अमेरिकी टैरिफ वृद्धि पर पवार का केंद्र सरकार को समर्थन, पड़ोसी देशों से रिश्तों पर दी चेतावनी

‘No one has control over him’: Sharad Pawar urges support for Centre against Donald Trump's tariff; terms it as ‘pressure tactics’
File photo: NCP (SP) chief Sharad Pawar (PTI)

नई दिल्ली: एनसीपी (सपा) प्रमुख शरद पवार ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50% तक टैरिफ बढ़ाने के फैसले को “दबाव की रणनीति” करार देते हुए केंद्र सरकार का समर्थन करने की अपील की है। नागपुर में पत्रकारों से बातचीत में पवार ने कहा कि “देश के हितों की रक्षा” के लिए सभी को सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए।

अमेरिका ने यह टैरिफ दो चरणों में लागू करने की घोषणा की है—पहला 25% शुल्क 7 अगस्त से और तीन हफ्ते बाद अतिरिक्त 25%। इसमें तेल व्यापार सहित कई क्षेत्रों को निशाना बनाया गया है।

पवार ने मोदी सरकार की विदेश नीति पर सीधा आरोप लगाने से बचते हुए ट्रंप की “आवेगपूर्ण कार्यशैली” पर टिप्पणी की और कहा कि बातचीत की गुंजाइश बेहद कम रह गई है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पड़ोसी देशों से बिगड़ते रिश्तों पर भी आगाह किया—“पाकिस्तान पहले से हमारे खिलाफ है, जबकि नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव हमसे खुश नहीं हैं।”

इस मुद्दे पर विपक्ष ने भी सरकार को घेरा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे “विदेश नीति के लिए बड़ा झटका” बताया, जबकि राहुल गांधी ने ट्रंप के कदम को “आर्थिक ब्लैकमेल” करार दिया और मोदी की चुप्पी को अडानी से जुड़ी अमेरिकी जांच से जोड़ा।

विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी कदम को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया है और कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय हित में कार्य करता रहेगा।




‘वोट अधिकार यात्रा’ स्थगित: राजद-कांग्रेस की संयुक्त पहल को लगा विराम

नई दिल्ली : राहुल गांधी और तेजस्वी यादव द्वारा प्रस्तावित बहुप्रतीक्षित ‘वोट अधिकार यात्रा’, जिसे 10 अगस्त से बिहार के सासाराम से आरंभ किया जाना था, अपरिहार्य कारणों के चलते स्थगित कर दी गई है। राजद के राज्य कार्यालय द्वारा जारी पत्र (संख्या 168, दिनांक 4 अगस्त) के माध्यम से यह औपचारिक घोषणा की गई।

सूत्रों के अनुसार, झारखंड के एक पूर्व मुख्यमंत्री के निधन के चलते यात्रा को स्थगित करने का निर्णय लिया गया है। पार्टी ने कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों और समर्थकों से अपील की है कि वे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम को निरस्त मानें और नई तिथि की प्रतीक्षा करें। यात्रा का संशोधित कार्यक्रम यथासमय घोषित किया जाएगा।

इस यात्रा को कांग्रेस और राजद द्वारा संयुक्त रूप से चुनाव आयोग की विवादास्पद विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के खिलाफ एक जन आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था। यात्रा का उद्देश्य मतदाता सूची से कथित तौर पर हटाए गए नामों के विरुद्ध जनजागरण फैलाना और आगामी बिहार विधानसभा चुनावों के लिए महागठबंधन कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करना था।

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार यह यात्रा 10 अगस्त को रोहतास जिले के सासाराम से आरंभ होकर 19 अगस्त को अररिया जिले के नरपतगंज में समाप्त होती, और बिहार के कई जिलों से होकर गुजरती।

यात्रा को राजद और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा न केवल चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत माना जा रहा था, बल्कि इसे मोदी सरकार और नीतीश कुमार सरकार के विरुद्ध विपक्षी रणनीति का एक प्रमुख हथियार भी बताया जा रहा था।

राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि इस यात्रा की घोषणा से गठबंधन के भीतर नई गतिशीलता पैदा हुई थी। टिकट के दावेदारों और जमीनी कार्यकर्ताओं में उत्साह की लहर थी, जो अब यात्रा के पुनर्निर्धारण की प्रतीक्षा में हैं। कई स्थानीय नेताओं के लिए यह यात्रा नेतृत्व के समक्ष अपनी प्रभावशीलता दिखाने का महत्वपूर्ण अवसर थी।

अब जबकि कार्यक्रम स्थगित हो गया है, राजनीतिक दृष्टि पुनः प्रस्तावित तिथियों की ओर केंद्रित हो गई है, जिनके तय होने पर भविष्य की चुनावी रणनीति और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ उनका गहरा तालमेल सुनिश्चित किया जाएगा।




Denvapost Exclusive : मोदी 3.0 की चुनौतियाँ और प्राथमिकताएँ: तीसरे कार्यकाल का रोडमैप

2024 में ऐतिहासिक जीत के साथ तीसरी बार सत्ता में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल अब एक निर्णायक मोड़ पर है। मोदी 3.0 न केवल एक राजनीतिक उपलब्धि है, बल्कि इससे जुड़ी उम्मीदें और चुनौतियाँ भी पहले से कहीं ज़्यादा व्यापक और पेचीदा हैं।

प्रमुख चुनौतियाँ:

1. 📉 आर्थिक मंदी और बेरोजगारी

भारत की युवाओं की जनसंख्या वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी है, लेकिन रोजगार सृजन अभी भी बड़ा सवाल बना हुआ है।

MSME सेक्टर अभी भी कोविड और नोटबंदी के प्रभाव से पूरी तरह उबर नहीं पाया है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश और कृषि से जुड़े सुधार अपेक्षित हैं।

2. 🌾 कृषि और किसान आंदोलन की विरासत

किसानों में अब भी विश्वास की कमी है। कृषि कानून वापसी के बावजूद उनकी मूलभूत मांगें जैसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी पर ठोस कदम अपेक्षित हैं।

3. 🧱 संस्थाओं की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्य

सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक पर सत्ता के एकाधिकार के आरोपों को जवाब देने की जरूरत है।

विपक्ष कमजोर जरूर है, लेकिन देश में प्रजातांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना मोदी सरकार के दीर्घकालिक छवि के लिए जरूरी होगा।

4. 🌐 विदेश नीति और चीन-पाक चुनौती

LAC पर चीन के साथ तनाव अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका-चीन टकराव के दौर में भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए वैश्विक नेतृत्व दिखाना होगा।

मोदी 3.0 की प्राथमिकताएँ:

1. 🏗 ‘विकसित भारत 2047’ की नींव

सरकार “विकसित भारत @100” के लक्ष्य को लेकर योजनाएं बना रही है, जिसमें बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी नवाचार पर फोकस होगा।

2. 💡 डिजिटल इंडिया 2.0 और टेक्नोलॉजी नेतृत्व

भारत को AI, चिप मैन्युफैक्चरिंग, और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना मोदी 3.0 की प्राथमिक रणनीति है।

3. 🌱 हरित ऊर्जा और पर्यावरणीय नेतृत्व

2030 तक नेट ज़ीरो मिशन, सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में भारत को अग्रणी बनाने का लक्ष्य।

4. 🏛 संविधानिक सुधार और यूनिफॉर्म सिविल कोड

मोदी सरकार समान नागरिक संहिता (UCC) को कानूनी रूप देने की दिशा में निर्णायक कदम उठा सकती है, जो सामाजिक बहस का बड़ा विषय बनेगा।

मोदी 3.0 केवल सत्ता का विस्तार नहीं, बल्कि राजनीतिक विरासत स्थापित करने की अंतिम पारी है। अगर यह सरकार नीतिगत साहस और सामाजिक संतुलन के साथ आगे बढ़ती है, तो यह भारत को एक नई दिशा देने वाला युग बन सकता है।




Parliament Monsoon Session Today LIVE News Updates : संसद मानसून सत्र 2025: बिहार SIR और मणिपुर राष्ट्रपति शासन पर नाटकीय गतिरोध

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नई दिल्ली | Denvapost विशेष संवाददाता

बिहार में मतदाता सूची SIR को लेकर संसद में विरोध-तांडव

लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में विपक्षी सांसद विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर जमकर प्रदर्शन कर रहे हैं। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि बिहार में यह प्रक्रिया चुनावी निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है।

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, पीटीआई विपक्ष में नेता मलिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी वाड्रा सहित अन्य INDIA ब्लॉक नेताओं ने संसद परिसर में जाकर ‘SIR’ लिखे पोस्टर फाड़कर कूड़ेदान में डाल दिए, जिससे प्रतीकात्मक विरोध का संदेश गया ।

राज्यसभा में कांग्रेस सांसद रेनुका चौधरी ने Rule 267 के तहत SIR पर चर्चा हेतु कारोबार स्थगन का प्रस्ताव रखा ।

CPI के सांसद संमोख कुमार ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को वोटर सूची से बाहर करने की रणनीति है ।

विपक्ष ने कहा कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में SIR पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए; लेकिन जब ये चर्चाएँ नहीं हो सकीं, तब विरोध तेज़ हो गया।

मंगलवार को पूरे सुबह का सत्र निरस्त कर दिया गया था क्योंकि 11 AM और 12 PM की दो बार कार्यालय स्थगन हुआ ।

गुरुवार को लोकसभा सिर्फ 12 मिनट चली, फिर दोपहर 2 बजे स्थगित कर दी गई। राज्यसभा महज़ एक मिनट में स्थगित कर दी गई थी ।

इंडिया ब्लॉक सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से बुलाए गए 12:30 बजे सभी दलों की बैठक में शामिल होकर समाधान की कोशिश की ।

कांग्रेस के ज़िला अध्यक्ष जितु पाटवारी ने भाजपा नेता शिवराज सिंह चौहान की टिप्पणी पर पलटवार करते कहा कि किसान वर्ग की वास्तविक समस्याएं जैसे प्राकृतिक आपदाओं में विस्थापन, ग्रामीण रोजगार, फसल नुकसान आदि पर सरकार गंभीर नहीं है ।

मणिपुर में राष्ट्रपति शासन का विस्तार: अमित शाह का प्रस्ताव आज राज्यसभा में पेश होगा

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आज राज्यसभा में मणिपुर में राष्ट्रपति शासन छह महीने और बढ़ाने का प्रस्ताव पेश करेंगे।

यह विस्तार 13 अगस्त 2025 से लागू होगा और 13 फरवरी 2026 तक रहेगा, यदि संसद इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है ।

फरवरी 2025 में मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जब मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने इस्तीफा दिया था—उनके खिलाफ भाजपा के अपने विधायकों ने दबाव बनाया था ।

2023–25 में मेइती और कुकी समुदायों के बीच हिंसा ने कम से कम 250 मौतें और 60,000 से अधिक विस्थापन उत्पन्न किया था ।

मणिपुर विधानसभा की अवधि 2027 तक है, जिसे अब तक सस्पेंडेड एनिमेशन में रखा गया है, और राज्यपाल अजय कुमार भल्ला केंद्रीय नियंत्रण संभाल रहे हैं ।

निष्कर्ष: दोनों मुद्दे लोकतांत्रिक संतुलन की लड़ाई

विपक्ष का तर्क है कि मतदाता सूची में SIR प्रक्रिया चुनाव से पहले न्यायसंगत प्रतिनिधित्व पर सवाल उठा रही है।

दूसरी ओर, सरकार कहती है कि प्रक्रिया निष्पक्ष है और इसे रोकने की मांग अस्वीकार्य है।

मणिपुर में राष्ट्रपति शासन का विस्तार, केंद्रीय प्राधिकरण और राजनीतिक दबाव के बीच लोकतांत्रिक संकट का संकेत देता है।

सत्र लगातार बाधित होने से संसद के विधायी एजेंडे — जैसे गोवा में अनुसूचित जनजातियों का पुनर्निर्धारण विधेयक और Merchant Shipping Bill, 2024 — पर काम नहीं हो पा रहा है ।

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MPs push for Yashwant Varma’s impeachment: 145 Lok Sabha members and 63 Opposition MPs in Rajya Sabha submitted a memorandum to remove Justice Yashwant Varma under Articles 124, 217, and 218 of the Constitution. Lok Sabha was adjourned till 4 pm, minutes after resuming at 2 pm as the Opposition continued to shout slogans. However, proceedings resume in Rajya Sabha. Monsoon session will comprise a total of 21 sittings, spread over 32 days, and will conclude on August 21. In between, both the Houses will be adjourned on August 12, 2025, and will reassemble on Monday, August 18, to facilitate Independence Day celebrations.




नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री कार्यकाल: एक नज़र में (2014–2025)

मुख्य पड़ाव — टाइमलाइन

26 मई 2014: नरेंद्र मोदी ने भारत के 15वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

2014–2019: पहले कार्यकाल में स्वच्छ भारत अभियान, जन-धन योजना, उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं की शुरुआत।

2016: नोटबंदी की घोषणा (8 नवंबर)।

2017: GST लागू किया गया — ऐतिहासिक कर सुधार।

2019: दूसरी बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापसी।

5 अगस्त 2019: अनुच्छेद 370 हटाया गया (जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा समाप्त)।

2020: कोविड-19 महामारी के दौरान लॉकडाउन और वैक्सीनेशन मिशन।

2021: तीन कृषि कानूनों की वापसी के फैसले की घोषणा।

2024: तीसरी बार प्रधानमंत्री बने — लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतने वाले नेहरू के बाद दूसरे नेता बने।

25 जुलाई 2025: 4,078 दिन लगातार प्रधानमंत्री रहने का कीर्तिमान — इंदिरा गांधी को पीछे छोड़ा।

क्या है मोदी युग की विशेषता?

प्रमुख उपलब्धियाँ

राजनीतिक स्थिरता: तीन बार बहुमत की सरकार बनाकर दुर्लभ उदाहरण पेश किया।

विकास और योजनाएँ: उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, जनधन, डिजिटल इंडिया, PM आवास योजना जैसी जनहित योजनाओं की शुरुआत।

राष्ट्रवाद और सुरक्षा: सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, नागरिकता कानून जैसे मुद्दों पर सशक्त निर्णय।

बाहरी छवि: वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को सशक्त बनाया।

मुख्य आलोचनाएँ

लोकतंत्र की संस्थाओं पर नियंत्रण: विपक्ष ने बार-बार न्यायपालिका, मीडिया और संवैधानिक संस्थाओं पर हस्तक्षेप के आरोप लगाए।

सामाजिक ध्रुवीकरण: NRC, CAA जैसे मुद्दों पर देशभर में विरोध।

महंगाई और बेरोजगारी: आर्थिक मोर्चे पर कई बार सवाल उठे हैं, खासकर युवाओं की रोजगार दर को लेकर।

कृषि आंदोलन और किसान नीतियाँ: कृषि कानूनों की वापसी से नीतिगत कमजोरी उजागर हुई।

क्या मोदी नेहरू को पीछे छोड़ सकते हैं?

जवाहरलाल नेहरू का लगातार प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड 6,130 दिनों (17 साल से अधिक) का है।
यदि नरेंद्र मोदी 2029 तक लगातार पद पर बने रहते हैं, तो वे यह रिकॉर्ड भी तोड़ सकते हैं।




Denvapost Exclusive : उपराष्ट्रपति का इस्तीफा: सत्ता संरचना के भीतर बढ़ते तनाव का संकेत

भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफा भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए एक अप्रत्याशित झटका है। संविधान की सबसे ऊँची व्यवस्थाओं में से एक व्यक्ति का इस तरह जाना केवल “स्वास्थ्य कारणों” का मामला नहीं हो सकता, खासकर तब, जब वे संसद के मानसून सत्र के पहले दिन सक्रिय भूमिका में देखे गए हों और उनके कार्यालय ने पूरे सप्ताह के सार्वजनिक कार्यक्रम घोषित किए हों।

यह इस्तीफा केवल व्यक्तिगत या स्वास्थ्य से जुड़ा मामला नहीं है — यह कार्यपालिका और संसद के बीच गहराते अंतर्विरोधों, और सत्तारूढ़ दल के भीतर की खींचतान का स्पष्ट संकेत है।

धनखड़ का विद्रोह: संविधान की व्याख्या को लेकर संघर्ष

उपराष्ट्रपति रहते हुए जगदीप धनखड़ का रवैया शुरू से ही विवादास्पद रहा है। वे बार-बार संसदीय सर्वोच्चता की बात करते रहे और उन्होंने न्यायपालिका की भूमिका व स्वायत्तता पर सवाल उठाए। खासकर जब उन्होंने संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों की वैधता पर सार्वजनिक बहस की वकालत की — यह न सिर्फ एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से असामान्य था, बल्कि सीधे उस संवैधानिक मूल्य संरचना को चुनौती देना था, जिस पर गणराज्य टिका है।

हाल के दिनों में दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया को लेकर उपराष्ट्रपति और सरकार के बीच विचार टकराव की स्थिति बनी। कहा जा रहा है कि जिस तरह से धनखड़ ने संसदीय नियमों और प्रक्रिया के तहत विपक्ष के प्रस्ताव को स्वीकार किया, वह सरकार की रणनीति के अनुकूल नहीं था।

यह सिर्फ इस्तीफा नहीं, एक चेतावनी है

धनखड़ का इस्तीफा संवैधानिक संस्थानों के बीच संतुलन के संकट की ओर इशारा करता है। उपराष्ट्रपति का पद केवल प्रतीकात्मक नहीं होता; वह राज्यसभा का सभापति भी होता है — और ऐसे में उनका निष्पक्ष होना अनिवार्य है।

पिछले तीन वर्षों में, विपक्ष द्वारा उन पर पक्षपातपूर्ण रवैये का आरोप लगाया गया। यहाँ तक कि उनके खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाया गया — भारतीय संसदीय इतिहास में यह एक असाधारण घटना थी। लेकिन हाल के सप्ताहों में उनके फैसले संकेत देते हैं कि उन्होंने एक संविधानवादी रुख अपनाना शुरू कर दिया था, जिसने उन्हें सत्ता के केंद्रीय प्रतिष्ठान से अलग कर दिया।

सरकारी दबाव या वैचारिक मतभेद?

यह स्पष्ट नहीं है कि धनखड़ ने इस्तीफा सरकारी दबाव में दिया या वे संवैधानिक विवेक के तहत सत्ता के किसी आंतरिक टकराव का शिकार हुए। लेकिन दोनों ही स्थितियाँ भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता के लिए चिंताजनक हैं।

उपराष्ट्रपति का अचानक हट जाना उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा लगता है, जिसमें संविधान की आत्मा के स्थान पर राजनीतिक लाभ का वर्चस्व स्थापित किया जा रहा है। यह घटनाक्रम केवल संसदीय राजनीति की बात नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद पर उठ रहे प्रश्न हैं।

क्या यह लोकतंत्र के गिरते तापमान की चेतावनी है?

धनखड़ का इस्तीफा सिर्फ एक व्यक्ति का व्यक्तिगत निर्णय नहीं है। यह उन शक्तियों के टकराव की अभिव्यक्ति है जो आज भारत के लोकतंत्र को नई दिशा देने की कोशिश कर रही हैं — किसी को मजबूत करने की तो किसी को कमजोर।

यदि लोकतंत्र में संस्थानों की भूमिका केवल सत्ता की सुविधा तक सीमित कर दी जाएगी, तो वह लोकतंत्र आंकड़ों में तो जीवित रहेगा, पर आत्मा से मृतप्राय हो जाएगा।




Denvapost exclusive : क्या उपराष्ट्रपति का इस्तीफा केवल स्वास्थ्य कारणों तक सीमित है?

भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे ने सियासी हलकों में खलबली मचा दी है। उन्होंने अपने इस्तीफे के लिए स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया है, लेकिन जिस तरह से राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है — क्या यह इस्तीफा केवल स्वास्थ्य तक सीमित है, या फिर इसके पीछे कोई गहराई से छिपा राजनीतिक समीकरण है?

उपराष्ट्रपति की भूमिका और धनखड़ की कार्यशैली

भारतीय संविधान के अनुसार, उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति होते हैं, और उनकी भूमिका अपेक्षाकृत तटस्थ मानी जाती है। लेकिन जगदीप धनखड़ का कार्यकाल कई मायनों में विशिष्ट रहा। वे न केवल संसदीय कार्यवाही में सख्त और स्पष्ट भूमिका में दिखाई दिए, बल्कि कई मौकों पर उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों और सदस्यों से सीधा संवाद और तीखे सवाल भी किए।

उनकी इसी शैली को लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्षधर लोग संविधानिक साहस मानते हैं, तो वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उनकी यह निर्भीकता सत्तारूढ़ दल के लिए असहज करने वाली थी।

कांग्रेस का तीखा सवाल

धनखड़ के इस्तीफे के कुछ ही घंटों के भीतर कांग्रेस ने बड़ा आरोप लगाया। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा कि यह इस्तीफा “उनके बारे में तो अच्छी बातें कहता है, लेकिन उन लोगों को बेनकाब करता है जिन्होंने उन्हें चुना था।”

यह बयान सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया से अधिक गहराई लिए हुए है। इससे संकेत मिलता है कि कांग्रेस इस इस्तीफे को केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि संस्थागत दबाव और संभावित राजनीतिक असहमति का परिणाम मान रही है।

बैठक में अनुपस्थित नेतृत्व

एक और दिलचस्प पहलू राज्यसभा की कार्य मंत्रणा समिति (BAC) की बैठक से जुड़ा है। जयराम रमेश ने दावा किया कि मंगलवार दोपहर और शाम को हुई दो बैठकों में धनखड़ खुद मौजूद रहे, लेकिन सदन के नेता जेपी नड्डा और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू दोनों ही अनुपस्थित रहे।

राजनीतिक संकेतों की दुनिया में यह अनुपस्थिति ‘सामान्य’ नहीं मानी जाती — खासकर तब, जब यह एक संवैधानिक पदाधिकारी के अंतिम बैठकों में से एक हो। यह असहमति का संकेत हो सकता है, या फिर किसी पूर्व-निर्धारित घटनाक्रम का हिस्सा।

क्या लोकतांत्रिक संस्थाएं स्वतन्त्र हैं?

धनखड़ का इस्तीफा एक बार फिर इस बुनियादी प्रश्न को सामने लाता है — क्या भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं वास्तविक रूप से स्वतंत्र हैं?

यदि एक संवैधानिक पदाधिकारी, जिसे गैर-राजनीतिक होकर कार्य करना है, केवल इसलिए असहज हो जाए कि वह सत्ता से कुछ असहमति व्यक्त करता है, तो यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए चेतावनी का संकेत है।

निष्कर्ष: एक इस्तीफा, कई परतें

धनखड़ का इस्तीफा चाहे स्वास्थ्य कारणों से हुआ हो या राजनीतिक असहजता के कारण, लेकिन यह स्पष्ट है कि इस घटना ने सत्ता, संवैधानिक संस्थाओं और राजनीतिक मर्यादा के रिश्तों को पुनः विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

भारत को चाहिए ऐसे उपराष्ट्रपति जो केवल शोभा के लिए न हों, बल्कि सक्रिय, विवेकशील और संविधान के प्रति प्रतिबद्ध हों। अगर ऐसे पदाधिकारी असहज महसूस करते हैं, तो यह न केवल व्यक्ति की हार है, बल्कि संविधान की भी एक असफलता है।


( प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं।)




Bhopal News : एमपी में कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित बयान, मनोज शुक्ला ने मंत्री विजय शाह की नेम प्लेट पर कालिख पोत दी

मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री विजय शाह ने भारतीय सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा, जिन लोगों ने हमारी बेटियों का सिंदूर उजाड़ा था, मोदी जी ने उन्हीं की बहन भेजकर उनकी…करा दी।

बता दें कि यह बयान मंत्री शाह ने सोमवार को इंदौर के महू के रायकुंडा गांव में आयोजित हलमा कार्यक्रम में दिया था। इसका वीडियो मंगलवार को वायरल हुआ। इसमें वह ये भी कह रहे हैं कि मोदी समाज के लिए जी रहे हैं और समाज के लिए काम कर रहे हैं।

मंत्री शाह ने यह भी कहा कि उन्होंने कपड़े उतार-उतार कर हमारे हिंदुओं को मारा और मोदी जी ने उनकी बहन को उनकी … करने उनके घर भेजा। अब मोदी जी कपड़े तो उतार नहीं सकते, इसलिए उनकी समाज की बहन को भेजा कि तुमने हमारी बहनों को विधवा किया है तो तुम्हारे समाज की बहन आकर तुम्हें नंगा करके छोड़ेगी। देश का सम्मान और मान-सम्मान और हमारी बहनों के सुहाग का बदला तुम्हारी जाति, समाज की बहनों को पाकिस्तान भेजकर बदला ले सकते हैं।

इस बयान के बाद मंगलवार शाम जब मंत्री विजय शाह बंगले पर मौजूद थे, कांग्रेस नेता मनोज शुक्ला ने साथियों सहित उनके बंगले पहुंचकर इस्तीफे की मांग को लेकर नेम प्लेट पर कालिख पोती और नारेबाजी की। इस अवसर पर तारिक अली, विजेंद्र शुक्ला, अमित खत्री, अलीमुद्दीन बिल्ले, मुजाहिद सिद्दीकी, मो आमिर आदि मौजूद रहे।

विवादित बयान पर फंसे मंत्री विजय शाह

मंत्री विजय शाह द्वारा भारतीय सेना की प्रवक्ता कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर दिए गए बयान पर भाजपा संगठन ने सख्त नाराजगी जताई है। पार्टी आलाकमान ने तत्काल उन्हें भोपाल स्थित प्रदेश मुख्यालय तलब किया। संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा और बाद में प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा से मुलाकात कर शाह ने सफाई दी और खेद जताया। मीडिया से बातचीत में विजय शाह ने कहा कि उनका इरादा किसी का अपमान करने का नहीं था और यदि उनके बयान से किसी को ठेस पहुंची हो तो वे कई बार माफी मांगने को तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनका परिवार सैन्य परंपरा से जुड़ा रहा है।

‘कुरैशी मेरे लिए सगी बहन’

मंत्री कुंवर विजय शाह ने कहा कि कर्नल सोफिया कुरैशी मेरे लिए सगी बहन से बढ़कर हैं, जिन्होंने उनका बदला लिया। मेरा किसी को ठेस पहुंचाने का न तो कोई इरादा था और न ही कोई इच्छा। अगर मेरी किसी बात से किसी को बुरा लगा हो, तो मैं दिल से माफी मांगता हूं। मंच से दिए गए अपने बयान पर उन्होंने भावनात्मक प्रतिक्रिया बताते हुए कहा कि यदि उनके शब्दों से किसी धर्म या व्यक्ति को ठेस पहुंची हो तो वह क्षमाप्रार्थी हैं। पार्टी की ओर से दी गई फटकार और विपक्ष के हमलों के बीच मंत्री शाह के इस बयान ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है।