
नर्मदापुरम। जिले में सूचना का अधिकार (RTI) कानून की खुलेआम अनदेखी का मामला सामने आया है। सरकारी कार्यालयों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए आरटीआई कानून को कई लोक सूचना अधिकारी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। ताजा मामले में जानकारी छिपाने और आयोग के नोटिसों की अवहेलना करने पर मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग ने कड़ा रुख अपनाते हुए ग्राम पंचायत महेन्द्रबाड़ी के लोक सूचना अधिकारी एवं सचिव ओमप्रकाश यादव पर 25 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया है
आयोग के पत्र लेने से भी किया इंकार
हैरानी की बात यह रही कि लोक सूचना अधिकारी ने आयोग द्वारा भेजे गए पत्र लेने से भी इंकार कर दिया। इतना ही नहीं, आयोग की सुनवाई में भी उपस्थित नहीं हुए और न ही कारण बताओ नोटिस का कोई जवाब दिया।
इस पर सख्ती दिखाते हुए सूचना आयुक्त डॉ. वंदना गांधी ने प्रकरण क्रमांक ए-158/एसआईसी/नर्मदापुरम/2025 में 26 फरवरी 2026 को आदेश पारित करते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20(1) के तहत 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। आयोग ने निर्देश दिए हैं कि जुर्माने की राशि एक माह के भीतर जमा कर रसीद प्रस्तुत की जाए, अन्यथा नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
निर्माण कार्यों की जानकारी मांगी थी
मामले के अनुसार आवेदक विनोद केवट ने 5 अगस्त 2024 को ग्राम पंचायत महेन्द्रबाड़ी में आरटीआई आवेदन देकर पंचायत में हुए निर्माण कार्यों की जानकारी मांगी थी। लेकिन लोक सूचना अधिकारी ने निर्धारित समय सीमा में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई।
इसके बाद आवेदक ने जनपद पंचायत माखननगर में प्रथम अपील दायर की, लेकिन वहां भी मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया। अंततः आवेदक को न्याय के लिए मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
तीन-तीन नोटिस, फिर भी नहीं पहुंचे अधिकारी
आयोग ने लोक सूचना अधिकारी को सुनवाई के लिए 24 सितंबर 2025, 2 दिसंबर 2025 और 16 जनवरी 2026 को नोटिस जारी किए। लेकिन अधिकारी ने नोटिस लेने से ही इंकार कर दिया।
कार्रवाई से बचने की कोशिश भी नाकाम
सूचना आयोग के आदेश में उल्लेख है कि लोक सूचना अधिकारी ने बाद में आवेदक को डाक से अपूर्ण जानकारी भेजकर कार्रवाई से बचने की कोशिश की, लेकिन आयोग के समक्ष कोई संतोषजनक जवाब प्रस्तुत नहीं किया।
आरटीआई व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
इस घटना ने जिले में आरटीआई कानून के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि लोक सूचना अधिकारी ही आयोग के आदेशों को नजरअंदाज कर रहे हैं, तो आम नागरिकों को सूचना देने की व्यवस्था कितनी पारदर्शी और जवाबदेह है, यह बड़ा प्रश्न बन गया है।
आयोग का यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि सूचना छिपाने और कानून की अवहेलना करने वाले अधिकारियों को अब जवाब देना ही होगा।