स्व. नर्मदा प्रसाद वर्मा की स्मृति में सेवानिवृत्त शिक्षकों का सम्मान

माखननगर में पांचवां सम्मान समारोह आयोजित

माखननगर। शिक्षक दिवस के अवसर पर नगर के प्रतिष्ठित शिक्षक रहे स्व. नर्मदा प्रसाद वर्मा की स्मृति में पांचवां सेवानिवृत्त शिक्षकों का सम्मान समारोह वर्मा परिवार द्वारा आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ शिक्षक रमेश पचौरी ने वर्मा जी के चित्र पर पुष्पमाला अर्पित कर, तिलक लगाकर एवं दीप प्रज्वलित कर की।

समारोह में वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र सिंघई ने सेवानिवृत्त शिक्षक रमेश पचौरी को शाल, श्रीफल एवं माला पहनाकर सम्मानित किया। इसके पश्चात नगर के कई सेवानिवृत्त शिक्षकों—राजेंद्र दीवान, रामस्वरूप दुबे, महेशचंद्र वर्मा, अवधनारायण द्विवेदी, ध्रुव तिवारी, शिवकुमार दुबे, प्रदीप मिश्रा, अरुण ताम्रकार, मदनलाल मेहरा, हितजोरी लाल यादव, बालकिशन चौहान एवं अनूप मिश्रा का वर्मा परिवार और अतिथियों द्वारा सम्मान किया गया।

कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र सिंघई और थाना प्रभारी एम.एल. पवार की विशेष उपस्थिति रही। दोनों का वर्मा परिवार द्वारा शाल-श्रीफल एवं माला पहनाकर स्वागत किया गया। इस अवसर पर पेंशनर संघ के पदाधिकारी, वर्मा परिवार के सदस्य और नगर के गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

सम्मान उपरांत अतिथियों ने गुरुजनों की सराहना करते हुए उनके दीर्घायु और स्वस्थ रहने की कामना की। कार्यक्रम के अंत में स्व. रमेश मिश्रा का पुण्य स्मरण कर श्रद्धांजलि दी गई। आभार गिरीश वर्मा द्वारा व्यक्त किया गया।




भारत उदय गुरुकुल गूजरवाड़ा में शिक्षक सम्मान समारोह

हाइलाइट

भारत उदय गुरुकुल गूजरवाड़ा में शिक्षक दिवस समारोह।

सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन की प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुई शुरुआत।

समिति पदाधिकारियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने की सहभागिता।

माखननगर। मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् द्वारा चयनित गुरुदेव शिक्षा एवं समाज सेवा समिति के तत्वावधान में भारत उदय गुरुकुल स्कूल, गूजरवाड़ा में शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य पर सम्मान समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत समिति अध्यक्ष नीतिराज सिंह यादव ने सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पूजन कर की। इस अवसर पर उन्होंने शिक्षक दिवस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उपस्थित अतिथियों और विद्यार्थियों को संबोधित किया।

समारोह में वरिष्ठ शिक्षक मनोहर लाल दुबे, पीएम श्री बागरा तवा संकुल प्राचार्य विकेश सिंह राजपूत, विजयशंकर यादव, कैलाश दुबे, राममोहन यादव, कोषाध्यक्ष मनोज यादव, सचिव मनोज परसाई, परामर्शदाता सुरेश यादव, सतीश यादव, प्रदीप यादव, चंद्रमोहन यादव, रीता यादव, नीतिराज सिंह यादव, यशोदा यादव, वैशाली चौरे, रक्षा यादव, पायल यादव एवं वीरेंद्र यादव सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, समिति पदाधिकारी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के अंत में वरिष्ठ शिक्षक मनोहर लाल दुबे ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया।




शिक्षक दिवस पर 80 शिक्षकों का सम्मान शासकीय एस.एन.जी. स्कूल नर्मदापुरम में आयोजित समारोह

“शिक्षक दिवस पर नर्मदापुरम में आयोजित समारोह में उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों को शाल-श्रीफल एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित करते अतिथिगण।”

हाइलाइट

शिक्षक दिवस पर 80 शिक्षकों को मिला सम्मान।

शत-प्रतिशत परिणाम देने वाले विषय-शिक्षक रहे शामिल।

शाल, श्रीफल और प्रशस्ति पत्र देकर किया गया सम्मान।

नर्मदापुरम। शिक्षक दिवस के अवसर पर शासकीय एस.एन.जी. स्कूल नर्मदापुरम के सभागार में सम्मान समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर हाई स्कूल एवं हायर सेकेंडरी परीक्षा में शत-प्रतिशत परिणाम दिलाने वाले विषय-शिक्षकों तथा शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों को सम्मानित किया गया।

समारोह में कुल 80 शिक्षकों को जिला शिक्षा अधिकारी ज्योति प्रह्लादी, अतिरिक्त जिला परियोजना समन्वयक राजेश गुप्ता, एपीसी विनोद तिवारी एवं विनोद केरकेट्टा, जिला परियोजना समन्वयक राजेश जायसवाल, प्राचार्या साधना बिलथरिया और प्राचार्य संदीप शुक्ला द्वारा शाल, श्रीफल एवं प्रशस्ति पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का संचालन प्राचार्य डी.एन. व्यास ने किया। जिला शिक्षा अधिकारी ने भी शत-प्रतिशत परीक्षा परिणाम लाने वाली संस्था को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया। कार्यक्रम में शाला प्राचार्यगण, जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के अधिकारी एवं कर्मचारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।




शिक्षक पर विशेष : जिम्मेदारियाँ बढ़ीं, सम्मान घटा

भारत में गुरु को सदा से सर्वोच्च स्थान दिया गया है। लेकिन 21वीं सदी में आते-आते शिक्षक की भूमिका, चुनौतियाँ और सामाजिक स्थिति तेजी से बदली है। सवाल यह है कि क्या आज के शिक्षक वही गरिमा और सम्मान पा रहे हैं, जो कभी समाज में स्वाभाविक रूप से मिल जाता था?

तकनीक और व्यावसायिकता की चुनौती

आज शिक्षा डिजिटल हो चुकी है। ऑनलाइन क्लास, स्मार्ट बोर्ड और एआई आधारित लर्निंग ने विद्यार्थियों को सूचना-समृद्ध तो बना दिया है, परंतु यह ज्ञान और विवेक की गारंटी नहीं देता।
शिक्षक अब केवल किताबें पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि तकनीक का उपयोग करके विद्यार्थियों को दिशा देने वाला मार्गदर्शक बन गया है।
दूसरी ओर, शिक्षा का बाजारीकरण और कोचिंग कल्चर ने शिक्षण को मिशन से पेशे में बदल दिया है। परिणामस्वरूप, गुरु-शिष्य का आत्मीय रिश्ता कमजोर होता जा रहा है।

प्रशासनिक बोझ और हाशिये पर शिक्षक

सरकारी स्कूलों के शिक्षक केवल अध्यापन तक सीमित नहीं हैं। उन्हें जनगणना, चुनाव, टीकाकरण, सर्वेक्षण और सरकारी योजनाओं के कार्यों में भी लगाया जाता है।
इससे उनकी मूल भूमिका प्रभावित होती है और विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पाती।
निजी स्कूलों में दूसरी तरह की समस्याएँ हैं—यहाँ शिक्षक अक्सर अनुबंध पर काम करते हैं और उन्हें स्थायित्व या पर्याप्त वेतन नहीं मिलता।

बदलता छात्र और शिक्षक-छात्र रिश्ता

सोशल मीडिया और तकनीक ने विद्यार्थियों को अधिक जागरूक और प्रश्नाकुल बना दिया है। वे अब केवल जानकारी नहीं चाहते, बल्कि संवाद और चर्चा चाहते हैं।
यह शिक्षक के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए कि वे छात्रों को क्रिटिकल थिंकिंग और विवेकशीलता की ओर ले जा सकते हैं, और चुनौती इसलिए कि परंपरागत “गुरु वचनं प्रमाणम्” वाला दौर अब नहीं रहा।

सम्मान की कमी, जिम्मेदारी अधिक

आज समाज में शिक्षक का सम्मान पहले जितना नहीं रहा।
जहाँ कभी गुरुजनों के चरण स्पर्श करना परंपरा थी, वहीं आज शिक्षकों को अक्सर अभिभावकों और प्रबंधन की आलोचना झेलनी पड़ती है।
विडंबना यह है कि जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं, लेकिन गरिमा और सम्मान घटते जा रहे हैं।

समाधान की राह

शिक्षा को केवल व्यवसाय न मानकर चरित्र निर्माण का साधन बनाया जाए।

शिक्षकों को प्रशासनिक बोझ से मुक्त कर पूरी तरह अध्यापन पर केंद्रित होने दिया जाए।

डिजिटल युग में भी शिक्षक और छात्र के बीच मानवीय रिश्ता कायम रखा जाए।

सरकार और समाज दोनों यह समझें कि शिक्षक ही भविष्य का निर्माता है।

आज का शिक्षक यदि तकनीक और मूल्य दोनों का संतुलन साध ले, तो वह आने वाली पीढ़ियों को केवल काबिल नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बना सकता है।
शिक्षक दिवस पर यही संकल्प लेना जरूरी है कि शिक्षक को केवल नौकरी करने वाला कर्मचारी न समझा जाए, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का स्तंभ माना जाए।




संस्कृति और शिक्षा का संगम – स्व. मिश्रीलाल गुरुजी

नर्मदापुरम जिले का प्राचीन नगर सोहागपुर इतिहास, संस्कृति और शिक्षा—तीनों का संगम है। यह नगर कभी वाड़ासुर की राजधानी सोणितपुर कहलाता था। पलकमती (नर्मदा) नदी का तट, जमनी तालाब, स्वादिष्ट पान और कलात्मक सुराही इसकी पहचान रहे हैं। लेकिन सोहागपुर की असली पहचान इसकी शिक्षक परंपरा से है, जिसे आगे बढ़ाया स्व. मिश्रीलाल गुरुजी ने।

गुरुजी: शिक्षा और संस्कार के प्रतीक

मिश्रीलाल गुरुजी अंग्रेज़ी विषय के शिक्षक थे, लेकिन उनके लिए अध्यापन केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज निर्माण का मिशन था। सीमित साधनों और साधारण वेतन के बावजूद उन्होंने विद्यार्थियों को न केवल पढ़ाया, बल्कि उन्हें अनुशासन, ईमानदारी और नैतिकता का मार्ग भी दिखाया। यही कारण है कि उनके कई शिष्य आज उच्च पदों पर पहुँचकर भी गर्व से कहते हैं—“हम गुरुजी के छात्र हैं।”

गुरुजी के पुत्र, जो स्वयं सेवानिवृत्त इंजीनियर हैं, हर साल अपने पिता की पुण्यतिथि पर स्थानीय शिक्षकों का सम्मान करते हैं। यह परंपरा केवल एक परिवार की श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि इस बात का संदेश है कि समाज में गुरु का सम्मान सबसे ऊपर होना चाहिए।

बदलता समय और शिक्षा की चुनौतियाँ

आज का दौर शिक्षा को केवल “व्यवसाय” के रूप में देखने लगा है। कोचिंग कल्चर, डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रतिस्पर्धा की दौड़ ने शिक्षक-छात्र के रिश्ते की आत्मीयता को कम कर दिया है। सवाल उठता है—क्या आज के विद्यार्थी मिश्रीलाल गुरुजी जैसे किसी शिक्षक से वही आत्मीय मार्गदर्शन पाते हैं, जो उन्हें किताबों से बाहर जीवन की सच्चाइयाँ सिखाए?

सोहागपुर: संस्कृति और प्रकृति का संगम

सोहागपुर न केवल शिक्षा बल्कि अपनी प्राकृतिक धरोहर के लिए भी चर्चित है। देनवा नदी का तट और मढ़ई का क्षेत्र आज सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व का प्रवेश द्वार है। यह इलाका अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर दर्ज है। पर्यटक यहाँ जंगल सफारी के साथ-साथ इस नगर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को भी अनुभव करते हैं।

शिक्षक दिवस का सच्चा अर्थ

भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन कहा करते थे—“शिक्षक वह है, जो केवल पढ़ाता ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाता है।”
मिश्रीलाल गुरुजी का जीवन इसी विचार का प्रमाण है।

इसलिए शिक्षक दिवस केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि यह संकल्प है कि समाज शिक्षा को केवल व्यवसाय न समझे, बल्कि चरित्र और संस्कार निर्माण का आधार माने।

“गुरु का आदर करना केवल उनका सम्मान नहीं, बल्कि अपनी आत्मा का पोषण करना है।” – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

राकेश दुबे स्वतंत्र लेखक