मोंगला पोर्ट से चीन की बढ़ती मौजूदगी—क्या भारत के लिए यह रणनीतिक चेतावनी है?

हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी आज केवल व्यापारिक मार्ग नहीं, बल्कि 21वीं सदी की भू-राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन चुके हैं। ऐसे समय में यदि बांग्लादेश अपने महत्वपूर्ण मोंगला पोर्ट के निकट विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) के विकास का जिम्मा चीन को सौंपता है, तो यह केवल एक आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से जुड़ा रणनीतिक निर्णय भी माना जाएगा।

हाल के घटनाक्रमों के अनुसार, मोंगला पोर्ट के पास लगभग 110 एकड़ क्षेत्र में चीन विशेष आर्थिक क्षेत्र विकसित करेगा। इससे भारत के लिए कई रणनीतिक और आर्थिक प्रश्न खड़े हो गए हैं।

मोंगला पोर्ट क्यों महत्वपूर्ण है?

मोंगला पोर्ट बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा समुद्री बंदरगाह है। इसकी भौगोलिक स्थिति भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पश्चिम बंगाल की सीमा के निकट स्थित है और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों—असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम—के लिए वैकल्पिक समुद्री संपर्क उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है।

भारत और बांग्लादेश के बीच पिछले वर्षों में इस बंदरगाह के उपयोग को लेकर कई समझौते हुए थे, जिनका उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत तक माल परिवहन को अधिक तेज और सस्ता बनाना था।

क्या भारत को वास्तव में नुकसान होगा?

यदि चीन इस क्षेत्र में औद्योगिक और लॉजिस्टिक आधार मजबूत करता है, तो भारत को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

  • भारतीय कंपनियों के लिए भविष्य में लॉजिस्टिक सुविधाओं की प्राथमिकता कम हो सकती है।
  • चीन की आर्थिक उपस्थिति धीरे-धीरे सामरिक प्रभाव में भी बदल सकती है।
  • बंगाल की खाड़ी में चीन का प्रभाव और गहरा होगा।
  • भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के समीप चीन की गतिविधियां बढ़ने से सुरक्षा एजेंसियों की चिंताएं बढ़ सकती हैं।

हालांकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि अभी तक मोंगला पोर्ट का उपयोग करने संबंधी भारत-बांग्लादेश के मौजूदा समझौतों को समाप्त करने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए यह कहना कि भारत पूरी तरह इस सुविधा से वंचित हो गया है, फिलहाल तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति की एक और कड़ी?

पिछले डेढ़ दशक में चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में कई बंदरगाहों और आधारभूत परियोजनाओं में निवेश किया है।

  • Gwadar Port
  • Hambantota Port
  • Chittagong Port

इन परियोजनाओं को कई रणनीतिक विशेषज्ञ चीन की तथाकथित “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति का हिस्सा मानते हैं, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी दीर्घकालिक उपस्थिति को मजबूत करना है।

यदि मोंगला में भी चीन का औद्योगिक और लॉजिस्टिक प्रभाव बढ़ता है, तो भारत की समुद्री सुरक्षा के दृष्टिकोण से इसकी गंभीर समीक्षा आवश्यक होगी।

क्या यह भारत की विदेश नीति की विफलता है?

यह सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है।

एक पक्ष का तर्क है कि पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंधों में हाल के वर्षों में चुनौतियां बढ़ी हैं और चीन ने आर्थिक निवेश के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ाया है।

दूसरा पक्ष कहता है कि बांग्लादेश एक संप्रभु राष्ट्र है और वह अपने आर्थिक हितों के अनुसार किसी भी देश के साथ निवेश समझौते कर सकता है। साथ ही भारत और बांग्लादेश के बीच रक्षा, ऊर्जा, बिजली, रेल और व्यापार सहित अनेक क्षेत्रों में सहयोग अभी भी मजबूत बना हुआ है।

इसलिए केवल इस एक समझौते के आधार पर पूरी भारतीय विदेश नीति को असफल घोषित करना एक राजनीतिक निष्कर्ष होगा, न कि निर्विवाद तथ्य।

चाबहार पोर्ट की तुलना कितनी उचित?

अक्सर यह कहा जाता है कि भारत ने अमेरिका के दबाव में चाबहार पोर्ट छोड़ दिया।

वास्तविकता यह है कि Chabahar Port में भारत की भागीदारी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। भारत वहां संचालन और विकास से जुड़ा हुआ है तथा हाल के वर्षों में भी इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए नए समझौते हुए हैं। इसलिए यह कहना कि भारत ने चाबहार “छोड़ दिया”, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं माना जाता।

भारत के सामने विकल्प

भारत के लिए यह समय केवल चिंता करने का नहीं, बल्कि अपनी क्षेत्रीय रणनीति को और मजबूत करने का है।

  • बांग्लादेश के साथ आर्थिक और सामरिक सहयोग को और गहरा करना।
  • पूर्वोत्तर भारत को समुद्री संपर्क से जोड़ने वाली परियोजनाओं में तेजी लाना।
  • बंगाल की खाड़ी में अपनी समुद्री क्षमता और बंदरगाह अवसंरचना को मजबूत करना।
  • पड़ोसी देशों में विश्वसनीय और दीर्घकालिक निवेश बढ़ाना।
  • क्षेत्रीय कूटनीति में निरंतर सक्रिय भूमिका निभाना।

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