
लोकतंत्र में आमंत्रण सिर्फ एक कार्ड नहीं होता, वह सम्मान का प्रतीक होता है। लेकिन जब आमंत्रण ही “फोटो कॉपी” बनकर रह जाए और उसमें न नाम हो, न गरिमा—तो समझ लीजिए कि आयोजन से पहले ही उसकी आत्मा का कन्यादान हो चुका है।
मामला है 19 अप्रैल को आयोजित होने वाले मुख्यमंत्री कन्या विवाह समारोह का, जो हर साल बड़े उत्साह और गरिमा के साथ होता आया है। लेकिन इस बार जो हुआ, वह प्रशासनिक लापरवाही का ऐसा उदाहरण बन गया है, जिसे देखकर खुद “व्यवस्था” भी शर्मा जाए।
इस बार आयोजन से ज्यादा चर्चा आमंत्रण कार्ड की हो रही है—और वह भी इसलिए कि वह “कार्ड” कम और “फोटो कॉपी प्रयोग” ज्यादा लग रहा है। न उसमें अतिथियों के नाम, न कोई औपचारिकता, बस एक फोटो कॉपी पकड़ाओ और कह दो—“आ जाइए, कार्यक्रम है।” जैसे कोई शादी नहीं, बल्कि मोहल्ले की क्रिकेट मैच की घोषणा हो रही हो।

जनपद सदस्य सरिता राजीव का दर्द भी कुछ ऐसा ही है। उनका कहना है कि यदि सामूहिक विवाह जैसा बड़ा आयोजन होना था, तो कम से कम एक बैठक तो बुलाई जा सकती थी। लेकिन यहां तो बैठक भी “कल्पना लोक” में ही आयोजित हो गई और निर्णय धरती पर लागू हो गया। लोकतंत्र में संवाद की जगह अब “डाउनलोड और फॉरवर्ड” ने ले ली है।
सबसे मजेदार स्थिति तब बनती है जब जिम्मेदार अधिकारी खुद ही कहते नजर आते हैं—“हमें तो कुछ पता ही नहीं।” पंचायत इंस्पेक्टर हरि प्रसाद बरेले को प्रभारी बना दिया गया, लेकिन उन्हें जानकारी ही नहीं। यानी कप्तान को पता ही नहीं कि मैच किस मैदान में है, और टीम पहले से खेल रही है।
जनपद पंचायत सीईओ रंजीत ताराम का बयान तो और भी दिलचस्प है। वे छुट्टी से लौटे और सीधे एक ऐसे आयोजन के प्रभारी बन गए, जिसके बारे में उन्हें उसी दिन पता चला। बैठक हुई या नहीं—इसकी जानकारी भी नहीं। यह स्थिति कुछ वैसी ही है जैसे कोई छात्र परीक्षा देने पहुंचे और उसे वहीं पता चले कि आज उसका पेपर है।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह “आनन-फानन संस्कृति” आई कहां से? क्या यह वही प्रशासन है जो हर छोटे से छोटे कार्यक्रम के लिए महीनों की तैयारी करता है? या फिर यह एक नया प्रयोग है—जहां पहले आयोजन करो, बाद में सोचो?
देखें तो यह पूरा मामला “फोटो कॉपी लोकतंत्र” का बेहतरीन उदाहरण बन चुका है। यहां निर्णय भी कॉपी-पेस्ट, संवाद भी कॉपी-पेस्ट और आमंत्रण भी कॉपी-पेस्ट। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां मूल प्रति किसी को नहीं मिलती।
कन्या विवाह जैसा आयोजन सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं होता, यह समाज की संवेदनाओं से जुड़ा होता है। इसमें शामिल हर परिवार अपने सपनों और सम्मान के साथ आता है। लेकिन जब आयोजन की तैयारी ही इस तरह की हो, तो सवाल उठना लाजमी है कि क्या हम सिर्फ औपचारिकता निभा रहे हैं?
यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं हम “कार्यक्रम करने” की होड़ में “कार्यक्रम की गरिमा” तो नहीं खो रहे? क्या अब प्रशासनिक दक्षता का मतलब सिर्फ यह रह गया है कि तारीख तय करो और किसी तरह कार्यक्रम निपटा दो?
अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में शायद निमंत्रण कार्ड की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। एक व्हाट्सएप मैसेज आएगा—“आज शादी है, समय मिले तो आ जाना।” और नीचे लिखा होगा—“Forwarded many times।”
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दुखद पहलू यह है कि जिन जनप्रतिनिधियों को सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया जाना चाहिए था, उन्हें मोबाइल संदेशों और फोटो कॉपी से बुलाया जा रहा है। यह न सिर्फ उनकी गरिमा का सवाल है, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर भी प्रश्नचिन्ह है।
अंत में, जनपद सीईओ की बात शायद सबसे सटीक लगती है—“ऐसे आयोजन आनन-फानन में नहीं होने चाहिए।” लेकिन सवाल यह है कि यह समझ पहले क्यों नहीं आई? क्या हर बार हमें एक “फोटो कॉपी विवाद” का इंतजार करना पड़ेगा, तब जाकर हम सीखेंगे?
फिलहाल, यह आयोजन होने जा रहा है। लोग आएंगे, शादियां होंगी, फोटो खिंचेंगे और सब कुछ सामान्य दिखेगा। लेकिन इस “फोटो कॉपी आमंत्रण” की कहानी प्रशासनिक इतिहास में एक हल्के-फुल्के व्यंग्य के रूप में जरूर दर्ज हो जाएगी—जहां आमंत्रण से ज्यादा उसकी अनुपस्थिति चर्चा में रही।
और शायद आने वाले समय में यह उदाहरण प्रशिक्षण सत्रों में पढ़ाया जाएगा—
“कैसे एक गंभीर आयोजन को मजाक में बदला जा सकता है, सिर्फ एक आमंत्रण कार्ड के जरिए।”