सत्ता, संवैधानिक मर्यादा और सवालों के घेरे में सरकार

किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का सबसे बड़ा पैमाना यह होता है कि वहां कानून कितना निष्पक्ष है और सत्ता में बैठे लोग स्वयं को कानून के प्रति कितना जवाबदेह मानते हैं। कर्नल सोफिया कुरैशी केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्य प्रदेश सरकार से पूछे गए तीखे सवाल इसी कसौटी पर सत्ता की परीक्षा ले रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर जैसे संवेदनशील सैन्य अभियान के दौरान एक वरिष्ठ महिला सैन्य अधिकारी पर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी और उस पर कार्रवाई में सरकार की लगातार देरी ने इस मामले को साधारण कानूनी विवाद से ऊपर उठाकर संवैधानिक नैतिकता का प्रश्न बना दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कर्नल सोफिया कुरैशी पर कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप मध्य प्रदेश के भाजपा मंत्री कुंवर विजय शाह पर लगे। यह टिप्पणी न केवल एक महिला अधिकारी की गरिमा से जुड़ी थी, बल्कि भारतीय सेना जैसी अनुशासित और सम्मानित संस्था की प्रतिष्ठा को भी प्रभावित करने वाली मानी गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच टीम (SIT) गठित की गई, जिसने अगस्त 2025 में ही अपनी जांच पूरी कर ली और राज्य सरकार से अभियोजन की मंजूरी मांगी।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र में अक्सर देखी जाने वाली उस बीमारी की ओर इशारा करता है, जहां सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों पर कानून की गति अचानक थम सी जाती है। महीनों बीत जाने के बावजूद राज्य सरकार ने अभियोजन की अनुमति पर कोई निर्णय नहीं लिया।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: असहज सवाल
मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अगुवाई वाली बेंच ने सुनवाई के दौरान सरकार की इस चुप्पी पर गंभीर नाराजगी जताई। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून के तहत सरकार पर समयबद्ध निर्णय लेने की वैधानिक जिम्मेदारी है। CJI का यह सवाल — “क्या हम सही समझ रहे हैं कि SIT ने अनुमति मांगी है और सरकार अब तक चुप बैठी हुई है?” — केवल एक औपचारिक टिप्पणी नहीं, बल्कि सत्ता की निष्क्रियता पर सीधा प्रहार है।

यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि अभियोजन की मंजूरी कोई राजनीतिक दया नहीं, बल्कि एक संवैधानिक प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई निराधार मामला न चले, न कि यह कि दोषी को राजनीतिक संरक्षण मिल जाए।

राजनीतिक संरक्षण बनाम संवैधानिक जिम्मेदारी

इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जांच पूरी होने के बावजूद कार्रवाई को टालना कहीं न कहीं राजनीतिक संरक्षण की आशंका को जन्म देता है। जब आरोप किसी मंत्री पर हों और सरकार महीनों तक निर्णय न ले, तो स्वाभाविक है कि जनता के मन में सवाल उठेंगे — क्या कानून सबके लिए समान है?
भारतीय संविधान मंत्रियों को किसी भी प्रकार की आपराधिक छूट नहीं देता। बल्कि उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे आचरण में आम नागरिकों से कहीं अधिक सावधानी और जिम्मेदारी बरतें। ऐसे में अभियोजन की मंजूरी में देरी सत्ता के नैतिक दिवालियापन का संकेत बन जाती है।

सेना और महिला सम्मान का प्रश्न
यह मामला केवल एक राजनीतिक या कानूनी विवाद नहीं है। इसमें भारतीय सेना के सम्मान और महिला अधिकारियों की गरिमा का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। कर्नल सोफिया कुरैशी जैसी अधिकारी न केवल देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाती हैं, बल्कि वे उन हजारों महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं जो कठिन परिस्थितियों में देश सेवा कर रही हैं।

यदि इस तरह के मामलों में ढिलाई बरती जाती है, तो यह संदेश जाता है कि महिला सम्मान और सैन्य मर्यादा जैसे मुद्दे भी राजनीतिक समीकरणों के आगे गौण हैं। यह न केवल गलत संदेश है, बल्कि खतरनाक भी।

न्याय में देरी: लोकतंत्र के लिए खतरा
कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है — Justice delayed is justice denied। जब सरकार जानबूझकर निर्णय को टालती है, तो यह न्याय प्रक्रिया को कमजोर करती है। इससे अदालतों का समय भी व्यर्थ होता है और जनता का भरोसा भी टूटता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इस बात का संकेत है कि अब न्यायपालिका इस तरह की देरी को गंभीरता से ले रही है। यह एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि लोकतंत्र में न्यायपालिका ही वह अंतिम संस्था है जो सत्ता को उसकी सीमाएं याद दिलाती है।

सरकार के लिए संदेश

मध्य प्रदेश सरकार के सामने अब स्पष्ट विकल्प है — या तो वह संविधान और कानून के अनुसार तुरंत अभियोजन की मंजूरी दे, या फिर यह स्वीकार करे कि राजनीतिक मजबूरियां न्याय के रास्ते में आड़े आ रही हैं। दोनों में से दूसरा विकल्प लोकतंत्र के लिए घातक है।
यह मामला आने वाले समय में एक नजीर भी बन सकता है। यदि अदालत की सख्ती के बाद भी सरकार टालमटोल करती है, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि जवाबदेही की संस्कृति को सत्ता अब भी गंभीरता से नहीं ले रही।

कर्नल सोफिया कुरैशी केस आज केवल एक मंत्री के बयान या एक फाइल पर अटके फैसले का मामला नहीं है। यह उस बड़े सवाल का प्रतीक है कि क्या भारत में कानून वास्तव में सर्वोपरि है, या फिर सत्ता के सामने उसे बार-बार झुकना पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपना कर्तव्य निभाते हुए सरकार से सवाल पूछा है। अब बारी सरकार की है कि वह जवाब केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कार्रवाई में दे। क्योंकि लोकतंत्र में अंततः फैसला अदालतों के साथ-साथ जनता भी सुनाती है, और वह फैसला अक्सर सत्ता के लिए कहीं ज्यादा कठोर होता है।

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