भोजन की बरबादी रोकने का प्रयास जरूरी

भोजन की बरबादी को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में प्रतिदिन लगभग एक अरब थालियां बरबाद होती हैं, यानी हर व्यक्ति एक वर्ष में औसतन 79 किलो खाना बर्बाद करता है. जो चिंता का विषय है. यह भी माना जाता है कि दुनिया में कुल पैदावार का लगभग 30 प्रतिशत बरबाद हो जाता है. अकेले अमेरिका में जितना भोजन बरबाद होता है, वह उप-सहारा अफ्रीका की भोजन की जरूरतों को पूरा कर सकता है. वहीं इटली में होने वाली बरबादी से इथियोपिया में भोजन की कमी पूरी हो सकती है. खाने की यह बरबादी कुल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में एक-तिहाई का योगदान देती है. रिपोर्ट में भोजन की बरबादी के कारण उत्सर्जित होने वाली ग्रीन हाउस गैसों का जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और पोषण पर पड़ने वाले प्रभावों पर भी चर्चा है. यह अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि खाद्य सुरक्षा के साथ पर्यावरण बचाने की बात भी हो रही है.

उपरोक्त चर्चा के साथ हमें दुनिया में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता के बारे में भी जानने की आवश्यकता है. अभी दुनिया में करीब 7.8 अरब लोग हैं, जिनके 2050 तक नौ अरब तक पहुंचने का अनुमान है और दुनिया में जो पैदावार हो रही है, वह 14 अरब लोगों के लिए पर्याप्त है. इसका अर्थ हुआ कि आज हम अपनी जरूरत से दोगुना उत्पादन कर रहे हैं. यह अलग बात है कि समाज के एक हिस्से को इसकी अधिक मात्रा उपलब्ध है, जबकि दूसरा इसकी कमी से जूझ रहा है. जहां 30 प्रतिशत बच्चे मोटापे से ग्रस्त हैं, वहीं दुनिया की 12 प्रतिशत जनसंख्या के पास पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं है. इसे समझने के बाद हमें इस समस्या के समाधान के लिए दो तरह से प्रयास करने होंगे.

पहली, दुनिया के बिगड़ते पर्यावरण को देखते हुए हम पैदावार उपजाने पर कम जोर दें और दूसरी, भोजन की बरबादी रोकने का प्रयास करें. इससे हम दुनिया की जरूरत को तत्काल पूरा कर सकते हैं. इस प्रकार भोजन की बरबादी भी कम होगी और हमें जरूरत से अधिक पैदावार भी नहीं उपजाना पड़ेगा. यहां हरित क्रांति की तरह ही एक और क्रांति की जरूरत है. जिस तरह हम हरित क्रांति लाये, उसी तरह भोजन की बरबादी रोकने के लिए क्रांति लाने की जरूरत है. यदि यह क्रांति होती है तो धरती, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधन, जैव-विविधता, वन भूमि, सभी को पहुंचने वाला नुकसान कम हो सकता है. इस कार्य में सभी देशों को सहभागिता करनी होगी, विशेषकर विकासशील देशों को, क्योंकि यहां अधिक क्षति पहुंच रही है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भोजन की जो बरबादी होती है, उसमें 60 प्रतिशत घरेलू स्तर पर, 13 प्रतिशत आपूर्ति-शृंखला में होती है. सबसे कम बरबादी रिटेल, यानी दुकानों में होती है. ग्रामीण क्षेत्रों में भोजन की सबसे कम बर्बादी की बात भी रिपोर्ट में है. इसका कारण हमारा धर्म है, जो हमें बताता है कि हम अपने साथ-साथ पशु-पक्षियों के भी भोजन का ध्यान रखें. वास्तव में जब हम खाद्य सुरक्षा की बात करते हैं, तो इसमें मनुष्य के साथ पशु-पक्षी भी शामिल होते हैं. गांवों में लोग मनुष्यों के साथ गाय, कुत्ते, पक्षी आदि की खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित करते हैं. इतना ही नहीं, यहां खाद्य पदार्थों के न खाये जाने वाले भाग समेत बचा हुआ भाेजन भी बर्बाद नहीं होता, बल्कि उनका कंपोस्ट बना दिया जाता है. ऐसे में हमें भोजन की बरबादी रोकने के लिए ग्रामीण क्षेत्र से सीखने की आवश्यकता है.

शहरों की मानसिकता में पशु-पक्षियों को खिलाने की बात है ही नहीं. वास्तव में, गांवों में मनुष्य और पशु-पक्षियों के बीच का संबंध घनिष्ठ होता है. यह भी कहा जाता है कि खाने की बरबादी गरीब लोग करते हैं, जो सच नहीं है. बरबादी वो करते हैं, जो शहरों में रहते हैं, जो पढ़े-लिखे हैं. गरीब, ग्रामीण तो अपना बचा रहा है. रिपोर्ट में जी-20 के देश (ऑस्ट्रेलिया, जापान, यूके, अमेरिका) और यूरोपीय संघ द्वारा भोजन की बरबादी को घरेलू स्तर पर रोकने में सफलता प्राप्त करने की भी चर्चा है. कनाडा और सऊदी अरब ने भी इस मामले में अच्छी सफलता प्राप्त की है. बाकी के देशों को अभी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाने की जरूरत है.

इन बातों के अलावा यहां कुछ और महत्वपूर्ण बातों पर चर्चा जरूरी है. पहली बात, हमारे यहां कहा जाता है कि देश का 40 प्रतिशत भोजन बरबाद हो जाता है. तीस वर्ष पूर्व भी यही बात कही जाती थी और आज भी यही बात कही जा रही है. पर किसी को नहीं पता कि इस आकलन का आधार क्या है. लुधियाना स्थित आइसीएआर के संस्थान सीफेट (सीआइपीएचइटी) द्वारा भारत में भोजन की बर्बादी पर किये गये एक अध्ययन में सामने आया है कि खाद्यान्न के भंडारण में सबसे कम नुकसान धान और गेहूं का होता है. सबसे अधिक बरबादी फल और सब्जियों की होती है. इसमें भी कुछ फल, जैसे अमरूद का सबसे अधिक नुकसान होता है, क्योंकि उसे पक्षी बहुत खाते हैं.

इसी तरह टमाटर भी बहुत बरबाद होता है. इससे पता चलता है कि हमारे देश में 40 प्रतिशत का जो आंकड़ा है, वह गलत है. दूसरी बात, शहरों में बरबादी को रोकने के लिए जागरूकता बढ़ाने की ओर भी ध्यान देना होगा. इसमें मीडिया की भूमिका और सेलिब्रिटीज- विशेषकर फिल्म स्टार, क्रिकेटर- की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. उन्हें समाज को जागरूक करना चाहिए कि भोजन को बरबाद होने से कैसे बचाया जाए. रही बात सरकार की, तो वह अपनी नीतियों में फूड वेस्टेज रोकने की बातें तो करती है, परंतु उसे दूसरी वेस्टेज की तरफ भी ध्यान देने की जरूरत है. खाद्य पदार्थों की बर्बादी दो तरीके से होती है. एक जो भोजन खाने के बाद बर्बाद हुआ. दूसरी बरबादी आपूर्ति-शृंखला में होती है, उसे रोकने के लिए भी कदम उठाने की जरूरत है.

तीसरी बात, प्रोसेसिंग के समय खाद्य पदार्थों के बर्बाद होने से तो अपशिष्ट उत्पन्न होते ही हैं, जिस पैकेट में ये पदार्थ बिक्री के लिए रखे गये होते हैं, वे भी अपशिष्ट ही बनते हैं. जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता है. इन्हें कैसे रोका जाए, इसे लेकर अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. कुल मिलाकर देखा जाए, तो संयुक्त राष्ट्र ने एकदम समय पर यह चेतावनी दी है. मुझे लगता है कि हमें अपनी नीतियों में परिवर्तन करना चाहिए, विशेषकर पोषण सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन को लेकर. अंत में, हमें पैदावार बढ़ाने पर जोर देने की जरूरत नहीं है. आज हम जितनी फसल उपजा रहे हैं, अगर उसी को सहेज लें, तो दूसरी हरित क्रांति की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)




Narmadapuram News: स्वच्छता के बहाने ग्राम पंचायत फर्मों को कर रही मालामाल

नर्मदापुरम: स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत नर्मदापुरम जिले की सात जनपद की 425 ग्राम पंचायतों में अधिकतर पंचायतों में तीन गुनी ज्यादा कीमत पर एसबीएम सामग्री खरीदी गई हैं। हैरत की बात है कि पंचायतों में ये सामान जा रहे हैं लेकिन ग्राम सरपंचों और सचिवों को ये पता ही नहीं है कि ये किसके द्वारा भेजे जा रहे हैं।

सतपुड़ा का नार्मल रिक्शा e riksha से महंगा

ग्राम पंचायतों को फर्मों के खाते में भुगतान करने को कहां जा रहा हैं। जिन ग्राम पंचायतों में ये एसबीएम के तहत सामान खरीदें जा रहे हैं, उनकी कार्ययोजना में इनकी खरीद का कहीं कोई जिक्र ही नहीं है। लाखों के इस खेल में अधिकारियों के शामिल होने की बात सामने आ रही है।

सारंगपुर की E रिक्शा का बिल

स्वच्छ भारत मिशन के तहत कूड़ादान से लेकर रिक्शा पहुंचाने के नाम पर जो भुगतान किया गया हैं, उनको लेकर पंचायत  विभाग के जिम्मेदार भी चुप्पी साधे हैं। सूत्र बताते हैं कि जिला प्रशासन के जिम्मेदार अगर सिर्फ माखन नगर की सभी ग्राम पंचायतों की निधियों के खाते का ब्यौरा मांग लें, तो सारा खेल खुल जाएगा। यह बात और है कि स्वच्छ भारत मिशन का नाम जुड़ा होने के कारण अफसर खातों का ब्यौरा निकलवाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

यहां से तीनों फर्म संचालित हो रही है

पुलिस अधिकारी के बंगले को बनाया ऑफिस

सबसे खास बात यह है कि तीनों फर्म गोमती इंटरप्राइजेस, बल्लु इंटरप्राइजेस एवं सतपुड़ा मेनिफेक्चरिंग प्रा लि भोपाल के एक पुलिस अधिकारी के बंगले से संचालित हो रही है। जब denvapost तीनों फर्मों के पते जानकारी ली तो चौंक गए कि यह तीनों फर्में एनएस दामले के बंगले जो कि अशोका गार्डन भोपाल में वहां से संचालित हो रही है लेकिन जब आसपास के लोगो से पूछा तो उन्होंने बताया कि यहां ऐसी कोई फर्म नही है। यह तो पुलिस अधिकारी का बंगला हैं।

GeM पोर्टल ने रखी एसबीएम में भ्रष्टाचार की नीव

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए साल 2016 में GeM (Goverment E Marketplace) पोर्टल की शुरुआत की थी। लेकिन एसबीएम में भ्रष्टाचार की नीव इसी पोर्टल के माध्यम से रखी गई। ग्राम पंचायतों में खरीदी gem पोर्टल से बाज़ार से करीब 75 फीसदी महंगे दामों पर खरीदी जा रही है। यह बात समझ से परे है कि अधिकारी की ऐसी क्या मजबूरी है कि किसी पर भी कार्यवाही करने से बच रहे हैं।

व्यवस्थित तरीके से किया गया खेल

एसबीएम में खरीदी का खेल इतने व्यवस्थित तरीके से किया गया कि कोई इसे पकड़ ही नहि पाए। सबसे पहले इसके समान की खरीदी के लिए एक फर्म की आवश्यकता थी जिसे 2021 में बनाया गया। जिसका नाम गोमती इंटरप्राइजेस रखा गया। उसके बाद Gem पर भी रजिस्टर करा जिससे की सरकारी पोर्टल से खरीदी बता सके। अब बारी थी पंचायतों को खरीदी के लिए मानने की। सूत्रों देनवा पोस्ट को मिली जानकारी के अनुसार कुछ पंचायत तो आसानी से मान गई जो नही मानी उन पर दबाव बनाकर मना लिया गया।

GeM पोर्टल से दूरी बनाना पंचायत को पड़ा महंगा

सरपंच सचिवो को बिना बताए ही उनकी पंचायतों में समान पहुंचाया जा रहा है। इस काम को इतने व्यवस्थित तरीके से अंजाम दिया जा रहा है कि अगर जांच की गाज गिरे भी तो सरपंच और सचिव ही फसेंगे क्योंकि GeM पोर्टल 2016 में लांच हुआ था। तब से सरकार की मंशा थी कि खरीदी सरकारी पोर्टल के माध्यम से हो। लेकिन पंचायतों ने इस से खरीदी में कोई रुचि नहीं दिखाई जबकि GeMid सभी पंचायतों की बनी हुई हैं। बस यहीं पंचायतों से गलती हो गई और उन्होने ऑनलाइन की जगह आफ लाइन GeM पोर्टल पर आर्डर का रास्ता खोल दिया और बकायदा उनसे  खाली फार्म पर सहमति ली गई। उसके बाद फार्म में सामान की मात्रा को भरा गया।  जाने अंजाने में समान का आर्डर दे दिया  और पता ही नही चला कि आर्डर उनके द्वारा दिया गया। जिन पंचायतों के खातों में राशी थी। वहां सामान भेजकर भुगतान भी करा लिया गया।

यह वही फार्मेट जो पंचायतों से भरवाए गए

इतना सब हुआ किसी को खबर ही नहीं

ग्राम पंचायतों ने एसबीएम की सामग्री के ऑर्डर इन वेंडरों को कभी दिए ही नही फिर वेंडरों सप्लाई  कैसे की बिना किसी की मिली भगत के यह कैसे संभव हुआ।

जब पंचायतों ने ऑर्डर दिया ही नहीं दिया तो फिर भुगतान कैसे किया जा रहा हैं इन वेंडरों को। आश्चर्य की बात यह है कि एक पंचायत में सचिव मेडिकल पर होने के बाद भुगतान कर दिया गया।

हर साल वेंडर द्वारा फर्म के नाम और प्रो. बदलकर सप्लाई  की जबकि तीनों फर्म का आपस मे संबंध रखती है। क्योंकि प्रशांत दामले (गोमती इंटरप्राजेज), योगेश दामले(बल्लू इंटरप्राजेज) एवं विवेक दामले सहित दोनो भाई (सतपुड़ा मैन्युफैक्चरिंग) में पार्टनर हैं।ऐसा इन फर्मों ने क्यों किया यह जानना किसी ने उचित समझा हो नही।

विगत तीन वर्षो में फर्मों ने पंचायतों में लाखों का माल सप्लाई कर बारे न्यारे कर लिए लेकिन अधिकारियों को भनक तक नहीं लगी यह कैसे संभव हैं?

बस सामान रखवा लो और पावती दे दो

नर्मदापुरम जिले के अलग-अलग गांवों के सरपंचों और सचिवों से देनवापोस्ट ने बातचीत की। नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने बताया कि उन्हें नहीं मालूम कि किसके निर्देश पर एसबीएम की सामग्री उनके गांव में आ रही हैं। सरपंचों से बातचीत में पता चला कि पंचायत विभाग के एक अधिकारी ने सिर्फ इतना कहा कि बस सामान रखवा लो और पावती दे दो।

हालांकि कुछ सरपंचों ने इसका विरोध भी किया लेकिन बाद में इनका भुगतान ग्राम पंचायत के खाते से कर दिया गया । वही एक लोकल वेंडर ने बताया कि पंचायतों में हमारे भुगतान में महीनों लगते है लेकिन कुछ विशेष फर्म को तुरंत बिना शर्त भुगतान किया जा रहा हैं।

मुझे इसकी जानकारी नहीं हैं कि ऐसा कुछ हुआ

जब देनवापोस्ट इस संबंध में एड. सीईओ एससी अग्रवाल से बात की तो उन्होंने ने बताया कि GeM पोर्टल से खरीदी की गई । ऐसा कुछ हुआ है मुझे इसकी जानकारी नहीं है।




रोकना होगा भूजल का मनमाना दोहन

भारी मात्रा में पानी का इस्तेमाल करने वाली गुजरात की एक फैक्ट्री के सामने एक समस्या थी- गर्मी का मौसम आ रहा था. जितनी आपूर्ति होनी थी, वह नहीं हो पा रही थी. पानी कम खपत करने की कोशिशों के बावजूद पानी की बड़ी कमी थी, जिससे फैक्ट्री बंद हो सकती थी. ऐसे में प्रबंधक को लगभग 1500 रुपये प्रति 5000 लीटर की दर से पानी टैंकर खरीदने को मजबूर होना पड़ा. वह अधिक दाम देने को भी तैयार था. उसे हर दिन सैकड़ों टैंकर की जरूरत थी. पड़ोस के किसानों के लिए यह अच्छी खबर थी, उनमें से अधिकतर के पास कुएं और पंपिंग सेट थे, जिनसे उनकी फसलों को पानी मिलता था. पर फैक्ट्री को पानी बेचना अधिक लाभप्रद था. ऐसे में फैक्ट्री भी अपने उत्पादन को जारी रखकर मुनाफा बना सकती थी और किसान पानी बेचकर अधिक कमाई कर सकते थे. लेकिन सामाजिक दृष्टि से यह लाभदायक स्थिति नहीं है.

पहली बात तो यह है कि कोई भले अधिक दाम देने को तैयार है, पर भूजल का मनमाना दोहन नहीं किया जा सकता है. भूजल स्तर में कमी के सामाजिक घाटे की तुलना में निजी लाभ बहुत मामूली हैं. दूसरी बात, फसलों से पानी को फैक्ट्री की ओर मोड़ना निजी तौर पर समझ की बात भले हो, पर सामाजिक रूप से इसे अधिक समय तक जारी नहीं रखा जा सकता. ऐसे में किसानों के पास कुएं होने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें भूजल के अंतहीन दोहन का असीमित अधिकार है. वैसे भी अनुदान के चलते मिलने वाली सस्ती बिजली से पानी निकालने में बहुत कम खर्च आता है. यह कहानी हजारों तरह से दोहरायी जा रही है. अगर धनी देशों के ग्राहक बासमती की अधिक कीमत देने लगें, तो क्या हम चावल का अंधाधुंध निर्यात कर सकते हैं? अगर किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद मिलती हो, तो आम तौर पर फसलों के निर्यात पर लगे सभी अवरोध हटा दिये जाने चाहिए. पर तब इसका मतलब होगा पानी का निर्यात, भारत में जिसकी बड़ी कमी है. पिछले साल भारत ने 2.20 करोड़ टन चावल के निर्यात से लगभग 90 हजार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा कमायी थी. लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि कम से कम 88 लाख करोड़ लीटर पानी का निर्यात हुआ. हमारे देश में पानी के बड़े अभाव के कारण उस पानी की कीमत कमायी गयी विदेशी मुद्रा से कहीं बहुत अधिक है.

यही बात चीनी निर्यात के साथ भी लागू होती है. पानी की बड़ी खपत वाली फसलों को ऊंची कीमत पर बेचने का तर्क वैसा ही है, जैसा उद्योगों द्वारा निजी कुओं से पानी खरीदने का तर्क, जो असल में खेती के लिए है. हमें केवल 22 मार्च को मनाये जाने वाले विश्व जल दिवस के अवसर पर पानी की कमी पर विचार नहीं करना है. भारत के पास दुनिया के ताजे पानी का महज दो प्रतिशत हिस्सा है, पर वैश्विक जनसंख्या का 17 प्रतिशत भाग है. बेंगलुरु में काम छोड़कर एक बाल्टी पानी के लिए लोगों का लंबी कतार में खड़ा होना एक गंभीर चेतावनी है. कुछ साल पहले महाराष्ट्र के लातूर में रेलगाड़ियों से बहुत बड़ी मात्रा में पानी की कई खेप भेजनी पड़ी थी. कई बार थर्मल बिजली संयंत्रों को बंद करने की नौबत भी आ चुकी है क्योंकि मशीनों को ठंडा रखने के लिए समुचित पानी उपलब्ध नहीं था. ऐसी घटनाओं से 2017 और 2021 के बीच 8.2 टेरावाट घंटे की बिजली के नुकसान का अनुमान है, जो 15 लाख घरों की बिजली आपूर्ति के बराबर है. द वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टिट्यूट का कहना है कि भारत और चीन जैसे देशों में खराब जल प्रबंधन से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सात से 12 प्रतिशत का नुकसान हो सकता है.

जब किसी देश में इस्तेमाल होने लायक पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1700 क्यूबिक मीटर से कम होती है, उसे जल दबाव वाला देश कहा जाता है. भारत में यह आंकड़ा 1000 से बहुत नीचे है, जबकि अमेरिका में यह उपलब्धता 8000 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति है. भारत में 1951 में पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 3000 क्यूबिक मीटर से अधिक थी. स्पष्ट है कि पानी का यह दबाव आबादी बढ़ने की वजह से है. इसके साथ-साथ पानी आपूर्ति के मौजूदा स्रोतों की गुणवत्ता भी घटती गयी है. ऐसा समुचित जल शोधन नहीं होने तथा आर्सेनिक जहर जैसी चीजों के कारण हुआ है. केंद्रीय जल शक्ति मंत्री ने संसद को बताया था कि देश में भूजल में 230 जिलों में आर्सेनिक और 469 जिलों में फ्लोराइड पाया गया है. भूजल में प्रदूषण से पानी की कमी की समस्या और गंभीर हो जाती है. फिर भूजल के मनमाने दोहन ने स्थिति को विकट बना दिया है. अजीब है कि इसमें सस्ती या मुफ्त बिजली आपूर्ति से मदद मिलती है, जिसका उत्पादन पानी की कमी से बाधित होता है. पानी की कमी की समस्या से निपटना हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए और इसके लिए सरकार के हर स्तर से लेकर समाज और परिवार तक प्रयास होने चाहिए. समाधान के लिए निम्न पहलुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है.

सबसे पहले जल संरक्षण, जिसमें वर्षा जल संग्रहण भी शामिल है, होना चाहिए. फिर सही इस्तेमाल पर जोर दिया जाना चाहिए और अधिक खपत वाली फसलों से विमुख होना चाहिए या कम से कम तरीका बदलना चाहिए. तीसरी बात यह है कि पुनः उपयोग और रीसाइक्लिंग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. पीने, खाना बनाने और नहाने के अलावा लगभग 90 फीसदी इस्तेमाल के लिए रीसाइकिल पानी काम में लाया जा सकता है. पुणे में ऐसे संयंत्र शुरू किये गये हैं, जिनसे लोग एक एप के जरिये रीसाइकिल पानी का एक टैंकर मुफ्त मंगा सकते हैं. चौथी बात, एक ठोस नीति और नियमन की आवश्यकता है. पांचवां पहलू है अच्छे जल प्रबंधन के लिए तकनीक का इस्तेमाल और जलाशयों को पुनर्जीवित करना. तमिलनाडु जैसे राज्यों में ऐसे प्रयास हुए हैं. पानी के संबंध में ही नहीं, प्लास्टिक का कम उपयोग या पटाखे नहीं चलाने जैसे मामलों में भी जन जागरूकता बढ़ाना बहुत प्रभावी हो सकता है. बच्चों को जागरूक करना दीर्घकालिक रूप से उपयोगी हो सकता है. हाल में एक विज्ञापन में बच्चों को गीत गाते हुए पानी निकालते दिखाया गया है, पर वहां पानी उपलब्ध नहीं है. यह जल संकट के प्रति आगाह करने के प्रभावी प्रचार का एक अच्छा उदाहरण है. इस विश्व जल दिवस के अवसर पर हम अपने सबसे कीमती संसाधन को बचाने का संकल्प दोहराना चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)




Makhannagar News : पंचायत में कर रहे रिश्तेदार काम, हो रहा लाखो का भुगतान!

दीपकशर्मा / माखन नगर : जिले की ग्राम पंचायत में नित नए फर्जीवाड़े सामने आ रहे हैं। अब माखन नगर जनपद पंचायत के ग्राम नया चूरना में एक नया मामला सामने आया है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत की महिला सरपंच ने अपने परिवार के लोगों को पंचायत में काम देकर लाखों का भुगतान कर दिया है। दो साल से महिला सरपंच अपने पति के साथ मिलकर पारिवारिक लोगों को भुगतान कराती रही है। लेकिन इस बात की भनक जनपद स्तर के अधिकारियों को तक नहीं लगी।

आरटीआई में खुलासा हुआ कि ग्राम पंचायत नयाचूरना की महिला सरपंच ममता यादव ने अपने पति मुकेश यादव के साथ मिलकर अपने परिवार के सदस्योंं के नाम पर लाखों के बिल लगाकर भुगतान कराया है। सरपंच ​पति मुकेश यादव पर यह कहावत ठीक बैठती है कि “सैयां भये कोतवाल, अब डर काहे का” क्योकि पंचायत की व्यवस्​था इन्ही के हाथों में है। ग्राम पंचायत में मिठाई, भोजन, साफ सफाई, मटेरियल आदि सामान भांजे, देवर और ससुर से खरीदना दर्शा दिया है। दो साल में दो लाख से ज्यादा के बिल का भुगतान इन लोगो को किया गया है। मामला उजागर होने के बाद अधिकारी जांच कराकर कार्रवाई की बात कह रहे हैं। जिले में ऐसी पंचायत, जो सरपंच अथवा सचिव के परिजन के खातों में भुगतान हो रहा हैं। कहीं न कहीं मिलीभगत से ग्राम पंचायतों में बिल का भुगतान इसी तरह हो रहा है।

नयाचूरना पंचायत के 2 लाख 24 हजार 500 का भुगतान हुआ

सूत्रों की माने तो जिन तीन लोगों को पंचायत मेंं काम दिया गया वह महिला सरपंच के रिश्तेदार हैं। शोनू यादव (भांजे)के खाते मेंं दो साल में एक लाख 12 हजार रु. की बड़ी राशि का भुगतान हुआ, जबकि बड़े ससुर मोहन यादव के खाते में 58 हजार रु. के चार बिल लगाकर भुगतान हुआ है। वही राजेश यादव ( देवर) के खाते में 54 हजार 500 रु का भुगतान हुआ है। इस तरह कुल 2 लाख 24 हजार 500 रुपए के बिलों का भुगतान हुआ है।जो पंचायत राज अधिनियम 1993 के मुताबिक गलत है।

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एक व्यक्ति एक समय में दो जगह कैसे

एक व्यक्ति एक समय में दो जगह कैसे हो सकता है। इस तरह का काम तो सिर्फ नया चूरना पंचायत में संभव है। जहां सोनू यादव कंप्यूटर ऑपरेटर ने फरवरी 2023 से मई 2023 तक पंचायत में ऑपरेटर का कार्य किया जिसका बकायदा भुगतान भी किया गया। वहीं सोनू यादव ने एक सीसी रोड के निर्माण में मनरेगा मस्टर पर 22 मई से 31 मई तक काम किया। ऐसे ही सोनू ने जून 2023 से अक्टूबर 2023 तक कंप्यूटर ऑपरेटर का कार्य पंचायत में किया। जिसका ₹9000 महीने के मान से 4 माह का 36000 रुपए भुगतान किया गया। वही सोनू यादव 3 जून से 14 जुलाई तक करीब एक महीने मनरेगा मस्टर पर भी काम करना दिखाया गया जिसका भुगतान उन्हें 9724 किया गया। कंप्यूटर ऑपरेटर पंचायत के काम में कितना मसरूफ हो गया की वह कब ऑपरेटर से मनरेगा मजदूर बन गया उसे पता ही नहीं चला और ऑपरेटर का काम करते हुए अपने मस्टर भी मनरेगा पर चला दिए।

ज्ञात हो कि पंचायत राज अधिनियम 1993 के मुताबिक ग्राम पंचायत के सरंपच, पंच और सचिव तथा उनके स्वजन संबंधित पंचायत में निर्माण या किसी भी कार्य का स्वयं या स्वजन  का बिल नहीं लगा सकते, लेकिन इसे नजरअंदाज कर ग्राम पंचायत नया चूरना के सरपंच ममता यादव  द्वारा अपने ही पंचायत नया चूरना में अपनो के नाम से लाखों रुपये का बिल लगा दिए गए। 

उल्लेखनीय है कि माखननगर जनपद की ग्राम पंचायत नयाचूरना में ममता यादव सरपंच है। उसी पंचायत में ही रिश्तेदारोंं को वेंडर बनाकर करीब दो लाख रुपये के बिल लगाकर राशि का आहरण किया है। जबकि पंचायत राज अधिनियम 1993 के धारा 40 ग में स्पष्ट लिखा हुआ है कि सरपंच अपने परिवार के सदस्यों को पंचायत में लाभ नहीं दिला सकता।
लेकिन नयाचूरना सरपंच ने नियम विरुद्घ अपने पंचायत में अपने रिश्तेदारोंं को लाभ दिला दिया। जब इस संबंध में देनवापोस्ट ने ग्राम पंचायत नयाचूरना के सरपंच से मोबाईल पर बिल के संबंध में बात करनी चाही तो उनसे संपर्क नही हो सका।

गड़बड़ी पाई गई तो निश्चित तौर पर कार्रवाई करेंगे

जनपद सीईओंं संदीप डाबर ने बताया कि ग्राम पंचायत नयाचूरना की सरपंच द्वारा यदि रिश्तेदारोंं को पंंचायत में काम देकर भुगतान कराया गया तो इसकी हम जांच कराएंगे। मामला गड़बड़ पाया जाता है, तो निश्चित तौर पर कार्रवाई करेंगे।




Makhannagar News : घोटालों का पौधारोपण, जेबों में बढती रही हरियाली।

दीपकशर्मा / माखननगर : जनपद पंचायत माखन नगर की 64 ग्राम पंचायतों ने बीते साल धरती को हरा भरा करने में लाखो रुपये खर्च कर दिए। ग्राम पंचायत ने खाली पड़ी जमीन हो या फिर तालाब का किनारा या स्कूल का परिसर सभी जगह पर योजना की राशी से पौधे इस बार भी रोपित किए गए। जो कुछ दिनों बाद हर बार की तरह नजर नहीं आयेंगे। सही मायने में धरती में हरियाली आए या न आए पर जेबों में हरियाली आना तय है।
ऐसा ही मामला जनपद पंचायत माखननगर की ग्राम पंचायत मढ़ावन में देखने को मिला , जहां पौधे रोपण के लिए पंचायत भारी भरकम बजट दिया गया। सितंबर 2022 एवं सितंबर 2023  में पौधरोपण सप्ताह मनाते हुए हजारों रुपए खर्च भी कर पौधे रोपित कर दिए गए। हरियाली के नाम पर सरकारी पैसे को ठिकाने लगाने के लिए पंचायत में नए नए प्रयोग किए गए। खरीदी पौधो कि हुई लेकिन बिल बिल्डिंग मटेरियल के लगाए गए। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि बिल्डिंग मटेरियल वाले कब से पौधे बेचने लगे हैं। इतना ही नहीं पौधों के सरंक्षण के लिए मजदूर भी कागजों पर ही नजर आये हैं। 

वर्ष वार पौधे रोपण पर हुए लाखों खर्च

मनरेगा के तहत 2022 से 2023 तक एक वृहद पौधे रोपण का कार्यक्रम चालू किया गया था। जिसमें मढ़ावन पंचायत में 12 लाख 34 हजार रुपये के पौधरोपण होने थे। पंचायत ने एक लाख रुपए का भुगतान स्थानीय बिल्डिंग मटेरियल सप्लायर को नवंबर 2022 किया था। बाद में पौधों की आपूर्ति किए जाने का दावा किया गया। लेकिन पौधे कब आये और कब रोपित किये गये इसका कुछ पता ही नहीं चला। लेकिन मजदूरों को करीब 50 हजार भुगतान किया गया। बात करे 2023 और 2024 में 4 लाख 80 हजार रुपए पंचायत का बजट निर्धारित था इसमें भी लगभग 75 हजार रुपए हरियाली पर खर्च किए गए। लेकिन उस समय रोपित किए गए पौधे कहा है इसकी जानकारी किसी को नहीं है।

खर्च का पता, पौधे का कुछ पता नहीं

ग्राम पंचायत  मढ़ावन में पौधरोपण पंचायत की खाली पड़ी जमीन में प्रत्येक वर्ष लाखों रुपए खर्च किए जा रहे है। इन वर्षो में पौधे की खरीद के साथ ही गांवों में पौधों को लगवाने के लिए गड्ढों की खुदाई तक का बजट तय किया जाता है। इस पर खर्च का तो मढ़ावन पंचायत में वर्ष वार लेखा जोखा है लेकिन इस खर्च में कितने गड्ढे कहा खुले और कितने पौधे लगे यह किसी को जानकारी नहीं है।

यहां पौधे ही नही मजदूरों का हों रहा भुगतान

पौधों का पता नहीं देखरेख करने वाले पा गए मजदूरी

पौधरोपण को लेकर सबसे मजेदार बात यह है कि  वर्ष 2023 – 24 में मढ़ावन में जो पौधे रोपण होने थे वह पौधे कभी खरीदे ही नही गए। फिर पौधों के देखरेख और सिचाई कराने के लिए मजदूरों को भुगतान कैसे कर किया गया। समझ से परे है,शायद यही कारण है कि यह सवाल आते ही सरपंच और कर्मचारी बगले झांकने लगते हैं।

उन्हीं स्थानों पर हो रहा हर वर्ष पौधरोपण

लगभग प्रत्येक वर्ष होने वाले पौधरोपण अभियान में स्थान का चयन ही सारी पोल खोलने के लिए काफी है। जानकारों की माने तो लगभग हर बार स्कूल, पंचायत भवन से लेकर दूसरे खाली स्थानों पर पौध रोपण हर बार किया जाता है। लेकिन जब उन स्थानों पर देखा जाए तो पौधे वहां पर नजर नहीं आते हैं। मजे की बात यह है कि इस हकीकत को देखने के बाद भी अधिकारी मौन रहते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हर बार रोपित होने वाले पौधे गए तो कहा गए जब उनकी देखरेख के नाम पर भी बराबर धन खर्च होता रहा।

पंचायत में पौधरोपण पर आठ लाख खर्च की तैयारी

बीते वर्षो के भांति इस वर्ष भी  पौधरोपण का खेल शुरू होने वाला है  पंचायत दो जगह शान्तिधाम एवं खेल मैदान में वृक्षारोपण करने की तैयारी में है। इन दोनो जगह के लिए पंचायत ने करीब आठ लाख की टीएस करा रखी है। सरपंच को एक बार फिर हरियाली के नाम पर खेल खेलने का मौका हाथ आ गया है। 

ऐसी ईमानदारी कही नही देखी 

जब देनवापोस्ट इस संबंध में मढ़ावन पंचायत की सरपंच लता गोस्वामी से तो उनसे संपर्क नही हुआ। लेकिन सरपंच पति राजेन्द्र गोस्वामी जैसी ईमानदारी कहीं देखने को नहीं मिली उन्होने बताया कि वृक्षारोपण किया ही नही गया तो पौधे दिखेंगे कैसे। 

मालूम करना पड़ेगा 

देनवा पोस्ट को जनपद सीईओ संदीप डाबर ने बताया कि पंचायत में पौधे लगे हैं या नहीं सब इंजीनियर से मालूम करना पड़ेगा। उसके बाद ही कुछ कहा जा सकता है।




Narmadapuram News : सरपंच को कारण बताओं नोटिस जारी, 23 जनवरी को देना जबाब

दीपकशर्मा / नर्मदापुरम : माखननगर जनपद पंचायत की बुधनी पंचायत की सरपंच ज्योति चौहान के काम में पति मनीष चौहान एवं परिजन हरिनारायण चौहान का हस्तक्षेप सरपंच को भारी पड़ा। देनवापोस्ट को सूत्रों से जानकारी के अनुसार जिला पंचायत सीईओं एस एस रावत ने 19 जनवरी 2024 को बुधनी पंचायत की सरपंच ज्योति चौहान कारण बताओं नोटिस जारी कर कहा कि 23 जनवरी 2024 को जिला पंचायत में अपना पक्ष रखें। उक्त दिनांक को अनुपस्थित या जबाब संतोषजनक नही होने पर पद पृथक की कार्यवाही की जावेगी।

यह है मामला

ग्राम पंचायत बुधनी के शिकायत पत्र के आधार पर हरिप्रसाद बरेले खण्ड पंचायत अधिकारी एवं एच के नायक प्रभारी सहायक यंत्री द्वारा जांच कर प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। जिसमें पति मनीष चौहान एवं जेठ हरिनारायण चौहान द्वारा पंचायत के काम में दखलअंदाजी का प्रयास किया जाता है। वही 15 एवं 28 मार्च 2023 में पंचायत के काम में बाधा एवं अभद्र व्यवहार करने की शिकायत की गई थी। वही 25 मार्च 2023 को लाडली बहना योजना के कार्य करने हेत सचिव को पंचायत भवन की चाबी नही दी गई। जिसकी शिकायत की जनपद पंचायत माखननगर में की गई। मनरेगा बजट का मात्र 9 प्रतिशत ही हुआ एवं 23-24 में बधनी पंचायत द्वारा लक्ष्य पूर्ण नही होने पर कार्यवाही की गई है।

पद से पृथक की कार्यवाही संभव !

सूत्रों की मानों तो बुधनी पंचायत की सरपंच ज्योति चौहान को पद से पृथक करने की कार्यवाही हो सकती है। क्योकि विगत ढेढ़ साल में सरपंच के पति सहित जेठ की कई शिकायत हो चुकी है। सरपंच के परिजनों का पंचायत के सचिवों से विवाद किसी छिपा नही है। वही 7 नंवबर 2022 को मामला माखननगर थाने के तक भी पहंुचा था। जिसकी लिखित शिकायत थाने में की गई थी। इन्ही मामलों पर संज्ञान लेते हुए जिला पंचायत सीईओं ने सरपंच को एक मौका देते हए जबाब मांगा है। संतोषजनक जबाब नही मिलने पर पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम 1993 की धारा 40 के तहत सरपंच पद से पृथक किए जानेे की कार्यवाही हो सकती हेै।




Makhannagar News : फर्नीचर खरीदा लेकिन कार्यालय कभी पहुंचा ही नही

दीपक शर्मा/माखन नगर : ग्राम पंचायत के सरपंच-सचिव द्वारा मिलीभगत कर विकास कार्यों के नाम फर्जी बिल बाउचर लगाकर शासकीय राशि का दुरुपयोग करने का मामला माखन नगर जनपद में सामने आया है। जहां पर 2022 से 2024 में पदस्थ तत्कालीन सचिव और सरपंच द्वारा जिस कार्य के नाम पर राशि निकाली उसका काम नही कराया है। मामला ग्राम पंचायत बुधनी का है। जहां पर जिम्मेदारों ने राशि की हेराफेरी कर शासन के रुपयों का दुरुपयोग किया गया। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि ग्रामीणों ने किसी से शिकायत कर जांच कराने की मांग तक नहीं है। ग्रामीण रामभरोस सेन ने देनवा पोस्ट को बताया कि शिकायत करे भी तो किससे क्योंकि सरपंच की पहुंच ऊपर तक हैं।

पंचायत कार्यालय में रखा पुराना फर्नीचर

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत बुधनी के तत्कालीन सचिव और सरपंच ज्योति चौहान के द्वारा फर्नीचर के नाम पर फर्जी बिल लगाकर 88 हजार 150 रुपये की राशि अगस्त 2023 में निकाली गई। ग्राम पंचायत में आज भी नए फर्नीचर के नाम पर कुछ नहीं है। यह बात सोचने वाली हैं कि जब पिछली पंचायत ने फर्नीचर खरीदा था, तो नई पंचायत को खरीदने की क्या आवश्यकता थी। इस संबंध में सरपंच से तो बात नहीं हो सकी लेकिन उनके पति मनीष चौहान से बात हुई तो उनका कहना है कि पुराना फर्नीचर ठीक नहीं था इसलिए खरीदा गया।

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वर्चुअल फर्नीचर खरीद बनी पहली पंचायत

देनवा पोस्ट के सुधि पाठक को यह जानकर हैरानी होगी कि माखन नगर जनपद की बुधनी देश की पहली ऐसी पंचायत होगी जिसने डिजिटल इंडिया का सही उदाहरण दिया जिसने वर्चुअल फर्नीचर की ही खरीदी कर डाली । उस फर्नीचर का पंचायत बकायदा इस्तमाल भी कर रही है। यही वजह है कि जब कोई फिजिकली फर्नीचर देखना भी चाहे तो दिखाई नही देगा।

मुझे ऐसी कोई जानकारी नहीं

जनपद सीईओ संदीप डाबर ने देनवापोस्ट को बताया कि मुझे अभी तक इस तरह की कोई जानकारी नहीं मिली है। देखने के बाद ही कुछ कहना उचित होगा। अगर पंचायत ने लापरवाही की हैं तो कार्यवाही की जावेगी।




Makhannagar News : स्वच्छता मिशन में सफाई हो ना हो… पर बजट की सफाई हो गई

दीपक शर्मा/माखन नगर : मोदी सरकार ने सबसे पहला काम स्वच्छता पर किया… गांधीजी के चश्मे का मोनो लगा कर पूरे देश में स्वच्छता की अलख जगाई… आज इस मिशन के चलते कई जगह स्वछता की होड़ है… क्योंकि इसमें मोटे बजट का भी तगड़ा जोर है… और काम से पहले बजट देनें में सरकार भी देर नहीं करती है… इसी चक्कर में आज कल इस मिशन में ही भ्रष्टाचार की गंदगी फैलने लग गई है..स्वच्छता मिशन में सफाई हो ना हो… पर बजट की सफाई जरूर हो जाती है!… देनवा पोस्ट को ऐसा कुछ माखन नगर जनपद की बुधनी पंचायत में देखने को मिला…। यहां मोदी सरकार के स्वच्छता मिशन की… पंचायत ने वाट ही लगा दी… और स्वच्छता उद्वेश्य की पूर्ति के लिए ग्राम को साफ करने करने की जगह राशि ही साफ कर दी …। 

पंचायत भवन में गंदगी

देनवा पोस्ट ने इस मामले में तहकीकात की तो पाया… कि पूरी पंचायत में कोई साफ सफाई ही नही हुई। गांव में जहां जहां चालू हैंडपंप थे… वहां आसपास गंदा पानी जमा था… जो स्वच्छता मिशन लाखों की राशि की लूट की पोल खोल रहा था…। बच्चों का स्कूल हो या मंदिर… गांव की चौपाल हो या गांव की गली… चारों तरफ गंदगी ही गंदगी पसरी थी…। यानी मोदी सरकार के स्वच्छता मिशन के मोटे बजट की लूट की कहानी बयां कर रही थी… और इस काम में पंचायत का साथ… स्वच्छता मिशन की मॉनिटरिंग करनें वाले जनपद और जिला पंचायत के लोगों ने भी दिया था… तभी तो जब हमने ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान जवाबदारों से बात की… तो सबने अलग अलग कहानी बयां की… 

नालियों का सड़क पर बह रहा पानी

पंचायत दर्पण की वेब साइट पर देखा तो गांव में साफ सफाई के नाम पर अलग अलग करीब दो लाख 73 हजार 630 रुपए की राशि निकाली गई थी। जब हमने इसकी सत्यता जानने के लिए… देनवापोस्ट की टीम ने 15 जनवरी को खुद ही गांव में पहुंचकर तहकीकात कर यहां का माजरा देखा कि स्वच्छता मिशन में गांव की सफाई या गंदगी दूर हो ना हो… पर इस मिशन के मोटे बजट की एंडवास राशी में पूरी ईमानदारी से सफ़ाई हो रही है… और इसमें ग्राम पंचायत को ऊपर तक के जवाबदार लोगों का पूरा स्पोट मिल रहा है…!

बुधनी में लगा कचरे का ढेर

जबकि ग्रामीणों ने भी गंदगी पर रोष जाहिर किया… एक ग्रामीण पप्पू यादव ने तो यहां तक कहा कि गांव में विकास की बात तो छोड़ो नई पंचायत ने साफ सफाई तक नहीं की आलम यह है कि मंदिरों के आसपास भी गंदगी हो रही है। प्रधानमंत्री की इच्छा अनुसार 22 जनवरी को हम अपने गांव में कार्यक्रम कैसे करेगें… इस पर पंचायत और जनपद वालो का ध्यान क्यों नही है…! ऐसे में अब गांव वालों को उम्मीद सिर्फ नए कलेक्टर सोनिया मीना पर ही है… उन्हे इस ओर ध्यान देना चाहिए… और स्वच्छता मिशन में हो रहे बड़े भ्रष्टाचार पर ठोस कार्यवाही करना चाहिए… ताकि मोदी सरकार की देश के हर गांव हर शहर को स्वच्छ करनें की उद्देश की पूर्ति हो सके…। और उसके लिए आने वाले मोटे बजट की लूट रुक सके…। क्योंकि ये कहानी एक ग्राम पंचायत की नही है… बल्कि हर ग्राम पंचायत में यही कहानी दोहराई जा रही है…।

जांच कराएंगे

पंचायत इंस्पेक्टर हरि प्रसाद बरेले ने देनवा पोस्ट को बताया कि आपसे जानकारी मिली है, कि पंचायत मे इस तरह की अनिमित्ता हुई है तो उसकी जांच कराएंगे। अगर पंचायत में गड़बड़ी मिलती है तो संबंधित के खिलाफ कार्यवाही करेंगे।




Makhannagar News : ब्रजमोहन जेल में विभाग को खबर ही नहीं

दीपक शर्मा/ माखन नगर : प्राथमिक विद्यालय कीरपुरा के एक  शिक्षक को जेल जाने के बाद भी अब तक निलंबित नहीं किया जा सका है। शिक्षक ब्रजमोहन दायमा को माखन नगर थाने में दर्ज हत्या के एक मामले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। ताजुब इस बात का है कि करीब 17 दिन बीत जाने के बाद भी गायब शिक्षक ब्रजमोहन दायमा को ढूंढने की कोशिश भी विभाग ने नही की और शिक्षक की शाला में अनुपस्थिति लगाकर इति श्री कर ली है। सूत्रो से प्राप्त जानकारी के अनुसार गूजरवारा पंचायत के ग्राम कीरपुरा की प्राथमिक शाला के प्रारम्भिक शिक्षक ब्रजमोहन दायमा पर हत्या का आरोप लगा है। जिसे माखन नगर पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

अभी मामले की विवेचना चल रही

जब इस संबंध denvapost की थाना प्रभारी राजपाल सिंह जादौन से बात की गई तो बताया कि हत्या के चारों आरोपी को जेल भेज दिया है। एक आरोपी के विभाग को रही सूचना देने की बात तो अभी 90 दिनों में विवेचना के दौरान कभी भी उसके संबंधित विभाग को जानकारी भेज सकते हैं।

जानकारी में नही

डीईओ एसपीएस बिसेन का कहना है कि यह मामला मेरी जानकारी में नही है। अगर कोई कर्माचारी 48 घंटे जेल में बंद हैं तो उस पर कार्यवाही होगी। मैं इस बात की जानकारी लेता हूं।




Makhannagar News : टैक्स वसूली में पंचायतें फिसड्डी

दीपक शर्मा/ माखन नगर : शासन से मिलने वाली राशि से ग्राम पंचायत द्वारा गावों में विकास कार्य तो कराए जाते हैं लेकिन टैक्स वसूली के मामले में माखन नगर जनपद की ज्यादातर ग्राम पंचायतें फिसड्डी साबित हो रही है। कुछ पंचायतों को छोड़ अधिकांश के सरपंच व सचिव टैक्स वसूली के काम में रूचि नहीं दिखा रहे हैं। नतीजतन लंबे समय से बनी हुई समस्याओं का कोई निराकरण नहीं निकल रहा है और न ही ठीक तरह से नए काम हो रहे हैं।

ग्राम पंचायतें शासन से लाखों रुपए की राशि स्वीकृत होने के बाद गांवों में ग्रामीणों की सुविधा मुहैया कराने के लिए विकास कार्य तो कराती है लेकिन अपना राजस्व बढ़ाने के लिए टैक्स वसूली में कोई भी रूचि नहीं दिखा रही है। जनपद की कुल 64 ग्राम पंचायतों में से कुछ पंचायतों को छोड़ अधिकांश द्वारा जो सुविधाएं दी जा रही है, उसके एवज में टेक्स नहीं वसूला जाता है। इसके चलते पंचायत के राजस्व में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही है। जिससे जो काम होना चाहिए वह समय पर नहीं हो रहे हैं।

विकास के लिए शासन पर रहते निर्भर

पंचायत के सरपंच व सचिव विकास कार्य के लिए शासन से राशि प्राप्त करने के लिए काफी प्रयास करते हैं लेकिन टैक्स वसूली के मामले में फिसड्डी साबित है। इस कारण कई गांव के लोगो को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। जिससे उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

पंचायतों में लगते हैं ये कर

जिस तरह नगरीय क्षेत्र में नगर निगम व नगर पालिका की ओर से शिक्षा उपकर, प्रकाश कर, वृत्तिकर, संपत्ति कर, समेकित कर, जल कर वूसला जाता है, उसी तर्ज पर ग्राम पंचायतों को भी सुविधानुसार उक्त सभी प्रकार के टैक्स वसूल करना होता है। कुछ पंचायतों को छोड़ अधिकांश पंचायतों के पास इनकी वसूली से जुड़ा कोई रिकॉर्ड हीं नहीं है। पंचायत द्वारा वसूले गए टैक्स की जानकारी जिला पंचायत को मुहैया कराने के लिए हर वर्ष पत्र भी जारी होते हैं, लेकिन उनका उत्तर गिनती की पंचायतें ही देती हैं।

हर महीने बढ़ सकता राजस्व

ग्राम पंचायत द्वारा गांवों में जो सुविधाएं दी जा रही हैं उसके एवज में यदि वह लोगों से टैक्स वसूलती है तो हर महीने हजारों रुपए का राजस्व प्राप्त कर सकती है। इस राशि से ही वह गांव में दूसरे नए कार्य करा सकती है लेकिन इस समय कार्य की तरफ प्रमुखता से ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि पूर्व में पंचायत द्वारा जो कार्य किए गए थे, उसके बदले भी थोड़ा टैक्स लिया जाता तो पंचायत कई कार्य अपने स्तर से ही करा सकती थी और उसे छोटे कार्य को कराने के लिए शासन से राशि प्राप्त करने की जरुरत नहीं लगती।

समस्या का हो सकता है समाधान

विकासखंड के कई गांव आज भी ऐसे हैं, जिनमें विकास कार्य के नाम पर आज तक कुछ नहीं हो सका है। इन गांवों के लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में परेशानी उठा रहे हैं। इसके बाद भी पंचायतों ने यहां विकास कार्य कराना उचित नहीं समझा है। पंचायतों द्वारा गांवों में कई योजनाओं के तहत विकास कार्य कराए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक टैक्स नहीं वसूला है जबकि पंचायत यदि टैक्स वसूलती तो वह लाखों रुपए का राजस्व बढ़ा सकती थी और इसी राशि से गांव में दूसरे विकास कार्य हो सकते थे परंतु ऐसा नहीं हुआ।

टैक्स वसूली के दिए हैं निर्देश

जनपद सीईओ संदीप डाबर ने देनवा पोस्ट को बताया कि सभी पंचायत सचिवों को उनकी पंचायत में बकाया टैक्स जमा कराने के निर्देश जनपद स्तर से जारी किए गए है। ये जानकारी भी मांगी गई है कि किस पंचायत में कुल कितना टैक्स वसूला जाना है और कब से इसकी वसूली होगी।