मंगलाचरण के साथ प्रारंभ हुआ दो दिवसीय मां नर्मदा प्राकट्योत्सव एवं नगर गौरव दिवस

नर्मदापुरम | मां नर्मदा प्राकट्योत्सव एवं नगर गौरव दिवस 2026 का दो दिवसीय आयोजन श्रद्धा, आस्था और भक्ति भाव के साथ भव्य रूप से प्रारंभ हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण एवं गणेश वंदना से हुआ, जिसके पश्चात मां नर्मदा का विधिवत पूजन-अर्चन एवं अभिषेक संपन्न कराया गया। इस अवसर पर भजन-कीर्तन के आयोजन ने पूरे परिसर को भक्तिमय वातावरण से सराबोर कर दिया।

शनिवार 24 जनवरी को आयोजित कार्यक्रमों की श्रृंखला के अंतर्गत ‘इंद्रधनुष’ कार्यक्रम में रंगोली चित्रकला एवं मेहंदी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। प्रतियोगिताओं में बच्चों, युवाओं एवं महिलाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और अपनी रचनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

सायंकालीन कार्यक्रमों के अंतर्गत शाम 7 बजे मां नर्मदा जी की भव्य आरती का आयोजन नित्य आरती समिति द्वारा किया गया। इसके पश्चात रात्रि 7:30 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत हुई।

सांस्कृतिक संध्या में श्वेता शर्मा एवं उनके साथियों द्वारा मां नर्मदा के जीवन एवं महिमा पर आधारित भावपूर्ण नृत्य नाटिका प्रस्तुत की गई, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। वहीं रवि त्रिपाठी एवं उनके समूह द्वारा प्रस्तुत भक्ति गायन ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

कार्यक्रम में सूहागपुर विधायक श्री विजयपाल सिंह, नगर पालिका अध्यक्ष श्रीमती नीतू यादव सहित अनेक जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। आयोजन के दौरान सुरक्षा एवं व्यवस्थाओं के लिए प्रशासन एवं आयोजन समिति द्वारा विशेष प्रबंध किए गए थे।

दो दिवसीय महोत्सव के अंतर्गत आगामी कार्यक्रमों को लेकर नगरवासियों में खासा उत्साह देखा जा रहा है।




नर्मदा परिक्रमा: आस्था, आत्मशुद्धि और भारतीय जीवन-दर्शन की जीवंत यात्रा

भारत की पवित्र नदियों में नर्मदा का स्थान विशिष्ट है। गंगा जहाँ मोक्षदायिनी मानी जाती हैं, वहीं नर्मदा को स्वयं शिवस्वरूपा कहा गया है। नर्मदा परिक्रमा केवल नदी की यात्रा नहीं, बल्कि यह मन, विचार और जीवन के परिष्कार की साधना है। यह परिक्रमा व्यक्ति को भौतिकता से निकालकर प्रकृति, समाज और स्वयं से जोड़ती है।

नर्मदा: एक नदी नहीं, जीवंत देवी

पुराणों के अनुसार नर्मदा का अवतरण भगवान शिव के पसीने से हुआ माना जाता है। स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण और वायु पुराण में नर्मदा की महिमा का विस्तार से वर्णन है। मान्यता है कि नर्मदा के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है, और उसके जल के स्पर्श से आत्मा पवित्र होती है।

इसी कारण नर्मदा को रेवा, शंकरजा और महानदी भी कहा जाता है।

परिक्रमा की परंपरा और नियम

नर्मदा परिक्रमा लगभग 2600 किलोमीटर की पैदल यात्रा है, जो अमरकंटक से आरंभ होकर अरब सागर तक जाती है और पुनः अमरकंटक लौटती है। परिक्रमा का मूल नियम है—

  • नर्मदा को सदैव दाईं ओर रखना
  • नदी को पार न करना
  • पैदल यात्रा करना
  • संयम, सात्त्विक आहार और सेवा भाव रखना

यह नियम परिक्रमा को एक साधारण यात्रा से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक अनुशासन बना देते हैं।

आत्मशुद्धि और जीवन परिवर्तन की साधना

नर्मदा परिक्रमा को तपस्या कहा गया है। महीनों और वर्षों तक चलने वाली यह यात्रा व्यक्ति को—

  • धैर्य
  • सहनशीलता
  • त्याग
  • और आत्मनिरीक्षण
    सिखाती है।

परिक्रमा के दौरान व्यक्ति समाज के हर वर्ग से मिलता है—आदिवासी, किसान, संत, गृहस्थ—और जीवन को नए दृष्टिकोण से समझता है। यही कारण है कि कहा जाता है—
“नर्मदा परिक्रमा मनुष्य को बाहर नहीं, भीतर से बदलती है।”

सामाजिक समरसता की मिसाल

नर्मदा परिक्रमा भारतीय सामाजिक एकता का अनूठा उदाहरण है। मार्ग में बसे गाँवों के लोग बिना किसी भेदभाव के परिक्रमावासियों को—

  • भोजन
  • विश्राम
  • और सहयोग
    प्रदान करते हैं।

यह परंपरा आज भी जीवित है और बताती है कि भारतीय संस्कृति सेवा और सह-अस्तित्व पर आधारित है।

पर्यावरण चेतना की धरोहर

नर्मदा परिक्रमा प्रकृति के साथ सहजीवन का पाठ पढ़ाती है। परिक्रमावासी जंगलों, घाटों, पहाड़ियों और खेतों से गुजरते हुए यह अनुभव करते हैं कि—

  • नदी केवल जलधारा नहीं
  • बल्कि जीवन का आधार है

आज जब नर्मदा प्रदूषण, अवैध खनन और अतिक्रमण से जूझ रही है, तब परिक्रमा हमें नदी संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का संदेश देती है।

नर्मदा और मध्यप्रदेश की पहचान

नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवनरेखा है। अमरकंटक, मंडला, जबलपुर, नर्मदापुरम, ओंकारेश्वर, महेश्वर जैसे तीर्थ न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र हैं। नर्मदा परिक्रमा इन सभी स्थलों को एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरोती है।

आधुनिक युग में नर्मदा परिक्रमा का संदेश

आज के भागदौड़ भरे, उपभोक्तावादी जीवन में नर्मदा परिक्रमा हमें—

  • धीमे चलने
  • कम में जीने
  • और प्रकृति के साथ संतुलन बनाने
    का संदेश देती है।

यह यात्रा सिखाती है कि विकास का अर्थ केवल निर्माण नहीं, संरक्षण और संवेदना भी है।

नर्मदा परिक्रमा एक धार्मिक अनुष्ठान से कहीं आगे है। यह भारतीय जीवन दर्शन की चलती-फिरती पाठशाला है, जहाँ आस्था, पर्यावरण, समाज और आत्मा—सब एक साथ चलते हैं।

जब तक नर्मदा बहती रहेगी, तब तक परिक्रमा की यह परंपरा हमें याद दिलाती रहेगी कि— नदी को बचाना, जीवन को बचाना है।