रेशम केंद्र घोटाला: फील्डमेन ने क्वार्टर ठेकेदार को किराए पर दिए।

government-quarters

औद्योगिक क्षेत्र मुहासा में शासकीय लापरवाही और विभागीय अनियमितता का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ रेशम विभाग के लगभग 10 शासकीय क्वार्टर (government-quarters), जिनका उपयोग विभागीय कर्मचारियों के रहने या विभागीय कार्यों के लिए होना चाहिए था, उन्हें एक निजी ठेकेदार को किराए पर देने का गंभीर आरोप सामने आया है।

सूत्रों के अनुसार, इन क्वार्टरों (government-quarters) को 30 से 40 हजार रुपये प्रतिमाह के किराए पर दिया गया है। इस पूरे मामले में रेशम केंद्र के फील्डमेन श्याम सिंह राजपूत का नाम प्रमुख रूप से सामने आया है।

यह घटना न सिर्फ विभागीय अनुशासन पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि जब सरकारी विभागों पर निगरानी कमजोर हो जाती है, तो नियमों और संसाधनों का दुरुपयोग कैसे बढ़ जाता है।

पूर्व सरपंच का दावा: “क्वार्टर महीनों से किराए पर चल रहे हैं”

गांव के पूर्व सरपंच कल्लू यादव ने खुलासा किया कि लगभग तीन से चार महीने पहले इन सरकारी क्वार्टरों (government-quarters) को  ठेकेदार के कुछ मजदूरों को रहने के लिए किराए पर दे दिया गया था।

पूर्व सरपंच के अनुसार:
“रेशम केंद्र के फील्डमेन श्याम सिंह राजपूत ने ही इन क्वार्टरों (government-quarters) को ठेकेदारों को किराए पर दिया है। कई महीनों से मजदूर यहाँ रह रहे हैं और यह किसी से छिपा नहीं है।”

कल्लू यादव का यह बयान मामले को और गंभीर बनाता है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार क्वार्टरों ((government-quarters)) में लगातार मजदूरों की आवाजाही देखी गई है, जबकि विभागीय अधिकारी इस पूरे घटनाक्रम से पूरी तरह अनजान बने रहे।

फील्डमेन की सफाई: ‘मेरी जानकारी के बिना लोग रह रहे हैं’

जब देनवापोस्ट ने इस संबंध में फील्डमेन श्याम सिंह राजपूत से बात की, तो उनका बयान हैरान करने वाला था।
उन्होंने कहा—“मेरी जानकारी के बिना लोग क्वार्टरों (government-quarters) में रह रहे हैं।”

यह सफाई स्थानीय लोगों और प्रशासनिक दृष्टिकोण से बेहद असंगत लगती है। सवाल यह उठता है कि

क्या सरकारी क्वार्टरों (government-quarters)  की चाबी फील्डमेन के पास नहीं होती?

क्या रह रहे मजदूरों की संख्या भी उनकी नजरों से बची रही?

और अगर उन्हें जानकारी नहीं थी, तो क्वार्टरों के ताले किसने खोले?

यह साफ है कि यह जवाब जिम्मेदारी से बचने का प्रयास लगता है, क्योंकि सरकारी क्वार्टरों (government-quarters) में किसी के रहने की जानकारी फील्ड स्टाफ से छिपी नहीं रह सकती।

मजदूरों का कहना : ‘भैरो सिंह ने रहने को कहा’

मामले में एक और दिलचस्प मोड़ तब आया जब इन क्वार्टरों  (government-quarters) में रह रहे मजदूरों से पूछताछ की गई।
मजदूरों ने बताया—“भैरो सिंह ने हमें यहाँ रहने को कहा है।”

अब सवाल यह है कि भैरो सिंह कौन हैं?
ग्रामीणों के अनुसार भैरो सिंह ठेकेदारों से जुड़ा व्यक्ति हैं, जो मजदूरों के ठहरने की व्यवस्था करवाते हैं।

जब भैरो सिंह से पूछा गया कि ये मजदूर किसके हैं, तो उन्होंने कहा :
“ये पालीवाल कॉन्ट्रैक्शन के मजदूर हैं।”

लेकिन मामला तब और उलझ गया जब पालीवाल कॉन्ट्रैक्शन के कपिल पालीवाल ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर देते हैं।
उन्होंने स्पष्ट कहा—“ये मजदूर हमारे नहीं हैं, हमने इन्हें नहीं भेजा।”

इससे यह स्पष्ट हो गया कि मजदूरों को क्वार्टरों (government-quarters) में ठहराने की प्रक्रिया पूरी तरह अवैध, अनधिकृत, और नियंत्रण से बाहर थी।

अवैध कब्जा और विभागीय संपत्ति के दुरुपयोग की पुष्टि

किराएदारों और ठेकेदारों के बयानों में विरोधाभास ने यह साबित कर दिया कि शासकीय क्वार्टरों (government-quarters) का उपयोग बिना अनुमति और बिना विभागीय जानकारी के किया जा रहा था।

क्वार्टरों में मनमाने ढंग से मजदूरों को ठहराया गया।
किराया निजी रूप से तय किया गया।
विभागीय निरीक्षण पूरी तरह अनुपस्थित रहा।
किसी भी वरिष्ठ अधिकारी ने स्थिति की जाँच नहीं की।

ग्रामीणों के अनुसार, मजदूरों को क्वार्टरों में देखा जा सकता था। क्वार्टरों के बाहर निजी वाहनों की आवाजाही भी होती थी, जिससे यह स्पष्ट है कि यह कोई नई या छुपी गतिविधि नहीं थी।

रेशम केंद्र बंद होने से बढ़ा दुरुपयोग

इस पूरे मामले की जड़ में एक बड़ा कारण यह भी सामने आया— रेशम केंद्र का काम लंबे समय से बंद है।

जब विभाग का नियमित कार्य ठप हो जाता है और निरीक्षण करने वाला अधिकारी जब उपलब्ध नहीं हो। तो विभागीय संपत्तियाँ देखरेख से बाहर हो जाती हैं।
मुहासा में भी ऐसा ही हुआ—क्वार्टर (government-quarters) खाली थे, अधिकारी नहीं आए, और धीरे-धीरे यह जगह अवैध ठहराव का केंद्र बन गई।

प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़े सवाल

इस घटना ने जिला स्तर पर प्रशासनिक निगरानी पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।

1. किसने क्वार्टर की चाबी उपलब्ध करवाई?

2. किराए पर देने की अनुमति किसने दी?

3. 30–40 हजार रुपये किसने लिए?

4. मजदूर किसके अधीन काम कर रहे थे?

5. क्वार्टरों में रहने की जानकारी विभाग को क्यों नहीं थी?

6. क्या विभागीय संपत्ति का ऑडिट नहीं होता?

ये सभी गम्भीर प्रशासनिक प्रश्न हैं, जिनका उत्तर अभी तक किसी भी अधिकारी द्वारा नहीं दिया गया है।

ग्रामीणों में इस घटना को लेकर गहरा रोष

लोगों का कहना है कि अगर सरकारी क्वार्टर (government-quarters) किराए पर दिए जा सकते हैं, तो बाकी संपत्तियों का क्या भरोसा?

कुछ ग्रामीणों ने कड़े शब्दों में कहा—
“सरकारी भवनों को घर समझ लिया है, मनमर्जी से किराए पर दे रहे हैं। अधिकारी मौजूद नहीं हैं, तभी ऐसा हो रहा है।”

गाँव में चर्चा है कि अगर शिकायत पर कोई कार्रवाई न हुई तो यह मामला आने वाले समय में बड़ा घोटाला बनकर सामने आएगा।

तत्काल कार्रवाई की मांग

यह मामला सिर्फ क्वार्टर या एक कर्मचारी की गलती नहीं है। यह विभागीय व्यवस्था की पूरी विफलता है।

तत्काल जांच होनी चाहिए—

क्वार्टरों की सूची

पिछले 6 महीनों की निगरानी रिपोर्ट

विभागीय उपस्थिति

चाबी का हस्तांतरण

मजदूरों की भूमिका

ठेकेदारों की संलिप्तता

अगर जांच ठीक से की गई, तो कई और चौंकाने वाली बातें सामने आ सकती हैं।

मुहासा का ‘क्वार्टर मामला’ विभागीय लापरवाही की जीती-जागती तस्वीर

मुहासा रेशम केंद्र का यह मामला प्रशासन के लिए चेतावनी है।
यह सिर्फ किराए की बात नहीं—यह बताता है कि निगरानी तंत्र कमजोर है।कर्मचारी निजी लाभ ले रहे हैं। विभाग अपनी संपत्तियों को बचाने में असफल है और अधिकारी ज़मीनी स्तर से कट चुके हैं।

यह मामला यह भी स्पष्ट करता है कि जब सरकारी विभाग निष्क्रिय होते हैं, तो शासकीय भवन (government-quarters) निजी लालच का केंद्र बन जाते हैं।

मुहासा में जो हुआ वह सिर्फ शुरुआत हो सकती है। यह जिला प्रशासन के लिए ज़रूरी है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की जाए, दोषियों को चिन्हित कर कार्रवाई हो और विभागीय संपत्तियों को सुरक्षित किया जाए।

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