प्रह्लाद जोशी बने नए केंद्रीय शिक्षा मंत्री, बोले- प्रधानमंत्री मोदी की उम्मीदों पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगा

नई दिल्ली। NEET-UG विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वरिष्ठ भाजपा नेता प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी है। नई जिम्मेदारी मिलने के बाद प्रह्लाद जोशी ने प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वह पूरी निष्ठा, समर्पण और कर्तव्य भावना के साथ मंत्रालय की जिम्मेदारियों का निर्वहन करेंगे।

प्रह्लाद जोशी ने कहा, “मैं इस जिम्मेदारी को कर्तव्य और विनम्रता के भाव के साथ स्वीकार करता हूं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभारी हूं कि उन्होंने मुझ पर विश्वास जताया। मुझे जो जिम्मेदारी दी गई है, उस पर उनकी उम्मीदों के अनुरूप काम करने की पूरी कोशिश करूंगा।”

धर्मेंद्र प्रधान के कार्यों की सराहना

नवनियुक्त शिक्षा मंत्री ने अपने पूर्ववर्ती धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि पिछले चार-पांच वर्षों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने सहित शिक्षा क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं।

उन्होंने कहा कि “धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव लाने का काम किया है। नई शिक्षा नीति के माध्यम से देश ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में मैं इन प्रयासों को आगे बढ़ाने का प्रयास करूंगा।”

मोदी सरकार के 12 वर्षों का किया उल्लेख

प्रह्लाद जोशी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों के दौरान देश ने अनेक ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि शिक्षा मंत्रालय भी इसी विकास यात्रा को आगे बढ़ाएगा और छात्रों, शिक्षकों तथा शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए निरंतर कार्य किया जाएगा।

कौन हैं प्रह्लाद जोशी?

प्रह्लाद जोशी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं और कर्नाटक की राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। वे वर्ष 2004 से लगातार कर्नाटक की धारवाड़ लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अपने पहले ही लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार बी.एस. पाटिल को हराकर संसद में प्रवेश किया था।

वे वर्ष 2014 से 2016 तक कर्नाटक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। संगठन और संसदीय राजनीति में लंबे अनुभव के कारण उन्हें भाजपा का अनुभवी चेहरा माना जाता है।

आरएसएस से जुड़ा रहा राजनीतिक सफर

प्रह्लाद जोशी का राजनीतिक जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है। वर्ष 1992-94 के दौरान हुबली के ईदगाह मैदान में तिरंगा फहराने के आंदोलन के बाद वे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे। इसके अलावा उन्होंने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में ‘कश्मीर बचाओ आंदोलन’ का भी नेतृत्व किया था।

NEET-UG विवाद के बीच मिली बड़ी जिम्मेदारी

प्रह्लाद जोशी ऐसे समय में शिक्षा मंत्रालय की कमान संभाल रहे हैं, जब NEET-UG परीक्षा विवाद को लेकर देशभर में छात्रों और विपक्ष का दबाव बना हुआ है। ऐसे में नई शिक्षा मंत्री के सामने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, छात्रों का विश्वास बहाल करने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन जैसी कई बड़ी चुनौतियां होंगी।

अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि नए शिक्षा मंत्री के नेतृत्व में शिक्षा मंत्रालय इन चुनौतियों से कैसे निपटता है और शिक्षा व्यवस्था में क्या नए कदम उठाए जाते हैं।




भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर सियासी घमासान, ट्रंप के एलान के बाद कांग्रेस का मोदी सरकार पर तीखा हमला

नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते (ट्रेड डील) के एलान के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। जहां केंद्र सरकार इसे कूटनीतिक और आर्थिक उपलब्धि बता रही है, वहीं कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोला है। कांग्रेस का आरोप है कि भारत से जुड़े अहम फैसलों की जानकारी बार-बार अमेरिका से दी जा रही है, न कि भारत सरकार की ओर से, जो विदेश नीति और सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

ट्रंप ने किया ट्रेड डील का एलान

पूरा मामला तब शुरू हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को यह घोषणा की कि भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापार समझौता तय हो गया है। ट्रंप के अनुसार, इस समझौते के तहत अमेरिका भारत से आयात होने वाले सामानों पर लगाए जाने वाले पारस्परिक टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर देगा।
ट्रंप ने यह जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर हुई बातचीत के बाद सार्वजनिक की।

पीएम मोदी ने जताई संतुष्टि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बातचीत के बाद प्रतिक्रिया देते हुए इस फैसले पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि मेड इन इंडिया उत्पादों पर अमेरिका में अब कम टैक्स लगेगा, जिससे भारतीय निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और दोनों देशों के व्यापारिक संबंध और मजबूत होंगे।

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कांग्रेस का सरकार पर तीखा हमला

हालांकि, इस एलान के बाद विपक्षी दल कांग्रेस ने मोदी सरकार पर तीखा हमला बोल दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पार्टी के संचार प्रभारी जयराम रमेश ने इस समझौते को लेकर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि यह डील किसी भी लिहाज से ‘फादर ऑफ ऑल डील्स’ नहीं लगती। जयराम रमेश ने तंज कसते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अंततः अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने झुकने का फैसला कर लिया है।

‘वॉशिंगटन में मोगैम्बो खुश है’ – जयराम रमेश

कांग्रेस नेता ने 1987 की फिल्म मिस्टर इंडिया के मशहूर डायलॉग का जिक्र करते हुए कहा,

“वॉशिंगटन में तो साफ है कि मोगैम्बो खुश है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि भारत से जुड़े कई अहम फैसलों की जानकारी पहले अमेरिका से दी जा रही है। जयराम रमेश ने याद दिलाया कि ऑपरेशन सिंदूर, भारत द्वारा रूस और वेनेजुएला से तेल खरीदने के मामले, और अब भारत–अमेरिका ट्रेड डील—इन सभी की घोषणाएं पहले ट्रंप की ओर से हुई हैं।

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ट्रंप के दबाव में मोदी सरकार?

कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति ट्रंप के पास प्रधानमंत्री मोदी पर किसी न किसी तरह का दबाव या लीवरेज है। उन्होंने कहा कि अब स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री न तो ट्रंप के साथ सार्वजनिक मंच साझा करते दिखते हैं और न ही पहले जैसी दोस्ताना गर्मजोशी नजर आती है।
कांग्रेस का सवाल है कि अगर यह समझौता वाकई इतना बड़ा होता, तो इसकी घोषणा भारत सरकार ने खुद क्यों नहीं की?

अमेरिकी राजदूत की पोस्ट पर भी तंज

विवाद उस समय और बढ़ गया जब भारत में अमेरिका के राजदूत ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर यह जानकारी दी कि ट्रंप और मोदी के बीच बातचीत हुई है। इस पर भी कांग्रेस ने तंज कसते हुए कहा कि अब यह एक परंपरा बनती जा रही है कि भारत के फैसलों की जानकारी पहले अमेरिकी राष्ट्रपति या उनके अधिकारी देते हैं। जयराम रमेश ने इसे ‘ट्रंप-निर्भरता’ करार दिया।

सरकार की उपलब्धि या राजनीतिक विवाद

गौरतलब है कि हाल ही में भारत और यूरोपीय संघ के बीच एक बड़े मुक्त व्यापार समझौते पर सहमति बनी थी, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा गया था। कांग्रेस का कहना है कि अमेरिका के साथ हुआ समझौता उस स्तर का नहीं है, फिर भी इसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है।

कुल मिलाकर, भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर सरकार जहां इसे आर्थिक और कूटनीतिक सफलता बता रही है, वहीं कांग्रेस का आरोप है कि इस पूरे घटनाक्रम में भारत की भूमिका कमजोर नजर आ रही है और फैसले अमेरिकी दबाव में लिए जा रहे हैं।

 




रामदास अठावले का पिनाराई विजयन को NDA में शामिल होने का खुला न्योता, कहा– केरल को मिलेगा ज्यादा फंड और तेज विकास

केरल | केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामदास अठावले ने केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को एनडीए में शामिल होने का खुला न्योता दिया है। उन्होंने इसे एक “क्रांतिकारी निर्णय” बताते हुए कहा कि यदि पिनाराई विजयन और उनकी पार्टी सीपीआई (एम) एनडीए में शामिल होती है, तो केरल को केंद्र सरकार से अधिक वित्तीय सहायता मिलेगी और राज्य का विकास तेजी से होगा।
रामदास अठावले ने यह बयान केरल के कॅलब्लॉकर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिया।

“एनडीए में आएंगे तो फंड की दिक्कत खत्म होगी” – अठावले
केंद्रीय मंत्री ने कहा,
“मैं केरल के लंबे समय से मुख्यमंत्री रहे पिनाराई विजयन से अपील करता हूं कि वे एनडीए में शामिल हों। यह एक क्रांतिकारी फैसला होगा। अगर वे और सीपीआई (एम) एनडीए में आते हैं, तो केरल को ज्यादा फंड मिलेगा और राज्य का तेजी से विकास होगा।”

अठावले ने दावा किया कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर तालमेल से विकास परियोजनाओं को गति मिलेगी और केरल को केंद्रीय योजनाओं का पूरा लाभ मिलेगा।

NDA और CPI(M): कट्टर वैचारिक विरोधी

भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए और वामपंथी दल सीपीआई (एम) लंबे समय से एक-दूसरे के कट्टर राजनीतिक और वैचारिक विरोधी माने जाते हैं। ऐसे में रामदास अठावले का यह प्रस्ताव राजनीतिक हलकों में चौंकाने वाला माना जा रहा है।

गौरतलब है कि केरल की सीपीआई (एम) सरकार लगातार आरोप लगाती रही है कि केंद्र सरकार राज्य के साथ भेदभाव कर रही है और कई योजनाओं के फंड या तो रोके जा रहे हैं या जानबूझकर देरी से जारी किए जा रहे हैं।

केंद्र पर भेदभाव के आरोप, विरोध प्रदर्शन भी

इसी महीने की शुरुआत में केरल की सत्तारूढ़ वाम मोर्चा सरकार (LDF) ने केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किया था। केरल के आबकारी मंत्री एम.बी. राजेश ने आरोप लगाया था कि केंद्र ने कई योजनाओं की राशि कम कर दी है और भुगतान में जानबूझकर देरी की जा रही है। उन्होंने वायनाड में हुए भूस्खलन के दौरान भी पर्याप्त मदद न मिलने का आरोप लगाया था।

इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए रामदास अठावले ने कहा कि यदि केरल सरकार एनडीए से हाथ मिला लेती है, तो फंड से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी और राज्य को केंद्र से पूरा सहयोग मिलेगा।

राज्यपाल–मुख्यमंत्री विवाद से और गरमाई राजनीति

इस बीच केरल की राजनीति पहले से ही गरमाई हुई है। मंगलवार को एक नया विवाद तब खड़ा हो गया जब मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के उत्तराधिकारी आर्लेकर पर आरोप लगाया कि उन्होंने मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर नीति भाषण में अपने स्तर पर बदलाव किए। वहीं लोकभवन ने पलटवार करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री का भाषण आधी-अधूरी सच्चाइयों से भरा था।

चुनावी साल में बढ़ा राजनीतिक तापमान

इस साल के अंत में केरल में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनावी मैदान में सत्तारूढ़ एलडीएफ, कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ, और लगातार मजबूत होती भाजपा-एनडीए के बीच मुकाबला तय माना जा रहा है। हाल ही में तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में भाजपा की जीत के बाद राज्य की राजनीति अब त्रिकोणीय संघर्ष की ओर बढ़ती दिख रही है।

रामदास अठावले का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब केरल की राजनीति निर्णायक मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है।




बिहार विधानसभा चुनाव 2025: कांग्रेस-राजद के बीच सीट बंटवारे पर आज निर्णायक बैठक, राहुल गांधी-तेजस्वी यादव करेंगे अंतिम फैसला

bihar election

नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव (bihar election) 2025 को लेकर कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बीच सीट बंटवारे पर चल रही लंबी खींचतान अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। दोनों दलों के शीर्ष नेता राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की सोमवार को दिल्ली में होने वाली बैठक में इस मसले पर अंतिम निर्णय लिए जाने की संभावना जताई जा रही है।

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सीट बंटवारे पर जारी गतिरोध

सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस और आरजेडी के बीच पिछले कई दिनों से सीटों के बंटवारे को लेकर गहन चर्चा चल रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया था। कांग्रेस चाहती है कि उसे बिहार (bihar election) में कम से कम 60 सीटें दी जाएं, जबकि आरजेडी इसे घटाकर करीब 45 से 50 सीटों तक सीमित रखने के पक्ष में है।

2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन पार्टी अब गठबंधन की मजबूती को ध्यान में रखते हुए अपनी मांग में थोड़ी लचीलापन दिखा रही है। हालांकि, आरजेडी का मानना है कि वह राज्य में प्रमुख विपक्षी दल है और पिछली बार की तुलना में इस बार कांग्रेस को कम सीटों से संतुष्ट होना चाहिए।

राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की (bihar election 2025) अहम मुलाकात

रविवार को दोनों दलों के कई वरिष्ठ नेता दिल्ली पहुंचे। सोमवार को राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की मुलाकात तय है, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के भी शामिल होने की संभावना है। बताया जा रहा है कि खड़गे ने पहले ही तेजस्वी यादव से फोन पर बात की है और गठबंधन को एकजुट रखने पर जोर दिया है।

कांग्रेस के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और महासचिव सुशील पासी ने कहा कि पार्टी का उच्च नेतृत्व अब इस मामले पर अंतिम फैसला लेगा। उनके अनुसार, “सारी तैयारी पूरी कर ली गई है, बस उच्च कमान को निर्णय लेना है।”

तेजस्वी यादव दिल्ली में, परिवार के साथ रणनीति पर मंथन

तेजस्वी यादव इन दिनों दिल्ली में अपने माता-पिता लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के साथ मौजूद हैं। माना जा रहा है कि तेजस्वी ने बिहार चुनाव ( bihar election) की रणनीति को लेकर अपने पिता से गहन चर्चा की है। आरजेडी अब यह सुनिश्चित करना चाहती है कि सीट बंटवारे के बाद गठबंधन में किसी तरह की नाराजगी या टूट-फूट की स्थिति न बने।

तेजस्वी यादव की रणनीति स्पष्ट है — वह चाहते हैं कि राजद को गठबंधन (bihar election) में प्रमुख स्थान मिले और कांग्रेस समेत अन्य सहयोगी दल उनकी नेतृत्व क्षमता को स्वीकार करें।

वीआईपी पार्टी को लेकर नई उलझन

इस बीच, तेजस्वी यादव अपने सहयोगी मुकेश सहनी की वीआईपी पार्टी को भी गठबंधन में बनाए रखना चाहते हैं। सहनी ने हाल ही में 60 सीटों और उपमुख्यमंत्री पद की मांग रखकर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी थी।

कांग्रेस ने इस पर स्पष्ट कहा कि “वीआईपी को संभालना राजद की जिम्मेदारी है।” पार्टी का तर्क है कि वह सीधे तौर पर केवल राजद के साथ तालमेल कर रही है, और छोटे सहयोगियों के मसले पर राजद को नेतृत्व करना चाहिए।

एनडीए के खिलाफ साझा मोर्चा

राजद और कांग्रेस दोनों को उम्मीद है कि बिहार bihar election) में एनडीए सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी माहौल बन चुका है, जिसका फायदा विपक्षी गठबंधन को मिल सकता है। राजद का मानना है कि अगर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव साझा जनयात्रा निकालते हैं, तो यह गठबंधन की एकता और जनसमर्थन दोनों को मजबूत करेगी।

राजद के वरिष्ठ नेताओं ने सुझाव दिया है कि तेजस्वी यादव को गठबंधन का “मुख्यमंत्री चेहरा” घोषित किया जाए, ताकि जनता के बीच स्पष्ट संदेश जाए कि विपक्ष एकजुट है और उसके पास स्पष्ट नेतृत्व है।

कांग्रेस का पलटवार: बिहार (bihar election) में मजबूत उपस्थिति

वहीं, कांग्रेस का दावा है कि बिहार के कई जिलों में उसका पारंपरिक वोट बैंक अब भी मजबूत है। पार्टी का कहना है कि वह न सिर्फ एनडीए की नीतिगत विफलताओं को मुद्दा बनाएगी, बल्कि रोज़गार, शिक्षा, और महंगाई जैसे मसलों पर जनता के बीच जाएगी।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “गठबंधन का सीट बंटवारा जल्द तय होगा और कांग्रेस अपनी पूरी ताकत के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी। हमारा लक्ष्य बिहार (bihar election) में एनडीए सरकार की नीतिगत असफलताओं को उजागर करना और जनता को विकल्प देना है।”

बिहार की राजनीतिक समीकरण में बदलाव के संकेत

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार बिहार (bihar election) में मुकाबला काफी दिलचस्प रहने वाला है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार को लेकर जनता में असंतोष के संकेत हैं, जबकि बीजेपी की आंतरिक चुनौतियां भी बढ़ी हैं। ऐसे में अगर महागठबंधन (राजद-कांग्रेस-लेफ्ट) समय रहते एकजुट होकर अभियान चलाए, तो यह एनडीए के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की संयुक्त रैलियाँ युवाओं और नए मतदाताओं को आकर्षित कर सकती हैं। खासकर रोजगार और शिक्षा के मुद्दों पर दोनों नेताओं की समान सोच गठबंधन के लिए फायदेमंद हो सकती है।

सीट बंटवारे का फार्मूला: कौन कहां मजबूत

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस ने जिन सीटों की मांग की है, उनमें से अधिकांश सीवान, दरभंगा, पूर्णिया, भागलपुर, चंपारण और गया जैसे इलाके शामिल हैं, जहां पार्टी पारंपरिक रूप से मजबूत रही है।

वहीं, आरजेडी ने अपनी नजरें मधुबनी, समस्तीपुर, सारण, पटना, और जहानाबाद जैसी सीटों पर टिकाई हैं। इन क्षेत्रों में पार्टी का संगठन मजबूत है और पिछली बार भी उसे अच्छा प्रदर्शन मिला था।

सोमवार की बैठक पर सबकी निगाहें

अब सभी की निगाहें सोमवार को होने वाली बैठक पर टिकी हैं। अगर बैठक में कोई ठोस सहमति बन जाती है, तो अगले कुछ दिनों में गठबंधन की औपचारिक घोषणा और सीटों की सूची भी जारी की जा सकती है।

कांग्रेस और राजद दोनों ही इस बात से वाकिफ हैं कि देरी से फैसला लेने पर जमीनी कार्यकर्ताओं में असंतोष फैल सकता है। यही वजह है कि दोनों दल अब किसी भी कीमत पर जल्दबाजी में नतीजे पर पहुंचना चाहते हैं।

बिहार चुनाव (bihar election) 2025 से पहले कांग्रेस-राजद गठबंधन का यह सीट बंटवारा न केवल दोनों दलों के लिए बल्कि पूरे महागठबंधन के भविष्य के लिए अहम साबित होगा। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की बैठक से यह तय होगा कि विपक्ष कितनी मजबूती से एनडीए के खिलाफ मोर्चा खोल पाएगा।

अगर दोनों दलों के बीच सहमति बन जाती है, तो बिहार (bihar election) की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। लेकिन अगर मतभेद जारी रहे, तो विपक्षी एकता पर सवाल उठना तय है।

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करूर रैली त्रासदी के बाद विजय का भावुक वीडियो बयान: “मेरे जीवन में कभी करूर जैसा दर्द नहीं देखा”

TVK chief Vijay

तमिलनाडु की राजनीति इस समय करूर में हुई एक भीषण त्रासदी से हिल चुकी है। 27 सितंबर, 2025 को तमिलगा वेट्री कज़गम (टीवीके) अध्यक्ष और अभिनेता-राजनीतिज्ञ विजय (vijay) की रैली में अचानक भगदड़ मच गई। इस दुर्घटना में कम से कम 41 लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हो गए।

इस हादसे के तीन दिन बाद, 30 सितंबर को विजय ने एक वीडियो बयान जारी कर घटना पर अपनी गहरी पीड़ा व्यक्त की और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन से भावुक अपील की।


“दिल दर्द से भारी है”

अपने संदेश में विजय (vijay) ने कहा:

“मेरे जीवन में कभी भी करूर जैसी दर्दनाक स्थिति का सामना नहीं किया। मेरा दिल दर्द से भारी है। जो हुआ, वह नहीं होना चाहिए था।”

उन्होंने कहा कि पूरे राज्यव्यापी दौरे में उन्हें जनता से अपार स्नेह मिला और करूर में भी लोग उनके प्रति प्रेम और समर्थन दिखाने आए थे। विजय (vijay) ने बताया कि उनकी पार्टी ने हमेशा कार्यक्रम स्थलों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और प्रशासन से अनुमति ली।

उन्होंने पीड़ितों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना जताई और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की। साथ ही कहा कि वे जल्द ही प्रभावित परिवारों से मुलाकात करेंगे।


मुख्यमंत्री स्टालिन को संदेश: “मेरे खिलाफ कार्रवाई करें, कार्यकर्ताओं पर नहीं”

विजय (vijay) ने अपने बयान में सीधे मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन से कहा:

“अगर आप बदला लेना चाहते हैं, तो मुझ पर लें — मेरे कार्यकर्ताओं पर नहीं। मेरा घर हो या दफ्तर, आप मेरे खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं। लेकिन मेरी पार्टी के लोगों को मत सताइए।”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रैली पार्टी को आधिकारिक तौर पर आवंटित स्थल पर हुई थी और सभी नियमों का पालन किया गया था। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पांच जिलों में रैली बिना किसी हादसे के हुई, तो केवल करूर में ही यह त्रासदी क्यों घटी? विजय (vijay) ने कहा कि “लोग सच्चाई जानते हैं, जल्द ही सब कुछ सामने आएगा।”


पुलिस और प्रशासन पर सवाल

घटना के बाद पुलिस ने टीवीके पदाधिकारियों पर एफआईआर दर्ज की और कुछ गिरफ्तारियाँ भी कीं। आरोप है कि भीड़ प्रबंधन में गंभीर लापरवाही हुई। वहीं, विपक्षी नेताओं ने सरकार और पुलिस प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। एआईएडीएमके नेता एडापडी पलानीस्वामी ने कहा कि अगर पूरी पुलिस सुरक्षा होती तो यह हादसा टाला जा सकता था।विशेषज्ञों के अनुसार, भीड़ नियंत्रित करने में खामियाँ, समय पर एंट्री और एग्जिट प्रबंधन का अभाव और आपातकालीन व्यवस्था की कमी इस त्रासदी के कारण बने।


टीवीके की राजनीतिक यात्रा जारी रहेगी

विजय (vijay) ने अपने संदेश में कहा कि उनकी पार्टी पीछे नहीं हटेगी। “टीवीके की राजनीतिक यात्रा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और बहादुर होकर जारी रहेगी।” उन्होंने कार्यकर्ताओं से संयम रखने और जनता की सेवा पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया।


आगे का रास्ता

राज्य सरकार ने इस हादसे की जांच के लिए न्यायिक आयोग गठित किया है और मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे की घोषणा की है। अदालत ने कुछ टीवीके नेताओं को न्यायिक हिरासत में भेजा है। यह त्रासदी तमिलनाडु की राजनीति में गहरी हलचल पैदा कर चुकी है। विजय का भावुक बयान जहां समर्थकों के लिए साहस का संदेश है, वहीं यह सवाल भी खड़ा करता है कि भविष्य में राजनीतिक रैलियों की सुरक्षा और व्यवस्था को कैसे सुनिश्चित किया जाएगा।

करूर की यह घटना केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि उन परिवारों की गाथा है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है। अब पूरे राज्य की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच से क्या निष्कर्ष निकलते हैं और जिम्मेदार लोगों को कैसे कटघरे में खड़ा किया जाता है।

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लद्दाख हिंसा के बाद KDA ने सोनम वांगचुक की रिहाई की मांग की

KDA

नई दिल्ली: कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) ने सोमवार को लेह में 24 सितंबर को हुई हिंसा के बाद गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और अन्य लोगों की तुरंत और बिना शर्त रिहाई की मांग की। संगठन ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी कि लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठे अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने में विफलता से क्षेत्र के लोगों में असंतोष और “परायेपन” की भावना गहराती जा रही है।

KDA
कारगिल लोकतांत्रिक गठबंधन के नेता सज्जाद कारगिली ने 29 सितंबर, 2025 को नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। Photo Credit: PTI

24 सितंबर की हिंसा

लेह में 24 सितंबर को लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और अन्य संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर प्रदर्शन हुआ था। यह विरोध अचानक हिंसक हो गया। घटना में चार लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हो गए, जिनमें सुरक्षा बलों के कर्मी भी शामिल थे। प्रशासन ने हालात को देखते हुए कई नेताओं को हिरासत में लिया। सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेजा गया। अन्य युवा नेताओं को भी लेह में हिरासत में रखा गया है।

KDA की प्रेस कॉन्फ्रेंस

नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए KDA के सदस्य सज्जाद कारगिली ने कहा कि वांगचुक और अन्य नेताओं की गिरफ्तारी अनुचित है और उनकी तुरंत रिहाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य का दर्जा और छठे अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा की मांगें “गैर-वार्ता योग्य” हैं। कारगिली ने कहा, “जब राष्ट्र कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब लद्दाख के लोगों के साथ ऐसा व्यवहार उन्हें अलगाव और असुरक्षा की ओर धकेल रहा है।”

प्रशासन पर सवाल

KDA ने हिंसा की जिम्मेदारी केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन पर डाली। कारगिली ने कहा कि प्रशासन के पास संभावित अशांति की अग्रिम जानकारी थी, लेकिन रोकथाम के उपाय नहीं किए गए। उन्होंने कहा, “गोलीबारी की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। जब जानकारी थी तो गोली चलाने की नौबत क्यों आई?” उन्होंने CRPF की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए।

न्यायिक जांच की मांग

KDA ने 24 सितंबर की हिंसा की निष्पक्ष न्यायिक जांच की मांग की है। संगठन ने कहा कि प्रदर्शन स्थल पर उपवास कर रहे लोग शांतिपूर्ण थे और हिंसा बाहर भड़की। कारगिली ने कहा, “हम निष्पक्ष जांच चाहते हैं। यह लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है।”

आंदोलन का विस्तार

कारगिली ने माना कि वांगचुक की गिरफ्तारी के बाद लद्दाख के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। उन्होंने कहा कि पहले विरोध केवल लद्दाख तक सीमित थे, लेकिन अब देश के अन्य हिस्सों में भी प्रदर्शन हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और लद्दाख के नेताओं के बीच होने वाली बैठक केवल वांगचुक के उपवास और हालिया घटनाओं के बाद तय की गई है। KDA और लेह एपेक्स बॉडी (LAB) लद्दाख को राज्य का दर्जा और संवैधानिक सुरक्षा दिलाने के लिए संयुक्त रूप से आंदोलन कर रहे हैं। दोनों संगठनों का कहना है कि उनकी मांगें किसी भी हालत में कम नहीं होंगी।

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पूर्व मंत्री व भाजपा विधायक सुरेंद्र पटवा के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी

इंदौर।भाजपा विधायक और पूर्व पर्यटन मंत्री सुरेंद्र पटवा पर इंदौर की एमपी-एमएलए कोर्ट ने गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। अदालत का यह आदेश न केवल कानूनी दृष्टि से अहम है, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर रहा है।

मामला क्या है?

अक्टूबर 2021 में सीबीआई ने सुरेंद्र पटवा और उनकी पत्नी पर धोखाधड़ी का केस दर्ज किया था।

यह कार्रवाई बैंक ऑफ बड़ौदा की इंदौर शाखा से मिली शिकायत पर की गई थी।

आरोप है कि पटवा परिवार ने बैंक से जुड़े वित्तीय लेन-देन में अनियमितताएं कीं और भारी भरकम रकम की हेराफेरी हुई।

मामला अब तक जांच में था, लेकिन अदालत के आदेश के बाद स्थिति और गंभीर हो गई है।

अदालत का आदेश

एमपी-एमएलए कोर्ट ने सीबीआई और एसीबी को निर्देश दिया है कि पटवा को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया जाए। कानूनी जानकारों का कहना है कि गिरफ्तारी वारंट जारी होना एक बड़ा कदम है और यह संकेत देता है कि अदालत मामले को गंभीरता से देख रही है।

राजनीतिक महत्व

सुंदरलाल पटवा परिवार की छवि पर असर
सुरेंद्र पटवा, पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के भतीजे हैं। इस वजह से यह मामला पटवा परिवार और भाजपा दोनों के लिए असहज स्थिति पैदा करता है।

भाजपा की मुश्किलें
चुनावी सालों में भाजपा की “साफ-सुथरी छवि” पर सवाल उठ सकते हैं। विपक्ष निश्चित तौर पर इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश करेगा।

स्थानीय राजनीति पर असर
भोजपुर और आसपास की विधानसभा सीटों पर पटवा का गहरा प्रभाव है। गिरफ्तारी की स्थिति में उनका राजनीतिक आधार कमजोर हो सकता है।

संभावित नतीजे

अगर गिरफ्तारी होती है तो विधानसभा सदस्यता और पार्टी पद पर असर पड़ सकता है।

भाजपा नेतृत्व को जल्द ही यह तय करना होगा कि वे पटवा के मामले पर क्या आधिकारिक रुख अपनाते हैं।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के मुद्दे से जोड़कर जनता के बीच ले जा सकते हैं।

यह मामला सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की राजनीति में नया विवाद है, जिसका असर आने वाले चुनावी समीकरणों तक पहुंच सकता है।




सी.पी. राधाकृष्णन: संघ से उपराष्ट्रपति पद तक का सफर

नई दिल्ली। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन ने मंगलवार को हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में निर्णायक जीत दर्ज की। उन्होंने विपक्षी उम्मीदवार एवं सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को हराया। राधाकृष्णन को 452 प्रथम वरीयता वोट मिले, जबकि रेड्डी को 300 वोट हासिल हुए। इस जीत के साथ राधाकृष्णन मौजूदा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की जगह लेंगे।


शुरुआती जीवन और वैचारिक आधार

68 वर्षीय राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरुपुर में हुआ। किशोरावस्था से ही उनकी रुचि संगठनात्मक गतिविधियों में रही। महज 16 वर्ष की उम्र में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े और धीरे-धीरे भाजपा में सक्रिय होते गए। यही वैचारिक जड़ें उनके आगे के राजनीतिक सफर की नींव बनीं।


राजनीतिक उत्थान

राधाकृष्णन पहली बार 1990 के दशक के उत्तरार्ध में सुर्खियों में आए। उन्होंने 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में कोयंबटूर सीट रिकॉर्ड अंतर से जीती, जो भाजपा के लिए तमिलनाडु जैसे चुनौतीपूर्ण राज्य में एक बड़ी सफलता थी।
2004 से 2007 तक वे तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष रहे और पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी बने। उनकी संगठनात्मक क्षमता और स्पष्ट छवि ने उन्हें राज्य की राजनीति में अलग पहचान दिलाई।


संवैधानिक पद और शासन अनुभव

फरवरी 2023 में उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया। एक साल बाद फरवरी 2024 में वे महाराष्ट्र के राज्यपाल बने। इन पदों पर रहते हुए उन्होंने प्रशासनिक अनुभव और व्यवहारिक दृष्टिकोण का परिचय दिया। सहयोगी उन्हें वैचारिक रूप से संघ से जुड़ा, लेकिन शासन में व्यावहारिक मानते हैं।


विवाद और सार्वजनिक बयान

राधाकृष्णन विवादों से पूरी तरह दूर नहीं रहे। 2023 में, जब तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने “सनातन धर्म के विनाश” का आह्वान किया था, तब झारखंड के राज्यपाल के रूप में राधाकृष्णन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने चेतावनी दी कि जो लोग हिंदू परंपराओं को नष्ट करना चाहते हैं, वे “अपने ही कृत्य से नष्ट हो जाएंगे।”
उन्होंने उदयनिधि को “गहराई से परे एक बच्चा” कहकर खारिज कर दिया। इस बयान ने समर्थकों और आलोचकों दोनों का ध्यान आकर्षित किया।


रणनीतिक महत्व

उनका राज्यपाल कार्यकाल भाजपा की तमिलनाडु इकाई, विशेषकर प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई के कोयंबटूर और कोंगु बेल्ट में संगठन मजबूत करने के प्रयासों से मेल खाता है। यह भाजपा की उस रणनीति को दर्शाता है, जिसके तहत पार्टी दक्षिण भारत में अपनी जड़ें गहरी करने की कोशिश कर रही है।

सी.पी. राधाकृष्णन की जीत सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि भाजपा और एनडीए के लिए एक रणनीतिक संदेश भी है। वे एक ऐसे नेता हैं जो संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि और प्रशासनिक अनुभव दोनों को साथ लेकर चलते हैं। अपेक्षाकृत साफ-सुथरी छवि, सीधे-सपाट बोलने का अंदाज और दक्षिण भारत से आने वाली उनकी पृष्ठभूमि उन्हें मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में अलग पहचान दिलाती है।




तृणमूल कांग्रेस का जेपीसी से बहिष्कार

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने शनिवार को संसद में गठित संयुक्त समिति (जेपीसी) को “तमाशा” करार देते हुए ऐलान किया कि वह इसमें अपना कोई सदस्य नहीं भेजेगी।

दरअसल, केंद्र सरकार ने तीन विधेयक पेश किए हैं—

1. केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक 2025

2. संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक 2025

3. जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025

ये विधेयक गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार को लोकसभा में विपक्षी नारेबाजी के बीच पेश किए थे और बाद में इन्हें संयुक्त समिति को भेजा गया।

टीएमसी ने बयान जारी कर कहा कि समिति पर भरोसा नहीं है क्योंकि यह सत्तारूढ़ बहुमत की ओर झुकी रहती है और विपक्ष के सुझाव हमेशा खारिज कर दिए जाते हैं।

राज्यसभा में टीएमसी के नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार जेपीसी को “नौटंकी” में बदल रही है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण से ध्यान भटकाना है।

उन्होंने कहा कि किसी को इस हथकंडे को “हथकंडा” कहना ही था और टीएमसी ने वही किया।




के.के. मेनन ने कांग्रेस के ‘वोट चोरी’ अभियान में भूमिका से किया इनकार

Endorsement of Congress drive is 'clip chori': Actor Menon

पटना — अभिनेता के.के. मेनन ने कांग्रेस के ‘वोट चोरी’ अभियान में अपनी किसी भी तरह की भागीदारी से इनकार किया है। एक वीडियो के ज़रिए दावा किया गया था कि उन्होंने इस अभियान का समर्थन किया, लेकिन मेनन ने स्पष्ट किया कि यह क्लिप उनकी एक वेब सीरीज़ के प्रचार से ली गई है और बिना अनुमति संपादित कर इस्तेमाल की गई है।

मेनन का बयान उस समय आया जब बिहार की मिंता देवी — जो दिल्ली में इंडिया ब्लॉक के ‘वोट चोरी’ विरोध प्रदर्शन की “124 नॉट आउट” पोस्टर गर्ल हैं — ने भी कांग्रेस द्वारा उनके नाम और तस्वीर के इस्तेमाल की आलोचना की।

अभिनेता ने सोशल मीडिया पर लिखा,

“कृपया ध्यान दें कि मैंने इस विज्ञापन में अभिनय नहीं किया है। मेरी वेब सीरीज़ के प्रचार से एक क्लिप को बिना किसी अनुमति के संपादित करके इस्तेमाल किया गया।”

विवादित वीडियो में मेनन के वेब सीरीज़ के किरदार ‘हिम्मत सिंह’ को दर्शकों से अभियान में शामिल होने का आह्वान करते हुए दिखाया गया है, जिसे कांग्रेस ने प्रचार में प्रयोग किया।