
सागर। मध्य प्रदेश के सागर जिले से एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) द्वारा जारी एक सर्कुलर ने अतिथि शिक्षकों में हड़कंप मचा दिया है। सर्कुलर में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया है कि 14 नवंबर 2025 के बाद यदि कोई भी अतिथि शिक्षक सुबह 10 बजे के बाद विद्यालय पहुंचता है, तो उसकी सेवा तत्काल समाप्त की जाए। इस आदेश को लेकर शिक्षा जगत में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है और विशेषज्ञ इसे पूरी तरह नियम विरुद्ध बता रहे हैं।
जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा जारी सर्कुलर क्रमांक अतिथि शिक्षक/निरीक्षण/2025/10183 में कहा गया है कि विद्यालयों के निरीक्षण के दौरान अनुपस्थित पाए जाने वाले अतिथि शिक्षकों के मामले में विभाग “व्यक्तिगत सुनवाई” कर रहा है और संतोषजनक उत्तर न मिलने पर सेवाएं समाप्त की जा रही हैं। साथ ही सभी संकुल प्राचार्यों को निर्देशित किया गया है कि 14 नवंबर के बाद जो भी अतिथि शिक्षक 10 बजे के बाद उपस्थित होता है, उसकी सेवा तुरंत समाप्त कर सूचना कार्यालय को भेजी जाए।
यह आदेश न केवल प्रशासनिक दृष्टि से विवादास्पद है, बल्कि शासकीय सेवा नियमों, सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता हुआ प्रतीत होता है।
क्या कहता है नियम और कानून?
शिक्षा विभाग के जानकारों और प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह सर्कुलर सीधे-सीधे सेवा नियमों का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों में यह स्पष्ट कहा गया है कि—
शासन के लिए कार्य करने वाला प्रत्येक व्यक्ति, चाहे भुगतान का तरीका कोई भी हो, शासकीय सेवक की श्रेणी में माना जाएगा। अतिथि शिक्षक, संविदा शिक्षक, दैनिक वेतनभोगी—सभी एक सीमा तक प्रशासनिक सुरक्षा और सेवा नियमों के दायरे में आते हैं।
सिविल सेवा आचार संहिता के अनुसार
कर्तव्य पर देरी से आने की स्थिति में नोटिस देकर वेतन कटौती की जा सकती है। यदि लगातार अनुपस्थिति रहे और कर्मचारी रजिस्टर में दर्ज पते पर उपलब्ध न हो, तब उसे निलंबित किया जा सकता है।
सेवा समाप्ति की कार्रवाई केवल तभी संभव है जब— उचित कारण बताया जाए, नियमों के तहत जांच हो, कर्मचारी को पर्याप्त अवसर दिया जाए
विशेषज्ञों का कहना है कि
“सिर्फ एक दिन देरी से आने या एक दिन अनुपस्थित रहने पर अतिथि शिक्षक की सेवा समाप्त करना बिल्कुल गैरकानूनी है।”
सर्कुलर की भाषा पर सवाल: क्या वसूली का संकेत?
“व्यक्तिगत सुनवाई के दौरान संतोषजनक उत्तर न मिलने पर अतिथि शिक्षकों की सेवाएं समाप्त की जाएं”
कई सवाल खड़े करती है।
पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि— यदि व्यक्तिगत सुनवाई “नियम आधारित प्रक्रिया” है, तो
नियमों का उल्लेख क्यों नहीं किया गया?
कौन से प्रावधान के तहत सुनवाई हो रही है?
किस प्रकार की जांच समिति गठित है?
सर्कुलर में ऐसी कोई जानकारी नहीं दी गई है।
कई अतिथि शिक्षक संगठनों का आरोप है कि—
देर से आने का बहाना बनाकर अतिथि शिक्षकों से अवैध वसूली का रास्ता बनाया जा रहा है।
व्यक्तिगत सुनवाई की भाषा में “संतोषजनक उत्तर” जैसी अस्पष्ट शब्दावली का उपयोग भ्रष्टाचार की आशंका को और बढ़ाता है।
एक वरिष्ठ शिक्षाविद् ने नाम न छापने की शर्त पर कहा— “जिस अधिकारी ने यह सर्कुलर लिखा है, उसकी भाषा किसी प्रशासनिक आदेश जैसी नहीं, बल्कि किसी निजी संस्था की चेतावनी जैसी प्रतीत होती है। यह विभाग की गरिमा के विपरीत है।”
सवाल यह है कि—
यदि यही नियम शासकीय शिक्षकों के लिए लागू किया जाए तो क्या विभाग सैकड़ों की संख्या में सेवाएं समाप्त कर सकेगा?
उत्तर साफ है—नहीं।
क्योंकि शासकीय शिक्षकों के सेवा नियम मजबूत हैं और कार्रवाई प्रक्रिया आधारित है।
अतिथि शिक्षक सबसे कमजोर वर्ग है, इसलिए उस पर कार्रवाई सरल समझी जाती है।
अवैध वसूली की आशंका मजबूत क्यों?
शिक्षक संगठनों का कहना है कि व्यक्तिगत सुनवाई के नाम पर— शिक्षक को डीईओ कार्यालय बुलाया जाता है।देरी का कारण पूछा जाता है और फिर “संतोषजनक उत्तर” के आधार पर कार्रवाई टाली या जारी रखी जाती है।
ऐसे मामलों में अक्सर अधिकारियों द्वारा “मौखिक निपटान” या “प्रबंधन” जैसे शब्द उपयोग किए जाते हैं, जो अवैध वसूली की ओर संकेत करते हैं।
बिना स्पष्ट नियमों का उल्लेख किए गया कार्रवाई का आदेश अक्सर भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ाता है।