कांग्रेस की ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ से नई उम्मीदें, क्या लौट पाएगी 35 साल बाद ज़मीन?

बिहार में कांग्रेस को अपनी ज़मीन गँवाए और जनता दल के हाथों पराजित हुए 35 साल हो चुके हैं। 1990 के विधानसभा चुनावों के बाद से राज्य की राजनीति पर जनता दल (यूनाइटेड) और राष्ट्रीय जनता दल का दबदबा रहा। कांग्रेस तब से ज्यादातर भाजपा-विरोधी गठबंधनों में सहायक भूमिका तक सीमित रही है। 2020 में पार्टी ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ़ 19 जीत पाई, लगभग 27% स्ट्राइक रेट के साथ।

राहुल गांधी की पदयात्रा : नया उत्साह

इस बार कांग्रेस की उम्मीदें राहुल गांधी की ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ पर टिकी हैं, जो 1 सितंबर को संपन्न हुई।

14 दिनों में 25 ज़िलों और 110 विधानसभा क्षेत्रों की 1,300 किमी की पदयात्रा।

बड़ी रैलियों में कांग्रेस का झंडा राजद और अन्य सहयोगियों के साथ बराबरी से लहराता दिखा।

अंतिम रैली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, झामुमो प्रमुख हेमंत सोरेन, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत, वीआईपी के मुकेश साहनी और सीपीआई (एम-एल) के दीपांकर भट्टाचार्य जैसे नेता मौजूद रहे।

यहाँ तक कि तृणमूल कांग्रेस, जो अक्सर कांग्रेस से दूरी बनाए रखती है, ने भी सांसद यूसुफ पठान को भेजा। यह भारतीय ब्लॉक की एकजुटता का संकेत था।

भीड़ और कार्यकर्ताओं में नया जोश

यात्रा ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में वर्षों बाद ऊर्जा भरी।

भागलपुर के सुल्तानगंज में कांग्रेस झंडों की संख्या राजद से भी अधिक दिखी।

स्थानीय नेता ललन कुमार ने राहुल का स्वागत जेसीबी मशीन से पुष्पवर्षा कर किया, जो कार्यकर्ताओं में नए उत्साह का प्रतीक था।

ग्रामीण इलाकों से लेकर छोटे कस्बों तक बड़ी संख्या में महिलाएँ, छात्र और किसान भीड़ में नज़र आए।

भाषण और प्रतीकात्मकता

राहुल गांधी ने यात्रा का समापन एक तीखे भाषण से किया —

नारा दिया: “वोट चोर, गद्दी छोड़”।

मतदाताओं को चेताया कि वोट चोरी का मतलब आरक्षण, नौकरी और शिक्षा जैसे अधिकारों का हनन है।

महात्मा गांधी की हत्या के पीछे की ताकतों पर आरोप लगाया कि वही अब संविधान को नष्ट करना चाहती हैं।

तुलना की: “अगर कर्नाटक का मतदाता सूची विवाद एक परमाणु बम था, तो हाइड्रोजन बम अभी आना बाकी है।”

तेजस्वी यादव ने भी नीतीश सरकार की योजनाओं को “राजद की कॉपी-पेस्ट” बताया और कहा — “बिहार गणतंत्र की राजधानी है। गुजरात के दो लोग लोकतंत्र की हत्या करना चाहते हैं, लेकिन जनता उनकी चाल समझ रही है।” उनका सीधा इशारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की ओर था।

गठबंधन राजनीति की सीमाएँ

कांग्रेस को यह यात्रा दिखाई देने लायक जगह तो दे गई, पर चुनौतियाँ अभी बरकरार हैं —

पार्टी के पास राजद जैसा मजबूत जाति-आधारित वोट बैंक नहीं है।

संगठनात्मक कमजोरी और आंतरिक खींचतान अब भी बाधा हैं।

सवर्ण वोट पूरी तरह भाजपा के साथ खड़ा है।

ओबीसी और ईबीसी तबकों में कांग्रेस की पैठ सीमित है।

2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी ने नौ सीटों पर चुनाव लड़ा और तीन जीतीं — यह मामूली, पर सकारात्मक संकेत था।

निष्कर्ष : प्रतीक से नतीजों तक की चुनौती

‘मतदाता अधिकार यात्रा’ ने कांग्रेस को बिहार की राजनीति में फिर से चर्चा में ला खड़ा किया है।

कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है।

गठबंधन के भीतर पार्टी की स्थिति मजबूत हुई है।

मीडिया और गाँव की चाय की दुकानों तक में अब कांग्रेस पर बहस हो रही है।

लेकिन सवाल अब भी वही है — क्या यह प्रतीकात्मक ऊर्जा सीटों में तब्दील हो पाएगी?
बिहार की गठबंधन राजनीति में छोटे बदलाव भी चुनाव परिणाम बदल सकते हैं। कांग्रेस के लिए यह यात्रा सिर्फ़ एक मार्च नहीं, बल्कि खोई ज़मीन वापस पाने का असली इम्तिहान है।




निवास प्रमाण पत्र में ‘कुत्ता बाबू’ और ‘ट्रैक्टर परिवार’: बिहार में ई-गवर्नेंस की पोल खुली

पटना/मोतिहारी। बिहार में निवास प्रमाण पत्रों से जुड़ी फर्जीवाड़े की घटनाएं एक बार फिर ई-गवर्नेंस सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही हैं। ताज़ा मामला पूर्वी चंपारण के मोतिहारी से सामने आया है, जहाँ आवेदक ने खुद को ‘सोनालिका ट्रैक्टर’ बताते हुए, भोजपुरी अभिनेत्री मोनालिसा की तस्वीर लगाकर आवेदन किया। इससे एक दिन पहले ही पटना के मसौढ़ी में “कुत्ता बाबू” के नाम पर निवास प्रमाण पत्र जारी होने का मामला सामने आया था।

फर्जीवाड़े की दो परतें:

🔹 मोतिहारी (17 जुलाई):

आवेदक का नाम: सोनालिका ट्रैक्टर पिता का नाम: स्वराज ट्रैक्टर, माता का नाम: कार देवी
फोटो: भोजपुरी अभिनेत्री मोनालिसा थाना क्षेत्र: छौड़ादानो सत्यापन के बाद पाया गया कि आवेदन पूरी तरह फर्जी है।

🔹 पटना (मसौढ़ी, 15 जुलाई):

“कुत्ता बाबू” के नाम से जारी हुआ निवास प्रमाण पत्र। आवेदन दिल्ली निवासी महिला के आधार कार्ड से किया गया। एक राजस्व अधिकारी निलंबित, एक आईटी सहायक बर्खास्त। आवेदक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज।

प्रशासन में हड़कंप, कार्रवाई तेज मोतिहारी में साइबर सेल को जांच सौंपी गई है। कोटवा थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई। डीएम सौरव जोरवाल ने दोषियों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।पटना के डीएम त्यागराजन एस.एम. ने इसे “सरकार की छवि को जानबूझकर धूमिल करने की साजिश” करार दिया।

व्यवस्था पर सवाल:

दोनों ही मामलों ने बिहार के ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म और प्रमाण पत्र सत्यापन प्रणाली की कमजोरियों को उजागर किया है। अधिकारियों ने माना है कि: कई प्रमाणपत्र बिना फील्ड सत्यापन के जारी किए गए। सिस्टम में मानव हस्तक्षेप और निगरानी की कमी है। यह दुरुपयोग सिर्फ तकनीकी चूक नहीं, बल्कि सुनियोजित हरकत हो सकती है।

सरकार का रुख सख्त:

राज्य सरकार ने इन घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए: डिजिटल सुरक्षा प्रोटोकॉल की समीक्षा शुरू की है। सभी जिलों को सत्यापन प्रक्रिया में पारदर्शिता और कठोरता बरतने के निर्देश दिए गए हैं। दोषी अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

“कुत्ता बाबू” और “ट्रैक्टर परिवार” जैसे मामले केवल मज़ाक नहीं, बल्कि सिस्टम की साख पर गहरे आघात हैं। अगर अब भी प्रशासन नहीं चेता, तो कल को इसी फर्जी पहचान के ज़रिए बड़ी आपराधिक घटनाओं की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।”




चिराग पासवान की दोहरी रणनीति या गठबंधन धर्म? बिहार में बढ़ते अपराध पर एनडीए में उठे सवाल

'It is my responsibility...': Chirag Paswan explains his recent criticism of ally Nitish Kumar; predicts historic win for NDA
Chirag Paswan; Nitish Kumar

नई दिल्ली/पटना। बिहार में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर मतभेदों की आहट सुनाई देने लगी है। केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने सोमवार को एक बार फिर नीतीश सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि अपराध पर चुप रहना उनकी जिम्मेदारी से भागने जैसा होगा। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एनडीए एकजुट है और अगला चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा।

पासवान ने दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में कहा –

“एक सहयोगी के रूप में मेरी जिम्मेदारी है कि अगर सरकार में कोई खामी है, तो उस पर चर्चा होनी चाहिए ताकि सुधार हो सके।”

यह बयान उनके दो दिन पहले दिए गए उस विवादित वक्तव्य के बाद आया है जिसमें उन्होंने कहा था कि –

“मुझे शर्म महसूस हो रही है कि मैं उस सरकार का हिस्सा हूं जिसके शासन में बिहार में अपराध बेकाबू हो गया है।”

पासवान के इन बयानों ने एनडीए के भीतर असहजता पैदा की है, तो दूसरी ओर विपक्ष को एक और मौका भी दे दिया है।

विपक्ष का पलटवार: ‘यह सिर्फ़ दिखावा है’

राजद नेता प्रो. मनोज झा ने चिराग पासवान की आलोचना को “राजनीतिक स्टंट” करार देते हुए कहा –

“चिराग पासवान दोहरी बातें कर रहे हैं। एक ओर वे अपराध पर शर्मिंदा होने की बात करते हैं, दूसरी ओर फिर उसी नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा करते हैं। यह जनता को भ्रमित करने की कोशिश है।”

उन्होंने चिराग के प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से “घनिष्ठ संबंधों” की ओर इशारा करते हुए सवाल उठाया कि –

“क्या एक केंद्रीय मंत्री सिर्फ़ दिखावे के लिए सरकार पर सवाल उठा सकता है?”

राजनीतिक पृष्ठभूमि और संभावनाएं

बिहार में साल के अंत में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, और इससे पहले चिराग पासवान की यह स्थिति भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से लाभदायक भी हो सकती है। वे नीतीश कुमार पर लोकल विपक्षी दबाव के रूप में काम कर रहे हैं, जबकि एनडीए की एकता का चेहरा भी बने हुए हैं।

गठबंधन धर्म बनाम राजनीतिक स्वायत्तता

चिराग पासवान का यह रवैया भारतीय गठबंधन राजनीति की एक पुरानी रणनीति को दर्शाता है – “एक पैर भीतर, एक बाहर।”
वे एक ओर जनता के बीच अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखना चाहते हैं, तो दूसरी ओर एनडीए के प्रति वफादारी दिखाकर सत्ता-साझेदारी भी सुनिश्चित करना चाहते हैं।




बिहार: मसौढ़ी में कुत्ते के नाम पर बना आवासीय प्रमाण पत्र, प्रशासन में हड़कंप!

पटना / मसौढ़ी।
बिहार में चल रहे गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान के बीच पटना जिले के मसौढ़ी प्रखंड से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे प्रशासन को शर्मसार कर दिया है। यहां के अंचल कार्यालय ने एक कुत्ते के नाम पर आवासीय प्रमाण पत्र जारी कर दिया। यह प्रमाण पत्र जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो जिले के प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया।

आरटीपीएस पोर्टल से 24 जुलाई को जारी किए गए इस निवास प्रमाण पत्र की संख्या BRC/CO/2025/15933581 है। इसमें आवेदक का नाम लिखा है: “डॉग बाबू”, पिता का नाम: “कुत्ता बाबू”, माता का नाम: “कुटिया देवी” और पता: काउलीचक, वार्ड 15, मसौढ़ी। प्रमाण पत्र पर एक कुत्ते की तस्वीर भी चस्पा है और इस पर राजस्व पदाधिकारी मुरारी चौहान का डिजिटल हस्ताक्षर भी मौजूद था।

प्रमाण पत्र वायरल, प्रशासन की खुली नींद

यह प्रमाण पत्र जब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, तो अधिकारियों की नींद खुली। रविवार शाम को इस प्रमाण पत्र को तुरंत आरटीपीएस पोर्टल से हटाया गया और रद्द कर दिया गया। साथ ही संबंधित डिजिटल हस्ताक्षर भी हटा दिए गए।

प्रशासन ने मानी गलती, होगी कार्रवाई

मसौढ़ी के अंचलाधिकारी प्रभात रंजन ने इस प्रमाण पत्र को रद्द करने की पुष्टि की है। वहीं पटना जिलाधिकारी डॉ. त्यागराजन एसएम ने मामले को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट किया है कि दोषी कर्मचारियों और अधिकारियों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में ऐसी कोई गलती दोहराई न जाए।

प्रणाली की खामियां उजागर

यह घटना उस समय सामने आई है जब सीमांचल के जिलों में आवासीय प्रमाण पत्रों को लेकर विशेष जांच के आदेश दिए गए हैं। मतदाता सूची के सत्यापन के लिए प्रमाणपत्रों की वैधता अत्यंत महत्वपूर्ण है, और इस तरह की लापरवाही पूरी प्रक्रिया को संदिग्ध बना सकती है।

प्रश्न उठते हैं…

क्या आरटीपीएस प्रणाली में बग है या यह कर्मचारियों की लापरवाही का नतीजा है?

किसने यह ‘फर्जी आवेदन’ डाला और किस स्तर पर बिना जांच के प्रमाण पत्र जारी हो गया?

क्या यह किसी तरह की साइबर शरारत है या प्रशासनिक भ्रष्टाचार का नमूना?

यह घटना प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है, विशेषकर उस समय जब राज्य चुनाव आयोग मतदाता सूची की शुद्धता के लिए अभियान चला रहा है।




Denvapost Exclusive : बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण: संशय और संवैधानिकता के बीच लोकतंत्र की परीक्षा

बिहार में विधानसभा चुनावों से कुछ ही महीने पहले मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया है, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र की जड़ों तक पहुँचने वाला संवेदनशील विषय बन गया है। सुप्रीम कोर्ट इस पर 28 जुलाई को सुनवाई करने जा रहा है, और यह केवल तकनीकी या प्रक्रिया संबंधी मुद्दा नहीं, बल्कि “लोकतांत्रिक अधिकार बनाम प्रशासकीय सुधार” का मामला बन चुका है।

भारतीय चुनाव आयोग ने दावा किया है कि यह प्रक्रिया पूर्णत: संवैधानिक, समावेशी और आवश्यक है। आयोग के अनुसार, अब तक बिहार के लगभग 95% मतदाताओं को कवर किया जा चुका है, और अंतिम नामावली जारी होने से पहले सभी को दावा और आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त अवसर मिलेगा। आयोग का यह भी कहना है कि वह मृत, स्थानांतरित और बहु-पंजीकृत नामों को हटाने के साथ-साथ वास्तविक मतदाताओं को सूची में बनाए रखने हेतु ज़मीनी स्तर पर काम कर रहा है।

लेकिन यह आधिकारिक तर्क जितना तकनीकी लगता है, उतना ही यथार्थ से कटे हुए सामाजिक प्रश्न भी उठ खड़े हुए हैं। याचिकाकर्ताओं — जिनमें एडीआर जैसी विश्वसनीय संस्थाएं शामिल हैं — ने सवाल उठाया है कि इस प्रक्रिया में जो दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, वे गरीबों, प्रवासी मजदूरों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए न केवल असुविधाजनक बल्कि मतदाता अधिकार से वंचित करने वाले साबित हो सकते हैं। नागरिकता प्रमाण में माता-पिता के दस्तावेज़ की मांग न केवल संविधान के अनुच्छेद 326 की भावना के विरुद्ध है, बल्कि यह समानता और समावेशिता के सिद्धांतों पर चोट है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि मतदाता सूची की शुद्धता अनिवार्य है — एक मतदाता, एक मत, एक स्थान — यही लोकतांत्रिक मर्यादा की नींव है। लेकिन इस शुद्धता के नाम पर यदि हजारों-लाखों वास्तविक मतदाताओं को तकनीकी आधार पर सूची से बाहर कर दिया जाए, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को नुकसान पहुंचाने जैसा होगा।

चुनाव आयोग का यह कहना कि प्रक्रिया की आलोचना मीडिया लेखों पर आधारित है और इसलिए इसे ‘गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए’, लोकतंत्र में जन संवाद और सिविल सोसाइटी की भूमिका को कमतर आंकना है। जब देश की सबसे बड़ी अदालत में मामला विचाराधीन है, तो यह मान लेना कि “सब कुछ ठीक है” एक पूर्वग्रह की स्थिति उत्पन्न करता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने आधार, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को पहचान के प्रमाण के तौर पर स्वीकारने पर विचार करने को कहा, तो यह एक प्रकार से संकेत था कि सहूलियत और व्यावहारिकता को प्रक्रियात्मक कठोरता पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

निष्कर्ष : बिहार में मतदाता सूची की गहन समीक्षा, यदि पारदर्शिता, न्याय और समावेशन की भावना से संचालित हो, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करने वाली प्रक्रिया बन सकती है। लेकिन अगर यह डर, दस्तावेज़ों और अपारदर्शिता से ग्रस्त रही, तो यह उन लाखों भारतीयों को मौन करने का औजार बन जाएगी, जिनकी आवाज़ ही लोकतंत्र की असली पहचान है।

28 जुलाई की सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से केवल कानूनी दिशा नहीं, बल्कि भारत में मतदाता अधिकारों की सामाजिक परिभाषा भी तय होने जा रही है।

संपादकीय टीम | denvapost




Patna News : खान सर क्या गिरफ्तार हो गए या पुलिस हिरासत में हैं? यहां जानिए सभी जवाब

Khan Sir Arrested Or Detained: खान सर वैसे तो हमेशा ही चर्चा में रहते हैं, लेकिन इस बार मामला गंभीर हो चला है। खान सर की टीम की तरफ से दावा किया जा रहा है कि खान सर को गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं पटना पुलिस का कहना है कि उन्हें न तो हिरासत में लिया गया है और न ही गिरफ्तार किया गया है। दरअसल, हुआ ये कि बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की 70वीं संयुक्त प्राथमिक परीक्षा में नॉर्मलाइजेशन को लेकर छात्रों के विरोध-प्रदर्शन को खान सर ने समर्थन दे दिया और खुद धरना स्थल पर पहुंच गए। बीपीएससी के अभ्यर्थियों ने पटना में बीपीएससी कार्यालय के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया।अभ्यर्थियों ने शहर में बेली रोड को भी जाम कर दिया। इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों को तितर-बितर करने और व्यवस्था बहाल करने के लिए लाठीचार्ज किया। इसके बाद खान सर की टीम की तरफ से पहले बताया गया कि उन्हें हिरासत में लिया गया है। बाद में कहा गया कि गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके बाद काफी संख्या में अभ्यर्थी गर्दनीबाग थाने पहुंच गए। बाद में, रात के समय पुलिस अपनी जीप में खान सर को कहीं ले जाती दिखी।

पटना पुलिस का बयान

पटना के एसएसपी राजीव मिश्रा ने जोर देकर कहा कि खान सर को गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया गया था और उन्हें बार-बार पुलिस स्टेशन छोड़ने के लिए कहा गया था, लेकिन वह जाने के लिए तैयार नहीं थे। वह पुलिस स्टेशन भी खुद ही आए थे। खान सर उन छात्रों के लिए पुलिस स्टेशन पहुंचे थे, जिन्हें पुलिस ने हिरासत में लिया था। वहीं बिहार लोक सेवा आयोग ने परीक्षा में सामान्यीकरण के बारे में अफवाहों को किसी भी सच्चाई से इनकार किया, उन्हें निराधार बताया।

कौन हैं खान सर

खान सर पटना में कोचिंग क्लास चलाते हैं। दिल्ली में भी इन्होंने कुछ समय कोचिंग सेंटर खोला है। वे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं। ये कभी अपना असली नाम किसी को नहीं बताते। हर पब्लिक फोरम पर जब उनसे नाम पूछा जाता है तो वो कहते हैं कि कोई मेरा नाम अमित सिंह बताता है तो कोई फैजल खान। नाम न बताने के पीछे की वजह वो बताते हैं कि वो जाति और धर्म से खुद को नहीं जोड़ना चाहते, इसलिए नाम नहीं बताते। खान सर का जन्म दिसंबर 1993 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में हुआ। केबीसी में भाग लेते हुए उन्होंने अमिताभ बच्चन को बताया था कि वो स्कूल में सबसे कमजोर छात्रों में से एक थे। कारण ये था कि शिक्षक सभी छात्रों को अपने लेवल पर ले जाकर पढ़ाते थे। इसके चलते उन्हें कुछ समझ नहीं आता था। बाद में कॉलेज के समय उन्हें पढ़ने में रुचि पैदा हुई तो वे खूब पढ़े।

शिक्षक कैसे बने

शिक्षक कैसे बने सवाल पर खान सर ने अमिताभ बच्चन को बताया कि वो आर्मी में जाना चाहते थे, लेकिन हाथ से मेडिकली फिट नहीं होने के कारण उनका सलेक्शन नहीं हुआ। खुद के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते समय उनके दोस्तों को जब कुछ समझ नहीं आता था। तो वे उन्हें समझाते थे। इस पर दोस्त कहते थे कि भाई तुम बहुत बढ़िया पढ़ाते हो। फिर आसपास के छात्र पढ़ने आने लगे और फिर वो एक कोचिंग सेंटर में नौकरी करने लगे। वहां उन्होंने फीस ज्यादा देखी तो सोचा कि गरीब बच्चे कैसे इतनी फीस भर पाएंगे तो उन्होंने खुद की कोचिंग सेंटर खोल ली और आज स्थिति ये है कि उन्हें कोचिंग सेंटर में माइक लेकर क्लास लेनी पड़ती है। कारण बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उनके यहां पढ़ने आते हैं।

सोशल मीडिया पर कैसे हुए हिट

सोशल मीडिया पर फैन फॉलोइंग को लेकर कपिल शर्मा के शो में खान सर ने बताया था। कि कोविड के समय कोचिंग क्लास बंद हो गए थे। वो भी अपने गांव चले गए थे। सोच नहीं पा रहे थे कि अब आगे क्या करना है। उस वक्त लग ही नहीं रहा था कि स्थिति नॉर्मल हो पाएगी।फिर यू ट्यूब पर अपनी ऑनलाइन क्लास डालने लगे। यहीं से मोबाइल ऐप से लेकर अन्य तरह से कोचिंग के काम भी शुरू हो गए। अब ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से वो कोचिंग चलाते हैं। इसी शो में अर्चना पूरण सिंह ने भी बताया था कि वो भी उनकी क्लास यू ट्यूब पर देखती हैं। अर्चना की तरह की गांव, कस्बों और शहरों के लोग भी खान सर के वीडियो देखते हैं। भले ही उन्हें कोई परीक्षा न देनी हो।

एक बार तो कोचिंग पर बम भी चला था

खान सर बेबाक हैं। यही कारण है कि कई बार वो अपनी जिंदगी के उन किस्सों को साझा कर देते हैं, जिन्हें आमतौर पर लोग याद नहीं रखना चाहते। एक बार खान सर ने बताया था कि पटना वाले कोचिंग पर कुछ लोग बम फेंक दिया था। एक बम तो ठीक उनके सामने आकर गिरा था, लेकिन वो फटा नहीं तो बच गए। हालांकि, उनके एक स्टूडेंट की नई स्कूटी बम से बर्बाद हो गई। खान सर ने बताया था कि चूकि वो सस्ते में कोचिंग देते हैं, इसलिए अन्य कोचिंग वालों ने उनपर बम फेंकवाया था।




Patna News : EMI नहीं भर पाने वालों को हाईकोर्ट ने दी बड़ी राहत, बैंकों और फाइनेंस कंपनियों को लगाई कड़ी फटकार

High Court:  आज के समय हर किसी को लोन की जरूरत पड़ती है। यह लोन पर्सनल या होम लोन या व्हीकल लोन हो सकता है। लोन लेने के बाद उसे चुकाने के लिए किस्त (EMI) भी देनी पड़ती है। लेकिन, कई बार ऐसी स्थिति आ जाती है कि आर्थिक हालात खराब हो जाते हैं और किस्त देने के लिए जेब खाली हो जाती है। ऐसे में फिर परेशानी शुरू होती है। कई बार तो मुश्किल बड़ी हो जाती है। इसी संबंध में हाईकोर्ट की ओर से महत्वपूर्ण फैसला दिया है। जिससे लोन नहीं भर पाने वालों को बड़ी राहत मिलेगी।

आजकल टु व्हीलर या कार खरीदना ज्यादा मुश्किल नहीं रहा हैं। यह आसान इसलिए हो गया हैं क्योंकि लगभग हर बैंक और एनबीएफसी आकर्षक फाइनेंस स्कीम ऑफर करते हैं और लोन लेकर गाड़ी को आसानी से खरीदा जा सकता है। इसके चलते बड़ी संख्या में लोग गाड़ियों को लोन पर लेने लगे हैं। लेकिन हर चीज का फायदा होने के साथ नुक्सान (patna high court) भी होते हैं। नुक्सान यह हैं कि कई बार यही आसान किस्तें महंगी भी पड़ जाती हैं। जीवन में कई बार ऐसे भी हालात आते हैं जब लोग इन EMI का बोझ नहीं उठा पाते और ये ड्यू हो जाती हैं।

जिसके बाद फाइनेंस कंपनियों (Car loan emi) द्वारा रिकवरी एजेंटों के फोन कॉल्स का दौर और धमकियां भेज दी जाती हैं। साथ ही कई बार रास्ते में गाड़ी रोककर आपसे ले भी ली जाती है। इसी के चलते पटना हाईकोर्ट ने उन बैंकों और फाइनेंस कंपनियों को जमकर फटकार लगाई है, जो कार लोन की ईएमआई (loan EMI) समय पर नहीं चुका पाने वाले ग्राहकों के वाहनों को जबरन जब्त करने के लिए रिकवरी एजेंटों की सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। उच्च न्यायालय ने दोषी बैंकों और वित्त कंपनियों में से हर एक पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।

न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद ने अपने फैसले में साफ बता दिया हैं कि रिकवरी एजेंटों द्वारा वाहनों की जब्ती अवैध है। 19 मई को लिए गए एक (car loan recovery) फैसले में कहा कि रिकवरी एजेंटों का व्यवहार जीवन और आजीविका के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

एक केस को निपटाते हुए, न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा कि यदि ग्राहक ईएमआई के भुगतान में चूक करता है तो बैंक और वित्त कंपनियां वाहन को जब्त करने के लिए रिकवरी एजेंटों की सेवाओं का इस्तेमाल (What happens if car EMI bounces) नहीं कर सकती हैं। बल्कि उन्हें इस चीज के लिए अन्य रास्ते अपनाने चाहिए जैसे कि उन्होंने पुलिस को ऐसे वसूली एजेंटों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

बता दें कि उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा हैं कि व्हीकल लोन (वाहन ऋण) सिर्फ बैंकों और वित्त कंपनियों द्वारा सेक्युरिटीजेशन (प्रतिभूतिकरण) के प्रावधानों का पालन करके वसूल किया जाना चाहिए। जो बैंकों और वित्त कंपनियों को चूक करने वाले ग्राहक की गिरवी रखी गई (Car loan emi bounce india) संपत्ति का भौतिक कब्जा हासिल करके वापस नहीं किए गए लोन की वसूली करने का अधिकार देता है। लेकिन धमकी या गाडी बीच में रोकने का अधिकार नहीं हैं। 

उच्च न्यायालय का फैसला ईएमआई (Car loan emi bounce calculator) के भुगतान में चूक करने वाले ग्राहकों के वाहनों को जबरन जब्त करने पर पांच रिट याचिकाओं का निस्तारण करते हुए आया।




तेजस्वी के बाद निशाने पर आए चिराग, प्रशांत किशोर ने मनोज भारती को नेता बनाकर चला दलित कार्ड

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में जन सुराज पार्टी नाम से एक और दल मैदान में आ गया है। चुनाव रणनीतिकार से पदयात्री बने प्रशांत किशोर द्वारा रची-बुनी गई इस पार्टी का पहला नेता और कार्यकारी अध्यक्ष मधुबनी के मनोज भारती को बनाया गया है जो भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अफसर हैं। दलित समुदाय के मनोज भारती को जन सुराज पार्टी का नेता बनाकर प्रशांत ने संकेत दे दिया है कि लालू यादव, तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार के बाद उनका अगला टारगेट चिराग पासवान हैं जो राज्य में दलितों के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं। प्रशांत की पार्टी 2025 में असेंबली चुनाव के फाइनल से पहले नवंबर में विधानसभा की चार सीटों के उप-चुनाव में सेमीफाइल लड़ेगी और पीके के मुताबिक बाकी पार्टियों को दिखाएगी कि कैसे लड़ा और जीता जाता है।
महागठबंधन सरकार के दौरान नीतीश कुमार की सरकार द्वारा कराए गए जाति सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 36.01 परसेंट अति पिछड़ा, 27.12 फीसदी अन्य पिछड़ा, 19.65 परसेंट दलित, 15.52 फीसदी सवर्ण और 1.68 परसेंट आदिवासी हैं। रामविलास पासवान के जमाने से दलितों के एक बड़े तबके का वोट उनके परिवार के साथ रहा है। वोटिंग पैटर्न और मिले वोट की व्याख्या के आधार पर माना जाता रहा है कि चिराग पासवान के साथ 6 परसेंट वोट है जो वो अपने साथ लेकर चलते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में 5 सीट लड़ी चिराग की पार्टी लोजपा-रामविलास को 6.47 परसेंट वोट मिला है। 2020 में जब चिराग की पुरानी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) अकेले ही लड़ गई थी तब 135 सीटों के चुनाव में ही उसे 5.66 फीसदी वोट मिल गया था।
प्रशांत किशोर की दो साल से चल रही पदयात्रा में मुसलमान तबके के अंदर जन सुराज को लेकर दिलचस्पी दिखी है। दो साल से जन सुराज के बैनर-पोस्टर पर सिर्फ महात्मा गांधी और चरखा को लेकर चल रहे प्रशांत किशोर ने पार्टी की स्थापना के मौके पर कहा कि जन सुराज पार्टी के झंडे में महात्मा गांधी और भीमराव आंबेडकर की फोटो के इस्तेमाल के लिए वो चुनाव आयोग से आग्रह करेंगे। दो साल महात्मा गांधी और चरखा लेकर घूमने के बाद प्रशांत किशोर को समझ आ गया है कि 2025 में जीत हासिल करने के लिए दलितों का साथ बहुत जरूरी है।
मनोज भारती को जन सुराज पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाना और झंडे में आंबेडकर को गांधी के साथ बिठाने की योजना राज्य के 19 परसेंट से ज्यादा दलित वोटरों को अपनी ओर खींचने की एक रणनीति है। अनुसूचित जाति के आरक्षण में क्रीमी लेयर को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सहयोगी चिराग पासवान और जीतनराम मांझी फायदे पर झगड़ रहे हैं। चिराग एससी आरक्षण को भेदभाव और छुआछूत से जोड़कर देख रहे हैं तो मांझी ये गिना रहे हैं कि 70 साल से एससी की चार जाति ही आरक्षण की मलाई खा रही है।
इससे ये साफ है कि बिहार में दलितों के बीच विधानसभा चुनाव में तालमेल बिगड़ेगा। दलितों की राजनीति में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आई इस आपदा को दलित को नेता और झंडे में आंबेडकर की फोटो लगाकर प्रशांत अवसर में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें पीके या मार्च तक के लिए कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए मनोज भारती को कितनी कामयाबी मिलती है, उसका नमूना नवंबर में संभावित विधानसभा उप-चुनाव से मिल जाएगा।



बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले होगा कैबिनेट विस्तार? नीतीश से आवास पर जाकर मिले जेपी नड्डा

Nitish Cabinet Expansion: बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कैबिनेट का विस्तार हो सकता है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने अपने दो दिवसीय बिहार दौरे के दौरान शुक्रवार को पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आवास पर जाकर उनसे मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच करीब 45 मिनट तक बातचीत हुई। इस दौरान राज्य में मंत्रिमंडल में नए मंत्री बनाए जाने को लेकर भी चर्चा की गई। सूत्रों के मुताबिक निकट भविष्य में बिहार में मंत्रिमंडल का विस्तार हो सकता है। राज्य में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। इससे पहले एक बार कैबिनेट विस्तार किया जा सकता है।

जानकारी के मुताबिक बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा शुक्रवार को पटना एयरपोर्ट से सीधे सीएम नीतीश कुमार के सरकारी आवास पर पहुंचे। दोनों नेताओं के बीच बिहार में स्वास्थ्य के क्षेत्र में चल रही योजनाओं को लेकर विमर्श हुआ। साथ ही आने वाले दिनों में होने वाले उपचुनाव को लेकर भी दोनों में बातचीत हुई। इसके अलावा कैबिनेट विस्तार पर चर्चा की गई। इस दौरान दोनों डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी एवं विजय कुमार सिन्हा के अलावा जल संसाधन मंत्री विजय चौधरी, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल और स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय भी मौजूद रहे।

बता दें कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इसी साल महागठबंधन छोड़कर एनडीए में आने के बाद बिहार में सत्ता परिवर्तन हुआ था। फरवरी महीने में नए सिरे से सरकार का गठन किया गया था। इसके बाद मार्च महीने में मंत्रिपरिषद का विस्तार कर 21 नेताओं को मंत्री बनाया गया था। फिलहाल राज्य मंत्रिपरिषद में बीजेपी, जेडीयू और हम (हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा) के कोटे से कुल 30 सदस्य हैं। इनमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और दोनों डिप्टी सीएम भी शामिल हैं।

राज्य मंत्रिपरिषद की अधिकतम सीमा 36 है। यानी कि अभी 6 और मंत्री बनाए जा सकते हैं। बिहार में विधानसभा चुनाव होने में अभी एक साल से भी ज्यादा का समय बचा हुआ है। इससे पहले एक कैबिनेट विस्तार की चर्चा तेज हो गई है। कुछ नए मंत्री बनाकर बीजेपी और जेडीयू चुनाव से पहले विभिन्न वर्गों को साधने की कोशिश कर सकती है।




Bharat Bandh LIVE: बिहार में हाईवे जाम, रेल रोकी, पटना में लाठीचार्ज

पटना में डाकबंगला चौक पर जुटे भारत बंद के समर्थक और सामने से रास्ता रोके पुलिस

एससी-एसटी आरक्षण में सब कोटा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ आहूत भारत बंद का बिहार में सड़क परिवहन पर गहरा असर देखने को मिल रहा है। पटना, पूर्णिया, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, दरभंगा, समस्तीपुर, हाजीपुर, वैशाली, बक्सर, औरंगाबाद, जहानाबाद, मोतिहारी समेत कई जिलों में जगह-जगह नेशनल और स्टेट हाईवे जाम करने की खबर है। कुछ जगहों पर तो बंद समर्थक हाईवे पर ही टेंट लगाकर धरना और भाषण दे रहे हैं। मोतिहारी, दरभंगा, बक्सर, आरा समेत कुछ जगहों पर ट्रेन भी रोकी गई है। कई जिलों में स्कूल एहतियातन बंद रखे गए हैं। बाजार कई जगह बंद हैं, कई जगह खुले हैं। ये इस बात पर निर्भर है कि बंद समर्थकों ने बाजार का रुख किया या सड़क का। पटना में डाकबंगला चौक पर प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज हो गया है जिस दौरान पटना के एसडीओ के भी पिटने की खबर है।

बंद को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के दो सहयोगी दलों के केंद्रीय मंत्री ही आमने-सामने हैं जिससे बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की गांठ खुल गई है। लोजपा-रामविलास के अध्यक्ष चिराग पासवान जहां बंद के समर्थन में हैं वहीं हम नेता जीतनराम मांझी इसके खिलाफ हैं। जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने पहले ही कहा था कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महादलित और अति पिछड़ी जाति का आरक्षण अलग करने जैसे कदम पहले ही उठाए हैं। बंद को तेजस्वी यादव की राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने नैतिक समर्थन दिया है। मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) बंद में सक्रिय है। कई जगह बसपा कार्यकर्ता पार्टी का झंडा लेकर सड़कों पर दिख रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण में उन जातियों को आरक्षण का लाभ देने की व्यवस्था करने कहा है जिन्हें इसका बहुत लाभ नहीं मिल पा रहा है। फैसले के समर्थक कह रहे हैं कि कोटा का फायदा कुछ जातियों को ज्यादा मिल रहा है। जीतनराम मांझी कहते हैं कि सिर्फ चार जाति जो 5 परसेंट हैं, सारा फायदा उठा रही हैं जबकि 10 परसेंट बाकी दलितों को गिने-चुने मौके ही मिले हैं। चिराग पासवान जैसे नेता जो फैसले का विरोध कर रहे हैं वो हाल में दलित आईपीएस की बारात पुलिस सुरक्षा में निकालने का हवाला देकर कह रहे हैं कि एससी-एसटी को आरक्षण आर्थिक नहीं छुआछूत के आधार पर मिला है जो आज भी जारी है।