
नर्मदापुरम। आगामी मतदाता सूची 2003 एवं 2025 का मेपिंग कार्य की तैयारियों के बीच रोजगार सहायकों (rojgar sahayak) ने निर्वाचन कार्य में जबरन ड्यूटी लगाए जाने पर नाराज़गी जाहिर की है। रोजगार सहायक (rojgar sahayak) संघ के संभागीय अध्यक्ष संतोष मालवीय ने बताया कि यह निर्णय शासन के अपने ही आदेशों के विरुद्ध है और इससे कर्मचारियों में गहरी असंतोष की भावना है।
आदेश का हवाला
मालवीय ने 19 अक्टूबर 2020 के शासन पत्र क्रमांक 3206/एनआईजीएस—म.प्र./एनआर—1/20—21 का हवाला देते हुए कहा कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि रोजगार सहायकों (rojgar sahayak) की ड्यूटी पूर्णकालिक रूप से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के क्रियान्वयन में ही रहेगी। इस आदेश का उद्देश्य यह था कि ग्रामीण विकास कार्यों, मजदूरों के भुगतान और योजनाओं की मॉनिटरिंग में कोई व्यवधान न आए।
लेकिन हाल ही में जारी किए गए आदेशों के तहत रोजगार सहायकों (rojgar sahayak) को निर्वाचन कार्य में ड्यूटी पर लगाया जा रहा है। इससे न केवल विभागीय आदेशों की अनदेखी हो रही है, बल्कि ग्रामीण विकास योजनाओं के सुचारू संचालन पर भी असर पड़ रहा है।
वेतन बकाया से बढ़ी चिंता
रोजगार सहायकों (rojgar sahayak) ने बताया कि वे पिछले तीन माह से वेतन से वंचित हैं। समय पर वेतन न मिलने से उनके सामने आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। ऐसे में बिना भत्ते और बिना उचित व्यवस्था के निर्वाचन कार्य में ड्यूटी लगाना उनके साथ अन्याय है।उन्होंने यह भी बताया कि मुख्यालय पर ड्यूटी लगाने के बाद न तो भोजन की व्यवस्था है और न ही यातायात भत्ता दिया जा रहा है। इससे ग्रामीण अंचलों से आने वाले कर्मचारियों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है।
जबरन थमाए जा रहे नोटिस
संघ पदाधिकारियों का कहना है कि रोजगार सहायकों (rojgar sahayak) को निर्वाचन कार्य का नोटिस जबरन थमाया जा रहा है। नियमों की अनदेखी कर इस प्रकार का दबाव बनाना कर्मचारियों के मनोबल को गिराने वाला कदम है।
मनरेगा कार्य पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रोजगार सहायकों (rojgar sahayak) को चुनावी ड्यूटी में लगाया जाता है तो इसका सीधा असर मनरेगा कार्यों पर पड़ेगा।
- मजदूरों को समय पर भुगतान नहीं होगा।
- ग्राम पंचायत स्तर पर योजनाओं की निगरानी बाधित होगी।
- जल संरक्षण, सिंचाई, ग्रामीण सड़क और आवास निर्माण जैसी परियोजनाएं प्रभावित होंगी।
मनरेगा पहले से ही ग्रामीणों की आजीविका का सबसे बड़ा साधन है। रोजगार सहायकों की अनुपस्थिति से ग्रामीण मजदूरों को काम और भुगतान में देरी का सामना करना पड़ सकता है।
संघ की मांगें
रोजगार सहायकों (rojgar sahayak) के संघ ने शासन से कुछ प्रमुख मांगें रखी हैं:
- निर्वाचन कार्य में रोजगार सहायकों की ड्यूटी से छूट दी जाए।
- लंबित वेतन का तत्काल भुगतान किया जाए।
- यदि निर्वाचन कार्य में लगाया ही जाए तो भोजन व भत्ते की उचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
- शासन अपने ही आदेशों का पालन करे और रोजगार सहायकों को केवल मनरेगा कार्यों में लगाया जाए।
सरकार की दुविधा
विशेषज्ञ बताते हैं कि चुनावी कार्य अत्यंत संवेदनशील और विशाल प्रक्रिया है। इसमें बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता होती है। शिक्षक, पटवारी, लिपिक और अन्य कर्मचारियों की तरह रोजगार सहायकों (rojgar sahayak) को भी ड्यूटी पर लगाया जा रहा है। शासन का तर्क है कि निर्वाचन कार्य संवैधानिक जिम्मेदारी है और इसमें सभी की भागीदारी आवश्यक है। हालांकि दूसरी ओर, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के पूर्व आदेशों का हवाला देकर रोजगार सहायक खुद को इससे अलग करने की मांग कर रहे हैं। यही वजह है कि यह मुद्दा अब टकराव का रूप लेता जा रहा है।
विशेषज्ञों की राय
- प्रशासनिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि रोजगार सहायकों को चुनाव ड्यूटी से मुक्त किया जाता है तो कर्मचारियों की भारी कमी हो सकती है, जिससे चुनाव प्रभावित होंगे।
- वहीं ग्रामीण विकास विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि रोजगार सहायकों को चुनाव ड्यूटी पर लगाया गया तो ग्रामीण योजनाएं बाधित होंगी, जिससे हजारों मजदूर प्रभावित होंगे।
कर्मचारियों का असंतोष
नाराज रोजगार सहायकों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे। उनका कहना है कि पहले से ही वेतन न मिलने से परेशान हैं और अब चुनावी ड्यूटी थोपकर उनकी मुश्किलें बढ़ाई जा रही हैं।
संभावित असर
यदि यह विवाद जल्द नहीं सुलझा तो इसके कई नतीजे हो सकते हैं:
- ग्रामीण विकास कार्य रुक सकते हैं।
- मजदूरों को समय पर भुगतान न होने से आक्रोश बढ़ सकता है।
- चुनावी प्रक्रिया में कर्मचारियों की कमी से प्रशासनिक चुनौती खड़ी हो सकती है।
- शासन और कर्मचारियों के बीच विश्वास की खाई गहरी हो सकती है।
रोजगार सहायकों की नाराज़गी मतदाता सूची 2003 एवं 2025 का मेपिंग कार्य प्रभावित हो सकता है प्रशासन के लिए नई चुनौती बन गई है। एक ओर सरकार को संवैधानिक दायित्व निभाने के लिए मतदाता सूची 2003 एवं 2025 का मेपिंग कार्य कराना है। तो दूसरी ओर ग्रामीण विकास की निरंतरता भी सुनिश्चित करनी है। ऐसे में ज़रूरत है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित कर व्यावहारिक समाधान निकाला जाए। रोजगार सहायकों की मांगें जायज़ हैं क्योंकि वेतन और भत्तों की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। वहीं सरकार को भी यह देखना होगा कि निर्वाचन जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया प्रभावित न हो। अगर समय रहते समाधान नहीं निकला तो यह विवाद न सिर्फ चुनाव बल्कि ग्रामीण विकास योजनाओं पर भी भारी पड़ सकता है।
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