पाठ्य पुस्तक निगम के नव नियुक्त अध्यक्ष पर कार्रवाई

कारण बताओ नोटिस जारी, सभी प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार तत्काल प्रभाव से निरस्त

भोपाल में सत्ता और संगठन के गलियारों में उस समय हलचल मच गई, जब मध्यप्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम के नव नियुक्त अध्यक्ष द्वारा उज्जैन से भोपाल कथित रूप से वाहन रैली निकालने का मामला सामने आया। इस घटना को शासन ने गंभीरता से लेते हुए अध्यक्ष को कारण बताओ सूचना पत्र जारी कर दिया है। साथ ही मामले के पूर्ण निराकरण तक उनके सभी प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिए गए हैं।

सूत्रों के अनुसार हाल ही में नियुक्त किए गए अध्यक्ष ने पदभार ग्रहण करने के बाद समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन करते हुए उज्जैन से वाहन रैली निकाली थी। बताया जा रहा है कि रैली में बड़ी संख्या में चार पहिया वाहन और समर्थक शामिल थे। इस दौरान प्रशासनिक मर्यादाओं और सुरक्षा प्रोटोकॉल के उल्लंघन के आरोप भी लगे हैं।

मामला सामने आते ही मुख्यमंत्री कार्यालय ने इसे अनुशासनहीनता और शासकीय गरिमा के विपरीत आचरण मानते हुए कड़ा रुख अपनाया। बताया जा रहा है कि शासन स्तर पर इस घटना की प्रारंभिक रिपोर्ट तलब की गई थी, जिसके बाद अध्यक्ष को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।

सूचना पत्र में अध्यक्ष से पूछा गया है कि आखिर किस अनुमति के आधार पर से वाहन रैली निकाली गई। साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि क्या इस आयोजन के लिए प्रशासन अथवा सुरक्षा एजेंसियों से पूर्व अनुमति ली गई थी या नहीं।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि शासन इस पूरे मामले को केवल प्रोटोकॉल उल्लंघन के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि इसे सत्ता के दुरुपयोग और राजनीतिक प्रदर्शन से जोड़कर भी जांच कर रहा है। यही कारण है कि जांच पूरी होने तक अध्यक्ष के सभी प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार निरस्त कर दिए गए हैं।

इस कार्रवाई के बाद पाठ्य पुस्तक निगम में प्रशासनिक गतिविधियों पर भी असर दिखाई देने लगा है। निगम के भीतर अब वित्तीय स्वीकृतियों, प्रशासनिक निर्णयों और अन्य महत्वपूर्ण कार्यों पर अस्थायी रोक जैसी स्थिति बन गई है। शासन ने निगम के वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि जांच पूरी होने तक किसी भी बड़े निर्णय को बिना उच्चस्तरीय अनुमति के लागू न किया जाए।

राजनीतिक गलियारों में इस कार्रवाई को एक बड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि सरकार यह स्पष्ट संकेत देना चाहती है कि चाहे कोई भी पद हो, शासकीय गरिमा और प्रशासनिक अनुशासन से समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।

विपक्ष ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सत्ता के संरक्षण में कुछ लोग खुद को नियमों से ऊपर समझने लगे हैं। हालांकि सरकार की त्वरित कार्रवाई के बाद विपक्ष को भी आक्रामक रुख अपनाने का पूरा मौका नहीं मिल पाया।

वहीं सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं का कहना है कि मामला जितना दिखाया जा रहा है, उतना गंभीर नहीं है और संभवतः उत्साह में यह आयोजन हो गया होगा। लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा सीधे हस्तक्षेप और अधिकार निरस्त किए जाने से स्पष्ट है कि शासन इस मामले में कोई नरमी बरतने के मूड में नहीं है।

अब सबकी निगाहें अध्यक्ष द्वारा दिए जाने वाले जवाब और शासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया, तो मामला और गंभीर हो सकता है तथा पद से हटाने जैसी कार्रवाई भी संभव मानी जा रही है।

फिलहाल यह मामला प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। मुख्यमंत्री कार्यालय की सख्त कार्रवाई ने साफ कर दिया है कि सरकार अपनी छवि और प्रशासनिक अनुशासन को लेकर किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

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