पूजा पद की नहीं, परमार्थ की होनी चाहिए – पं. श्याम मानवत

गोवर्धन लीला से मानवता को मिलता है सच्ची पूजा का संदेश
श्रीमद् भागवत कथा के पाँचवें दिन मानस मर्मज्ञ पं. श्याम जी मानवत ने गोवर्धन लीला का सार बताते हुए कहा कि पूजा प्रभाव की नहीं, स्वभाव की होनी चाहिए; पूजा अधिकार की नहीं, कर्तव्य की होनी चाहिए और पूजा पद की नहीं, परमार्थ की होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सच्ची पूजा अहंकार की नहीं, बल्कि ओंकार यानी ईश्वरभाव से प्रेरित होनी चाहिए।


पं. मानवत ने कहा कि इंद्र इसलिए पूजनीय नहीं हो सकते क्योंकि वे स्वर्ग के राजा हैं। उन्होंने अपने प्रभाव और भय के बल पर पूजा करानी चाही, जबकि गोवर्धन पर्वत ने बिना किसी अहंकार के गोकुलवासियों को संकट के समय आश्रय दिया। यही कारण है कि गोवर्धन की पूजा हुई, क्योंकि उसमें परमार्थ, परोपकार और करुणा का भाव निहित है।


उन्होंने स्पष्ट कहा कि पूजा भय दिखाकर नहीं कराई जा सकती, पूजा में भाव ही प्रधान होता है। जहाँ सेवा, सुरक्षा और समर्पण होता है, वहीं ईश्वर का वास होता है। गोवर्धन लीला हमें यही सिखाती है कि शक्ति से नहीं, संवेदनशीलता और सेवा भाव से पूज्यता प्राप्त होती है।
विशिष्ट जनों की रही उपस्थिति
कथा के दौरान किसान संघ के प्रांत संगठन मंत्री भरत जी, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीताशरण शर्मा, विधायक विजयपाल सिंह, पूर्व विधायक हरिशंकर जायसवाल, महिला मोर्चा की जिला अध्यक्ष अर्चना पुरोहित, पूर्व अध्यक्ष रंजना मीना, ग्राम भारती के जिला प्रमुख महेंद्र सिंह चौहान सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं श्रोता उपस्थित रहे।
कथा स्थल पर भक्तिमय वातावरण बना रहा और श्रोताओं ने गोवर्धन लीला के आध्यात्मिक संदेश को आत्मसात किया।

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