जनपद पंचायत का जीनक्षीर भवन औने-पौने दामों में नीलाम? नियम ताक पर, 4 भवन मात्र 1.05 लाख में डिस्मेंटल सहित फाइनल

न जनपद सभा प्रस्ताव, न विधिवत प्रमाणन और PWD अनुमति के नीलामी के आरोप; 33 में से सिर्फ 2 ने लगाई बोली

माखननगर। जनपद पंचायत के जीनक्षीर आवासीय भवन की नीलामी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 27 फरवरी 2026, शुक्रवार को हुई इस नीलामी में कथित तौर पर नियमों को दरकिनार कर चार भवनों को मात्र 1 लाख 5 हजार रुपये में डिस्मेंटल मटेरियल सहित फाइनल कर दिया गया। सूत्रों का दावा है कि पूरी प्रक्रिया में न तो जनपद सभा से प्रस्ताव लिया गया और न ही सदस्यों को पूर्व सूचना दी गई।

33 पंजीयन, पर बोली सिर्फ 2 की — क्या यह प्रतिस्पर्धी नीलामी थी?

दस्तावेज़ी जानकारी के अनुसार 33 खरीदारों ने भागीदारी दर्ज कराई, लेकिन बोली केवल दो व्यक्तियों ने लगाई। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नीलामी की शर्तें और समय-सीमा ऐसी रखी गईं कि वास्तविक प्रतिस्पर्धा ही खत्म हो गई? चार भवनों का डिस्मेंटल मटेरियल सहित कुल मूल्य मात्र 1.05 लाख रुपये तय होना अपने आप में संदेह पैदा करता है।

नियम क्या कहते हैं?

सामान्य प्रशासन की कंडिका 4.2, सामान्य परिपत्र पुस्तिका 3-8 तथा लोक निर्माण विभाग के मैनुअल के अनुसार— कलेक्टर द्वारा यह प्रमाणित किया जाना आवश्यक है कि संबंधित भवन किसी अन्य विभाग को आवश्यक नहीं है।
यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि भवन किसी लोक प्रयोजन के लिए उपयोग योग्य नहीं है।
पूंजीगत लागत का निर्धारण PWD मैनुअल के अनुसार होना चाहिए।
यहां प्रश्न यह है कि क्या यह समस्त प्रमाणन और मूल्यांकन विधिवत हुआ?

PWD से अनुमति पर चुप्पी

जब इस संबंध में PWD के सब इंजीनियर आरबी चौहान से संपर्क किया गया तो फोन रिसीव नहीं हुआ। वहीं जनपद के सब इंजीनियर मुकेश बुबाड़े का कहना है कि PWD सब इंजीनियर ने “कलेक्टर को सूचना दे दी गई है, नीलामी कर सकते हैं” कहा था। लेकिन क्या केवल मौखिक सूचना पर्याप्त है? क्या लिखित स्वीकृति और प्रमाणन मौजूद है?

जनपद बॉडी को जानकारी नहीं!

जनपद उपाध्यक्ष लालचंद यादव ने स्पष्ट कहा कि न तो जनपद की बॉडी में इस प्रकार का कोई प्रस्ताव आया और न ही सदस्यों को जानकारी दी गई। उन्होंने उच्च अधिकारियों से शिकायत कर जांच कराने की बात कही है। यदि यह सही है, तो यह सीधे-सीधे जनप्रतिनिधियों की भूमिका को दरकिनार करने का मामला बनता है।

पंचायत इंस्पेक्टर हरिप्रसाद बरेले का कहना है कि “सीईओ के निर्देशानुसार प्रक्रिया का पालन किया गया।”
तहसीलदार महेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि प्रेस विज्ञप्ति जारी कर नीलामी की गई है और फिर भी अनियमितता हुई है तो प्रक्रिया की जांच करवाएंगे।
लेकिन केवल प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देना क्या पर्याप्त पारदर्शिता है? क्या यह सुनिश्चित किया गया कि अधिकतम प्रतिस्पर्धा और राजस्व हित सुरक्षित रहे?

बड़ा सवाल: किसे लाभ, किसे नुकसान?

चार भवनों का डिस्मेंटल मटेरियल सहित मात्र 1.05 लाख रुपये में निपटान—क्या यह बाजार मूल्य के अनुरूप है? यदि नहीं, तो यह सीधा-सीधा जनपद पंचायत को राजस्व हानि का मामला हो सकता है।
यदि नियमों के अनुरूप कलेक्टर प्रमाणन, PWD मूल्यांकन और जनपद सभा प्रस्ताव नहीं लिया गया, तो यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही बल्कि वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आ सकता है।

उच्चस्तरीय जांच की मांग

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जागरूक नागरिकों ने इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है।
नीलामी की पूरी फाइल सार्वजनिक की जाए।
मूल्यांकन रिपोर्ट और कलेक्टर प्रमाणन सामने लाया जाए।
यह स्पष्ट किया जाए कि 33 में से केवल 2 बोलीदाता ही क्यों सक्रिय रहे।
यदि प्रक्रिया पारदर्शी है तो प्रशासन को दस्तावेज़ सार्वजनिक करने में संकोच नहीं होना चाहिए। और यदि चूक हुई है, तो जिम्मेदारी तय होनी ही चाहिए।




जनपद शिक्षा समिति: जहां पढ़ाई अपराध है और लापरवाही नीति

Denvapost exclusive। अगर शिक्षा समिति का काम सिर्फ बैठकें न करना होता, तो जनपद की शिक्षा समिति अपने लक्ष्य से कहीं आगे निकल चुकी है।
दो साल।चार बैठकें। और गांवों में बर्बाद होती शिक्षा।
यह उपलब्धि नहीं तो और क्या है?
ग्रामीण अंचल के शासकीय स्कूलों की हालत देखकर एक बात साफ हो जाती है— विभाग बेबस है, जनप्रतिनिधि बेख़बर हैं और शिक्षा समिति पूरी तरह बेपरवाह।

यह आरोप नहीं है। यह ज़मीनी सच है, जो स्कूलों की टूटी कुर्सियों, बंद कमरों और गायब शिक्षकों में साफ दिखाई देता है।

13 साल से शिक्षक, लेकिन पढ़ाने की सजा नहीं

पवारखेड़ा खुर्द प्राथमिक स्कूल में एक शिक्षक पिछले 13 वर्षों से निर्वाचन कार्यों में सेवाएं दे रहा है।
मतलब लोकतंत्र मजबूत हो रहा है,
लेकिन शिक्षा को लगातार कमजोर किया जा रहा है।

जिस काम के लिए शिक्षक नियुक्त हुआ—पढ़ाने के लिए—
वह काम शायद उसकी नौकरी की शर्तों में अब शामिल ही नहीं है।
प्रस्ताव पंचायत से जनपद तक गया।
फाइल चली।
लेकिन नतीजा वही—शून्य।

शायद शिक्षा समिति का मानना है कि
बच्चे पढ़ें या न पढ़ें, लेकिन चुनाव समय पर होने चाहिए।

भवन खड़ा है, शिक्षा लापत

सुप्लई गांव में स्कूल भवन बने एक साल हो गया। ईंट, सीमेंट, छत—सब कुछ है। बस स्कूल नहीं है।
बच्चे दूसरे गांव जाने को मजबूर हैं
और यह इमारत खड़ी है—सरकारी उदासीनता का स्मारक बनकर।अगर भवन ही शिक्षा होता,तो आज ठेकेदारों को नोबेल मिल रहे होते।

कहीं स्कूल से एलर्जी, कहीं मेडिकल अमर

सैंडरवाड़ा में एक महिला शिक्षिका को स्कूल आने से परहेज है। खरगावली में शिक्षिका का मेडिकल ऐसा है।जो न खत्म होता है, न सवालों के घेरे में आता है। लगता है मेडिकल प्रमाणपत्र अब
बीमारी का नहीं,सरकारी गैरहाज़िरी का लाइसेंस बन चुका है।

शिक्षा समिति? उसे शायद लगता है—“चलने दो, सिस्टम यूं ही चलता है।”

स्कूल गया, दीवार आई

मोहासा धमासा टोला की ईजीएस शाला बंद हो गई। लेकिन आश्चर्य देखिए— तीन लाख रुपये की बाउंड्री वॉल खड़ी हो गई।स्कूल नहीं।बच्चे नहीं।पढ़ाई नहीं। लेकिन दीवार है। क्योंकि दीवार में भुगतान है और शिक्षा में सिर्फ जिम्मेदारी।

शिक्षा समिति: अज्ञान या अनदेखी?

सबसे खतरनाक बात यह नहीं कि स्कूल बदहाल हैं। सबसे खतरनाक बात यह है किcजनपद शिक्षा समिति को इसकी भनक तक नहीं लगती और अगर लग भी जाए, तो क्या? बैठक अगली तिथि तक टाल दी जाती है।

जहां पैसा, वहां सक्रियता

यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि— जहां निर्माण का पैसा होता है, वहां जनप्रतिनिधि दौड़ते हैं। जहां शिक्षा होती है, वहां सब बैठ जाते हैं। क्योंकि शिक्षा में ना टेंडर है,ना कमीशन ,ना उद्घाटन की फोटो।

सवाल पूछो तो याददाश्त लौट आती है
जब देनवापोस्ट ने शिक्षा समिति सभापति लालचंद यादव से सवाल किए,तो उन्हें अचानक बैठक करने की याद आ गई। समस्याएं हल करने की बातें भी होने लगीं।

पुरानी खबरें गवाह हैं कि— यही वादे पहले भी किए गए थे, न बैठकें हुईं,न स्कूल सुधरे। यानी बयान हर बार नया,
लेकिन नीयत और नतीजा—पुराना और खोखला।

कुर्सी सुरक्षित, शिक्षा असुरक्षित
आज जनपद पंचायत में कुर्सी सुरक्षित है, पद सुरक्षित है, समिति सुरक्षित है।

असुरक्षित है तो गांव का स्कूल, गरीब का बच्चा, और उसका भविष्य।

अगर दो साल में चार बैठकें पर्याप्त हैं, शिक्षक स्कूल जाएं या न जाएं कोई फर्क नहीं पड़ता, स्कूल बंद हों लेकिन दीवारें बनती रहें—तो फिर जनपद शिक्षा समिति को तत्काल भंग कर देना ही ज्यादा ईमानदार कदम नहीं होगा?
क्योंकि जब निगरानी सिर्फ कागज़ों में हो, तो शिक्षा ज़मीन पर नहीं, कब्र में पहुंच जाती है।




सियासत नहीं, सिद्धांत की लड़ाई : गांधी और चतुर्वेदी की कलम से सीखो!

आज की तारीख सिर्फ एक कैलेंडर पर दो नामों को याद करने का दिन नहीं है। यह एक क्रूर मज़ाक है। यह उस युग का अवसान और इस युग के ढोंग का प्रदर्शन है। एक तरफ महात्मा गांधी, जिनके लिए ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ विचारों के ऐसे मैदान-ए-जंग थे, जहाँ सत्य का एक शब्द साम्राज्य के गलाने वाले ज़हर का काम करता था। दूसरी तरफ माखन लाल चतुर्वेदी, जिनकी ‘कर्मवीर’ में छपी हर पंक्ति राजद्रोह के आरोप का खतरा ओढ़कर आती थी, फिर भी नहीं झुकी।

और आज देखिए! हमारे प्राइम टाइम के ‘योद्धा’, स्टूडियो की रोशनी में चमकते हुए, टीआरपी के नाम पर ज़हर उगलते हुए। गांधी की ‘आक्रामकता’ सत्य में थी। चतुर्वेदी की ‘आक्रामकता’ देशभक्ति के ज्वार में थी। आज की ‘आक्रामकता’ क्या है? सनसनी में। आधे सच में। किसी की जाति, धर्म, पोशाक पर कीचड़ उछालने में। यह पत्रकारिता नहीं, पतन है।

गांधी साफ़ कहते थे — अखबार का उद्देश्य जनता की भावनाएँ भड़काना नहीं, बल्कि उन्हें शिक्षित और संयमित करना है। आज क्या हो रहा है? हर खबर एक ‘वार’ है, हर बहस एक ‘क्रिकेट मैच’ है, और हर एंकर एक ‘स्कोर’ बताने वाला कमेंटेटर। चतुर्वेदी जेल जाने से नहीं डरे। क्या आज का कोई ‘स्टार’ रेटिंग गिरने, या ‘दबाव’ आने के डर से सच लिखने-बोलने से डरता है? जवाब आपके पास है।

गांधी कहते थे – “अपनी गलती स्वीकारने में कोई बुराई नहीं।” क्या आज का कोई चैनल, कोई अखबार यह हिम्मत दिखा सकता है?
चतुर्वेदी पूछते – “क्या लिखूं? अभिव्यक्ति की कठिनाई यही।” क्या आज की ‘एंकर-शक्ति’ को इस कठिनाई का अहसास भी है?

हमें एक सवाल पूछना होगा: क्या आज का मीडिया उस महासागर की बात कर रहा है, जिसमें देश तैर रहा है, या फिर खुद एक छोटे-से स्विमिंग पूल में उछल-कूद करके दिखावा कर रहा है? गांधी और चतुर्वेदी ने पूरे सागर की चुनौती स्वीकार की थी। उनकी कलम समाज के घावों पर नमक छिड़कने के लिए नहीं, मरहम लगाने के लिए थी।

यदि पत्रकारिता सत्ता के गलियारों में घूमने वाली ‘लॉबी’ बनकर रह गई है, तो यह उन सभी शहीदों के बलिदान का अपमान है, जिन्होंने कलम को तलवार माना था। आज उस तलवार पर जंग लग चुकी है। उसे फिर से तेज़ करने की ज़रूरत है। नहीं तो, इतिहास हमें क्षमा नहीं करेगा। गांधी और चतुर्वेदी की पुण्यतिथि सिर्फ फूल चढ़ाने का दिन नहीं, आईना दिखाने का दिन है। क्या हम इस आईने में अपना चेहरा देखने की हिम्मत रखते हैं?

यह लड़ाई टीआरपी की नहीं, विवेक की है। यह लड़ाई सत्ता की कृपा की नहीं, जनता के विश्वास की है।




1.38 करोड़ का विश्रामगृह: उद्घाटन के बाद अंधेरे में ‘विश्राम’, प्रशासन रोशनी ढूंढता रह गया

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा 16 जनवरी को जिस विश्रामगृह का लोकार्पण किया गया था, वह आज अपने नाम के अनुरूप विश्राम नहीं बल्कि अंधकार साधना करता नजर आ रहा है। 1 करोड़ 38 लाख रुपए की लागत से बना यह भवन उद्घाटन के दिन दुल्हन की तरह सजा था—झालरें, रोशनी, साज-सज्जा और प्रशासनिक मुस्कान सब कुछ मौजूद था।

लेकिन जैसे ही उद्घाटन संपन्न हुआ, रोशनी भी विदा हो गई और जिम्मेदारी भी।

लोकार्पण के बाद बालाजी कॉन्ट्रैक्शन ने भवन को लोक निर्माण विभाग (PWD) को हैंडओवर किया और उसी के साथ अस्थाई बिजली कनेक्शन कटवाने का आवेदन भी दे दिया। यानी फीता कटा, बिजली कटी और भवन अंधेरे में चला गया।

जहां गणतंत्र दिवस चमका, वहां विश्रामगृह बुझा रहा

राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस पर नगर के लगभग सभी शासकीय भवन तिरंगे की रोशनी में नहाए हुए थे। कहीं झालरें चमक रहीं थीं, कहीं फोकस लाइट्स से देशभक्ति झलक रही थी।

लेकिन 1.38 करोड़ की लागत से बना नया विश्रामगृह वीरानों की तरह खड़ा रहा—न रोशनी, न गतिविधि, न जिम्मेदारी। यह दृश्य अपने आप में प्रशासनिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य था।

जब बिजली ही नहीं, तो झालर किस भरोसे?

पीडब्ल्यूडी सब इंजीनियर आर.बी. चौहान का बयान इस पूरे मामले का सबसे उजला… माफ कीजिए, सबसे अंधेरा पक्ष उजागर करता है। उन्होंने कहा—“कल झालर लगवा देंगे।”
अब सवाल यह है कि जब विश्रामगृह में बिजली कनेक्शन ही नहीं है, तो झालर आखिर चलेगी कैसे?

क्या अब सरकारी सजावट भावनाओं से जलाई जाएगी या फिर फाइलों की गर्मी से रोशनी फैलेगी?

कॉन्ट्रैक्टर का तर्क: हैंडओवर मतलब हाथ झाड़ना

बालाजी कॉन्ट्रैक्शन के प्रतिनिधि कृष्ण गोपाल अग्रवाल का कहना है कि—
“विश्रामगृह पीडब्ल्यूडी को हैंडओवर कर दिया गया है, इसलिए बिजली कनेक्शन कटवाने का आवेदन दिया।”
यानी उद्घाटन तक जिम्मेदारी, उसके बाद मजबूरी।

प्रश्न यह उठता है कि क्या 1.38 करोड़ की योजना केवल उद्घाटन समारोह तक ही सीमित थी?

क्या विश्रामगृह का भविष्य सिर्फ फोटो फ्रेम और प्रेस रिलीज़ तक था?

बिजली विभाग बोला: आवेदन आया, हमने निभाया

मध्यप्रदेश विद्युत मंडल (MPEB) के सब इंजीनियर का कहना है—
“बालाजी कॉन्ट्रैक्शन की ओर से कनेक्शन काटने का आवेदन आया था, उसी आधार पर कनेक्शन काटा गया।”
मतलब यह कि बिजली विभाग ने नियम निभाया, कॉन्ट्रैक्टर ने जिम्मेदारी छोड़ी और पीडब्ल्यूडी… अब तक नए कनेक्शन के लिए आवेदन करना भूल गया।

तो फिर बिजली आएगी कहां से?
यही सबसे बड़ा सवाल है।
जब पीडब्ल्यूडी ने नए बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन ही नहीं किया, तो विश्रामगृह में बिजली चालू कैसे होगी?
क्या मुख्यमंत्री के उद्घाटन की रौशनी को स्थायी मान लिया गया है?
या फिर यह मान लिया गया है कि कागजों में बिजली चालू होना ही काफी है?

दुल्हन से वीरान तक का सफर

16 जनवरी को जो भवन दुल्हन की तरह सजा था, वही कुछ दिनों में वीरान खड़ा है।
न कोई उपयोग, न कोई गतिविधि, न कोई जवाबदेही।
कॉन्ट्रैक्टर कहता है—हम मुक्त।
पीडब्ल्यूडी कहता है—देख लेंगे।
बिजली विभाग कहता है—आवेदन लाओ।
और 1.38 करोड़ रुपए का विश्रामगृह कहता है—मैं अंधेरे में ठीक हूं।

व्यंग्य नहीं, सिस्टम की सच्चाई
यह सिर्फ एक व्यंग्यात्मक खबर नहीं, बल्कि उस सिस्टम की तस्वीर है जहां योजनाएं बनती हैं, उद्घाटन होते हैं, लेकिन उपयोग और रखरखाव फाइलों में दम तोड़ देते हैं।

अगर यही हाल रहा, तो यह विश्रामगृह जल्द ही विश्राम नहीं बल्कि प्रशासनिक उदासीनता का स्मारक बन जाएगा।
प्रशासन से सीधे सवाल
पीडब्ल्यूडी ने अब तक स्थायी बिजली कनेक्शन का आवेदन क्यों नहीं किया?
उद्घाटन से पहले यह मूलभूत व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
क्या किसी स्तर पर जिम्मेदारी तय होगी?
क्योंकि अब जनता सिर्फ रौशनी नहीं, जवाब भी चाहती है।




लोकतंत्र की नींव रखने वाला ऐतिहासिक संकल्प

भारत का संविधान केवल कानूनों का संकलन नहीं, बल्कि आज़ाद भारत के सपनों, संघर्षों और समानता के संकल्प का दस्तावेज है। इसकी रचना एक लंबी, लोकतांत्रिक और विचारशील प्रक्रिया का परिणाम रही, जिसने देश को गणराज्य के रूप में स्थापित किया।
जब भारत आज़ाद हुआ, तब सबसे बड़ी चुनौती केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण था, जो भाषा, धर्म, जाति और संस्कृति की असंख्य विविधताओं को एक सूत्र में बाँध सके। इसी ऐतिहासिक आवश्यकता ने भारतीय संविधान को जन्म दिया—एक ऐसा संविधान, जो लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और समानता की नींव पर खड़ा है।

संविधान निर्माण की प्रक्रिया आज़ादी से पहले ही शुरू हो चुकी थी। वर्ष 1946 में संविधान सभा का गठन हुआ, जिसकी पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई। यह सभा किसी एक दल या विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी, बल्कि इसमें देश के हर वर्ग और क्षेत्र की आवाज़ शामिल थी। यही कारण है कि भारतीय संविधान को जनता की सामूहिक चेतना का प्रतिबिंब कहा जाता है।

संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस ऐतिहासिक कार्य को दिशा दी। विशेष रूप से डॉ. अंबेडकर की भूमिका केंद्रीय रही। उन्होंने संविधान को केवल प्रशासनिक ढांचा नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का माध्यम बनाया। दलितों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों को अधिकारों की गारंटी देना इसी सोच का परिणाम था।

करीब 2 वर्ष 11 माह 18 दिन तक चली संविधान निर्माण की प्रक्रिया में हर अनुच्छेद पर गहन बहस हुई। यह दिखाता है कि संविधान किसी जल्दबाजी का दस्तावेज नहीं, बल्कि गहन मंथन से निकला हुआ समझौता है—जहाँ आदर्शों और व्यावहारिकता के बीच संतुलन साधा गया।

भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों और राज्य की जिम्मेदारियों—दोनों को समान महत्व देता है। मौलिक अधिकार नागरिकों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं, जबकि नीति-निर्देशक तत्व सरकार को कल्याणकारी राज्य की दिशा दिखाते हैं। यह संतुलन ही संविधान को जीवंत और प्रासंगिक बनाए रखता है।

26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकार किया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया। इसी दिन भारत एक संप्रभु गणराज्य बना। 26 जनवरी का चयन अपने आप में ऐतिहासिक था, क्योंकि 1930 में इसी दिन पूर्ण स्वराज का संकल्प लिया गया था।

आज जब संविधान की मूल भावना पर बार-बार बहस होती है, तब यह समझना जरूरी है कि संविधान केवल सरकार चलाने का उपकरण नहीं, बल्कि नागरिकों और राज्य के बीच सामाजिक अनुबंध है। यह अधिकार देता है, तो कर्तव्य भी याद दिलाता है।

संपादकीय दृष्टि से, संविधान की रक्षा केवल संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। इसे जीवित रखने का दायित्व हर नागरिक पर है। संविधान सुरक्षित रहेगा, तभी लोकतंत्र मजबूत रहेगा—और लोकतंत्र मजबूत रहेगा, तभी भारत अपने मूल्यों के साथ आगे बढ़ेगा।
संविधान केवल किताबों में रखने की वस्तु नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के आचरण में उतारने की आवश्यकता है। यही इसकी सच्ची श्रद्धांजलि है।




सत्ता, संवैधानिक मर्यादा और सवालों के घेरे में सरकार

किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का सबसे बड़ा पैमाना यह होता है कि वहां कानून कितना निष्पक्ष है और सत्ता में बैठे लोग स्वयं को कानून के प्रति कितना जवाबदेह मानते हैं। कर्नल सोफिया कुरैशी केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्य प्रदेश सरकार से पूछे गए तीखे सवाल इसी कसौटी पर सत्ता की परीक्षा ले रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर जैसे संवेदनशील सैन्य अभियान के दौरान एक वरिष्ठ महिला सैन्य अधिकारी पर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी और उस पर कार्रवाई में सरकार की लगातार देरी ने इस मामले को साधारण कानूनी विवाद से ऊपर उठाकर संवैधानिक नैतिकता का प्रश्न बना दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कर्नल सोफिया कुरैशी पर कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप मध्य प्रदेश के भाजपा मंत्री कुंवर विजय शाह पर लगे। यह टिप्पणी न केवल एक महिला अधिकारी की गरिमा से जुड़ी थी, बल्कि भारतीय सेना जैसी अनुशासित और सम्मानित संस्था की प्रतिष्ठा को भी प्रभावित करने वाली मानी गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच टीम (SIT) गठित की गई, जिसने अगस्त 2025 में ही अपनी जांच पूरी कर ली और राज्य सरकार से अभियोजन की मंजूरी मांगी।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र में अक्सर देखी जाने वाली उस बीमारी की ओर इशारा करता है, जहां सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों पर कानून की गति अचानक थम सी जाती है। महीनों बीत जाने के बावजूद राज्य सरकार ने अभियोजन की अनुमति पर कोई निर्णय नहीं लिया।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: असहज सवाल
मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अगुवाई वाली बेंच ने सुनवाई के दौरान सरकार की इस चुप्पी पर गंभीर नाराजगी जताई। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून के तहत सरकार पर समयबद्ध निर्णय लेने की वैधानिक जिम्मेदारी है। CJI का यह सवाल — “क्या हम सही समझ रहे हैं कि SIT ने अनुमति मांगी है और सरकार अब तक चुप बैठी हुई है?” — केवल एक औपचारिक टिप्पणी नहीं, बल्कि सत्ता की निष्क्रियता पर सीधा प्रहार है।

यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि अभियोजन की मंजूरी कोई राजनीतिक दया नहीं, बल्कि एक संवैधानिक प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई निराधार मामला न चले, न कि यह कि दोषी को राजनीतिक संरक्षण मिल जाए।

राजनीतिक संरक्षण बनाम संवैधानिक जिम्मेदारी

इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जांच पूरी होने के बावजूद कार्रवाई को टालना कहीं न कहीं राजनीतिक संरक्षण की आशंका को जन्म देता है। जब आरोप किसी मंत्री पर हों और सरकार महीनों तक निर्णय न ले, तो स्वाभाविक है कि जनता के मन में सवाल उठेंगे — क्या कानून सबके लिए समान है?
भारतीय संविधान मंत्रियों को किसी भी प्रकार की आपराधिक छूट नहीं देता। बल्कि उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे आचरण में आम नागरिकों से कहीं अधिक सावधानी और जिम्मेदारी बरतें। ऐसे में अभियोजन की मंजूरी में देरी सत्ता के नैतिक दिवालियापन का संकेत बन जाती है।

सेना और महिला सम्मान का प्रश्न
यह मामला केवल एक राजनीतिक या कानूनी विवाद नहीं है। इसमें भारतीय सेना के सम्मान और महिला अधिकारियों की गरिमा का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। कर्नल सोफिया कुरैशी जैसी अधिकारी न केवल देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाती हैं, बल्कि वे उन हजारों महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं जो कठिन परिस्थितियों में देश सेवा कर रही हैं।

यदि इस तरह के मामलों में ढिलाई बरती जाती है, तो यह संदेश जाता है कि महिला सम्मान और सैन्य मर्यादा जैसे मुद्दे भी राजनीतिक समीकरणों के आगे गौण हैं। यह न केवल गलत संदेश है, बल्कि खतरनाक भी।

न्याय में देरी: लोकतंत्र के लिए खतरा
कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है — Justice delayed is justice denied। जब सरकार जानबूझकर निर्णय को टालती है, तो यह न्याय प्रक्रिया को कमजोर करती है। इससे अदालतों का समय भी व्यर्थ होता है और जनता का भरोसा भी टूटता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इस बात का संकेत है कि अब न्यायपालिका इस तरह की देरी को गंभीरता से ले रही है। यह एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि लोकतंत्र में न्यायपालिका ही वह अंतिम संस्था है जो सत्ता को उसकी सीमाएं याद दिलाती है।

सरकार के लिए संदेश

मध्य प्रदेश सरकार के सामने अब स्पष्ट विकल्प है — या तो वह संविधान और कानून के अनुसार तुरंत अभियोजन की मंजूरी दे, या फिर यह स्वीकार करे कि राजनीतिक मजबूरियां न्याय के रास्ते में आड़े आ रही हैं। दोनों में से दूसरा विकल्प लोकतंत्र के लिए घातक है।
यह मामला आने वाले समय में एक नजीर भी बन सकता है। यदि अदालत की सख्ती के बाद भी सरकार टालमटोल करती है, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि जवाबदेही की संस्कृति को सत्ता अब भी गंभीरता से नहीं ले रही।

कर्नल सोफिया कुरैशी केस आज केवल एक मंत्री के बयान या एक फाइल पर अटके फैसले का मामला नहीं है। यह उस बड़े सवाल का प्रतीक है कि क्या भारत में कानून वास्तव में सर्वोपरि है, या फिर सत्ता के सामने उसे बार-बार झुकना पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपना कर्तव्य निभाते हुए सरकार से सवाल पूछा है। अब बारी सरकार की है कि वह जवाब केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कार्रवाई में दे। क्योंकि लोकतंत्र में अंततः फैसला अदालतों के साथ-साथ जनता भी सुनाती है, और वह फैसला अक्सर सत्ता के लिए कहीं ज्यादा कठोर होता है।




एमपी बोर्ड परीक्षा 2026: हाईस्कूल, हायर सेकंडरी व डीपीएसई के प्रवेश पत्र जारी

नर्मदापुरम/ माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्यप्रदेश (एमपीबीएसई) द्वारा आयोजित हाईस्कूल, हायर सेकंडरी एवं विद्यालय पूर्व शिक्षा में डिप्लोमा (डी.पी.एस.ई.) परीक्षा वर्ष 2026 के लिए प्रवेश पत्र जारी कर दिए गए हैं। प्रवेश पत्र जारी होते ही प्रदेशभर के लाखों विद्यार्थियों में परीक्षा को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं।

मंडल द्वारा जारी सूचना के अनुसार, हाईस्कूल (कक्षा 10वीं), हायर सेकंडरी (कक्षा 12वीं) तथा डी.पी.एस.ई. परीक्षा में सम्मिलित होने वाले सभी नियमित एवं निजी परीक्षार्थी अपना प्रवेश पत्र माध्यमिक शिक्षा मंडल की आधिकारिक वेबसाइट https://mpbse.mponline.gov.in पर जाकर डाउनलोड कर सकते हैं। प्रवेश पत्र डाउनलोड करने के लिए विद्यार्थियों को रोल नंबर अथवा आवेदन क्रमांक दर्ज करना अनिवार्य होगा।

प्रवेश पत्र में परीक्षार्थी का नाम, पिता का नाम, रोल नंबर, परीक्षा केंद्र का नाम, विषयवार परीक्षा तिथि एवं समय, साथ ही परीक्षा संबंधी आवश्यक दिशा-निर्देश अंकित किए गए हैं। मंडल ने विद्यार्थियों से अपील की है कि वे प्रवेश पत्र में दर्ज समस्त जानकारियों का सावधानीपूर्वक अवलोकन कर लें। यदि किसी प्रकार की त्रुटि पाई जाती है, तो संबंधित विद्यालय अथवा परीक्षा केंद्र प्रभारी से तत्काल संपर्क करें।

मंडल अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि बिना प्रवेश पत्र के किसी भी परीक्षार्थी को परीक्षा केंद्र में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी। परीक्षार्थियों को प्रवेश पत्र के साथ एक वैध फोटो पहचान पत्र भी अनिवार्य रूप से साथ लाना होगा। साथ ही परीक्षा केंद्र पर समय से पूर्व पहुंचने और अनुशासन बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं।

माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा परीक्षाओं के सुचारु एवं निष्पक्ष संचालन के लिए सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षा व्यवस्था, उड़नदस्तों की तैनाती तथा प्रश्नपत्रों की गोपनीयता को लेकर विशेष सतर्कता बरती जा रही है। नकल अथवा अनुचित साधनों का उपयोग करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी मंडल द्वारा दी गई है।

उल्लेखनीय है कि बोर्ड परीक्षाएं विद्यार्थियों के शैक्षणिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव होती हैं। ऐसे में मंडल ने सभी परीक्षार्थियों से शांत मन से परीक्षा देने, समय प्रबंधन पर ध्यान देने और स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखने की अपील की है।