकि रेत कंक्रीट बनाने और पक्की सड़कों को बनाने में इस्तेमाल होने वाले कोलतार का मुख्य़ अवयव है. साल 2000 से लेकर अबतक भारत में निर्माण-कार्यों में इस्तेमाल होने वाले रेत में तिगुने से ज्य़ादा की वृद्धि हुई है और यह मांग लगातार बढ़ती ही जा रही है. झारखंड राज्य के रांची शहर को अब केवल कांची नदी से रेत हासिल होता है. पहले निर्माण-कार्य के लिए दो और नदियों के रेत का भी उपयोग किया जाता था. अब इन दोनों नदियों में पाया जाने वाला रेत अत्यधिक उत्खनन के कारण बहुत कम पड़ गया है. ये बात रांची शहर के उत्तरी हिस्से में बहने वाली जूमर नदी के रेत-भंडार के बारे में विशेष रुप से कही जा सकती है. झारखंड में रेत के खदानों की निलामी की नीति कभी शुरु होती है तो कभी बंद हो जाती है. इस कारण पैदा रेत-संकट की वजह से हज़ारों करोड़ की निर्माण-कार्य की परियोजनाओं का काम प्रभावित हुआ है.
विनिर्मित रेत या एम-सैंड नदी से निकाले जाने वाले रेत का विकल्प हो सकता है
विनिर्मित रेत या एम-सैंड नदी से निकाले जाने वाले रेत का एक विकल्प हो सकता है और इस रेत के इस्तेमाल पर दक्षिण के राज्यों में पर्याप्त जोर दिया जा रहा है. ये रेत चट्टानों और खदान के पत्थरों को चूर्ण करके बनाया जाता है.इस विधि से निर्मित रेत के कण आकार 150 माइक्रॉन का होता है. रेत के कण को वांछित आकार में प्राप्त करने के लिए मौजूदा मोटे कठोर चट्टानी भंडार को विभिन्न आकारों में चूर्ण किया जाता है और निर्माण-कार्य की अलग-अलग ज़रूरतों के हिसाब से उन्हें छांट लिया जाता है. इस तरीके से हासिल रेत से अशुद्धियों और अत्यंत महीन कणों को हटाने के लिए धोवन और झारन जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है,ताकि रेत परिष्कृत हो सके.रेत इमारतों के निर्माण-कार्य और नदियों को जीवंत बनाये रखने के लिए भी ज़रूरी है. परस्पर विरोधी इन दोनों जरुरतों के बीच संतुलन साधने का एक विलक्षण काम कर्नाटक की सरकार ने किया है. पर्यावरण और विकास-कार्य के आपसी हितों के विरोध के बीच संतुलन साधने के लिए कर्नाटक की सरकार ने लोक-निर्माण विभाग (पी.डब्ल्यू.डी) को 6 सितंबर 2013 को एक आदेश जारी किया. इसमें कहा गया कि सभी शासकीय निकाय अपने निर्माण-कार्य संबंधी कामों के लिए नदी के रेत का नहीं बल्कि सिर्फ विनिर्मित रेत (एम-सैंड — मैन्युफैक्चर्ड सैंड) का इस्तेमाल करेंगे.
भारत में एम–सैंड की मौजूदा स्थिति
प्राकृतिक रेत की आपूर्ति में कमी के कारण कर्नाटक ने एम-सैंड के उत्पादन के प्रयास तेज़ कर दिये हैं. इस राज्य में एम-सैंड के उत्पादन की 164 इकाइयां हैं. इन इकाइयों से प्रतिवर्ष 20 मिलियन एम-सैंड का उत्पादन हो रहा है. राज्य के माइनर मिनरल कंसेशन रूल्स में एम-सैंड के लिए अलग से प्रावधान किये गये हैं. राज्य की सरकार ने इसे पर्याप्त बढ़ावा दिया है जिससे सूबे में एम-सैंड के इस्तेमाल में व्यापक बढोत्तरी हुई है. कर्नाटक के अतिरिक्त एम-सैंड को बढ़ावा देने की दिशा में अग्रसर अन्य राज्यों के नाम हैं- आंध्रप्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु तथा तेलंगाना.
अवैध रूप से खनन रेत की मात्रा का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं
अवैध रूप से खनन किये गये रेत की मात्रा को लेकर कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं मिलता, लेकिन साल 2015-16 में खनन मामलों के पूर्व केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि देश में लघु खनिज के अवैध खनन के 19,000 से अधिक मामले सामने आये हैं जिनमें रेत के अवैध खनन के मामले भी शामिल हैं. इनमें से कितने मामले रेत के अवैध खनन से जुड़े हैं,इसे आंकड़ों में दर्ज नहीं किया गया है लेकिन इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस का कहना है कि लघु खनिजों के उत्खनन के लिहाज़ से देखें तो रेत सबसे ज्यादा उत्खनित खनिजों में चौथे स्थान पर है. तेज़ गति से शहरीकरण की ओर दौड़ते भारत में रेत की मांग को आगे और बढ़ते ही जाना है क्योंकि रेत कंक्रीट तथा सीमेंट के निर्माण में इस्तेमाल किया जाने वाला मुख्य अवयव है. हालांकि, इस साल निर्माण-क्षेत्र में सिर्फ 1.7 प्रतिशत की वृद्धि देखने में आयी है लेकिन स्वच्छ भारत मिशन तथा साल 2024 तक सबके लिए आवास सरीखी सरकारी योजनाओं के कारण निर्माण-क्षेत्र में गतिविधियां बढ़वार पर रहेंगी.
लापरवाही के साथ प्राकृतिक संसाधनों का दोहन
मनुष्य के रूप में हम एक ऐसी प्रजाति हैं जो सब कुछ गारंटीशुदा मानकर चलता है और हमने जिस लापरवाही के साथ प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है उससे ये बात एकदम स्पष्ट है कि हमने विकास के नाम पर किसी चीज को बख्श़ा नहीं है. बात चाहे कोयला की हो या प्राकृतिक गैस अथवा खनिज-तेल की. लेकिन क्या हमें ये बात पता है कि रेत भी ऐसे ही विरल होते जा रहे प्राकृतिक संसाधनों में एक है? यह सीमेंट, कंक्रीट, काँच, कंप्यूटर के कल-पुर्जे, स्मार्ट फोन, टूथपेस्ट, सौंदर्य प्रसाधन, कागज़, पेंट, टायर और ऐसी बहुत सी चीजों में उपयोग किया जाने वाला प्राकृतिक संसाधन है. लेकिन, याद रहे कि रेत असीमित मात्रा में उपलब्ध संसाधन नहीं है. दरअसल, रेत दुनिया में सर्वाधिक उपभोग किये जाने वाले संसाधनों में से एक है, लेकिन इसकी महत्ता को कम करके आंका जाता है. रेत के उपभोग के कारण दुनिया के 70 प्रतिशत समुद्र तट रेत-विहीन हो चले हैं और ऐसे में हमें इस बात का अंदाज़ा भी नहीं हो पा रहा है कि आगे चलकर इसके क्या नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं.
Narmadapuram:सरपंच पति को सचिवों का व्यवहार पंसद नही, इसलिए नो माह से विकास नहीं आया ग्राम
written by Deepak Sharma | 01/10/2023
Denva Post Exclusive: भारत के संविधान में अनुच्छेद 243 के तहत पंचायती राज की व्यवस्था दी गई है।इसी के तहत ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायत गठित की जाती हैं। प्रत्येक ग्राम का एक मुखिया होता है, जो ग्राम प्रधान अथवा सरपंच कहलाता है। सामान्य रूप से संपूर्ण गांव के विकास की जिम्मेदारी इसी ग्राम प्रधान के कंधों पर होती है। सरपंच पति को दो सचिवों का व्यवहार पंसद नही,जिसके कारण नो माह से विकास नहीं आया ग्राम।देनवापोस्ट एक्सक्लूसिव में इसी ग्राम पंचायत की बात होगी।
माखनगर जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत बुधनी में नो माह के अंदर दो सचिवों को बदल कर तीसरे सचिव को प्रभार दिया गया। जब इसकी जानकारी देनवापोस्ट की टीम को मिली तो माजरा क्या है ? यह जानने के लिए ग्राम बुधनी पहुंची I वहा की सरपंच श्रीमति ज्योति मनीष चौहान से कारण जानने का प्रयास किया। लेकिन महिला सरपंच होने कारण उनकी जगह उनके पति मनीष चौहान से बात करने का सौभाग्य हमे प्राप्त हुआ। आपको यह बता दे कि शासन ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने व महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए आरक्षण किया है, तब से महिलाओं की स्थानीय शासन में भागीदारी बढ़ी है लेकिन क्या करे फिर भी बुधनी ग्राम पंचायत में सरपंच पति की व्यवस्था से ग्रामीण अच्छे खासे नाराज हैं, हो भी क्यों न ऐसे में सरपंच से ग्राम में विकास के आने की की कैसे अपेक्षा की जा सकती है।
एक फोन नही उठाता, दूसरे का व्यवहार ठीक नही
चुनाव के बाद जब अगस्त 2022 मे पंचायत बुधनी का प्रथम संमेलन हुआ उस समय सचिव ओमप्रकाश यादव की पद स्थापना पंचायत बुधनी में थी। लेकिन वह मात्र चार माह ही बुधनी पंचायत संभाल सके। ठीक उसके बाद प्रदीप शर्मा जनवरी 2023 में बुधनी का हाल जानने पहुंचे, वह भी तीन माह गुजारने के बाद भी बुधनी पंचायत को पहचान नहीं पाए और वापिस आ गए। फिर अप्रेल 2023 में आंनद गिरी गोस्वामी को बुधनी पंचायत की कमान दी गई कि ग्राम में कुछ कार्य हो सके । जब इस संबंध मे सरपंच पति मनीष चौहान से बात की गई तो उन्होने बताया कि उन्हे दोनो सचिवों का व्यवहार पंसद नही आया । वैसे उनका कहना भी जायज है कि सचिवों का व्यवहार जबतक ठीक नही होता है। जबतक पंचायत को विकास की जरूरत नही है।भला यह क्या बात हुई सरपंच पति को सचिवों का व्यवहार पंसद नही इसलिए करीब नो माह से विकास गांव नही आ पा रहा है।
रोजगार न मिलने से बनती है पलायन की स्थिति
ग्राम पंचायत बुधनी में मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना का सही ढंग से क्रियान्वयन न होने के कारण मजदूरो को रोजगार ढुढने के लिए गांव से बाहर जाना पड़ रहा है। गांव के ही महेश कहार ने बताया कि गांव में रोजगार न मिलने के कारण मजबूरी बस हमें पलायन करना पड़ता है। बच्चों को तो पालना है इसलिए मजदूरी के लिए हमें आसपास के गांवो और शहरों की ओर जाना पड़ता है। ग्रामीणों की पीड़ा से स्पष्ट होता है की ग्राम पंचायत बुधनी में प्रशासनिक नुमाइंदों कि किस तरह तानाशाही चल रही है। गांव के जागरूक नागरिक सीताराम बताते हैं की ग्राम पंचायत तो 15 अगस्त व 26 जनवरी को ही खुलती है। ग्राम के पंचों को भी ग्राम सभा होने की सूचना भी नहीं दी जाती जो पंच है उन्हें तो यह भी पता नहीं ग्रामसभा क्या होती है।
Sohagpur:सोहागपुर विधानसभा जब शिशु थी तो बीजेपी के गोद में खेली, बचपन में उंगली पकड़कर चली, किशोर होने पर कहीं थाम न ले किसी और का हाथ
written by Deepak Sharma | 01/10/2023
DENVA POST Exclusive: मध्यप्रदेश में इस साल विधानसभा चुनाव हैं। चौक—चाराहों पर भले ही अभी चुनावी चर्चा शुरू नहीं हो पाई है, लेकिन राजनीतिक पंडित गुणा—भाग लगाने में व्यस्त हो चुके हैं। ऐसे में हम आज बात करेंगे नर्मदापुरम (पहले होशंगाबाद) की हाल ही में किशोर हुई विधानसभा सोहागपुर की। यहां हम किशोर शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि विधानसभा के गठन को 15 साल पूरे हो चुके हैं, उम्र के इस पड़ाव को किशोरावस्था कहा जाता है। सोहागपुर विधानसभा शिशु से लेकर पूरा बचपन (यानी विधानसभा गठन के 13 साल तक) बीजेपी के गोद में ही खेली, उसकी उंगली पकड़कर ही चली, लेकिन किशोरावस्था में पहुंचने तक विधानसभा के चाल ढ़ाल बदले बदले नजर आ रहे हैं, हो भी क्यों न…यह अवस्था ही ऐसी है जब बदलाव को तेजी से महसूस किया जाता है। इस अवस्था के लोग हमेशा यह नहीं बता पाते हैं, कि वे कैसा महसूस करते हैं और वे चीजों को अपने अंदर ही रखते हैं, कुछ ऐसा ही किशोर हुई विधानसभा सोहागपुर के साथ है। यदि बीजेपी ने समय पर पहचान लिया तो ठीक नहीं तो किशोरावस्था विद्रोह और मतांतर की अवस्था होती है, कहीं ऐसा न हो कि किशोर हुई सोहागपुर विधानसभा आगे के सफर के लिए किसी और का हाथ ही न थाम लें।
बीजेपी ने जहां से शुरूआत की वहीं पहुंच गई
मध्यप्रदेश में 138वी विधानसभा के रूप में वर्ष 2008 में सोहागपुर विधानसभा का गठन हुआ। तब से यहां बीजेपी के विधायक विजयपाल सिंह की ही विजय पताका फहर रही है। मौटे तौर पर देखने में इसे बीजेपी का अभेद किला कहा जा सकता है, लेकिन इस अभेद किले में अब कब दरार पड़ जाए और किले में सेंध लग जाए इसे लेकर संभावनाएं तलाशी जाने लगी है। कारण…बीजेपी से जहां से शुरूआत की थी वह बीते चुनाव में वहीं पहुंच गई। विधानसभा के पहले चुनाव यानी 2008 में बीजेपी को 48% वोट मिले थे। 2013 में इसमें इजाफा हुआ और वोट बढ़कर हो गए 55%, लेकिन 2018 में वापस बीजेपी को 48% ही वोट मिले। मतलब 10 सालों में गाड़ी जहां से शुरू हुई, वापस वहीं आकर रूक गई।
कांग्रेस का हर इलेक्शन में बढ़ रहा 4% वोट
सोहागपुर विधानसभा में भले ही कांग्रेस अब तक अपना खाता भी नहीं खोल पाई हो, लेकिन उसका विधानसभा के हर चुनाव में 4% वोट बढ़ रहा है। एक ओर बीजेपी का वोट बैंक जहां से शुरू हुआ वहीं पर पहुंच गया तो दूसरी ओर कांग्रेस का हर विधानसभा चुनाव में 4% वोट बढ़ना बीजेपी के लिए चिंता का विषय है। यदि 2023 के चुनाव में भी कांग्रेस का यही ट्रेंड रहा और इस बार भी 4% वोट का इजाफा हो गया तो समझो बीजेपी के गढ़ को बचाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। बता दें कि सोहागपुर विधानसभा में कांग्रेस को 2008 के चुनाव में 34% तो 2013 के चुनाव में 4% बढ़कर 38% वोट मिले थे। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के वोट बैंक में दोबारा 4% का उछाल आया और 42% मिले। यदि यही ट्रेंड रहा तो इस बार कांग्रेस का वोट बैंक 46% तक जा सकता है और यही बीजेपी के लिए चिंता का विषय है।
जीत—हार का अंतर भी हो रहा कम
2008 के चुनाव में बीजेपी के विजयपाल सिंह को 56578 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के मेहरबान सिंह को 40037 वोट मिले थे। दोनों के बीच हार जीत का अंतर 16 हजार से ज्यादा वोटों का था। 2013 के चुनाव में बीजेपी के विजयपाल सिंह को 92859 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के रणवीर सिंह को 63968 वोट मिले थे। दोनों के बीच हार जीत का अंतर 28 हजार से ज्यादा वोटों का था। इसके बाद स्थिति बदली और 2018 के चुनाव में विजयपाल सिंह को 87488 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के सतपाल पलिया को 76071 वोट मिले। इस बार बीजेपी 2008 के चुनाव से भी कम 11,417 के अंतर से जीती। यदि कांग्रेस अपने वोट बैंक के ट्रेंड का बनाए रखती है तो इस बार पेंच फंस सकता है।
पौधरोपण घोटाला : गनेरा में 10 लाख के पौधे दे रहे छाया…पर इन्हें आम व्यक्ति नहीं देख पाएगा, इन्हें देखने के लिए सरपंच सचिव जैसी दिव्यदृष्टि चाहिए
written by Deepak Sharma | 01/10/2023
Denvapost Exclusive: मध्य प्रदेश के मुखिया (मुख्यमंत्री) शिवराज सिंह चौहान जब हर दिन एक पौधा रोपने का अभियान छेड़े हुए हैं तो ऐसे में माखननगर जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाली पंचायते पीछे कैसे रह सकती है. एक कदम आगे बढ़ते हुए यहाँ कि पंचायत ने अनोखे पौधे लगाए. इन पौधों को आप और हमारे जैसे सामान्य लोगों की आंखें नहीं देख पाएंगी, बल्कि इन्हें देखने के लिए दिव्य दृष्टि की जरूरत होती है जो सरपंच सचिव के पास ही है. देनवापोस्ट एक्सक्लुजीव में बात आज इन्हीं दिव्य पौधों की होगी.
माखननगर जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाली गनेरा पंचायत में सितंबर 2022 से दिसंबर 2022 तक तीन महीनो में ऐसे ही दिव्य पौधे लगाए गए. इन्हें लगाने में थोड़ा बहुत नहीं बल्कि 10 लाख रूपये खर्च किये गए. जब हमें इन पौधों कि जानकारी लगी तो पहले तो मन नहीं मना कि ऐसे भी दिव्य पौधे होते हैं.. पर फिर सच्चाई जानने हम भी गनेरा पहुंच गए… स्पॉट पर जो मिला, उसे देखकर हमारे भी होश उड़ गए… बात झूठी नहीं थी… पौधे हकीकत में दिव्य ही थे… वरना भला ऐसे कैसे हो सकता है कि जिन पौधों को लगाने में कागजों पर 10 लाख रुपए का खर्चा बताया गया वो मौके पर हो ही न. कोई भी सरपंच सचिव इस तरह से मुख्यमंत्री के बड़े अभियान की मिट्टी पलीत थोड़ी ना करेगा… इसलिए हमने भी मान लिया कि दोष न तो पौधों का है… न ही पंचायत का… दरअसल ये पौधे ही दिव्य हैं… जिन्हें देखने के लिए इनके जैसी दिव्य आँखों कि जरूरत पड़ती है जो आपके हमारे पास नहीं है.
पौधे दिव्य थे इसलिए बिंल्डिंग मटेरियल सप्लायर ने उपलब्ध कराए, वरना नर्सरी से मिल जाते
ग्राम पंचायत को पौधरोपण में जो बिल लगाए है उससे तो यही साबित होता है कि पौधे उपलब्ध कराने वाला वेंडर बिंल्डिंग मटेरियल सप्लायर है। जबकि पौधे नर्सरी से मिलते है. पौधे दिव्य थे इसलिए बिंल्डिंग मटेरियल सप्लायर के बिल पंचायत ने लगाए, सामान्य पौधे होते तो नर्सरी का बिल लगाया जाता.
10 लाख खर्च कर दिए मौके पर 10 पौधे भी नही
गनेरा ग्राम पंचायत ने 4 जगहों पर पौधारोपण कराया था। लेकिन जब ग्रामीणों से पौधारोपण के बारे जानकारी ली गई तो उन्होने बताया कि मेन रोड पर ग्राम पंचायत ने कुछ पौधे लगाए गए थे। लेकिन नर्मदा किनारे कोई पौधे नही लगाए गए। पंचायत ने बकायदा दस लाख खर्च पौधारोपण कर दिए लेकिन मौके पर दस पौधे भी नहीं दिख रहे है।
पौधरोपण योजना कामधेनु गाय बनकर आई
पौधरोपण अभियान में पंचायत जनप्रतिनिधि एवं मनरेगा विभाग ने जमकर खर्च किया है. एक पौधें को लगाने में 200 से 300 रूपए खर्च किया। पौधों की खरीद में भी घटिया से घटिया स्तर का पौधा लगाया जो लगते ही सूखने लगे। लेकिन जनप्रतिनिधियों एवं कर्मचारियों इन्हे बचाने के नाम पर भी वारेन्यारे कर लिए। सूत्रो की मानें तो पंचायत में पौधरोपण योजना कामधेनु गाय की तरह आई. एक पौधें की खरीद पर 35 से 100 रूपए खर्च किए गए। इन पौधों को आवारा पशुओं से बचाने के नाम पर घेराव के लिए जाली पर करीब 150 रूपए का बजट पेश किया गया और राशी निकाल ली.
पौधे या तो दिव्य हैं या फिर इन्हें दिव्यता देने वाले जिम्मेदार
हमारे समाज में भ्रष्टाचार अब इतना सहज हो गया है कि कई मामलों में तो हमें यह शिष्टाचार के रूप में ही नजर आता है. ऐसे में संभवत: परंपरागत लेखनी से जिम्मेदारों के कानों पर जूं तक न रेंगे. इसलिए देनवापोस्ट ने इस खबर के लिए दिव्य पौधे जैसे व्यंग का सहारा लिया. पंचायतों में कामों की मॉनिटरिंग करने वाली जिम्मेदार एजेंसियों के जिम्मेदार अफसरों को अब यह तय करना है कि यदि 10 लाख के यह पौधे दिव्य पौधे नहीं है.. तो इन्हें दिव्य बनाने वाले सरपंच सचिव पर कार्रवाई हो… नहीं तो यह मान लिया जाए कि इन जिम्मेदार अफसरों के पास भी दिव्य दृष्टि है जो सरपंच सचिव की तरह इन दिव्य पौधों को देख पा रही है.
जिम्मेदारों ने क्या कहां
ग्राम पंचायत सचिव जय सिंह यह कहकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर लिया कि पौधे लगाए गए थे लेकिन सूख गए । अब हम क्या कर सकते है। जब गनेरा सरपंच कृष्णकुमार झा ( सरपंच संघ अध्यक्ष ) से फोन पर बात करनी चाही तो फोन पर उनसे संपर्क नही हो सका। जब इस संबंध में जनपद सीइओ संदीप डाबर से बात की तो वह भी चौक गए हालाकि उन्होने बताया आप जो इतने बड़े अमाउंट का पौधारोपण बता रहे हो अभी अपनी जनपद पंचायत में कहीं नही हुआ है में पोर्टल में देखने के बाद ही इसबारे कुछ कह सकता हूं।
डॉक्टरों की बनेगी राष्ट्रीय पंजी,डिजिटल पंजीकरण की योजना पर चल रहा है काम
written by Denva Post Bureau | 01/10/2023
denvapost exclusive: देश के सभी डॉक्टरों के डिजिटल पंजीकरण की योजना बन रही है. इस राष्ट्रीय पंजी में चिकित्सकों से संबंधित प्रमुख सूचनाएं, जैसे- डिग्री, विश्वविद्यालय, विशेषज्ञता आदि, भी दर्ज की जायेगी. रिपोर्टों की मानें, तो ये सूचनाएं राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की वेबसाइट पर रखी जायेंगी. पंजीकृत डॉक्टरों को एक विशेष पहचान संख्या भी मुहैया करायी जायेगी. इसके तहत उन्हें चिकित्सा आयोग के एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड की ओर से एक लाइसेंस भी जारी किया जायेगा, जो पांच वर्षों के लिए मान्य होगा.
इस अवधि के पूरा होने के बाद डॉक्टर अपने राज्य की मेडिकल काउंसिल से संपर्क कर लाइसेंस का नवीनीकरण करा सकेंगे. जानकारों का मानना है कि इस पहल से सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि सरकार के पास डॉक्टरों की संख्या, विशेषज्ञता और कार्य स्थल के बारे में जानकारी होगी. इससे नीतियां और योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी. हमारे देश में डॉक्टरों की समुचित उपलब्धता नहीं है. गांवों और दूर-दराज की जगहों में स्थिति और भी खराब है. चिकित्सा का खर्च भी बहुत है.
ऐसे में नीम हकीम और नकली डॉक्टरों की भरमार हो गयी है. इन पर लगाम लगाने के लिए अब तक की गयीं कोशिशें बहुत कामयाब नहीं रही हैं. डिजिटल पंजीकरण होने से यह पता लगाने में आसानी हो जायेगी कि कौन सही मायने में डॉक्टर है और कौन डॉक्टर बनकर लोगों को ठगने में लगा हुआ है. इस नयी व्यवस्था से यह सूचना भी स्पष्ट रूप से उपलब्ध होगी कि कितने डॉक्टर किस चिकित्सा पद्धति के हैं.
साथ ही, किसी बड़े संकट और आपदा की स्थिति में चिकित्सकों की सेवाएं लेने में सुविधा हो जायेगी. आज डिजिटल तकनीक के युग में इस तरह की व्यवस्था करना सुगम भी है. उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार एक स्वास्थ्य काडर बनाने की दिशा में भी अग्रसर है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है.
स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाने के उद्देश्य से सरकार ने केंद्र और राज्य स्तर की स्वास्थ्य योजनाओं के लिए एक कार्ड बनाने की योजना भी लागू की है. राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन के तहत एक ऐसा कार्ड भी बनाया जा रहा है, जिसमें मरीज के उपचार से जुड़ी सभी आवश्यक जानकारियां एक ही कार्ड में संग्रहित होगी.
ऐसा होने से मरीज कहीं भी इलाज हासिल कर सकेगा और उसे अपने सारे दस्तावेज ढोने की जरूरत भी नहीं होगी. इससे कहीं दूसरी जगह बैठा विशेषज्ञ डॉक्टर भी परामर्श दे सकेगा. आयुष्मान भारत योजना का भी डिजिटलीकरण किया गया है. ऐसी तमाम पहलें भविष्य के लिए तकनीक और डाटा का बड़ा आधार बनाने में मददगार साबित होंगी.
9 साल में मोदी सरकार के नौ बड़े फैसले: नोटबंदी से लेकर मेक इन इंडिया तक
written by Deepak Sharma | 01/10/2023
Denvapostexclusive: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने आज 9 साल पूरे कर लिए हैं. 29 मई 2014 को पीएम मोदी ने देश की बागडोर संभाली थी. इसके बाद से पीएम मोदी लगातार प्रधानमंत्री बने हुए है. अपने दूसरे कार्यकाल के भी 4 साल पीएम मोदी ने पूरे कर लिए है. अपने दमदार व्यक्तित्व और करिश्माई नेतृत्व के दम पर पीएम मोदी न सिर्फ भारत के बल्कि दुनिया के वो दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं में शुमार हो गये हैं. पीएम मोदी की लोकप्रियता देश दुनिया में लगातार बढ़ रही है. अपने 9 साल के कार्यकाल में पीएम मोदी और उनकी सरकार ने कई ऐसे काम किये है जो काफी सराहनीय हैं.
देश को नये संसद की सौगात: अपने शासन काल में पीएम मोदी देश को नये संसद भवन की सौगात देने जा रहे हैं. प्रधानमंत्री ने दिल्ली में सेंट्रल विस्टा की शुरुआत की है. जिसके तहत यह निर्माण किया गया है. इसी महीने की 28 तारीख को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला नए संसद भवन को देश को समर्पित करने जा रहे हैं. नया संसद भवन भव्य होने के साथ-साथ कई सुविधाओं से भी लैस है.
नोटबंदी का बड़ा फैसला: अपने 9 साल के शासन काल में पीएम मोदी ने वर्ष 2016 में नोटबंदी जैसा बड़ा फैसला किया था. यह सरकार के चंद बड़े फैसलों में से एक है. इस फैसले से पूरे देश में हड़कंप सा मच गया था. 8 नवंबर साल 2016 को पीएम मोदी ने देश को संबोधित करते हुए नोटबंदी का फैसला सुनाया. साथ ही 500 और 1000 के नोट को चलन से बाहर कर दिया था. उसकी जगह 200 और 2000 नये नोट के चलन की शुरुआत की. मोदी सरकार ने नोटबंदी के जरिए काले धन पर चोट की थी.
कानूनी दायरे में लाया गया तीन तलाक: मोदी सरकार ने जुलाई 2019 में तीन तलाक विधेयक पारित कर तीन तलाक को कानूनी दायरे में ला दिया था. सरकार के इस फैसले के बाद मुस्लिम समाज में तीन तलाक देना अपराध की श्रेणी में आ गया है.
मेक इन इंडिया की शुरुआत: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 के सितंबर महीने में मेक इन इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत की थी. इसका मकसद देश में विनिर्माण को बढ़ावा देना और रोजगार के नये अवसर पैदा करना है. मेक इन इंडिया एक तरह का स्वदेशी अभियान है, जिसमें अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों को शामिल किया गया है. देश ने मेक इन इंडिया के तहत कई उपलब्धियों को हासिल किया है.
Narmadapuram:वाइरल वीडियो की पड़ताल : ग्रामीणों ने जिस प्लास्टिक चावल लेने से किया मना वो है फोर्टीफाइड राइस, अधिकारियों ने क्या गिनाई खूबियां
written by Deepak Sharma | 01/10/2023
Denvapost exclusive :मध्यप्रदेश में फोर्टीफाईड चावल को लेकर पहले से ही ‘जंग’ छिड़ी है। अब ग्राम आंचलखेड़ा में ग्रामीणों ने सोसायटी से चावल लेने मना कर दिया है। उनका कहना है चावल में ‘प्लास्टिक’ मिला चावल आ रहा है वही उसका वीडियों कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर खूव वायरल हो रहा है। जिसे लेकर अधिकारी सख्ते मे आ गए। आखिर यह ‘प्लास्टिक’ जैसा दिखने वाला चावल है क्या? इसे लेकर देनवापोस्ट ने खाद्य विभाग के अफसरों से बात कर सच्चाई जानी। अफसरों का कहना है कि जिसे प्लास्टिक राइस बताया जा रहा है, वह असल में फोर्टिफाइड राइस है, जिसमें जरूरी पोषक तत्व, जो किसी भी इंसान की ग्रोथ के लिए जरूरी है।
फुड इंस्पेक्टर मीनाक्षी दुबे ने बताया कि प्लास्टिक का चावल पूरी तरह से अफवाह है। शासन द्वारा जिले में फोर्टिफाइड चावल का वितरण उपभोक्ताओं को किया जा रहा है। इसमें एनीमिया जैसी कई बीमारियों की रक्षा के लिए जरूरी पोषक तत्व हैं। जिसमें बी-12, आयरन आदि शामिल हैं। गुणवत्ता का परीक्षण पहले ही करा लिया जाता है। उचित मूल्य की दुकानों से सैंपल लेकर जांच भी समय समय पर करवाते हैं। किसी भी उपभोक्ता से अब तक चावल को लेकर कोई शिकायत नहीं है। इसका स्वाद भी बेहतर है और पकने पर भी दिक्कत नहीं है। प्लास्टिक जैसी कोई बात नहीं है। फिर भी माखन नगर तहसीलदार और मै स्वयं आंचलखेड़ा पीडीएस दुकान से सेंपल लेकर जांच करवाती हूं।
पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने भी यह मामला उठाया था।
पूर्व मंत्री और भोपाल से विधायक पीसी शर्मा ने 16 फरवरी को सरकार पर बड़ा आरोप लगाया। शर्मा ने कहा कि सरकारी राशन की दुकानों पर गरीबों को प्लास्टिक वाला चावल बांटा जा रहा है। पीसी शर्मा ने प्लास्टिक के चावल भी मीडिया को दिखाए। शर्मा ने कहा- राशन की दुकानों पर प्लास्टिक का चावल दिया जा रहा है। जिन लोगों को ये चावल दुकानों से दिए गए, उन्हीं लोगों ने मुझे ये चावल दिए हैं। सरकार गरीब कल्याण की बात करती है और गरीबों के घरों में प्लास्टिक का चावल मिक्स करके दिया जा रहा है।
अब जानते हैं यह फोर्टिफाइड राइस आखिर है क्या?
फोर्टिफाइड राइस का मतलब है पोषणयुक्त चावल। इसमें आयरन, विटामिन B-12, फॉलिक एसिड जैसे पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में होते हैं। पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा की वजह से फोर्टिफाइड राइस की न्यूट्रीशनल वैल्यू भी काफी ज्यादा होती है, यानी इस चावल का सेवन करने वाले लोग कुपोषण का शिकार नहीं होते।
कैसे तैयार होता है फोर्टिफाइड चावल
जानकारों की मानें तो फोर्टिफाइड राइस में जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व, विटामिन और खनिज की मात्रा को कृत्रिम तरीके से बढ़ाया जाता है, जिस तरह साधारण समुद्री नमक में आयोडीन मिलाकर उसे आयोडाइज्ड बनाया जाता है, इसी प्रकार चावल को फोर्टिफाइड बनाना भी इसी तरह की एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में चावल की पोषण गुणवत्ता में सुधार लाया जाता है। चावल का फोर्टिफिकेशन, चावल में आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाने और चावल की पोषण गुणवत्ता में सुधार करने का बेहतरीन तरीका है। यह सर्टिफाइड राइस मिलों में ही तैयार हो रहा है।
अफसरों के अनुसार- ये हैं फोर्टिफाइड राइस के फायदे
फोर्टिफिकेशन की प्रक्रिया के जरिये कम से कम जोखिम के साथ लोगों में कुपोषण को दूर कर सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा दी जा सकती है।
यह चावल लोगों के खाने के साथ-साथ दवा की तरह भी काम कर सकता है।
इस चावल का सेवन करने से कुपोषण की समस्या दूर करने में मदद मिलती है।
इस तरह के चावल में पाए जाने वाले आयरन, जिंक, फोलिक एसिड, विटामिन-ए, विटामिन-बी आदि शरीर की न्यूट्रीशनल वैल्यू बढ़ा देते हैं।
इसका सेवन करने से खासकर बच्चों और महिलाओं के स्वस्थ विकास में खूब मदद मिलती है।