प्रह्लाद जोशी बने नए केंद्रीय शिक्षा मंत्री, बोले- प्रधानमंत्री मोदी की उम्मीदों पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगा

नई दिल्ली। NEET-UG विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वरिष्ठ भाजपा नेता प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी है। नई जिम्मेदारी मिलने के बाद प्रह्लाद जोशी ने प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वह पूरी निष्ठा, समर्पण और कर्तव्य भावना के साथ मंत्रालय की जिम्मेदारियों का निर्वहन करेंगे।

प्रह्लाद जोशी ने कहा, “मैं इस जिम्मेदारी को कर्तव्य और विनम्रता के भाव के साथ स्वीकार करता हूं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभारी हूं कि उन्होंने मुझ पर विश्वास जताया। मुझे जो जिम्मेदारी दी गई है, उस पर उनकी उम्मीदों के अनुरूप काम करने की पूरी कोशिश करूंगा।”

धर्मेंद्र प्रधान के कार्यों की सराहना

नवनियुक्त शिक्षा मंत्री ने अपने पूर्ववर्ती धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि पिछले चार-पांच वर्षों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने सहित शिक्षा क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं।

उन्होंने कहा कि “धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव लाने का काम किया है। नई शिक्षा नीति के माध्यम से देश ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में मैं इन प्रयासों को आगे बढ़ाने का प्रयास करूंगा।”

मोदी सरकार के 12 वर्षों का किया उल्लेख

प्रह्लाद जोशी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों के दौरान देश ने अनेक ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि शिक्षा मंत्रालय भी इसी विकास यात्रा को आगे बढ़ाएगा और छात्रों, शिक्षकों तथा शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए निरंतर कार्य किया जाएगा।

कौन हैं प्रह्लाद जोशी?

प्रह्लाद जोशी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं और कर्नाटक की राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। वे वर्ष 2004 से लगातार कर्नाटक की धारवाड़ लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अपने पहले ही लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार बी.एस. पाटिल को हराकर संसद में प्रवेश किया था।

वे वर्ष 2014 से 2016 तक कर्नाटक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। संगठन और संसदीय राजनीति में लंबे अनुभव के कारण उन्हें भाजपा का अनुभवी चेहरा माना जाता है।

आरएसएस से जुड़ा रहा राजनीतिक सफर

प्रह्लाद जोशी का राजनीतिक जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है। वर्ष 1992-94 के दौरान हुबली के ईदगाह मैदान में तिरंगा फहराने के आंदोलन के बाद वे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे। इसके अलावा उन्होंने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में ‘कश्मीर बचाओ आंदोलन’ का भी नेतृत्व किया था।

NEET-UG विवाद के बीच मिली बड़ी जिम्मेदारी

प्रह्लाद जोशी ऐसे समय में शिक्षा मंत्रालय की कमान संभाल रहे हैं, जब NEET-UG परीक्षा विवाद को लेकर देशभर में छात्रों और विपक्ष का दबाव बना हुआ है। ऐसे में नई शिक्षा मंत्री के सामने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, छात्रों का विश्वास बहाल करने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन जैसी कई बड़ी चुनौतियां होंगी।

अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि नए शिक्षा मंत्री के नेतृत्व में शिक्षा मंत्रालय इन चुनौतियों से कैसे निपटता है और शिक्षा व्यवस्था में क्या नए कदम उठाए जाते हैं।




1 जून से महंगा हुआ कमर्शियल एलपीजी सिलिंडर, घरेलू उपभोक्ताओं को मिली राहत

नई दिल्ली। जून महीने की शुरुआत के साथ ही तेल विपणन कंपनियों ने कमर्शियल एलपीजी गैस सिलिंडर की कीमतों में बढ़ोतरी कर दी है। नई दरें 1 जून 2026 से लागू हो गई हैं। हालांकि घरेलू रसोई गैस सिलिंडर (14.2 किलोग्राम) की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, जिससे आम उपभोक्ताओं को राहत मिली है।42 रुपये तक बढ़े कमर्शियल सिलिंडर के दामनई कीमतों के अनुसार राजधानी दिल्ली में 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलिंडर की कीमत में 42 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। इसके बाद इसकी नई कीमत 3,113.50 रुपये हो गई है। वहीं कोलकाता में कमर्शियल सिलिंडर 53.50 रुपये महंगा होकर 3,255.50 रुपये में उपलब्ध होगा।तेल कंपनियों द्वारा की गई इस वृद्धि का सीधा असर होटल, रेस्तरां, ढाबों, कैटरिंग सेवाओं और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर पड़ सकता है, जहां बड़े पैमाने पर एलपीजी का उपयोग किया जाता है।

5 किलो वाले फ्री ट्रेड एलपीजी सिलिंडर के दाम भी बढ़ेकमर्शियल गैस के साथ-साथ 5 किलोग्राम वाले फ्री ट्रेड एलपीजी (एफटीएल) सिलिंडर की कीमत में भी 11 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। दिल्ली में अब यह सिलिंडर 821.50 रुपये में मिलेगा। छोटे व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं और सीमित गैस खपत वाले ग्राहकों पर भी इस वृद्धि का असर पड़ सकता है।

कारोबारियों की बढ़ेगी लागतविशेषज्ञों का कहना है कि कमर्शियल गैस सिलिंडर की कीमतों में हुई वृद्धि से होटल और रेस्तरां उद्योग की परिचालन लागत बढ़ेगी। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर खाद्य पदार्थों और रेस्तरां में मिलने वाले व्यंजनों की कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है।व्यापारिक संगठनों का मानना है कि लगातार बढ़ती परिचालन लागत पहले से ही चुनौती बनी हुई है, ऐसे में गैस कीमतों में बढ़ोतरी कारोबारियों के लिए अतिरिक्त बोझ साबित हो सकती है।

घरेलू उपभोक्ताओं को राहतहालांकि इस बार घरेलू एलपीजी सिलिंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इससे देशभर के करोड़ों परिवारों को राहत मिली है। घरेलू गैस की कीमतें स्थिर रहने से रसोई बजट पर तत्काल कोई अतिरिक्त असर नहीं पड़ेगा।तेल विपणन कंपनियों द्वारा जारी नई दरें रविवार, 1 जून 2026 से प्रभावी हो चुकी हैं। अब कारोबारियों की नजर आने वाले महीनों में गैस कीमतों की दिशा और सरकारी नीतियों पर रहेगी।




Brain Preservation Tech | मौत के 14 मिनट बाद भी सुरक्षित रह सकता है दिमाग? नई रिसर्च ने खोले विज्ञान के नए दरवाजे

नई दिल्ली। मौत के बाद क्या होता है? यह सवाल सदियों से इंसानों, दार्शनिकों और वैज्ञानिकों को आकर्षित करता रहा है। अब अमेरिका की एक रिसर्च ने इस बहस को नया आयाम दे दिया है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि मृत्यु के बाद भी कुछ समय तक दिमाग की संरचना को सुरक्षित रखा जा सकता है। सुअर के दिमाग पर किए गए एक प्रयोग में शोधकर्ताओं ने मृत्यु के बाद दिमाग की कोशिकाओं और न्यूरॉन्स को संरक्षित रखने में सफलता हासिल की है।

इस शोध ने मेडिकल साइंस, न्यूरोसाइंस और मानव चेतना को लेकर नई संभावनाओं के साथ कई नैतिक सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
सुअर के दिमाग पर किया गया सफल प्रयोग
अमेरिका के पोर्टलैंड स्थित स्टार्टअप “नेक्टोम” ने इस प्रयोग को अंजाम दिया। शोधकर्ताओं ने सुअर को इसलिए चुना क्योंकि उसका दिमाग और हृदय-रक्त संचार प्रणाली काफी हद तक इंसानों से मिलती-जुलती है।

प्रयोग के दौरान हृदय की धड़कन बंद होने के लगभग 10 मिनट बाद शरीर से सारा रक्त निकाल दिया गया। इसके बाद दिमाग में एल्डिहाइड नामक विशेष रसायन पहुंचाया गया, जिसने दिमाग के भीतर मौजूद प्रोटीन और कोशिकाओं को उनकी मूल स्थिति में स्थिर कर दिया।

इसके बाद दिमाग के ऊतकों में मौजूद पानी को विशेष क्रायोप्रोटेक्टेंट द्रव से बदला गया, जिससे ठंड के दौरान बर्फ के क्रिस्टल न बनें और कोशिकाएं क्षतिग्रस्त न हों। अंत में दिमाग को माइनस 32 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित कर दिया गया।

क्यों महत्वपूर्ण है 14 मिनट का समय?

शोधकर्ताओं के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया में समय सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रारंभिक परीक्षणों में जब प्रक्रिया मृत्यु के 18 मिनट बाद शुरू की गई तो दिमाग की बाहरी कोशिकाओं में टूट-फूट और क्षति के संकेत दिखाई दिए। लेकिन जब यह समय घटाकर 14 मिनट से कम किया गया तो परिणाम पूरी तरह बदल गए।

माइक्रोस्कोपिक जांच में न्यूरॉन्स और उनके आपसी कनेक्शन लगभग सुरक्षित पाए गए। वैज्ञानिकों का मानना है कि मृत्यु के बाद कोशिकाओं के भीतर मौजूद एंजाइम ऊतकों को नष्ट करना शुरू कर देते हैं। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ जाए तो नुकसान की भरपाई संभव नहीं रहती। यही कारण है कि मृत्यु के बाद शुरुआती 14 मिनट इस तकनीक की सफलता की कुंजी माने जा रहे हैं।

क्या यादों को भी सुरक्षित रखा जा सकेगा?

इस परियोजना की सबसे रोचक अवधारणा “कनेक्टोम” है। कनेक्टोम दिमाग के भीतर मौजूद अरबों न्यूरॉन्स और उनके बीच के कनेक्शनों का त्रि-आयामी नक्शा होता है।

कई वैज्ञानिकों का मानना है कि इंसान की यादें, अनुभव, व्यक्तित्व और सोच इसी जटिल नेटवर्क में संग्रहित रहते हैं। यदि इस नेटवर्क को पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सके तो सैद्धांतिक रूप से किसी व्यक्ति की मानसिक पहचान भी संरक्षित की जा सकती है।

हालांकि वैज्ञानिक स्पष्ट करते हैं कि फिलहाल किसी सुरक्षित दिमाग को पढ़ना, उसकी यादों को समझना या किसी व्यक्ति को दोबारा जीवित करना संभव नहीं है।

गंभीर मरीजों पर हो सकता है प्रयोग
नेक्टोम अब भविष्य में गंभीर और लाइलाज बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को यह सुविधा देने की योजना बना रहा है। अमेरिका के कुछ राज्यों में ऐसे कानून मौजूद हैं जो असाध्य रोगियों को चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु चुनने की अनुमति देते हैं।

योजना के अनुसार मरीज की मृत्यु की आधिकारिक पुष्टि के तुरंत बाद उसके दिमाग को संरक्षित करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसके लिए पहले से कानूनी अनुमति और शरीरदान संबंधी दस्तावेज पूरे करना अनिवार्य होगा।

वैज्ञानिक समुदाय में मतभेद

इस शोध को लेकर वैज्ञानिक जगत में उत्साह के साथ-साथ संदेह भी मौजूद है।
कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक दिमाग की संरचना को सुरक्षित रखने में तो सफल हो सकती है, लेकिन इससे किसी व्यक्ति को दोबारा जीवित करना संभव नहीं होगा। आलोचकों का तर्क है कि किसी व्यक्ति के दिमाग की संरचना की प्रतिकृति बनाना और वास्तविक व्यक्ति को वापस लाना दो अलग-अलग बातें हैं।
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवन केवल न्यूरॉन्स की वायरिंग नहीं है, बल्कि उसमें जैविक प्रक्रियाएं, चेतना और व्यवहार जैसे कई जटिल तत्व शामिल होते हैं, जिन्हें अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है।

क्या बदल जाएगी मौत की परिभाषा?

इस शोध ने मृत्यु की पारंपरिक मेडिकल परिभाषा पर भी सवाल खड़े किए हैं।
वर्तमान चिकित्सा मानकों के अनुसार रक्त प्रवाह और हृदय की धड़कन बंद होने के बाद व्यक्ति को मृत माना जाता है। लेकिन यदि मृत्यु के कुछ मिनट बाद तक दिमाग की संरचना सुरक्षित रखी जा सकती है, तो भविष्य में “मृत्यु” की परिभाषा पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह तकनीक चिकित्सा विज्ञान, जैव-नैतिकता और कानून के क्षेत्र में व्यापक बहस का विषय बन सकती है।

भविष्य की संभावनाएं

फिलहाल यह तकनीक केवल दिमाग की संरचना को सुरक्षित रखने तक सीमित है। किसी व्यक्ति की चेतना को पुनर्जीवित करना या उसे कंप्यूटर में स्थानांतरित करना अभी विज्ञान कथा जैसी अवधारणा है।

फिर भी वैज्ञानिक मानते हैं कि यह शोध मानव मस्तिष्क को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम है। भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और उन्नत न्यूरोसाइंस की मदद से ऐसी संभावनाओं पर और काम किया जा सकता है।

हालांकि एक बात स्पष्ट है कि मौत के बाद जीवन और चेतना को लेकर चल रही वैज्ञानिक खोजों में यह शोध एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।




सोशल मीडिया पर वायरल हुई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’, संस्थापक ने लगाया अकाउंट हैक होने का आरोप

'No access to any of our platforms': Cockroach Janta Party Instagram page hacked नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से तेजी से वायरल हो रही ‘कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)’ एक बार फिर चर्चा में है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने दावा किया है कि उनका इंस्टाग्राम अकाउंट, पार्टी पेज और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हैक कर लिए गए हैं।

शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए दिपके ने कहा कि यह उनकी ऑनलाइन मौजूदगी के खिलाफ चल रही एक व्यापक “कार्रवाई” का हिस्सा है। उन्होंने लिखा कि पार्टी का आधिकारिक इंस्टाग्राम पेज हैक हो गया है, उनका निजी इंस्टाग्राम अकाउंट भी प्रभावित हुआ है और ट्विटर अकाउंट को रोक दिया गया है।

दिपके ने अपने पोस्ट में लिखा,
“कॉकरोच जनता पार्टी पर कार्रवाई। इंस्टाग्राम पेज हैक। मेरा निजी इंस्टाग्राम हैक। ट्विटर अकाउंट रोक दिया गया। बैकअप अकाउंट भी हटा दिया गया।”
उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल उनकी टीम की किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच नहीं है। ऐसे में आगे आने वाली किसी भी पोस्ट को “कॉकरोच जनता पार्टी” का आधिकारिक बयान न माना जाए।

एक सप्ताह में बना सोशल मीडिया सेंसेशन

बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र और आम आदमी पार्टी के पूर्व सहयोगी अभिजीत दिपके ने यह व्यंग्यात्मक डिजिटल अभियान करीब एक सप्ताह पहले शुरू किया था। देखते ही देखते यह प्लेटफॉर्म युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पार्टी के इंस्टाग्राम अकाउंट पर फॉलोअर्स की संख्या 1.9 करोड़ के पार पहुंच गई थी। सोशल मीडिया पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से जुड़े मीम्स, ग्राफिक्स और व्यंग्यात्मक पोस्ट बड़ी संख्या में शेयर किए जा रहे थे।

कैसे शुरू हुआ विवाद?

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का ट्रेंड उस समय शुरू हुआ जब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा कथित तौर पर की गई टिप्पणियों को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई।

कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि फर्जी डिग्रियों के सहारे कानूनी पेशे में आने वाले लोगों पर टिप्पणी करते हुए “परजीवी” और “कॉकरोच” जैसे शब्दों का उपयोग किया गया था। हालांकि बाद में मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणियों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया और उनका संदर्भ केवल “फर्जी एवं नकली डिग्री” रखने वाले लोगों से था।

इसके बावजूद सोशल मीडिया पर इस बयान को लेकर व्यंग्य और मीम्स की बाढ़ आ गई। इसी दौरान अभिजीत दिपके ने “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम से डिजिटल अभियान शुरू किया।
युवाओं के मुद्दों को बनाया केंद्र
कॉकरोच जनता पार्टी की पोस्ट मुख्य रूप से बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं की समस्याओं पर आधारित थीं। इन विषयों को व्यंग्यात्मक चुनावी घोषणापत्र और राजनीतिक अभियान की शैली में प्रस्तुत किया गया।
दिपके ने इस आंदोलन को “आलसियों और बेरोजगारों की आवाज” बताया था।

जान से मारने की धमकियों का भी दावा

इससे पहले भी अभिजीत दिपके ने दावा किया था कि उन्हें व्हाट्सएप पर जान से मारने की धमकियां मिली थीं। उन्होंने कथित धमकी भरे संदेशों के स्क्रीनशॉट साझा करते हुए कहा था कि उनसे “कॉकरोच जनता पार्टी” अकाउंट बंद करने या किसी राजनीतिक दल में शामिल होने का दबाव बनाया जा रहा है।

फिलहाल सोशल मीडिया पर यह मामला तेजी से चर्चा में है। हालांकि अकाउंट हैकिंग और धमकियों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है।




पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान, 9 अप्रैल से शुरू होगी वोटिंग

नई दिल्ली। निर्वाचन आयोग (ECI) ने रविवार को पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों का पूरा कार्यक्रम घोषित कर दिया। दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने चुनाव कार्यक्रम की जानकारी दी।

आयोग के अनुसार पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव कराए जाएंगे। चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही इन राज्यों में आदर्श आचार संहिता भी लागू हो गई है।
पश्चिम बंगाल में दो चरणों में मतदान
निर्वाचन आयोग के अनुसार पश्चिम बंगाल में इस बार दो चरणों में मतदान होगा। पहले चरण के लिए 23 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे, जबकि दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को कराया जाएगा। पिछली बार 2021 के चुनाव में यहां आठ चरणों में मतदान हुआ था।

अन्य राज्यों में एक चरण में वोटिंग
असम, केरल और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान कराया जाएगा। वहीं तमिलनाडु में 23 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे।

4 मई को आएंगे नतीजे

आयोग के मुताबिक पांचों राज्यों में हुए मतदान की मतगणना 4 मई को की जाएगी और उसी दिन परिणाम घोषित किए जाएंगे।

17.4 करोड़ मतदाता करेंगे मतदान
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बताया कि इन पांचों राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में कुल 17.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यहां कुल 824 विधानसभा सीटों पर चुनाव होंगे।

उन्होंने बताया कि मतदान के लिए करीब 2.19 लाख मतदान केंद्र बनाए जाएंगे, जहां लगभग 25 लाख चुनाव अधिकारियों की तैनाती की जाएगी। प्रत्येक मतदान केंद्र पर औसतन 750 से 900 मतदाता होंगे।

मतदान केंद्रों पर मोबाइल ले जाने पर रोक

निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतदान केंद्र के भीतर मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति नहीं होगी। मतदाताओं को मोबाइल बाहर रखना होगा और मतदान के बाद उसे वापस ले सकेंगे।
इसके साथ ही आयोग ने बताया कि सभी मतदान केंद्रों पर तैनात पीठासीन अधिकारी हर दो घंटे में मतदान प्रतिशत की जानकारी अपलोड करेंगे, जबकि मतदान समाप्त होते ही अंतिम आंकड़े जारी कर दिए जाएंगे।

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इन पांचों राज्यों की विधानसभा का कार्यकाल मई में समाप्त हो रहा है, ऐसे में निर्धारित समय सीमा के भीतर चुनाव प्रक्रिया पूरी की जाएगी।




होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का बड़ा ऐलान, अमेरिका-इजरायल के जहाजों के लिए बंद, भारत को राहत

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बड़ा फैसला लिया है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) ने घोषणा की है कि यह जलमार्ग अब अमेरिका, इजरायल, यूरोप और उनके सहयोगी देशों के जहाजों के लिए पूरी तरह बंद रहेगा। हालांकि भारत और कुछ अन्य देशों के लिए यह फैसला राहत भरा माना जा रहा है।

Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने गुरुवार को ईरान के सरकारी प्रसारक Islamic Republic of Iran Broadcasting (IRIB) के माध्यम से यह ऐलान किया। IRGC ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि यदि United States, Israel, यूरोप या उनके समर्थक देशों का कोई भी जहाज इस जलमार्ग से गुजरने की कोशिश करता है तो उस पर हमला कर उसे नष्ट कर दिया जाएगा।
हालांकि इस घोषणा के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि India और China जैसे देशों के जहाजों पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा। इससे भारत के लिए तेल आपूर्ति जारी रहने की संभावना बनी हुई है, जिसे भारत के नजरिए से बड़ी राहत माना जा रहा है।
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और युद्धकालीन प्रावधानों के तहत Iran को Strait of Hormuz में आवागमन नियंत्रित करने का अधिकार है। उनका कहना है कि युद्ध की स्थिति में इस जलडमरूमध्य पर नियंत्रण रखना ईरान का अधिकार है।
यह घोषणा ऐसे समय आई है जब अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य कार्रवाई शुरू किए जाने के बाद क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंच गया है। इस स्थिति के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार Strait of Hormuz दुनिया के समुद्री तेल परिवहन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा वहन करता है। फारस की खाड़ी के देशों के लिए यह समुद्री मार्ग बेहद अहम है, क्योंकि यहीं से तेल और गैस की बड़ी खेप दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचती है। इसी मार्ग से Jebel Ali Port जैसे बड़े बंदरगाहों तक भी जहाजों की आवाजाही होती है।
समुद्री ट्रैकिंग वेबसाइटों के अनुसार कुवैत और दुबई के तट के पास सैकड़ों तेल टैंकर और मालवाहक जहाज फिलहाल लंगर डाले खड़े हैं। वहीं ईरान का बेड़ा भी Bandar Abbas Port के आसपास तैनात है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह नाकाबंदी लंबे समय तक जारी रहती है तो खाड़ी क्षेत्र के व्यापार और तेल-गैस आपूर्ति पर भारी दबाव पड़ सकता है। उल्लेखनीय है कि इतिहास में पहली बार वाणिज्यिक जहाजों के लिए इस तरह होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किया गया है। यहां तक कि 1980-88 के Iran–Iraq War के दौरान भी जहाजों की आवाजाही पूरी तरह बंद नहीं हुई थी।




MGNREGA पर कांग्रेस का आरोप: “अधिकार छीने जा रहे हैं”, ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’

A file image of Chairperson of Rachnatmak Congress leader Sandeep Dikshit.

कांग्रेस के नेता और चेयरपर्सन संदीप दीक्षित की एक फ़ाइल तस्वीर।
| फोटो क्रेडिट: पीटीआई

नई दिल्ली | 21 जनवरी 2026
कांग्रेस ने बुधवार को केंद्र सरकार पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) को कमजोर करने और मजदूरों के अधिकार छीनने का गंभीर आरोप लगाया। पार्टी ने दावा किया कि MGNREGA की जगह एक नया कानून VB-G RAM G लाया गया है, जिसका कांग्रेस लगातार विरोध कर रही है।

दीक्षित ने कहा—




Delhi News ।नितिन नबीन बने बीजेपी के 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष, पीएम मोदी बोले—“पार्टी मामलों में वही मेरे बॉस”

‘You are my boss, I am a worker’: PM Narendra Modi as Nitin Nabin takes charge as BJP chief; asks partymen to shun congress ‘failings’भारतीय जनता पार्टी को मंगलवार को नया नेतृत्व मिला। नितिन नबीन ने बीजेपी के 12वें और अब तक के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में पदभार संभाला। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें खुला समर्थन देते हुए कहा कि पार्टी के मामलों में नितिन नबीन ही उनके “बॉस” हैं और वह स्वयं एक कार्यकर्ता की भूमिका में हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा,
“लोग सोचते हैं कि नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं, 50 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बने और 25 वर्षों से सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। लेकिन इन सबसे ऊपर मेरी पहचान एक बीजेपी कार्यकर्ता की है। यही मेरा सबसे बड़ा गर्व है।”

संगठन, अनुशासन और आत्ममंथन पर जोर

अपने संबोधन में पीएम मोदी ने बीजेपी के निरंतर विस्तार और चुनावी सफलता का श्रेय संगठनात्मक मजबूती, अनुशासन और कार्यकर्ता संस्कृति को दिया। उन्होंने कांग्रेस के पतन की तुलना करते हुए कहा कि 1984 में 400 से अधिक लोकसभा सीटें और लगभग 50 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी आज 100 सीटें जीतने के लिए संघर्ष कर रही है।

मोदी ने कहा,
“कांग्रेस अपने पतन पर आत्मनिरीक्षण नहीं कर सकती, क्योंकि ऐसा करने से उस परिवार पर सवाल खड़े होंगे जिसने पार्टी को कब्ज़े में ले रखा है। परिवारवाद लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन है।”
उन्होंने बिना नाम लिए विपक्ष के उस आरोप का भी जवाब दिया, जिसमें चुनावी हार के लिए चुनाव आयोग और बीजेपी की मिलीभगत की बात कही जाती है, और इसे हार से बचने का बहाना करार दिया।

‘बीजेपी अलग सोच के साथ आगे बढ़ी’
प्रधानमंत्री ने 2002 के गुजरात विधानसभा चुनावों का ज़िक्र करते हुए कहा कि भारी जीत के बावजूद वह हारी हुई सीटों की समीक्षा के लिए बैठक कर रहे थे।

“बीजेपी शुरू से ही आत्ममंथन करने वाली पार्टी रही है। यही वजह है कि आज वह राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर तक शासन की पसंदीदा पार्टी बन चुकी है।”
उन्होंने हाल के विधानसभा और नगर निगम चुनावों में बीजेपी की “अभूतपूर्व स्ट्राइक रेट” का उल्लेख किया।
घुसपैठ, राष्ट्रीय सुरक्षा और ‘शहरी नक्सल’
पीएम मोदी ने अवैध घुसपैठ और जनसांख्यिकीय असंतुलन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि दुनिया के कई शक्तिशाली और समृद्ध देश भी घुसपैठियों के खिलाफ सख्त कदम उठा रहे हैं।

“कोई भी देश अवैध घुसपैठ को स्वीकार नहीं करता। भारत भी अपनी ज़मीन पर अवैध लोगों को बर्दाश्त नहीं कर सकता। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है।”
उन्होंने वोट-बैंक की राजनीति के लिए घुसपैठियों को संरक्षण देने वाली पार्टियों को बेनकाब करने की अपील की। साथ ही ‘शहरी नक्सलियों’ पर निशाना साधते हुए कहा कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साजिश रच रहे हैं, लेकिन देश में माओवाद अब अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है।

नए अध्यक्ष को ‘रिपोर्टिंग’
अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा कि वह अपने काम का हिसाब नए पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन को दे रहे हैं, जो उनकी “गोपनीय रिपोर्ट” तैयार करेंगे। इस टिप्पणी पर सभागार तालियों से गूंज उठा।

नितिन नबीन के नेतृत्व में बीजेपी संगठन को और मजबूत करने तथा आगामी राजनीतिक चुनौतियों से निपटने की रणनीति पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में नितिन नबीन ने संभाला भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद

नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संगठनात्मक इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया, जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की गरिमामयी उपस्थिति में पार्टी के नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नितिन नबीन ने औपचारिक रूप से पदभार ग्रहण किया। इस अवसर पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व, केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, सांसदों, वरिष्ठ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की बड़ी उपस्थिति रही। कार्यक्रम का माहौल उत्साह, अनुशासन और संगठनात्मक एकजुटता से भरा नजर आया।

पदभार ग्रहण समारोह को पार्टी की भावी राजनीतिक दिशा और संगठनात्मक रणनीति के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संबोधन में नितिन नबीन को बधाई देते हुए कहा कि भाजपा केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आंदोलन है। उन्होंने कहा—
“भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन है। यह संगठन विचार, संस्कार और सेवा की त्रिवेणी पर खड़ा है। नितिन नबीन जैसे समर्पित और ऊर्जावान कार्यकर्ता के हाथों में संगठन की कमान जाना, पार्टी के लिए एक सशक्त भविष्य का संकेत है।”

प्रधानमंत्री ने कार्यकर्ताओं से विकसित भारत के लक्ष्य को लेकर पूरी निष्ठा से काम करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्ष भाजपा के लिए केवल चुनावी नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा के निर्णायक वर्ष हैं। मोदी ने संगठन से अपेक्षा जताई कि वह समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक सरकार की योजनाओं और विचारधारा को पहुंचाए।

नवनिर्वाचित अध्यक्ष नितिन नबीन का पहला संदेश

पदभार ग्रहण करने के बाद अपने पहले संबोधन में  नितिन नबीन ने प्रधानमंत्री मोदी, पार्टी नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा—
“यह पद मेरे लिए सम्मान से अधिक एक बड़ी जिम्मेदारी है। भाजपा का प्रत्येक कार्यकर्ता मेरा परिवार है और संगठन को और मजबूत बनाना मेरी प्राथमिकता होगी।”
नितिन नबीन ने स्पष्ट किया कि पार्टी का फोकस संगठनात्मक विस्तार, युवाओं और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने तथा बूथ स्तर तक संगठन को सशक्त करने पर रहेगा। उन्होंने कहा कि भाजपा सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास के मंत्र के साथ आगे बढ़ती रहेगी।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने उद्बोधन में संगठनात्मक अनुशासन और चुनावी रणनीति पर जोर दिया। उन्होंने कहा—
“भाजपा का संगठन विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन है। इसकी ताकत उसकी विचारधारा और कार्यकर्ताओं की निष्ठा में है। नितिन नबीन के नेतृत्व में संगठन नई ऊंचाइयों को छुएगा।”
अमित शाह ने कहा कि पार्टी हर चुनाव को जनसेवा का अवसर मानकर लड़ती है और यही भाजपा को अन्य दलों से अलग बनाता है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि भाजपा ने हमेशा राष्ट्रहित को राजनीति से ऊपर रखा है। उन्होंने नवनिर्वाचित अध्यक्ष को शुभकामनाएं देते हुए कहा—
“संगठन की मजबूती ही मजबूत सरकार की नींव होती है। भाजपा का अनुशासित ढांचा उसकी सबसे बड़ी पूंजी है।”

पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता

  जे.पी. नड्डा ने कहा कि नितिन नबीन का संगठनात्मक अनुभव पार्टी को नई ऊर्जा देगा। उन्होंने कार्यकर्ताओं से एकजुट रहकर पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया।
इस अवसर पर कई मुख्यमंत्रियों, वरिष्ठ सांसदों और राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने भी अपने विचार रखे और नए अध्यक्ष को शुभकामनाएं दीं।

कार्यकर्ताओं में उत्साह
पदभार ग्रहण समारोह के दौरान कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह देखने को मिला। “मोदी है तो मुमकिन है” और “भाजपा जिंदाबाद” जैसे नारों से पूरा परिसर गूंज उठा। कार्यकर्ताओं ने इसे संगठनात्मक मजबूती और भविष्य की राजनीतिक लड़ाइयों के लिए संकल्प का अवसर बताया।

नितिन नबीन का भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में पदभार ग्रहण करना ऐसे समय में हुआ है, जब देश की राजनीति तेजी से बदल रही है और संगठन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन और शीर्ष नेतृत्व के सहयोग से नितिन नबीन के सामने पार्टी को और मजबूत करने, नई पीढ़ी को जोड़ने और विकसित भारत के लक्ष्य को संगठनात्मक स्तर पर साकार करने की बड़ी जिम्मेदारी है।

यह पदभार ग्रहण समारोह केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भाजपा के आगामी राजनीतिक और संगठनात्मक सफर की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।




छात्र आत्महत्याओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, उच्च शिक्षा संस्थानों को सुधार के लिए नौ निर्देश

नई दिल्ली। देश में छात्रों की आत्महत्याओं से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को नौ अहम निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने माना है कि उच्च शिक्षा के निजीकरण और तेज़ विस्तार के बावजूद गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है, जिसके चलते छात्र वित्तीय, सामाजिक, शैक्षणिक और सामाजिक अन्याय से जुड़ी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं।संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्रों की भलाई अब केवल नीतिगत मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। कोर्ट के नौ निर्देशों में से सात उच्च शिक्षा संस्थानों (HEI) में छात्र आत्महत्याओं से संबंधित रिकॉर्ड रखने, उनकी अनिवार्य रिपोर्टिंग और निगरानी प्रणाली विकसित करने से जुड़े हैं। अदालत का उद्देश्य है कि छात्र संकट के मामलों को छिपाया न जाए और समय रहते हस्तक्षेप किया जा सके।
फैकल्टी और प्रशासनिक रिक्तियों पर अदालत की चिंताकोर्ट के शेष दो निर्देशों में विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों में रजिस्ट्रार और वाइस-चांसलर जैसे शीर्ष पदों के साथ-साथ सभी खाली फैकल्टी पदों को तत्काल भरने के आदेश दिए गए हैं। अदालत ने साफ कहा कि बिना पर्याप्त शिक्षकों और मजबूत प्रशासनिक ढांचे के छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक गुणवत्ता को सुरक्षित नहीं किया जा सकता।देशभर में 50% तक खाली पद
ज़मीनी रिपोर्टिंग के अनुसार, देश के कई सरकारी विश्वविद्यालयों और HEI में 50 प्रतिशत तक फैकल्टी पद रिक्त हैं। यह स्थिति विशेष रूप से सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में चिंताजनक है, जहां सीमित संसाधनों में बड़ी छात्र आबादी को संभालना पड़ता है।मद्रास विश्वविद्यालय: एक केस स्टडी
तमिलनाडु का मद्रास विश्वविद्यालय इस संकट की एक अहम मिसाल है। राज्य, जो उच्च शिक्षा नामांकन और महिला शिक्षा में अग्रणी माना जाता है, वहीं इसका प्रमुख राज्य-प्रशासित विश्वविद्यालय आज गंभीर गिरावट का सामना कर रहा है। कभी गुणवत्तापूर्ण शोध और अकादमिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध रहा यह विश्वविद्यालय अब मुख्यतः संबद्ध कॉलेजों की परीक्षाएं आयोजित करने तक सीमित होता जा रहा है।पिछले एक दशक में विश्वविद्यालय में नई फैकल्टी नियुक्तियां लगभग ठप हैं और शिक्षण स्टाफ स्वीकृत पदों के आधे से भी कम रह गया है। दर्शनशास्त्र, वनस्पति विज्ञान और गणित जैसे विषयों में उन्नत अध्ययन केंद्र अपनी पूर्व प्रतिष्ठा खो चुके हैं। तमिलनाडु-केंद्रित मानविकी, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान शोध, जिससे राज्य सरकार नीतिगत लाभ उठा सकती थी, लगभग उपेक्षित हो गया है।
वाइस-चांसलर नियुक्ति में संवैधानिक उलझन
विश्वविद्यालयों में वाइस-चांसलर की नियुक्तियां राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकराव के कारण अटकी हुई हैं। राज्यपाल की शक्तियों से जुड़े राष्ट्रपति संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा पैदा की गई अस्पष्टता को दूर करना आवश्यक माना जा रहा है, ताकि प्रशासनिक रिक्तियों को शीघ्र भरा जा सके।भर्ती प्रक्रिया और गुणवत्ता की चुनौती
फैकल्टी पदों को भरने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है, जिसमें कम से कम छह महीने का समय और पर्याप्त बजटीय समर्थन चाहिए। इसमें केंद्र सरकार की सहायता महत्वपूर्ण हो सकती है। साथ ही, योग्य शिक्षकों की उपलब्धता, भ्रष्टाचार और राजनीतिक-वैचारिक नियुक्तियों जैसी समस्याएं भी गुणवत्ता को प्रभावित कर रही हैं।चार महीने की समयसीमा, पर स्पष्ट संदेश
हालांकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई चार महीने की समयसीमा को लागू करना व्यवहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन यह आदेश सार्वजनिक उच्च शिक्षा प्रणाली की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक स्पष्ट चेतावनी और आह्वान है। अदालत ने संकेत दिया है कि यदि देश को ‘विकसित भारत’ जैसे लक्ष्यों को गंभीरता से हासिल करना है, तो मजबूत, जवाबदेह और छात्र-केंद्रित सार्वजनिक उच्च शिक्षा व्यवस्था अनिवार्य है।