नल-जल योजना में गड़बड़ी का मामला गरमाया, सरपंच संघ ने सौंपा ज्ञापन
written by Denva Post Bureau | 24/12/2025
नर्मदापुरम। जनपद पंचायत माखननगर क्षेत्र की विभिन्न ग्राम पंचायतों में चल रही नल-जल योजना के कार्यों में गंभीर अनियमितताओं और लापरवाही के मामले सामने आए हैं। ग्राम पंचायत सरपंच संघ ने इसको लेकर मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ), जनपद पंचायत माखननगर को लिखित शिकायत सौंपी है और अधूरे एवं घटिया गुणवत्ता के कार्यों की जांच की मांग की है।
सरपंच संघ के अध्यक्ष द्वारा दिए गए ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) विभाग के ठेकेदारों द्वारा कई ग्राम पंचायतों में नल-जल योजना के कार्य या तो अधूरे छोड़ दिए गए हैं या मानकों के अनुरूप नहीं किए जा रहे हैं। कई पंचायतों में तो 8 से 10 माह से कार्य पूरी तरह से ठप पड़े हैं, जिससे ग्रामीणों को इस महत्वाकांक्षी योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
ज्ञापन में कहा गया है कि नल-जल योजना ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अत्यंत जरूरी है, लेकिन कार्यों के समय पर पूरा न होने और गुणवत्ता की अनदेखी से ग्रामीण विकास बाधित हो रहा है और लोगों में असंतोष बढ़ रहा है।
सरपंच संघ अध्यक्ष कृष्ण कुमार झा ने मांग की है कि जनपद पंचायत माखननगर के अंतर्गत सभी चल रहे और अधूरे नल-जल योजना कार्यों की उचित तकनीकी जांच कराई जाए, निर्धारित समय-सीमा में गुणवत्तापूर्ण ढंग से कार्य पूरा कराया जाए तथा लापरवाही बरतने वाले ठेकेदारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
ज्ञापन सौंपने के दौरान सरपंच संघ के पदाधिकारी और अन्य जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। अब प्रशासन इस गंभीर शिकायत पर किस तरह की कार्रवाई करता है, यह देखना होगा।
मनरेगा के बाद का भारत: रोजगार की गारंटी या केंद्रीकृत नियंत्रण?
written by Denva Post Bureau | 24/12/2025
भारत की ग्रामीण रोजगार नीति में सरकार ने ऐसा हस्तक्षेप किया है, जिसकी गूंज दूर तक सुनाई देगी। ‘विकसित भारत – रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025’ केवल मनरेगा का नया संस्करण नहीं है, बल्कि यह उस दर्शन का पुनर्लेखन है, जिस पर पिछले बीस वर्षों से ग्रामीण रोजगार की बुनियाद टिकी हुई थी।
मनरेगा का जन्म एक स्पष्ट संवैधानिक विचार से हुआ था—काम का अधिकार मांग पर मिले। नया कानून इस मूल विचार को बनाए रखते हुए भी उसकी आत्मा को अलग दिशा में ले जाता दिखाई देता है।
125 दिन का वादा: विस्तार या पुनर्परिभाषा?
पहली नजर में 100 से बढ़ाकर 125 दिन की रोजगार गारंटी एक प्रगतिशील कदम प्रतीत होता है। ग्रामीण परिवारों की आय सुरक्षा को देखते हुए यह फैसला स्वागत योग्य है। पर सवाल यह है कि क्या यह वृद्धि वास्तविक होगी या कागज़ी? मनरेगा में यदि किसी राज्य में काम की मांग बढ़ती थी, तो केंद्र को बजट बढ़ाना पड़ता था। नया कानून इस लचीलापन को समाप्त कर देता है। अब केंद्र सरकार राज्यवार आवंटन तय करेगी और वही अंतिम सीमा होगी। यानी दिन बढ़े, लेकिन बजट बंधा रहे—तो रोजगार की गारंटी कितनी व्यावहारिक रह जाएगी?
मांग आधारित से सप्लाई आधारित मॉडल: नीतिगत यू-टर्न
मनरेगा की सबसे बड़ी ताकत उसकी मांग आधारित प्रकृति थी। ग्रामीण गरीब तय करता था कि उसे काम चाहिए। नया कानून इस अधिकार को सैद्धांतिक रूप से बरकरार रखते हुए भी व्यवहार में उसे केंद्र के बजटीय और भौगोलिक निर्णयों पर निर्भर कर देता है। यह बदलाव सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और संघीय संतुलन से जुड़ा हुआ है। राज्यों की भूमिका अब कार्यान्वयन एजेंसी से अधिक कुछ नहीं रह जाती।
केंद्र का बढ़ता नियंत्रण
नए कानून के तहत केंद्र न केवल यह तय करेगा कि किस राज्य को कितना पैसा मिलेगा, बल्कि यह भी कि कहां रोजगार दिया जाएगा। मनरेगा जहां पूरे देश के लिए यूनिवर्सल था, वहीं नया कानून नोटिफाइड क्षेत्रों तक सीमित होगा। यह सवाल अनिवार्य हो जाता है— क्या ग्रामीण गरीबी अब भौगोलिक चयन का विषय बनेगी?
संविधान के संघीय ढांचे में यह बदलाव राज्यों की वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता को सीमित करता है, जिसे लेकर संसद में तीखी बहस तय है। ग्रामीण रोजगार से ग्रामीण परिवर्तन तक नए कानून का सकारात्मक पहलू यह है कि यह रोजगार को सिर्फ गड्ढा खोदने और भरने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रखता।
जल सुरक्षा, ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका ढांचा और आपदा प्रबंधन—इन चार स्तंभों पर आधारित ढांचा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक परिवर्तन की संभावना दिखाता है। विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन पर दिया गया जोर इस कानून को समयानुकूल बनाता है। मनरेगा के समय यह मुद्दा इतना केंद्रीय नहीं था।
खेती के मौसम में काम पर रोक
खेती के पीक सीजन में 60 दिन तक काम रोकने का फैसला किसानों की मांग के अनुरूप हो सकता है, लेकिन यह भूमिहीन मजदूरों के लिए गंभीर संकट भी पैदा कर सकता है। कृषि मजदूरी अस्थिर है और मनरेगा जैसे कार्यक्रम ऐसे समय में सुरक्षा कवच का काम करते थे। सवाल है— क्या सरकार ने इस सामाजिक प्रभाव का पर्याप्त आकलन किया है?
डिजिटल पारदर्शिता या डिजिटल निर्भरता?
AI आधारित ऑडिट, बायोमेट्रिक उपस्थिति और रियल-टाइम डैशबोर्ड पारदर्शिता बढ़ा सकते हैं, लेकिन ग्रामीण भारत की डिजिटल असमानता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि तकनीक बाधा बन गई, तो सबसे कमजोर वर्ग फिर हाशिये पर चला जाएगा।
पंचायतें: व्यवस्था की धुरी या कमजोर कड़ी?
सरकार ने ग्राम पंचायत को योजना की आधारशिला बताया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश पंचायतें: तकनीकी रूप से कमजोर मानव संसाधन की कमी से जूझती जटिल प्लानिंग ढांचे के लिए अपर्याप्त रूप से तैयार बिना व्यापक क्षमता निर्माण के यह कानून कागज़ों में भव्य और जमीन पर बोझ बन सकता है।
सुधार या पुनर्संरचना?
यह कानून न तो पूरी तरह जनविरोधी है, न ही निर्विवाद रूप से जनहितैषी। यह रोजगार की गारंटी को विकास की रणनीति में बदलने का प्रयास है, लेकिन इसकी कीमत केंद्रीकरण और लचीलापन खोने के रूप में चुकानी पड़ सकती है। मनरेगा ने ग्रामीण भारत को संकट के समय सहारा दिया था। अब नया कानून दावा कर रहा है कि वह ग्रामीण भारत को स्थायी विकास की राह दिखाएगा। सवाल सिर्फ इतना है—क्या गारंटी अधिकार के रूप में बचेगी, या योजना बनकर सिमट जाएगी?
जनपद पंचायत माखननगर के प्रतिनिधियों ने किया दो दिवसीय पंचायत एवं ऐतिहासिक स्थलों का अध्ययन दौरा
written by Denva Post Bureau | 24/12/2025
संजय गांधी एवं युवा नेतृत्व तथा पंचायत ग्रामीण विकास प्रशिक्षण संस्था पचमढ़ी द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत जनपद पंचायत माखननगर के अधिकारियों, सरपंचों, सचिवों एवं सहायक सचिवों ने दो दिवसीय अध्ययन दौरे में विभिन्न ग्राम पंचायतों और ऐतिहासिक स्थलों का निरीक्षण किया। यह प्रशिक्षण 4 दिसंबर से प्रारंभ हुआ। पहले दिन प्रतिनिधि दल ने भीमबेटका (अब्दुल्लागंज) की प्राचीन गुफाओं का भ्रमण कर वहां की ऐतिहासिक धरोहरों की जानकारी प्राप्त की। इसके बाद रायसेन जिले की जनपद पंचायत अब्दुल्लागंज के ग्राम पंचायत क्षेत्र का दौरा किया, जहां चल रहे पंचायत विकास कार्यों का अवलोकन किया गया। टीम ने सांची स्थित विश्व प्रसिद्ध स्तूप एवं अन्य ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन किए तथा वहां के ‘नंदन फलोद्यान’ जैसे नवाचारों से परिचित हुए। दूसरे दिन 5 दिसंबर को भोजपुर ग्राम पंचायत का विजिट किया गया। प्रतिनिधियों ने भोजपुर स्थित भगवान भोलेनाथ के प्राचीन मंदिर के दर्शन किए और स्थानीय पंचायत में चल रहे विकास कार्यों की समीक्षा की। प्रशिक्षण के दौरान स्वच्छता, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास तथा छोटे-छोटे कदमों से ग्राम उन्नयन के मॉडल पर विस्तृत जानकारी दी गई।
इस प्रशिक्षण में मास्टर ट्रेनर राजेंद्र कुशवाहा, जनपद अधिकारी घनश्याम मीणा सहित सरपंच कृष्ण कुमार झा, विशाल मालवीय, नरेंद्र मालवीय, लखन कीर, अनिल कहार, तथा सचिव सुरेंद्र सिंह तोमर, पवन, श्रुति, गोविंद यादव, लालजीराम मीणा, जीवन यादव, दुलारे मालवीय, विनोद यादव शामिल रहे। सहायक सचिवों में मनोज मालवीय, राघवेंद्र तोमर, संदीप सिंह ठाकुर, सोनू चौहान, ललित पटेल, महेश चौरे, प्रवीण राजपूत, राजकुमार यादव, आशीष मालवीय सहित अन्य जनप्रतिनिधियों ने प्रशिक्षण प्राप्त कर प्रमाण पत्र हासिल किए। अध्ययन दौरे ने प्रतिभागियों को पंचायत विकास से जुड़े नए आयामों, नवाचारों और व्यवहारिक ज्ञान से समृद्ध किया।
Makhannagar News : दुर्घटना ग्रस्त जोन में नाली निर्माण कार्य
written by Denva Post Bureau | 24/12/2025
जल गंगा संवर्धन अभियान अंतर्गत पंचायतों में साफ सफाई, गंदे पानी निकासी का का कार्य जनपद माखन नगर में वरीयता मैं करवाया जा रहा है जिसके अंतर्गत ग्राम पंचायत आंचलखेड़ा के वार्ड क्रमांक 16 के पास मैन रोड किनारे मोहल्ले का गंदा पानी MAIN रोड पर बहता रहता था। जिसके कारण रोड में कटाव एवं रोड में गड्ढे हो रहे थे। जिससे रोड की स्थिति खराब हो चुकी थी , मेन रोड से आने जाने वाले वाहन चालक ,पैदल राहगीर एवं दो पहिया वाहन दुर्घटना की संभावना बनी रहती थी ।
उक्त समस्या को देखते हुए ग्राम पंचायत आंचल खेड़ा सरपंच श्रीमती आशा व सचिव प्रेम यादव के प्रयासों से राजेश संकल्लय उपयंत्री के मार्गदर्शन में भगवती राइस मिल से राय मोहन की दुकान तक आरसीसी नाली का निर्माण कार्य लंबाई 235 मीटर 2*2 कुल लागत 6.32 लाख मद 15 वा वित्त से किया जा रहा है जिससे दुर्घटना ग्रस्त जोन में आमजनों को राहत मिलेगी ।
जनपद पंचायत सीईओ रंजीत ताराम ने बताया कि काफी ग्रामीणों को समस्या हो रही थी। हमने इस कार्य को जल गंगा संवर्धन अभियान अंतर्गत लिया हैं। जिससे ग्रामीणों को हो रही समस्या का निदान हो सके।
New Delhi News : पंचायतों की आय बढ़ाने के लिए नियम बनाने की तैयारी में केंद्र सरकार
written by Denva Post Bureau | 24/12/2025
पंचायतों के विकास के लिए केंद्र सरकार (Central Government) लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन स्थानीय ग्रामीण निकायों को आत्मनिर्भर बनाने में राज्यों की ही रुचि नहीं है। संविधान ने अनुच्छेद 243 h में प्रविधान किया है कि राज्य विधानमंडल पंचायतों को कर, शुल्क, पथकर आदि लगाने का अधिकार दे सकते हैं। इसके लिए राज्य विधानमंडल कानून बना सकता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि राज्य इसके प्रति उदासीन हैं।
कई राज्यों ने पंचायतों की अपने संसाधनों से आय के लिए नियम बनाए हैं, लेकिन ज्यादा अधिकार नहीं दिए। अब केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए आदर्श नियम बनाने जा रही है। हाल ही में पंचायतीराज मंत्रालय ने केंद्रीय वित्त आयोग के साथ मिलकर राज्य वित्त आयोगों का सम्मेलन आयोजित किया। इसमें एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसमें यह चिंताजनक तथ्य सामने आया कि देशभर की ग्राम पंचायतों की प्रति व्यक्ति से औसत राजस्व प्राप्ति (On Source Revenue) मात्र 59 रुपये है।
यह भी तब है, जबकि आंध्र प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मिजोरम, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और पुदुचेरी ने पंचायतों की अपने संसाधनों से आय के लिए नियम बना रखे हैं। बाकी राज्यों ने वह भी नहीं बनाए।
वित्त आयोग ने भी जताई चिंता
15वें केंद्रीय वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. अरविंद पनगढ़िया ने इस पर चिंता जताते हुए जोर दिया कि पंचायतों को विकास और बेहतर सेवाएं प्रदान करने के लिए अपने आय संसाधन बढ़ाने होंगे। पंचायतीराज मंत्रालय की ओर से प्रस्तुतीकरण में यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि राज्य चाहें तो पंचायतें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकती हैं।
दरअसल, संविधान ने ही राज्यों को यह अधिकार दिया है कि वह कानून बनाकर पंचायतों को कर, शुल्क, पथकर आदि लागू करने का अधिकार दे सकते हैं। विशेषज्ञों ने यह भी सिफारिश की है कि पंचायतों को उस क्षेत्र में होने वाले खनन की रॉयल्टी, जिला खनन निधि, जीएसटी और स्टॉम्प ड्यूटी में भी हिस्सेदारी दी जानी चाहिए।
किस तरह के बनेंगे नियम?
पंचायतीराज मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मंत्रालय पंचायतों के आय संसाधन बढ़ाने के लिए आदर्श नियम बनाने जा रही है। उनमें संविधान में दिए गए अधिकार और विशेषज्ञों की सिफारिशों को शामिल किया जाएगा। राज्यों से अपेक्षा की जाएगी कि वह उसी नियम के अनुसार अपने यहां व्यवस्थाएं लागू करते हुए पंचायतों को अधिकार दें, ताकि देशभर की पंचायतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा सके।
इसे देखते हुए ही पहली बार यह अनिवार्यता भी कर दी गई है कि अब ग्राम पंचायत विकास योजना ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अपलोड करते समय ग्राम पंचायतों को घोषणा करनी होगी कि उनकी अपने संसाधनों से आय कितनी है।
Narmadapuram News : पावरलेस महिला प्रतिनिधि, पति कर रहे अधिकारों का उपयोग
written by Deepak Sharma | 24/12/2025
दीपक शर्मा/नर्मदापुरम : पंचायती राज में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर प्रदेश सरकार ने उन्हें सशक्त बनाने की पहल की है। उम्मीद थी कि महिलाएं पंच बनकर गांव के विकास में भागीदार बनेंगी। मुखिया बनकर गांव की सरकार चलाएगी, लेकिन जिले में ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा। चुनाव जीतने के बाद ज्यादातर महिला प्रतिनिधि रबर स्टॉम्प बनकर रह गई हैं, जबकि उनके पति सरपंची चला रहे हैं। जिले की 425 ग्राम पंचायतों में से करीब 215 की सरपंच महिलाएं हैं, लेकिन ग्रामसभा की बैठक से लेकर गांव की चौपालों तक जनता की समस्याएं सुलझाने का काम उनके पति ही कर रहे हैं। यानी 98 फीसदी महिला प्रतिनिधि घर से बाहर नहीं निकल रहीं।
महज दो फीसदी सुधार पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का स्तर सुधारने ३ साल पूर्व सरकार ने पंचायती राज में हिस्सेदारी 33 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 फीसदी कर दी थी। इससे लगा था कि जनप्रतिनिधि बनने से महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार आएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पंचायत चुनाव में आधी भागीदारी के बाद समाज में महिलाओं को जीवन स्तर में बदलाव पर किए गए सर्वेक्षण के आंकड़े निराश करने वाले हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो महज दो फीसदी महिलाएं ही जिले में घर की दहलीज पार कर गांव विकास में भागीदारी निभा रही हैं। ये ऐसी महिलाएं हैं, जो बिना पति व परिवार के अपने दम पर गांव व नगरीय निकायों की सरकार चला रही हैं।
लेटर पेड पर पति कर रहे हस्ताक्षर पंचायती राज में महिला सशक्तिकरण की चौंकाने वाली स्थिति यह है कि सरपंच व अध्यक्ष होने के बाद भी वह अपने कामकाज से अनजान है। सरपंच एवं अध्यक्ष सहित गांव की पंच तक हर काम उनके पति देखते हैं। बैठकों से लेकर जिला कार्यालय तक हर जगह पति ही फाइल लेकर जाते हैं। चौंकाने वाली हकीकत तो यह है कि सरकारी दस्तावेजों में जिले की 60 फीसदी महिला प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर भी उनके पति ही करते हैं।
निष्क्रिय हैं अधिकारी पंचायती राज व्यवस्था में 50 फीसदी पदों पर निर्वाचित होने के बाद भी महिलाएं अपने अधिकारों का उपयोग कर पाने में अपने परिजनों के चलते पूरी तरह से लाचार नजर आ रही हैं। जानकारों के अनुसार महिला जनप्रतिनिधियों की आड़ में उनके अधिकारों का उपयोग उनके पति या परिजन खुलेआम कर रहे हैं। अधिकारियों की बैठक तक में बेरोंकटोक महिला जनप्रतिनिधियों के पति जाते हैं ओैर अधिकारी उन्हें फटकार लगाने के बजाय चुप्पी साधे रहते हैं। जिला पंचायत एवं जनपद पंचायतों में अपनी पत्नी की तरफ से फाइल लेकर पहुंचने वाले पतियों को भी जिम्मेदार अधिकारी फटकार लगाने के बजाय महिला सशक्तिकरण की राह में रोड़ा अटकाने वालों को प्रोत्साहित कर रहे हैं।
चूल्हा चौका से नहीं छूटा नाता त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में आधी भागीदारी महिलाओं की है। पंचायत से लेकर जिला पंचायत व नगरीय निकायों तक महिला शक्ति का दबदबा है। इसके बाद भी जिले में महिलाओं की सामाजिक स्थित नहीं बदली। पंच-सरपंच जैसे पद पाकर भी अस्सी फीसदी महिलाएं चूल्हा चौका से बाहर नहीं निकल पाई हैं। ग्राम सभा की बैठक में पंचों के बीच घूंघट ओढ़कर बैठी महिला सरपंच पंचायती राज में महिला सशक्तिकरण की जमीनी हकीकत को बयां कर रही हैं।
Narmadapuram News : अधिकांश सरपंचों के पद की गरिमा बनाए रखने के लिए, सरपंच नही ठेकेदार कर रहे निर्माण कार्य
written by Denva Post Bureau | 24/12/2025
दीपक शर्मा/नर्मदापुरम : गांवों में विकास कार्य, भवनों, सड़कों आदि निर्माण कार्य के लिए केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार ने तो सरपंचों को जिम्मेदारी दी हैं। लेकिन निर्माण कार्य के प्रारंभ से लेकर कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र प्राप्त करने एवं राशि आहरण करने में होने वाली दिक्कतों के कारण क्षेत्र के अधिकांश सरपंचों ने पचड़े में पड़ने के बजाय ठेकेदारों से काम करना ही ज्यादा मुनासिब समझा।
नर्मदापुरम जिले की सात जनपद में 425 ग्राम पंचायतों में अधिकतर पंचायतों में सभी कार्य ठेकेदार द्वारा ही कार्य कराया जा रहा है। जिम्मेदार अधिकारियो को जानकारी होने के बाद भी ठेकेदारी प्रथा पर रोक लगाने के बजाया अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। नर्मदापुरम जिले की सातों जनपद की अधिकतर पंचायतों में ठेकेदार हावी है और पंचायत में निर्माण कार्य ठेकेदारो द्वारा ही किए जा रहे हैं । निर्माण कार्यों के लिए ठेकेदार सरपंचों को पांच से दस प्रतिशत तक कमीशन भी देते हैं। ऐसे में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सरपंच को कमीशन देकर ठेकेदार उसका मुंह बंद कर देता है। जिले की अधिकतर पंचायतो में ऐसा ही खेल ठेकेदार के माध्यम से खेला जा
रहा है।
सरपंच किसी भी निर्माण कार्य की स्वीकृति से लेकर उसको बनाने में लगने वाली सामग्री, निर्माण के पश्चात मूल्यांकन सत्यापन तथा अंत में राशी आहरण के लिए जनपद कार्यालय के चक्कर लगाता है। कभी सीईओ नहीं आए तो कभी इंजीनियर नही मिलते और मिल भी गए तो काम होगा इसकी गारंटी नहीं है। इससे परेशान होकर सरपंच ठेकेदार को काम सौंप कर फ्री हो जाता है। ठेकेदार अपने प्रभाव का इस्तमाल कर इन सारे कामों को मैनेज कर लेता है। जिले की जनपदों में कुछ ऐसे ही ठेकेदार वर्षो से सक्रिय हैं। जो पंचायतों का कार्य बेधड़क कर रहे हैं। ठेकेदार बकायदा निर्माण कार्य से संबंधित फाइल लेकर जनपद आते हैं। ठेकेदारों द्वारा इंजीनियर, एकाउंटेंट से मिलकर काम निपटा लेते हैं। इस चक्कर में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को ताक पर रख दिया जाता हैं।