मनरेगा बचाओ : राहुल गांधी का मोदी सरकार पर तीखा हमला, बोले– मजदूरों के अधिकार छीनने की साजिश

नई दिल्ली। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मनरेगा बचाओ मोर्चा अभियान के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी पर जोरदार हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार मनरेगा जैसी गरीब-हितैषी योजना को धीरे-धीरे खत्म करने की साजिश कर रही है। राहुल गांधी ने मनरेगा पर सरकार के रवैये की तुलना तीन कृषि कानूनों से करते हुए कहा कि जिस तरह किसानों पर हमला किया गया था, उसी तरह अब मजदूरों को निशाना बनाया जा रहा है।

कृषि कानूनों जैसा हमला मजदूरों पर: राहुल गांधी

राहुल गांधी ने कहा,
“कुछ साल पहले भाजपा ने तीन काले कृषि कानूनों के जरिए किसानों पर आक्रमण किया था, लेकिन किसानों और हम सबने मिलकर नरेंद्र मोदी पर दबाव बनाया और उन्हें पीछे हटना पड़ा। अब उसी तरह का हमला मजदूरों पर किया जा रहा है।”

उन्होंने कहा कि मनरेगा के जरिए गरीबों को काम करने का कानूनी अधिकार मिला था, लेकिन भाजपा इसे खत्म करना चाहती है ताकि मजदूर फिर से ठेकेदारों और अमीरों पर निर्भर हो जाएं।
‘एक राजा तय करेगा सब कुछ’
राहुल गांधी ने भाजपा की विचारधारा पर सवाल उठाते हुए कहा कि
“भाजपा एक ऐसा भारत बनाना चाहती है जहां सिर्फ एक राजा ही सब कुछ तय करे।”
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार यह तय करेगी कि किस राज्य को कितना पैसा मिलेगा।

भाजपा शासित राज्यों को ज्यादा धन
विपक्ष शासित राज्यों को कम धन
इतना ही नहीं, काम कब होगा, कहां होगा और मजदूरी कितनी मिलेगी — यह सब फैसले भी केंद्र सरकार ही करेगी।
मजदूरों के अधिकार ठेकेदारों को सौंपने का आरोप

कांग्रेस नेता ने दावा किया कि
“जो अधिकार पहले मजदूरों के पास थे, वे अब ठेकेदारों को दिए जा रहे हैं।”
राहुल गांधी ने कहा कि भाजपा की सोच है कि देश का धन और संसाधन कुछ चुने हुए अमीर लोगों के हाथों में रहे और वही लोग देश को चलाएं। इससे गरीब, दलित और आदिवासी समाज पूरी तरह अमीरों पर निर्भर हो जाएगा।

लोकतंत्र और संविधान पर हमला
राहुल गांधी ने भाजपा पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी
लोकतंत्र
संविधान
एक व्यक्ति-एक वोट
जैसी अवधारणाओं को खत्म करना चाहती है।

उन्होंने कहा कि भाजपा आजादी से पहले वाला हिंदुस्तान वापस लाना चाहती है।

‘भाजपा डरपोक है, एकजुटता से पीछे हटेगी’

अपने संबोधन के अंत में राहुल गांधी ने भाजपा को डरपोक बताते हुए कहा,
“अगर हम सब एक साथ खड़े हो गए, तो नरेंद्र मोदी को पीछे हटना पड़ेगा और मनरेगा फिर से पूरी ताकत के साथ बहाल होगी।”
उन्होंने मजदूरों, किसानों और आम जनता से एकजुट होकर इस लड़ाई को लड़ने की अपील की।




MGNREGA पर कांग्रेस का आरोप: “अधिकार छीने जा रहे हैं”, ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’

A file image of Chairperson of Rachnatmak Congress leader Sandeep Dikshit.

कांग्रेस के नेता और चेयरपर्सन संदीप दीक्षित की एक फ़ाइल तस्वीर।
| फोटो क्रेडिट: पीटीआई

नई दिल्ली | 21 जनवरी 2026
कांग्रेस ने बुधवार को केंद्र सरकार पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) को कमजोर करने और मजदूरों के अधिकार छीनने का गंभीर आरोप लगाया। पार्टी ने दावा किया कि MGNREGA की जगह एक नया कानून VB-G RAM G लाया गया है, जिसका कांग्रेस लगातार विरोध कर रही है।

दीक्षित ने कहा—




मनरेगा के बाद का भारत: रोजगार की गारंटी या केंद्रीकृत नियंत्रण?

भारत की ग्रामीण रोजगार नीति में सरकार ने ऐसा हस्तक्षेप किया है, जिसकी गूंज दूर तक सुनाई देगी। ‘विकसित भारत – रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025’ केवल मनरेगा का नया संस्करण नहीं है, बल्कि यह उस दर्शन का पुनर्लेखन है, जिस पर पिछले बीस वर्षों से ग्रामीण रोजगार की बुनियाद टिकी हुई थी।

मनरेगा का जन्म एक स्पष्ट संवैधानिक विचार से हुआ था—काम का अधिकार मांग पर मिले। नया कानून इस मूल विचार को बनाए रखते हुए भी उसकी आत्मा को अलग दिशा में ले जाता दिखाई देता है।

125 दिन का वादा: विस्तार या पुनर्परिभाषा?

पहली नजर में 100 से बढ़ाकर 125 दिन की रोजगार गारंटी एक प्रगतिशील कदम प्रतीत होता है। ग्रामीण परिवारों की आय सुरक्षा को देखते हुए यह फैसला स्वागत योग्य है। पर सवाल यह है कि क्या यह वृद्धि वास्तविक होगी या कागज़ी?
मनरेगा में यदि किसी राज्य में काम की मांग बढ़ती थी, तो केंद्र को बजट बढ़ाना पड़ता था। नया कानून इस लचीलापन को समाप्त कर देता है। अब केंद्र सरकार राज्यवार आवंटन तय करेगी और वही अंतिम सीमा होगी।
यानी दिन बढ़े, लेकिन बजट बंधा रहे—तो रोजगार की गारंटी कितनी व्यावहारिक रह जाएगी?

मांग आधारित से सप्लाई आधारित मॉडल: नीतिगत यू-टर्न

मनरेगा की सबसे बड़ी ताकत उसकी मांग आधारित प्रकृति थी। ग्रामीण गरीब तय करता था कि उसे काम चाहिए। नया कानून इस अधिकार को सैद्धांतिक रूप से बरकरार रखते हुए भी व्यवहार में उसे केंद्र के बजटीय और भौगोलिक निर्णयों पर निर्भर कर देता है।
यह बदलाव सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और संघीय संतुलन से जुड़ा हुआ है। राज्यों की भूमिका अब कार्यान्वयन एजेंसी से अधिक कुछ नहीं रह जाती।

केंद्र का बढ़ता नियंत्रण

नए कानून के तहत केंद्र न केवल यह तय करेगा कि किस राज्य को कितना पैसा मिलेगा, बल्कि यह भी कि कहां रोजगार दिया जाएगा। मनरेगा जहां पूरे देश के लिए यूनिवर्सल था, वहीं नया कानून नोटिफाइड क्षेत्रों तक सीमित होगा।
यह सवाल अनिवार्य हो जाता है—
क्या ग्रामीण गरीबी अब भौगोलिक चयन का विषय बनेगी?

संविधान के संघीय ढांचे में यह बदलाव राज्यों की वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता को सीमित करता है, जिसे लेकर संसद में तीखी बहस तय है।
ग्रामीण रोजगार से ग्रामीण परिवर्तन तक
नए कानून का सकारात्मक पहलू यह है कि यह रोजगार को सिर्फ गड्ढा खोदने और भरने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रखता।

जल सुरक्षा, ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका ढांचा और आपदा प्रबंधन—इन चार स्तंभों पर आधारित ढांचा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक परिवर्तन की संभावना दिखाता है।
विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन पर दिया गया जोर इस कानून को समयानुकूल बनाता है। मनरेगा के समय यह मुद्दा इतना केंद्रीय नहीं था।

खेती के मौसम में काम पर रोक

खेती के पीक सीजन में 60 दिन तक काम रोकने का फैसला किसानों की मांग के अनुरूप हो सकता है, लेकिन यह भूमिहीन मजदूरों के लिए गंभीर संकट भी पैदा कर सकता है।
कृषि मजदूरी अस्थिर है और मनरेगा जैसे कार्यक्रम ऐसे समय में सुरक्षा कवच का काम करते थे। सवाल है—
क्या सरकार ने इस सामाजिक प्रभाव का पर्याप्त आकलन किया है?

डिजिटल पारदर्शिता या डिजिटल निर्भरता?

AI आधारित ऑडिट, बायोमेट्रिक उपस्थिति और रियल-टाइम डैशबोर्ड पारदर्शिता बढ़ा सकते हैं, लेकिन ग्रामीण भारत की डिजिटल असमानता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यदि तकनीक बाधा बन गई, तो सबसे कमजोर वर्ग फिर हाशिये पर चला जाएगा।

पंचायतें: व्यवस्था की धुरी या कमजोर कड़ी?

सरकार ने ग्राम पंचायत को योजना की आधारशिला बताया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश पंचायतें:
तकनीकी रूप से कमजोर
मानव संसाधन की कमी से जूझती
जटिल प्लानिंग ढांचे के लिए अपर्याप्त रूप से तैयार
बिना व्यापक क्षमता निर्माण के यह कानून कागज़ों में भव्य और जमीन पर बोझ बन सकता है।

सुधार या पुनर्संरचना?

यह कानून न तो पूरी तरह जनविरोधी है, न ही निर्विवाद रूप से जनहितैषी।
यह रोजगार की गारंटी को विकास की रणनीति में बदलने का प्रयास है, लेकिन इसकी कीमत केंद्रीकरण और लचीलापन खोने के रूप में चुकानी पड़ सकती है।
मनरेगा ने ग्रामीण भारत को संकट के समय सहारा दिया था। अब नया कानून दावा कर रहा है कि वह ग्रामीण भारत को स्थायी विकास की राह दिखाएगा।
सवाल सिर्फ इतना है—क्या गारंटी अधिकार के रूप में बचेगी, या योजना बनकर सिमट जाएगी?




केंद्र सरकार मनरेगा का नाम बदलेगी, 125 दिन रोजगार की गारंटी का फैसला

नई दिल्ली।केंद्र की मोदी सरकार ने देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा का नाम बदलने का फैसला किया है। शुक्रवार को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। सरकार अब इस योजना को “पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार गारंटी” के नाम से लागू करने की तैयारी में है।

सरकारी निर्णय के अनुसार, नए नाम के साथ योजना के तहत ग्रामीण गरीब परिवारों को एक वर्ष में 125 दिनों का रोजगार सुनिश्चित किया जाएगा। इसके लिए केंद्र सरकार ने 1.51 लाख करोड़ रुपये के प्रावधान का निर्णय लिया है। अब तक मनरेगा के तहत ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिन का रोजगार दिया जाता था।

योजना का इतिहास

मनरेगा योजना की शुरुआत साल 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने की थी। प्रारंभ में इसका नाम नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (NREGA) रखा गया था। बाद में इसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) नाम दिया गया। यह योजना एक महत्वपूर्ण भारतीय श्रम कानून और सामाजिक सुरक्षा उपाय मानी जाती है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में ‘काम के अधिकार’ की गारंटी देना है।

करोड़ों ग्रामीणों को मिला लाभ

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2005 से अब तक करीब 15.4 करोड़ लोग इस योजना के तहत सक्रिय रूप से काम कर चुके हैं। मनरेगा देश के ग्रामीण परिवारों को आर्थिक स्थिरता और आजीविका प्रदान करने वाली सबसे बड़ी फ्लैगशिप योजनाओं में से एक है। इसका संचालन केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा किया जाता है।

सरकार का दावा

सरकार का कहना है कि योजना का नाम बदलने से इसे एक नई पहचान मिलेगी और रोजगार के अवसर बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। रोजगार के दिनों में बढ़ोतरी से गरीब और जरूरतमंद परिवारों को अतिरिक्त आय का सहारा मिलेगा।

हालांकि, इस फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने की संभावना है, लेकिन सरकार इसे ग्रामीण रोजगार और सामाजिक सुरक्षा को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम बता रही है।




Narmadapuram News: गड़बड़ी में जो शामिल नहीं उन्हें थमाए नोटिस, इधर वेंडर का नोटिस टाइप होने पर भी साइन नहीं कर रहे सीईओ

दीपकशर्मा/माखननगर: जनपद पंचायत माखन नगर की ग्राम पंचायत नसीराबाद एवं गनेरा में अमृत सरोवर में हुए फर्जीबाड़े को लेकर जिला पंचायत ने इसमें शामिल सभी सभी संबंधित लोगों को कारण बताओं नोटिस जारी किए हैं।  ऐसा नहीं की पंचायत में हो रहा है हर फर्जीबाड़े में सरपंच सचिव ही जिम्मेदार हो अन्य लोग भी शामिल हो सकते हैं। ‘देर आए, दुरुस्त आए’ भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रशासन में कुछ कार्रवाई करने की मंशा तो जाहिर की । कही यह नोटिस दिखावा तो नहीं या फिर अधिकारी इस पर कोई कार्रवाई करने की मनसा भी रखते हैं।

ऐसा देनवापोस्ट क्यों कह रहा है इसके पीछे एक कारण क्योंकि अमृत सरोवर सारा मामला मनरेगा जुड़ा हुआ है। ऐसे में मनरेगा सिर्फ आठ लोगों को जिला पंचायत नर्मदापुरम से नोटिस जारी किए गए हैं। सूत्रो से मिली जानकारी के अनुसार इसमें कुछ लोगों को ओर नोटिस जारी किए जाने थे। जो इस सारे खेल में शामिल थे ले​किन उनको नोटिस जारी ही नही किए गए। जो अपने आप में एक सवाल है। जिला पंचायत से जिन्हें नोटिस जारी हुए हैं उनके नाम इस प्रकार है वर्तमान सरपंच नसीराबाद उषा बाई , सचिव दुलारे मालवीय, जीआरएस कैलाश अहिरवार, गनेरा के वर्तमान सरपंच कृष्ण कुमार झा, सचिव जयसिंग यादव, जीआरएस संतोष यादव,सुनीता चौहान सहायक लेखा अधिकारी मनरेगा एवं तत्कालीन उप यंत्री हर्षेंद्रनाथ तिवारी इन आठ लोगों को नोटिस जारी किए गए। जबकि मनरेगा के इस भुगतान में तीन लोग ओर जिम्मेदार थे। जब भुगतान किया गया उसे समय ग्रााम पंचायत में आचार संहिता लगी हुई थी तो प्रशासक की जिम्मेदारी थी पंचायत से होने वाले हर भुगतान की। दूसरा वेंडर जिसने ग्राम पंचायत से ज्यादा राशि प्राप्त की और तत्कालीन जनपद सीईओ जिनकी अनुमति के बाद ही भुगतान किया गया। फिर इन आठ लोगों को नोटिस जारी करना सिर्फ खाना पूर्ति ही नजर आती हैं।

मनरेगा में भुगतान की प्रक्रिया

मनरेगा में जो भी भुगतान होता है उसमें ग्राम पंचायत के सरपंच और सचिव का सीधा कोई रोल नहीं होता है। मनरेगा में किए गए कार्य की बकायदा एक नोट शीट बनाई जाती है। जिस पर बिल बाउचर में सरपंच और सचिव के साइन होते हैं। अगर किसी पंचायत में सरपंच नहीं है तो प्रशासक की जिम्मेदारी होती है उस स्थिति में प्रशासक के हस्ताक्षर होते है। फिर उस फाइल में उपयंत्री की वैल्यूएशन रिपोर्ट लगती है। उसके बाद मनरेगा फाईल मनरेगा शाखा में भुगतान के लिए सहायक लेखा अधिकारी के पास पहुंचती हैं। जबतक जनपद सीईओ अप्रूव नही करते जबतक वेंडर को कोई भुगतान नही होता। जनपद सीईओ के अप्रूवल के बाद जनपद सीईओ एवं मनरेगा लेखा अधिकारी की डीएससी के द्वारा मनरेगा की राशि का भुगतान किया जाता है।

यह हैं सारा मामला

जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत नसीराबाद में 2022 में मनरेगा एवं 15वां वित्त के संयोजन से अमृतसर सरोवर निर्माण के लिए 14 लाख 90 हजार की प्रशासनिक स्वीकृति जारी हुई थी। जिसमें मजदूरी पर ग्राम पंचायत में 8 लाख 94 हजार एवं मटेरियल पर 5 लाख 96 हजार व्यय होना था। वही ग्राम पंचायत गनेरा में मनरेगा एवं 15वां वित्त के संयोजन से अमर कारोबार निर्माण हेतु 16 लाख 70 हजार की प्रशासनिक स्वीकृति दी गई थी। जिसमें मजदूरी पर 10 लाख 2 हजार एवं मटेरियल पर 6 लाख 68 हजार व्यय होना था। ग्राम पंचायत नसीराबाद में उक्त कार्य पर 7 लाख 11 हजार की राशी मनरेगा से व्यय की वही ग्राम पंचायत गनेरा ने 7 लाख 21 हजार मनरेगा से व्यय की गई। यही वो राशी जिस पर मनरेगा में खेल हो गया औैर ग्राम पंचायत में हुई इसी अनिमित्ता को लेकर मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत माखन नगर ने पत्र क्रमांक 984 के माध्यम से 30 मार्च 2024 को जिला पंचायत सीईओ को सूचना के माध्यम से अवगत कराया था। उसके बाद जनपद पंचायत माखन नगर के पत्र क्रमांक 984 पर संज्ञान लेते हुए जिला पंचायत सीईओ एसएस रावत ने 18 अप्रैल 2024 को माखन नगर जनपद की ग्राम पंचायत नसीराबाद एवं गनेरा सरपंच सहित कर्मचारियों के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किए।

जो शामिल नहीं उन्हें भी मिला नोटिस

ग्राम पंचायत नसीराबाद और गनेरा में अमृत सरोवर में जो भी खेल हुआ है उसमें कार्रवाई करने के चक्कर में अधिकारी ने जो शामिल नहीं उन्हें भी नोटिस थमाने में देर नही की। वेंडर को मनरेगा का भुगतान जून 2022 में किया गया और नोटिस वर्तमान सरपंचों को जारी किए गए। जबकि गनेरा सरपंच कृष्ण कुमार झा और नसीराबाद सरपंच उषा बाई जुलाई 2022 में मनोनीत हुए। जिला पंचायत सीईओ द्वारा इन्हे दिए गए नोटिस यह बात समझ से परे हैं। देनवा पोस्ट को गनेरा सरपंच कृष्ण कुमार झा ने बताया गनेरा पंचायत में अमृत सरोवर हमारे कार्यकाल से पहले स्वीकृत हुआ था और उसका भुगतान भी हमारे कार्यकाल के पहले ही किया है फिर भी जिला पंचायत सीईओ द्वारा हमें कारण बताओं नोटिस धारा 40 के तहत दिया गया है। यह नियम विरुद्ध जबकि इस मामले में हमारा कोई लेना-देना ही नहीं हैं।

वेंडर का नोटिस टाइप हुआ लेकिन सीईओ ने नही किए साइन

वेंडर राजेश राय के खिलाफ पत्र क्रमांक 139 कारण बताओं नोटिस टाइप तो किया गया । लेकिन उस पर जिला पंचायत सीईओ द्वारा साइन नहीं किया। ऐसा क्यों जबकि सारे मामले में वेंडर की भूमिका संदिग्ध है। ग्राम पंचायत नसीराबाद द्वारा वेंडर को 5 लाख 95 हजार की राशि का भुगतान किया गया। जबकि ग्राम पंचायत की एमबी में मटेरियल का मूल्यांकन मात्र 98 हजार ही किया गया वही बात की जाए गनेरा पंचायत की तो पंचायत द्वारा 6 लाख 67 हजार का भुगतान किया गया वहीं पंचायत की एमबी में भी मटेरियल मूल्यांकन करीब 95 हजार किया गया। लाखों का भुगतान वेंडर के खाते में होने के बाद भी वेंडर को इस मामले से बाहर रखा जा रहा है। ऐसा नही कि जनपद वेंडर पर कोई कार्रवाई नही कर सकती है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जनपद पंचायत माखननगर की पंचायतों में अन्य वेंडरों ने निर्माण सामग्री पहुंचायी थी। कोई मामला नही होने पर भी विगत चार माह से भुगतान पर रोक लगी है और कुछ पर तो एफआईआर होने की बात भी सामने आ रही हैं। फिर इसपर इतनी मेहरबानी क्यो?

दो अधिकारियों से इतनी बड़ी चूक।

अमृतसर सरोवर में ग्राम पंचायत नसीराबाद और पंचायत गनेरा में मटेरियल का जो भुगतान किया गया उसमें दो अधिकारियों की भी भूमिका रही हैं। जिला पंचायत द्वारा माखन नगर जनपद के दो अधिकारियों को नोटिस क्यों जारी नहीं किया गया? जब ग्राम पंचायत में आचार संहिता लगी थी उसे समय प्रशासक पीसीओ नारायण मालवीय को चार्ज दिया गया था। उस दोरान पंचारयत में होने वाले भुगतान के बिल वाउचर पर उनके द्वारा ही साइन किए जाते थे। इस प्रकरण में भी नारायण मालवीय द्वारा ही हस्ताक्षर किए गए और जानकारी वर्तमान सरपंच से मांगी जा रही हैं। वही तत्कालीन सीईओ संदीप डाबर के पास भुगतान के लिए जब यह फाइल आई तब उनके द्वारा इस फ़ाइल को वेरीफाई किया गया होगा। ऐसे कैसे हुआ कि जब उन्होने देखा तब सब ठीक था
ओर भुगतान करने के बाद सब गड़बड़ हो गया। क्याकि जनपद सीईओ के डिजीटल सिग्नेचर के बिना भुगतान संभव ही नही। यह जांच का विषय है लेकिन इन्हे नोटिस ही नही दिया गया। इसलिए इस सारे मामले में कार्यवाही कम खानापूर्ति ज्यादा नजर आ रही है।




Makhannagar News : घोटालों का पौधारोपण, जेबों में बढती रही हरियाली।

दीपकशर्मा / माखननगर : जनपद पंचायत माखन नगर की 64 ग्राम पंचायतों ने बीते साल धरती को हरा भरा करने में लाखो रुपये खर्च कर दिए। ग्राम पंचायत ने खाली पड़ी जमीन हो या फिर तालाब का किनारा या स्कूल का परिसर सभी जगह पर योजना की राशी से पौधे इस बार भी रोपित किए गए। जो कुछ दिनों बाद हर बार की तरह नजर नहीं आयेंगे। सही मायने में धरती में हरियाली आए या न आए पर जेबों में हरियाली आना तय है।
ऐसा ही मामला जनपद पंचायत माखननगर की ग्राम पंचायत मढ़ावन में देखने को मिला , जहां पौधे रोपण के लिए पंचायत भारी भरकम बजट दिया गया। सितंबर 2022 एवं सितंबर 2023  में पौधरोपण सप्ताह मनाते हुए हजारों रुपए खर्च भी कर पौधे रोपित कर दिए गए। हरियाली के नाम पर सरकारी पैसे को ठिकाने लगाने के लिए पंचायत में नए नए प्रयोग किए गए। खरीदी पौधो कि हुई लेकिन बिल बिल्डिंग मटेरियल के लगाए गए। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि बिल्डिंग मटेरियल वाले कब से पौधे बेचने लगे हैं। इतना ही नहीं पौधों के सरंक्षण के लिए मजदूर भी कागजों पर ही नजर आये हैं। 

वर्ष वार पौधे रोपण पर हुए लाखों खर्च

मनरेगा के तहत 2022 से 2023 तक एक वृहद पौधे रोपण का कार्यक्रम चालू किया गया था। जिसमें मढ़ावन पंचायत में 12 लाख 34 हजार रुपये के पौधरोपण होने थे। पंचायत ने एक लाख रुपए का भुगतान स्थानीय बिल्डिंग मटेरियल सप्लायर को नवंबर 2022 किया था। बाद में पौधों की आपूर्ति किए जाने का दावा किया गया। लेकिन पौधे कब आये और कब रोपित किये गये इसका कुछ पता ही नहीं चला। लेकिन मजदूरों को करीब 50 हजार भुगतान किया गया। बात करे 2023 और 2024 में 4 लाख 80 हजार रुपए पंचायत का बजट निर्धारित था इसमें भी लगभग 75 हजार रुपए हरियाली पर खर्च किए गए। लेकिन उस समय रोपित किए गए पौधे कहा है इसकी जानकारी किसी को नहीं है।

खर्च का पता, पौधे का कुछ पता नहीं

ग्राम पंचायत  मढ़ावन में पौधरोपण पंचायत की खाली पड़ी जमीन में प्रत्येक वर्ष लाखों रुपए खर्च किए जा रहे है। इन वर्षो में पौधे की खरीद के साथ ही गांवों में पौधों को लगवाने के लिए गड्ढों की खुदाई तक का बजट तय किया जाता है। इस पर खर्च का तो मढ़ावन पंचायत में वर्ष वार लेखा जोखा है लेकिन इस खर्च में कितने गड्ढे कहा खुले और कितने पौधे लगे यह किसी को जानकारी नहीं है।

यहां पौधे ही नही मजदूरों का हों रहा भुगतान

पौधों का पता नहीं देखरेख करने वाले पा गए मजदूरी

पौधरोपण को लेकर सबसे मजेदार बात यह है कि  वर्ष 2023 – 24 में मढ़ावन में जो पौधे रोपण होने थे वह पौधे कभी खरीदे ही नही गए। फिर पौधों के देखरेख और सिचाई कराने के लिए मजदूरों को भुगतान कैसे कर किया गया। समझ से परे है,शायद यही कारण है कि यह सवाल आते ही सरपंच और कर्मचारी बगले झांकने लगते हैं।

उन्हीं स्थानों पर हो रहा हर वर्ष पौधरोपण

लगभग प्रत्येक वर्ष होने वाले पौधरोपण अभियान में स्थान का चयन ही सारी पोल खोलने के लिए काफी है। जानकारों की माने तो लगभग हर बार स्कूल, पंचायत भवन से लेकर दूसरे खाली स्थानों पर पौध रोपण हर बार किया जाता है। लेकिन जब उन स्थानों पर देखा जाए तो पौधे वहां पर नजर नहीं आते हैं। मजे की बात यह है कि इस हकीकत को देखने के बाद भी अधिकारी मौन रहते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हर बार रोपित होने वाले पौधे गए तो कहा गए जब उनकी देखरेख के नाम पर भी बराबर धन खर्च होता रहा।

पंचायत में पौधरोपण पर आठ लाख खर्च की तैयारी

बीते वर्षो के भांति इस वर्ष भी  पौधरोपण का खेल शुरू होने वाला है  पंचायत दो जगह शान्तिधाम एवं खेल मैदान में वृक्षारोपण करने की तैयारी में है। इन दोनो जगह के लिए पंचायत ने करीब आठ लाख की टीएस करा रखी है। सरपंच को एक बार फिर हरियाली के नाम पर खेल खेलने का मौका हाथ आ गया है। 

ऐसी ईमानदारी कही नही देखी 

जब देनवापोस्ट इस संबंध में मढ़ावन पंचायत की सरपंच लता गोस्वामी से तो उनसे संपर्क नही हुआ। लेकिन सरपंच पति राजेन्द्र गोस्वामी जैसी ईमानदारी कहीं देखने को नहीं मिली उन्होने बताया कि वृक्षारोपण किया ही नही गया तो पौधे दिखेंगे कैसे। 

मालूम करना पड़ेगा 

देनवा पोस्ट को जनपद सीईओ संदीप डाबर ने बताया कि पंचायत में पौधे लगे हैं या नहीं सब इंजीनियर से मालूम करना पड़ेगा। उसके बाद ही कुछ कहा जा सकता है।