मंत्री के आदेश की अनदेखी? केसला जनपद में ‘चार्ज’ पर सियासी-प्रशासनिक टकराव, आठ महीने से भटक रहा लेखाधिकारी

नर्मदापुरम। शासन के स्पष्ट निर्देश, मंत्री का लिखित आदेश और स्थानांतरण के आठ महीने बाद भी एक अधिकारी को उसका वैधानिक प्रभार (चार्ज) न मिलना—यह कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला मामला बन चुका है। केसला जनपद पंचायत में सहायक लेखाधिकारी के प्रभार को लेकर खड़ा हुआ विवाद अब खुलकर शासन बनाम प्रशासन की टकराहट का रूप लेता दिख रहा है।

मामले के केंद्र में हैं सहायक लेखाधिकारी पद पर पदस्थ किए गए राकेश उपाध्याय, जिन्हें लगभग आठ महीने पहले केसला जनपद पंचायत में पदस्थ किया गया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज तक उन्हें उनके पद का प्रभार नहीं दिया गया। उल्टा, भृत्य से पदोन्नत होकर सहायक ग्रेड-3 बने दिलीप डांग को इस महत्वपूर्ण पद का प्रभार सौंप दिया गया। सवाल यह उठता है कि जब विधिवत पदस्थ अधिकारी मौजूद है, तो फिर प्रभार किसी अन्य को क्यों और किस आधार पर दिया गया?

मंत्री का पत्र भी बेअसर!

मामले ने उस वक्त और तूल पकड़ लिया जब प्रदेश के आर्थिक एवं सांख्यिकी मंत्री जगदीश देवड़ा ने 26 मार्च 2026 को जिला पंचायत सीईओ को पत्र लिखकर स्पष्ट निर्देश दिए कि राकेश उपाध्याय को सहायक लेखाधिकारी का प्रभार सौंपा जाए। यह कोई मौखिक निर्देश नहीं, बल्कि विधिवत लिखित आदेश था।

लेकिन सवाल यहीं से और गंभीर हो जाता है—क्या मंत्री का पत्र अब सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है? क्योंकि पत्र जारी हुए एक महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

सीईओ की सफाई या टालमटोल?

इस पूरे मामले पर जब जिला पंचायत सीईओ हिमांशु जैन से सवाल किया गया, तो उन्होंने जवाब दिया कि “कर्मचारी की सर्विस बुक मंगाई गई है और यह देखा जा रहा है कि उसकी पूर्व पदस्थापनाएं कहां-कहां रही हैं। उसी के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।”

यह तर्क कई मायनों में सवालों के घेरे में है। प्रशासनिक जानकारों का साफ कहना है कि किसी भी अधिकारी को प्रभार देने का संबंध उसकी सर्विस बुक से नहीं होता, बल्कि उसके वर्तमान पदस्थापन आदेश और योग्यता से होता है। ऐसे में ‘सर्विस बुक’ की आड़ में फैसले को टालना कहीं न कहीं संदेह को और गहरा करता है।

नियमों की अनदेखी या ‘सेटिंग’ का खेल?

सूत्रों की मानें तो यह पूरा मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि ‘सेटिंग’ और ‘प्रभाव’ का खेल भी हो सकता है। जिस पद पर वित्तीय अधिकार जुड़े होते हैं, वहां प्रभार देना या न देना सीधे तौर पर आर्थिक निर्णयों को प्रभावित करता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर किसके दबाव में एक विधिवत पदस्थ अधिकारी को दरकिनार किया जा रहा है?

क्या यह महज संयोग है कि एक भृत्य से पदोन्नत कर्मचारी को उस पद का प्रभार दे दिया गया, जहां पहले से एक नियमित अधिकारी मौजूद है? या फिर इसके पीछे कोई और कहानी छिपी है?

प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने जिला पंचायत स्तर की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यदि एक मंत्री के लिखित आदेश के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो आम कर्मचारी और नागरिकों के लिए यह संदेश क्या जाता है?

  • क्या प्रशासन अब जनप्रतिनिधियों के निर्देशों को नजरअंदाज करने लगा है?
  • क्या नियमों की व्याख्या मनमर्जी से की जा रही है?
  • क्या पदस्थापन आदेशों का कोई महत्व नहीं रह गया है?

ये सवाल सिर्फ केसला जनपद पंचायत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर डालते हैं।

राकेश उपाध्याय का मामला अब एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यशैली का प्रतीक बन गया है। एक अधिकारी, जिसे शासन ने विधिवत पदस्थ किया, वह आठ महीने से अपने ही अधिकार के लिए इंतजार कर रहा है। यह स्थिति न सिर्फ उसके पेशेवर सम्मान को ठेस पहुंचाती है, बल्कि शासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाती है।




जुन्नारदेव की विशाला पंचायत में “फर्जी सामुदायिक भवन” का पर्दाफाश — भ्रष्टाचार पर कलेक्टर की सख्त कार्रवाई

छिंदवाड़ा जिले की जुन्नारदेव तहसील से लगी विशाला पंचायत में करोड़ों के विकास कार्यों के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पंचायत व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां विधायक निधि से प्रस्तावित सामुदायिक भवन का निर्माण तो होना था, लेकिन जमीन पर खड़ा है सिर्फ एक स्ट्रक्चर जिस पर भगवान शिव की 51 फीट प्रतिमा स्थापित की जा रही है। आरोप है कि भवन निर्माण के नाम पर फर्जी बिल लगाकर सरकारी राशि निकाल ली गई, जो अब पूरे जिले में चर्चा का केंद्र बन गया है।

विधायक निधि से 24.98 लाख मंजूर — लेकिन भवन नदारद
प्राप्त जानकारी के अनुसार 29 मार्च 2023 को सामुदायिक भवन के लिए विधायक निधि से 24 लाख 98 हजार रुपये की स्वीकृति दी गई थी। प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद तीन किस्तों में 16 लाख रुपये पंचायत तक पहुंच भी चुके थे। नियमों के अनुसार यह राशि सामुदायिक भवन के निर्माण में उपयोग होनी थी, लेकिन मौके पर पहुंची जांच टीम को वहां ऐसा कोई भवन नजर नहीं आया।

इसके उलट, वहां 15 पिलर्स वाला एक बड़ा स्ट्रक्चर बना हुआ है, जिस पर भगवान शिव की 51 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जानी है। यह स्थान स्थानीय स्तर पर एक धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सामुदायिक भवन तो कभी बना ही नहीं, लेकिन उसके नाम पर सरकारी राशि की निकासी कर ली गई।
स्थानीय लोगों का आरोप – “धार्मिक स्थल के नाम पर विधायक निधि का दुरुपयोग”

स्थानीय निवासी अश्वनी गोदवानी और विवेक चंद्रवंशी ने खुलकर आरोप लगाया कि
“यहां सामुदायिक भवन बनना था, लेकिन जो स्ट्रक्चर बनाया गया है वह धार्मिक स्थल के लिए है। प्रतिमा के लिए चंदा भी हुआ है, जबकि सरकारी निधि सामुदायिक भवन के नाम पर निकाल ली गई है। ये साफ-साफ भ्रष्टाचार है।”
लोगों का कहना है कि अगर यह जगह धार्मिक विकास के लिए ही चुनी गई थी तो इसकी स्पष्ट अनुमति और अलग प्रस्ताव क्यों नहीं बनाया गया? सामुदायिक भवन जैसी सार्वजनिक सुविधा को छोड़कर धार्मिक संरचना को प्राथमिकता देना अपने आप में संदिग्ध है।

कलेक्टर की बड़ी कार्रवाई — दोषियों पर रिकवरी नोटिस
शिकायत के बाद कलेक्टर हरेंद्र नारायण ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे तत्काल एसडीएम जुन्नारदेव को जांच के लिए सौंप दिया। जांच रिपोर्ट आने पर कलेक्टर ने किसी भी तरह की ढील नहीं दी और कड़ा कदम उठाते हुए—ग्राम पंचायत विशाला के सरपंच,ग्राम पंचायत सचिव,संबंधित इंजीनियर,सब इंजीनियर,तत्कालीन AE (असिस्टेंट इंजीनियर),CEO जनपद पंचायत इन सभी को रिकवरी नोटिस जारी कर दिया है।
कलेक्टर ने स्पष्ट कहा कि सरकारी राशि का दुरुपयोग किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा और हर्जाना संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से वसूला जाएगा।

“यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, जनता के भरोसे की चोरी है”
राज्य में पंचायतों पर लगातार बढ़ते आरोपों के बीच यह मामला एक और बड़ा झटका है। यह सिर्फ सरकारी धन की चोरी नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का उल्लंघन है। विधायक निधि जैसी राशि का उद्देश्य ग्रामीण विकास और सार्वजनिक सुविधाओं को बढ़ावा देना होता है, न कि धार्मिक संरचनाओं के नाम पर फर्जी बिल बनाने के लिए।

यह सवाल भी अब तेज़ी से उठ रहा है कि:क्या पंचायत और जनपद स्तर पर जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदकर बिल पास कर रहे थे?
किसके दबाव में सामुदायिक भवन की जगह धार्मिक संरचना को प्राथमिकता मिली?
यदि यह धार्मिक स्थल था तो फिर प्रतिमा के लिए चंदा किस उद्देश्य से लिया गया और सरकारी राशि किस उद्देश्य से?
यह मामला भ्रष्टाचार के साथ-साथ प्रशासनिक लापरवाही का भी क्लासिक उदाहरण बन गया है।

कलेक्टर ने जिस तेजी से कार्रवाई की है, उससे साफ है कि अब इस मामले में आगे और बड़े कदम उठेंगे। रिकवरी के बाद निलंबन और FIR की प्रक्रिया भी संभव है। अगर फर्जी बिल निर्माण सिद्ध होता है, तो यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आएगा।

स्थानीय लोगों की मांग है कि इस पूरे मामले को सिर्फ रिकवरी तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसमें शामिल सभी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में कोई भी सरकारी निधि के साथ इस तरह का खिलवाड़ करने की हिम्मत न करे।




पंचायत का बड़ा कारनामा! बंद पड़े स्कूल की बना दी बाउंड्री वॉल

boundary-wall
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माखननगर। माखननगर जनपद की ग्राम पंचायत मोहसा में सरकारी धन के दुरुपयोग और कागजी विकास के गंभीर आरोपों वाला एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जिस प्राथमिक शाला धमासा में इस वर्ष नामांकन शून्य है और शिक्षा विभाग द्वारा बंद करने की प्रक्रिया में है, उसी स्कूल के लिए अचानक बाउंड्री वॉल (boundary-wall) निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया।

यह मामला गंभीर इसलिए है क्योंकि—बाउंड्री वॉल (boundary-wall) के लिए करीब ₹3,04,000 की राशि 10 फरवरी 2025 को जारी हुई और सूत्रों के अनुसार राशि निकाल ली गई, लेकिन निर्माण लंबे समय तक नहीं कराया गया।

अब जब शिकायतें उच्च अधिकारियों तक पहुंच गईं, तब आनन-फानन में बंद पड़े स्कूल में निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया—मानो सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा हो।

“शासन का पैसा कैसे उड़ाया जाता है”—धमासा इसका जीवंत उदाहरण

ग्राम पंचायत मोहसा की प्राथमिक शाला धमासा पिछले कुछ वर्षों से नामांकन संकट से जूझ रही है। बीआरसी श्याम सिंह पटेल ने स्वयं स्वीकार किया कि—“स्कूल में इस वर्ष जीरो नामांकन है, इसलिए शाला बंद करने की प्रक्रिया चल रही है।”

जब स्कूल बंद हो रहा हो, तो बाउंड्री वॉल (boundary-wall) जैसे कार्य की न कोई जरूरत है और न ही कोई औचित्य।लेकिन इसके बावजूद लाखों की राशि स्वीकृत और जारी कर दी गई — यही सबसे बड़ा सवाल है।

सूत्र बताते हैं कि— 10 फरवरी 2025 को ₹3,04,000 की राशी जारी हुई। वही पंचायत ने राशि निकाल ली लेकिन जमीन पर निर्माण ही नहीं कराया। न ही कोई निरीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध थी,न ही साइट पर निर्माण की शुरूआत दिखाई दी।यह सीधे तौर पर शासन की राशि के दुरुपयोग की ओर इशारा करता है।

शिकायत होते ही “रातों-रात विकास” — यह किसे को बचाने की कोशिश?

गाँव में चर्चा है कि जैसे ही मामले की शिकायत अधिकारियों तक पहुंची, पंचायत पर दबाव बढ़ा। इसके बाद अचानक—मजदूर बुलाए गए,ईंट-बालू डाल दिया गया,काम तेजी से शुरू कर दिया गया और बंद पड़े स्कूल के चारों ओर बाउंड्री (boundary-wall)खड़ी करने की पूरी तैयारी हो गई।

ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय तक स्कूल में एक ईंट तक नहीं लगी थी।अब शिकायत सामने आते ही काम शुरू कर दिया गया है ताकि “कागज और जमीन” को मिलाया जा सके। यह “फर्जी निर्माण” को बाद में असली दिखाने का एक पैटर्न प्रतीत होता है, जो पंचायत स्तर पर आम हो चला है।

स्कूल बंद, बच्चे नहीं — फिर अचानक बाउंड्री (boundary-wall) की इतनी ज़रूरत क्यों?

जब स्कूल में न विद्यार्थी हैं,न शैक्षणिक गतिविधि,न क्लास चल रही हैं और बंद करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।तो शासन के 3 लाख रुपये बाउंड्री वॉल (boundary-wall) पर क्यों खर्च किए गए?

क्या बच्चों की सुरक्षा का हवाला देकर यह निर्माण (boundary-wall) उचित ठहराया जा सकता है? या फिर यह निर्माण सिर्फ इसलिए किया जा रहा है कि — “निकाली गई राशि का हिसाब कहीं तो दिखाना पड़े!”

यह प्रश्न अब जनपद प्रशासन के गले की फांस बन चुका है।

ग्रामीणों का आरोप—“तीन लाख कागज में साफ हो गए, अब दिखावा किया जा रहा है” गाँव मोहसा और धमासा के ग्रामीण इस कार्य को लेकर अत्यंत नाराज़ हैं।

उन्होंने देवऩ्वापोस्ट से कहा—पैसा कब आया, कब निकला किसी को पता नहीं। स्कूल बंद पड़ा है, पर बाउंड्री (boundary-wall) बन रही है — किसका हित है इसमें? यह शासन की राशि का खुला दुरुपयोग है। शिकायत की गई तो काम कर रहे हैं, वरना कोई निर्माण नहीं होता।

स्थानीय लोगों का मानना है कि यह पूरा मामला एक बड़े घोटाले की तरफ इशारा कर रहा है। इस पूरे प्रकरण पर जनपद सीईओ से संपर्क किया गया, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी।

जांच की दिशा पर भी संशय — क्या ‘समाधान’ पहले से तय कर लिया गया है?

सूत्रों का दावा है कि पंचायत स्तर पर यह प्रयास भी हो रहा है कि किसी तरह कागजों में सब कुछ सही साबित किया जाए।अगर जल्दबाज़ी में निर्माण पूरा कर दिया गया,तो जांच अधिकारी को यही दिखाया जाएगा कि—boundary-wall निर्माण कार्य तो चल रहा था, राशि का उपयोग सही जगह हुआ है।यानी शिकायत को निरस्त करने का पूरा तंत्र सक्रिय हो चुका है।यह स्थिति पंचायत प्रशासन की पारदर्शिता पर गंभीर चोट करती है।

बड़ा सवाल — सरकार के विकास कार्यों में जनता का पैसा सुरक्षित है या नहीं?

प्राथमिक शाला धमासा का मामला सिर्फ एक स्कूल का मामला नहीं है।
यह उन सैकड़ों पंचायतों का उदाहरण है जहाँ—पैसे जारी होते हैं, राशी निकल जाती है,निर्माण नहीं होता और शिकायत आने पर फर्जी कार्य शुरू कर दिया जाता है।

यह घटना बताती है कि सिस्टम की निगरानी व्यवस्था कितनी कमजोर है।यदि किसी ग्रामीण ने शिकायत न की होती, तो यह मामला शायद कभी सामने नहीं आता।

क्या होगी कार्रवाई? क्या जिम्मेदारों पर गिरेगी गाज?

इस मामले की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, क्योंकि सवाल सिर्फ तीन लाख रुपये का नहीं है— यह सवाल है कि ग्राम पंचायतों में विकास के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं।अगर इस मामले में दोषी बच जाते हैं, तो यह आने वाले समय में और बड़े घोटालों को खुली छूट देने जैसा होगा।

यह मामला गांव की सच्चाई और शासन की नीयत दोनों पर प्रश्नचिह्न है

बंद स्कूल में लाखों रुपये की बाउंड्री वॉल निर्माण की यह ‘तत्काल पहल’वास्तव में वर्षों से चली आ रही लापरवाही और वित्तीय अनियमितता का परिणाम है।

धमासा की यह बाउंड्री वॉल केवल एक दीवार नहीं—
यह भ्रष्टाचार की दीवार है,जिसके नीचे शासन की योजनाएं, शिक्षा की गुणवत्ता और प्रशासन की जवाबदेही दब गई है।




मैहर: जिंदा लोगों को मरा दिखाकर लाखों की सरकारी राशि हड़पने का बड़ा घोटाला उजागर

sambal-scam
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मैहर (सतना) — मध्य प्रदेश के सतना जिले की नागौद जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाली रहिकवारा ग्राम पंचायत में भ्रष्टाचार (sambal-scam) की ऐसी शर्मनाक कहानी सामने आई है, जिसने पूरे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां पंचायत सचिव और पीसीओ पर आरोप है कि उन्होंने सरकारी योजनाओं का पैसा हड़पने के लिए जिंदा लोगों को कागज़ों में मृत घोषित कर दिया।

फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाकर अंत्येष्टि सहायता योजना के तहत 5-5 हजार रुपए और अनुग्रह सहायता योजना से 2-2 लाख रुपए की राशि निकाल ली गई। यह पूरा मामला संबल योजना (sambal-scam) के तहत सामने आया है, जो आर्थिक रूप से कमजोर श्रमिक परिवारों को राहत देने के लिए शुरू की गई थी।

जिंदा को “मरा” दिखाकर खाते से निकाली राशि

सूत्रों के अनुसार, यह घोटाला रहिकवारा पंचायत में योजनाबद्ध तरीके (sambal-scam) से अंजाम दिया गया। संबंधित अधिकारियों ने फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र तैयार किए और उन्हीं के आधार पर बैंक खातों में राशि ट्रांसफर कराई।

पहला मामला सज्जन चौधरी (आईडी क्रमांक 132910955) से संबंधित है। उन्हें कागज़ों में मृत दिखाकर 10 जनवरी 2021 को 5,000 रुपए की अंत्येष्टि राशि और 2 लाख रुपए की अनुग्रह राशि निकाल ली गई — जबकि सज्जन चौधरी आज भी जीवित हैं और स्वयं इस भ्रष्टाचार के गवाह बन चुके हैं।

दूसरा मामला गनपत कुशवाहा (आईडी क्रमांक 103975461) का है, जिन्हें मृत घोषित कर 14 जनवरी 2020 को 5,000 रुपए की अंत्येष्टि राशि और 2 लाख रुपए की अनुग्रह राशि निकाल ली गई। आरोप है कि यह सारा काम पंचायत सचिव, पीसीओ और जनपद पंचायत सीईओ की मिलीभगत से किया गया।

तीसरा मामला रामचरण चौधरी (आईडी क्रमांक 132785947) का है। उनकी मृत्यु वास्तव में 12 अप्रैल 2020 को हुई थी, लेकिन उनके परिवार को मिलने वाली सहायता राशि उन्हें देने के बजाय किसी अन्य व्यक्ति के खाते में भेज दी गई। इससे साफ है कि पूरा नेटवर्क योजनाओं के तहत जारी होने वाले सरकारी धन को गबन करने में सक्रिय रहा।

ग्रामीणों ने की जांच की मांग

ग्रामवासियों ने इस पूरे प्रकरण को सरकारी धन की हेराफेरी और गंभीर धोखाधड़ी बताया है। उनका कहना है कि ग्राम पंचायत के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने आपसी मिलीभगत से गरीब श्रमिक परिवारों का हक छीन लिया। ग्रामीणों ने इस मामले में निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो वे जनआंदोलन या उच्च अधिकारियों तक शिकायत दर्ज कराएंगे।

कलेक्टर को जनसुनवाई में मिली शिकायत

इस भ्रष्टाचार (sambal-scam) की शिकायत जनसुनवाई के माध्यम से सतना कलेक्टर कार्यालय तक पहुंच चुकी है। शिकायत में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि संबल योजना में फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र तैयार कर सरकारी राशि का दुरुपयोग किया गया।

जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी शैलेन्द्र सिंह ने इस मामले पर कहा — “हमें जनसुनवाई में शिकायत (sambal-scam) प्राप्त हुई है। जांच प्रारंभ कर दी गई है। यदि जांच में आरोप सही पाए गए, तो दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। अन्य जगहों से भी ऐसे प्रकरण सामने आने पर जांच कराई जाएगी।”

सिस्टम पर सवाल

यह मामला प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाता है। एक ओर सरकार गरीबों और श्रमिकों के लिए संबल योजना (sambal-scam)जैसी कल्याणकारी योजनाएं चला रही है, वहीं दूसरी ओर भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी उन्हीं योजनाओं को अपने लाभ का माध्यम बना रहे हैं।

गांव के लोगों का कहना है कि जब सरकारी रिकॉर्ड में जीवित व्यक्तियों को मृत दिखाया जा सकता है, तो अन्य योजनाओं में भी इसी तरह की गड़बड़ी और फर्जीवाड़े की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

क्या है संबल योजना?

संबल योजना राज्य सरकार द्वारा संचालित एक सामाजिक सुरक्षा योजना है, जिसके अंतर्गत असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को दुर्घटना या मृत्यु की स्थिति में अनुग्रह सहायता और अंत्येष्टि सहायता दी जाती है। लेकिन रहिकवारा पंचायत में इस योजना को भ्रष्टाचार (sambal-scam) का जरिया बना दिया गया। जीवित लोगों को मृत दिखाकर लाखों रुपए की सरकारी राशि हड़प लेना न केवल अपराध है, बल्कि यह गरीबों के अधिकारों पर सीधा प्रहार भी है।

जांच के बाद क्या होगा?

अधिकारियों का कहना है कि यदि दस्तावेज़ों में फर्जी हस्ताक्षर, प्रमाणपत्र या बैंक लेनदेन की पुष्टि होती है, तो एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तारी की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। फिलहाल, मामले ने जिले के प्रशासन और पंचायत विभाग में हड़कंप मचा दिया है। यह घोटाला प्रदेश में पंचायत स्तर पर हो रहे सिस्टमेटिक भ्रष्टाचार (sambal-scam) की एक और मिसाल बन गया है।

रहिकवारा पंचायत का यह मामला केवल एक गांव या एक योजना तक सीमित नहीं है — यह पूरे सिस्टम के लिए (sambal-scam) एक चेतावनी संकेत है कि पारदर्शिता और निगरानी के बिना कोई भी जनकल्याणकारी योजना अपने वास्तविक उद्देश्यों से भटक सकती है।
अब देखना यह है कि जांच के बाद दोषियों पर कितनी सख्त कार्रवाई होती है, और क्या “जिंदा को मरा दिखाने” वाला यह भ्रष्टाचार वाकई में खत्म हो पाएगा या नहीं।

यह भी पढ़े सागर में एएसआई बर्खास्त: एएसपी के फर्जी हस्ताक्षर का मामला




कोंडरवाड़ा पंचायत में सामुदायिक भवन पर विवाद: 25 लाख की योजना अटकी, अतिक्रमण बना विकास में बाधा

samudayik-bhavan
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माखननगर। नर्मदापुरम जिले की जनपद पंचायत माखननगर की ग्राम पंचायत कोंडरवाड़ा में विकास की एक बड़ी योजना फिलहाल विवादों में घिर गई है। शासन द्वारा पंचायत को सामुदायिक भवन (samudayik-bhavan) निर्माण के लिए 25 लाख रुपये की स्वीकृति तो मिल चुकी है, लेकिन भवन निर्माण की निर्धारित भूमि पर अतिक्रमण का मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने फिलहाल भूमि पूजन पर रोक लगा दी है।

ग्रामीणों की उम्मीदों को झटका

ग्राम कोंडरवाड़ा में लंबे समय से सामुदायिक भवन (samudayik-bhavan) की मांग की जा रही थी। पंचायत स्तर से लेकर जनपद तक कई बार प्रस्ताव भेजे जाने के बाद आखिरकार शासन से स्वीकृति प्राप्त हुई। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि अब गांव में एक ऐसी इमारत बनेगी जहां सामाजिक कार्यक्रम, ग्राम सभाएं और सरकारी बैठकें एक ही स्थान पर हो सकेंगी। लेकिन निर्माण शुरू होने से ठीक पहले भूमि विवाद ने इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

जेसीबी रोकने से बढ़ा विवाद

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, भूमि (samudayik-bhavan) पूजन से एक दिन पहले पंचायत ने निर्माण स्थल की सफाई कराने के लिए जेसीबी मशीन भेजी थी। लेकिन जब जेसीबी वहां पहुंची तो ग्राम निवासी सतीश मीना ने मशीन चलाने से रोक दिया। उनका कहना था कि “यह जगह मेरी है, इस पर बिना अनुमति कोई काम नहीं होगा।” इस विवाद के बाद पंचायत प्रतिनिधियों को काम रोकना पड़ा।

भूमि (samudayik-bhavan) पर कोई अवैध कब्जा नहीं

देनवा पोस्ट से बातचीत में सतीश मीना ने बताया कि — “मैंने इस (samudayik-bhavan) भूमि पर कोई अवैध कब्जा नहीं किया है। मैंने इस जमीन का पट्टा आवेदन के माध्यम से शासन से मांगा है, लेकिन अभी तक मुझे कोई जवाब नहीं मिला है। जब तक पट्टे पर निर्णय नहीं होता, तब तक किसी को यहां काम नहीं करने दूंगा।”

सतीश मीना का कहना है कि वे सिर्फ अपने अधिकार की बात कर रहे हैं और प्रशासन यदि पट्टे को खारिज कर देता है तो वे विरोध नहीं करेंगे।

किसी के पास वैध दस्तावेज हैं तो प्रशासन उनकी जांच करे

ग्राम पंचायत कोंडरवाड़ा के सरपंच गुलाब सिंह ने बताया कि पंचायत को शासन से सामुदायिक भवन (samudayik-bhavan) निर्माण हेतु 25 लाख रुपये की राशि स्वीकृत हुई है। इसके लिए शासकीय भूमि चिन्हित की गई थी।

“जब हम सफाई के लिए जेसीबी लेकर पहुंचे, तो सतीश मीना ने मशीन रुकवा दी और कहा कि यह मेरी जमीन है, मेरे पास पट्टे के कागज हैं। हमने उनसे कागज दिखाने को कहा, लेकिन उन्होंने कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया।”

सरपंच ने यह भी कहा कि यदि किसी के पास वैध दस्तावेज हैं तो प्रशासन उनकी जांच करे, लेकिन विकास कार्य किसी व्यक्ति विशेष के कारण नहीं रुकना चाहिए।

ग्रामीणों ने जताई नाराज़गी

ग्राम के कई लोगों ने इस घटना पर नाराज़गी जताई। ग्रामीण असीम दत्त ने देनवा पोस्ट को बताया — “ग्राम के विकास के लिए सामुदायिक भवन (samudayik-bhavan) जरूरी है। लेकिन कुछ लोगों की व्यक्तिगत स्वार्थ और प्रशासन की लापरवाही के कारण योजना ठप पड़ गई है। अगर प्रशासन समय रहते सीमांकन और भूमि सत्यापन कर लेता तो यह स्थिति नहीं बनती।”

ग्रामीणों का कहना है कि शासन की योजना जनता के हित के लिए होती है, इसलिए प्रशासन को जल्द ही भूमि विवाद का समाधान निकालना चाहिए ताकि निर्माण कार्य शुरू हो सके।

प्रशासन की भूमिका पर सवाल

ग्राम पंचायत स्तर पर विकास कार्यों की सबसे बड़ी चुनौती भूमि विवाद और सीमांकन की अस्पष्टता बनती जा रही है। जनपद और तहसील स्तर पर अक्सर ऐसी शिकायतें आती हैं कि शासकीय भूमि का सीमांकन स्पष्ट नहीं होने के कारण योजनाएं रुक जाती हैं।

कोंडरवाड़ा का यह मामला भी उसी का उदाहरण है, जहां 25 लाख की स्वीकृति के बावजूद प्रशासनिक ढिलाई के कारण परियोजना शुरू नहीं हो पा रही है।

क्या है आगे की स्थिति

जनपद पंचायत माखननगर के अधिकारियों के संज्ञान में मामला आ गया है और राजस्व विभाग को सीमांकन एवं जांच के लिए पत्र भेजन की तैयारी है। रिपोर्ट आने के बाद ही यह तय होगा कि भवन (samudayik-bhavan) निर्माण कहां और कब शुरू किया जा सकता है।

अगर जांच में भूमि को शासकीय पाया गया तो प्रशासन सतीश मीना के दावे को निरस्त कर सकता है और सामुदायिक भवन (samudayik-bhavan) का भूमि पूजन दोबारा किया जाएगा। वहीं अगर भूमि विवादित पाई जाती है तो पंचायत को वैकल्पिक भूमि चिन्हित करनी पड़ सकती है।

विकास योजनाओं के लिए ज़रूरी है स्पष्टता

ग्राम स्तर पर विकास योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के लिए भूमि की स्थिति और स्वामित्व की स्पष्टता बेहद आवश्यक है। कोंडरवाड़ा का यह मामला बताता है कि यदि राजस्व रिकॉर्ड और सीमांकन अद्यतन नहीं हैं, तो शासन की लाखों की योजनाएं भी विवादों में फंस सकती हैं।

कोंडरवाड़ा पंचायत का सामुदायिक भवन फिलहाल विवाद के घेरे में है। ग्रामीण चाहते हैं कि गांव में जल्द से जल्द भवन निर्माण शुरू हो, ताकि विकास की राह में अड़चन न आए। अब देखना यह है कि प्रशासन कितनी तेजी से इस विवाद का समाधान निकालता है और 25 लाख की यह योजना कब धरातल पर उतरती है।




पंचायत दर्पण एप में भ्रष्टाचार का खुलासा: कराहल जनपद की ग्राम पंचायत सेसईपुरा पर गंभीर आरोप

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शिवपुरी (मध्यप्रदेश)। जिले की कराहल जनपद पंचायत (panchayat) के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत (panchayat) सेसईपुरा इन दिनों भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की वजह से सुर्खियों में है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत (panchayat) के सरपंच, सचिव और रोजगार सहायक (जीआरएस) ने मिलकर मनरेगा सहित अन्य विकास योजनाओं में करोड़ों रुपये के बिल पास कराए, लेकिन जमीनी स्तर पर अधिकांश कार्य अधूरे या अस्तित्वहीन हैं। पंचायत दर्पण एप और लगाए गए बिल खुद इस भ्रष्टाचार की गवाही दे रहे हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत (panchayat) में जितनी राशि खर्च होना दिखाई गई है, उतने निर्माण कार्य दिखाई नहीं देते। फर्जी फर्मों के नाम पर भुगतान, धुंधले बिलों की अपलोडिंग और खेत तालाब जैसी योजनाओं में हेरफेर ने स्थानीय लोगों का विश्वास हिला दिया है।


पंचायत (panchayat) दर्पण एप ने खोली पोल

सेसईपुरा पंचायत (panchayat) में किए गए कार्यों की स्थिति पंचायत (panchayat) दर्पण एप पर अपलोड की गई जानकारी से स्पष्ट हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि एप पर लगे बिल और मस्टरोल इस ओर इशारा करते हैं कि पंचायत स्तर पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है।

कई बिल धुंधले अपलोड किए गए हैं, जिन्हें केवल संबंधित अधिकारी ही देख सकते हैं। ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ऐसी अपारदर्शिता क्यों बरती जा रही है। बिलों में जिन फर्मों को भुगतान दिखाया गया है, उनमें से कई फर्में अस्तित्व में ही नहीं हैं, जबकि जो मौजूद हैं उनके पास न तो निर्माण सामग्री है और न ही मौके पर कोई काम दिख रहा है।


फर्जी फर्मों के नाम पर भुगतान

पंचायत (panchayat) दर्पण पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पंचायत (panchayat) ने ऐसे कई बिल अपलोड किए हैं जिनमें फर्मों का नाम दर्ज है, लेकिन वास्तविकता में न तो वह फर्म कार्यरत है और न ही उसके पास सामग्री का कोई रिकॉर्ड है। ग्रामीणों का कहना है कि यह पूरा खेल मिलीभगत से चल रहा है।

सरपंच और सचिव ने संबंधित अधिकारियों के सहयोग से इन फर्जी बिलों को पास कराया और राशि का भुगतान करा लिया। हैरानी की बात यह है कि इन फर्मों के नाम पर लाखों रुपये का भुगतान दिखाया गया है, लेकिन मौके पर किसी प्रकार का कार्य नहीं हो रहा।


किसानों को खेत तालाब योजना से नहीं मिला लाभ

ग्रामीणों ने बताया कि मनरेगा योजना के तहत खेत तालाबों का निर्माण कराया जाना था। उद्देश्य था –

  • मानसून में वर्षा जल संग्रहित करना
  • सिंचाई का विकल्प उपलब्ध कराना
  • भूजल स्तर को रिचार्ज करना
  • कुएं और अन्य जल स्रोतों को जीवंत बनाए रखना

लेकिन सेसईपुरा पंचायत (panchayat) में यह उद्देश्य पूरी तरह से विफल रहा। किसानों को खेत तालाब का लाभ नहीं मिला। नतीजा यह हुआ कि मानसून के बाद पानी का संकट जस का तस बना हुआ है और सरकारी राशि का दुरुपयोग कर लिया गया।


विकास कार्य केवल कागजों में पूरे

ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत (panchayat) ने सिर्फ खेत तालाब ही नहीं बल्कि अन्य निर्माण कार्यों में भी गड़बड़ी की है। सड़कों से लेकर नालियों तक का काम कागजों में पूरा दिखा दिया गया। पंचायत स्तर पर सरकारी खजाने से पैसा निकाला गया लेकिन जमीनी स्तर पर कार्य अधूरे या नदारद हैं।

पंचायत में लगाए गए होर्डिंग और बिल बताते हैं कि लाखों रुपये स्वीकृत हुए, लेकिन मौके पर विकास नजर नहीं आता। इससे यह साबित होता है कि पंचायत प्रतिनिधियों और अधिकारियों ने कागजों में विकास दिखाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया।


जिम्मेदारों की चुप्पी

मीडिया ने जब पंचायत के सरपंच और सचिव से इस संबंध में बात करने की कोशिश की तो उन्होंने फोन उठाना बंद कर दिया। कई बार संपर्क करने के बाद भी वे गोलमोल जवाब देते रहे। यह चुप्पी ग्रामीणों के शक को और गहरा करती है।


ग्रामीणों की नाराजगी

ग्रामवासियों का कहना है कि केंद्र सरकार की मनरेगा योजना गरीबों और किसानों की जीवनरेखा है। इस योजना से जल संरक्षण और रोजगार के अवसर मिलने चाहिए थे, लेकिन पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार ने इसकी जमीनी हकीकत को खोखला कर दिया है।

ग्रामीणों ने मांग की है कि–

  1. पंचायत में स्वीकृत खेत तालाबों और अन्य निर्माण कार्यों का स्थल निरीक्षण किया जाए।
  2. फर्जी बिलों और फर्मों की जांच कराई जाए।
  3. दोषी सरपंच, सचिव और जीआरएस पर रिकवरी की कार्रवाई की जाए।
  4. विकास कार्यों का भौतिक सत्यापन कर वास्तविक स्थिति उजागर की जाए।

योजना पर सवालिया निशान

सेसईपुरा पंचायत (panchayat) का मामला सामने आने के बाद मनरेगा जैसी योजनाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। यदि इस तरह भ्रष्टाचार चलता रहा तो ग्रामीण विकास की योजनाओं का लाभ कभी भी किसानों और गरीबों तक नहीं पहुंच पाएगा।


जनपद सीईओ का बयान

कराहल जनपद पंचायत के सीईओ राकेश शर्मा ने बताया कि यदि ग्राम पंचायत सेसईपुरा में इस तरह का मामला सामने आया है तो इसकी निष्पक्ष जांच कराई जाएगी। संबंधित सरपंच, सचिव और रोजगार सहायक को नोटिस जारी किए जाएंगे। दोष सिद्ध होने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।


प्रशासन की बड़ी चुनौती

जिले के कलेक्टर अर्पित वर्मा तक ग्रामीणों ने अपनी शिकायतें पहुंचाई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि कलेक्टर मौके पर जाकर निरीक्षण करेंगे तो स्थिति साफ हो जाएगी। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या प्रशासन इस मामले में कठोर कार्रवाई करेगा या फिर अन्य मामलों की तरह यह भी सिर्फ नोटिस और चेतावनी तक सीमित रह जाएगा।


ग्रामीणों की पीड़ा

सेसईपुरा पंचायत (panchayat) के ग्रामीणों का कहना है कि वे पिछले तीन साल से विकास की राह देख रहे हैं। चुनाव जीतने के बाद प्रधान ने बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन आज तक कोई भी वादा पूरा नहीं हुआ।

किसानों को सिंचाई सुविधा नहीं मिली, नालियां टूटी पड़ी हैं, सड़कों का हाल बदहाल है। वहीं, कागजों में सब कुछ चमकदार और दुरुस्त दिखाया गया है।


निष्कर्ष

ग्राम पंचायत सेसईपुरा का मामला सिर्फ एक पंचायत का नहीं है, बल्कि यह पूरे पंचायत तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। पंचायत दर्पण एप की पारदर्शिता से भ्रष्टाचार की परतें खुल रही हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करेंगे या फिर यह मामला भी समय के साथ दबा दिया जाएगा।

ग्रामीणों को उम्मीद है कि जिला प्रशासन इस बार सख्त कदम उठाएगा और दोषियों को सजा दिलाकर किसानों को उनका हक दिलाएगा।

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हिमांशु जैन बने नर्मदापुरम के नए जिला पंचायत सीईओ, प्रशासनिक फेरबदल में हुई नियुक्ति

Himanshu Jain
Himanshu Jain

नर्मदापुरम। मध्य प्रदेश सरकार ने बड़े प्रशासनिक फेरबदल के तहत हिमांशु जैन (Himanshu Jain) को नर्मदापुरम जिला पंचायत का नया मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) नियुक्त किया है। यह नियुक्ति पूर्व सीईओ सोजन सिंह रावत के ग्वालियर स्थानांतरण के बाद हुई है।

प्रशासनिक फेरबदल की मुख्य बातें

राज्य सरकार ने 27 सितंबर की आधी रात को प्रशासनिक बदलावों की घोषणा की। इस आदेश में 18 आईएएस और 8 राज्य प्रशासनिक सेवा (SAS) अधिकारियों का तबादला हुआ। इनमें से 20 अधिकारियों को जिला पंचायत सीईओ का जिम्मा सौंपा गया है।

  • नर्मदापुरम में नई जिम्मेदारी: शिवपुरी जिला पंचायत के सीईओ रहे श्री हिमांशु जैन अब नर्मदापुरम का कार्यभार संभालेंगे।
  • पूर्व सीईओ का स्थानांतरण: सोजन सिंह रावत को ग्वालियर जिला पंचायत सीईओ नियुक्त किया गया है।
  • शिवपुरी की नई नियुक्ति: विजय राज को शिवपुरी जिला पंचायत सीईओ की जिम्मेदारी दी गई है।

हिमांशु जैन (Himanshu Jain) एक परिचय

हिमांशु जैन (Himanshu Jain) एक मेधावी और युवा आईएएस अधिकारी हैं, जिनकी शैक्षणिक व प्रशासनिक उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं।

  • शैक्षणिक पृष्ठभूमि: यूपीएससी परीक्षा में उन्होंने ऑल इंडिया रैंक 4 हासिल की थी।
  • वरिष्ठता: 2020 बैच की वरिष्ठता सूची में मध्य प्रदेश कैडर में प्रथम स्थान और पूरे देश में 40वां स्थान प्राप्त।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि: उनकी पत्नी, श्रीमती सर्जना यादव, भी 2020 बैच की आईएएस अधिकारी हैं और उन्हें सीहोर जिला पंचायत सीईओ नियुक्त किया गया है।

नियुक्ति का महत्व

जिला पंचायत सीईओ का पद जिले में कलेक्टर के बाद दूसरा सबसे अहम माना जाता है। ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और बुनियादी ढांचे की योजनाओं के सफल क्रियान्वयन की जिम्मेदारी इसी पद पर होती है। सरकार का यह फेरबदल प्रशासनिक कार्यकुशलता और पंचायत व्यवस्था को सुदृढ़ करने की रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है।

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नर्मदापुरम के लिए नई चुनौतियां

नर्मदापुरम जिले में जैन को कई प्रमुख चुनौतियों से जूझना होगा। इनमें जल संरक्षण, सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार, कृषि क्षेत्र में प्रगति और ग्रामीण आधारभूत संरचना का विकास शामिल है।

श्री हिमांशु जैन की नियुक्ति को जिले के लिए सकारात्मक कदम माना जा रहा है। एक युवा और ऊर्जावान अधिकारी के रूप में उनसे उम्मीद है कि वे विकास कार्यों में नई रफ्तार लाएंगे और पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत करेंगे। अब सबकी निगाहें उनके पदभार ग्रहण करने और भविष्य की कार्ययोजना पर टिकी हैं।




Denvapost Exclusive : पांच माह की चुप्पी – पंचायत बचा रहे हैं या सच्चाई छुपा रहे हैं?

ग्राम पंचायत नया चूरना की गलियों में गूंजती एक आवाज़ है – “सत्ता किसकी, संचालन किसका?”
यह सवाल सिर्फ गांव का नहीं, लोकतंत्र की आत्मा का सवाल है, जहां चुने हुए जनप्रतिनिधि की भूमिका को पीछे धकेलकर, ‘सरपंच पति’ जैसे अनौपचारिक ताकतवर किरदार पंचायत पर कब्ज़ा किए बैठे हैं।

24 दिसंबर 2024 को उपसरपंच फग्गनसिंह ककोड़िया ने ग्रामवासियों के साथ मिलकर जनपद सीईओ और कलेक्टर को एक लिखित शिकायत दी थी। शिकायत में आरोप था कि पंचायत की योजनाओं में मनमानी, नियमों की अनदेखी और फंड के दुरुपयोग में सरपंच पति का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप है।

यह शिकायत अगर झूठी होती, तो इसका तत्काल खंडन या स्पष्टीकरण जारी होता। लेकिन तथ्यों की बजाय आई सिर्फ चुप्पी — पांच महीने की लंबी, गहरी, साजिश भरी चुप्पी।

इसी संदर्भ में 24 मार्च 2025 को आरटीआई कार्यकर्ता दीपक शर्मा ने दो बिंदुओं पर सूचना मांगी:

1. शिकायत की सत्यापित प्रति।

2. जनपद द्वारा की गई जांच और कार्यवाही की रिपोर्ट।

अब चार महीने बीत चुके हैं। न जवाब आया, न प्रतिवेदन। क्या यह चुप्पी अनजाने में है? शायद नहीं। यह सोची-समझी ‘नीतिगत मौन’ है, जो इस देश के लाखों गांवों में फैलते भ्रष्टाचार और संरक्षणवाद की एक झलक है।

जब RTI भी बेमानी हो जाए…

सूचना का अधिकार नागरिक का संवैधानिक औज़ार है। पर जब वही सूचना अधिकारी महीनों तक जानकारी न दें, तो यह सिर्फ नियमों की अनदेखी नहीं, लोकतंत्र के चेहरे पर एक काला धब्बा है।

क्या जनपद पंचायत माखननगर, जिला प्रशासन, और पंचायत विभाग — सभी की चुप्पी — महज़ संयोग है? या फिर कोई ऐसा ‘पंचायती गठजोड़’ है जिसे उजागर होने से बचाया जा रहा है?

लोकतंत्र के सबसे निचले पायदान पर कुंडली मारकर बैठे हैं ‘छद्म सरपंच’

आज हर पंचायत में एक निर्वाचित प्रतिनिधि होता है, पर सत्ता संभालते हैं कोई और। ‘सरपंच पति’, ‘साला जी’, या ‘मामाजी’ जैसे सत्ता के छाया पात्र ग्रामीण लोकतंत्र को लील रहे हैं। और यह सब प्रशासन की मौन सहमति से हो रहा है।

अब फैसला जनता को लेना होगा

यह सिर्फ नया चूरना की बात नहीं है। यह तो पूरे सिस्टम की पोल खोलने वाली एक मिसाल है। यदि आज इस आरटीआई पर भी प्रशासन जवाब नहीं देता, तो समझिए लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव – ग्रामसभा – को अंदर ही अंदर खोखला किया जा रहा है।

अब जनता को पूछना चाहिए:

किसे बचाया जा रहा है?

पंचायत में कौन असली सरपंच है?

अफसर जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं?

क्योंकि जब सरकारें जवाब देना छोड़ दें, और अफसर जांच करने से बचें — तब कलम को सवाल उठाना ही होगा।




नर्मदापुरम में भारी बारिश के चलते 29 जुलाई को स्कूलों में विद्यार्थियों के लिए अवकाश घोषित

नर्मदापुरम | 28 जुलाई 2025:
जिले में लगातार हो रही अत्यधिक वर्षा को देखते हुए जिला शिक्षा अधिकारी नर्मदापुरम ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। आदेश के अनुसार, विद्यार्थियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए 29 जुलाई 2025 (सोमवार) को जिले के सभी स्कूलों में विद्यार्थियों के लिए अवकाश घोषित किया गया है।


यह आदेश शासकीय, अशासकीय, सीबीएसई, नवोदय एवं केंद्रीय बोर्ड से संबद्ध प्राथमिक, माध्यमिक, हाई स्कूल और हायर सेकंडरी स्कूलों पर लागू होगा।

अवकाश केवल विद्यार्थियों के लिए घोषित किया गया है। यदि किसी विद्यालय में पूर्व निर्धारित बोर्ड परीक्षा होना है, तो वह निर्धारित समयानुसार यथावत संचालित की जाएगी।

शिक्षक/स्टाफ की उपस्थिति को लेकर आदेश में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है, अतः संबंधित विद्यालय प्रशासन से जानकारी प्राप्त करें।

जिला प्रशासन ने अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन से अपील की है कि वे मौसम की स्थिति को देखते हुए सतर्क रहें और विद्यार्थियों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखें।

नोट: यदि मौसम की स्थिति अत्यधिक खराब बनी रहती है, तो प्रशासन द्वारा आगे भी निर्णय लिया जा सकता है।




Jabalpur News: भ्रष्टाचार में फंसे सरपंच के पास नहीं होगा पैसे खर्च करने का हक, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

जबलपुर हाईकोर्ट के जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने कहा है कि भ्रष्टाचार के आरोपी सरपंच से पैसे खर्च करने का अधिकार वापस लेना सही फैसला है। कोर्ट ने सरपंच की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उसने अपने अधिकार छीने जाने को गलत बताया था।

जबलपुर हाईकोर्ट के जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने फैसला सुनाया है कि भ्रष्टाचार के आरोपी सरपंच से वित्तीय अधिकार वापस लेना सही कदम है। कोर्ट ने सरपंच की याचिका खारिज कर दी है, जिसमें उसने अपने अधिकार वापस लेने के फैसले को गलत बताया था। यह याचिका मंघु बैगा (पिता श्री धन्नू बैगा) ने दायर की थी। वह जिला शहडोल के तहसील सोहागपुर की ग्राम पंचायत मायकी का निर्वाचित सरपंच है। उसके खिलाफ लोकायुक्त ने 50 हजार रुपये की रिश्वत लेने का केस दर्ज किया है, जो अभी लंबित है। इस मामले के बाद जिला पंचायत शहडोल के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने उसके वित्तीय अधिकार छीन लिए और ये अधिकार पंचायत समन्वयक राजबहोर साकेत को दे दिए।

सरपंच ने कोर्ट में यह दलील दी थी कि उसके खिलाफ सिर्फ केस दर्ज हुआ है, फैसला नहीं आया है, इसलिए उसके अधिकार छीनना गलत है। लेकिन सरकार की ओर से बताया गया कि आरोप भ्रष्टाचार और अधिकारों के गलत इस्तेमाल से जुड़े हैं, इसलिए यह कदम उठाया गया।

कोर्ट ने “मध्य प्रदेश पंचायत (मुख्य कार्यपालन अधिकारी की शक्तियाँ एवं कार्य) नियम, 1995” का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य कार्यपालन अधिकारी को यह अधिकार है कि वह पंचायत के कार्यों की निगरानी करे और पंचायत की संपत्ति और धन की सुरक्षा सुनिश्चित करे। इसलिए यदि कोई सरपंच भ्रष्टाचार में शामिल पाया जाए, तो उसके वित्तीय अधिकार छीने जा सकते हैं। इस आधार पर कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।