बाल दिवस और नेहरू जयंती पर विशेष रिपोर्ट

हर वर्ष 14 नवंबर को देश पंडित जवाहरलाल नेहरू (jawaharlal-nehru) को उनकी जयंती पर याद करता है — भारत के पहले प्रधानमंत्री, एक दार्शनिक नेता, और आधुनिक भारत के शिल्पकार। यह दिन बाल दिवस के रूप में भी मनाया जाता है, क्योंकि बच्चों के प्रति नेहरू का स्नेह और उनके उज्ज्वल भविष्य के सपनों ने उन्हें “चाचा नेहरू” के रूप में अमर बना दिया। लेकिन नेहरू सिर्फ बच्चों के प्रिय नहीं थे, वे उस पीढ़ी के नेता थे जिन्होंने आज़ादी के बाद टूटे-बिखरे भारत को एक मजबूत राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ाया।
उनकी दूरदर्शिता ने लोकतंत्र, विज्ञान, शिक्षा, उद्योग, और विदेश नीति — सभी क्षेत्रों में ऐसी बुनियाद रखी, जिस पर आज का भारत खड़ा है।
लोकतंत्र को आधार बनाने वाले प्रथम प्रधानमंत्री
जब 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, तब देश के सामने असंख्य चुनौतियाँ थीं — विभाजन की त्रासदी, शरणार्थियों का संकट, संस्थागत खालीपन और आर्थिक अव्यवस्था। ऐसे में पंडित नेहरू (jawaharlal-nehru) ने लोकतंत्र को भारत की आत्मा के रूप में चुना। उन्होंने कभी “सत्ता केंद्रित” शासन नहीं चाहा, बल्कि जनता की भागीदारी पर विश्वास किया।
नेहरू (jawaharlal-nehru) ने कहा था — “भारत का भविष्य केवल जनता की चेतना और लोकतंत्र की जड़ों में है। अगर लोकतंत्र जिंदा रहेगा, तो भारत हमेशा जीवित रहेगा।”
संविधान सभा के गठन से लेकर उसके क्रियान्वयन तक नेहरू ने यह सुनिश्चित किया कि भारत न तो सैन्य तानाशाही बने और न ही किसी धर्म या जाति विशेष का राष्ट्र। उन्होंने स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस और स्वतंत्र निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाओं को सशक्त किया।
1952 में हुए पहले आम चुनाव में उन्होंने कहा था कि यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता की आस्था की परीक्षा है। आज जब भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है, तो उसकी नींव में नेहरू (jawaharlal-nehru) की ही सोच और धैर्य झलकता है।
‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ की नींव
पंडित नेहरू (jawaharlal-nehru) का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक चेतना से संभव है। उन्होंने कहा था — “It is science alone that can solve the problems of hunger and poverty, of insanitation and illiteracy, of superstition and dead tradition.”
(“केवल विज्ञान ही भूख, गरीबी और अंधविश्वास की समस्याओं का समाधान कर सकता है।”)
इसी सोच के साथ उन्होंने स्वतंत्र भारत में वैज्ञानिक संस्थानों की एक नई परंपरा की शुरुआत की।
- IITs (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) की स्थापना उनके ही नेतृत्व में हुई, ताकि भारत तकनीकी दृष्टि से आत्मनिर्भर बन सके।
- AIIMS (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) जैसी चिकित्सा शिक्षा की विश्वस्तरीय संस्था उनकी पहल से बनी।
- CSIR, DRDO, और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र जैसे संस्थान उनके “विज्ञान आधारित राष्ट्र” के सपने का प्रतीक बने।
नेहरू (jawaharlal-nehru) का “वैज्ञानिक दृष्टिकोण” आज भी भारत की नीतिगत सोच में गहराई से मौजूद है।
1958 में उन्होंने संसद में कहा था — “विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं का विषय नहीं, बल्कि सोचने की एक पद्धति है। जब तक हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं अपनाएंगे, हम आधुनिक राष्ट्र नहीं बन सकते।”
उनके इस दृष्टिकोण ने ही आगे चलकर भारत को ISRO, परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम और डिजिटल क्रांति की दिशा दी।
शिक्षा में दी ‘राष्ट्र निर्माण’ की दिशा
पंडित नेहरू (jawaharlal-nehru) जानते थे कि बिना शिक्षा के न तो स्वतंत्रता टिकेगी और न ही विकास संभव होगा। उन्होंने कहा था — “शिक्षा एक ऐसी ज्योति है जो अंधकार मिटाती है और राष्ट्र को नई दिशा देती है।”
उनकी प्रेरणा से देशभर में विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और शोध केंद्रों की स्थापना हुई।
उन्होंने विश्वविद्यालयों को केवल “शिक्षा के केंद्र” नहीं, बल्कि “विचार विमर्श और नवाचार के मंच” के रूप में विकसित करने पर जोर दिया।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की स्थापना, दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) जैसे केंद्रों का विस्तार — यह सब उनके ही शिक्षा दृष्टिकोण का परिणाम था।
नेहरू चाहते थे कि भारत का हर बच्चा स्कूल जाए, इसलिए उन्होंने बच्चों को देश का भविष्य बताया। यही कारण था कि उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
गुटनिरपेक्ष विदेश नीति: भारत की वैश्विक पहचान
आज जब भारत “वैश्विक दक्षिण” का नेतृत्व करने की बात करता है, तो उसकी जड़ें नेहरू (jawaharlal-nehru) के समय से जुड़ी हैं। उन्होंने शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ — दोनों से समान दूरी बनाए रखते हुए “गुटनिरपेक्ष आंदोलन” (Non-Aligned Movement) की नींव रखी।
1955 में बांडुंग सम्मेलन में नेहरू ने कहा था — “भारत किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगा। हमारी निष्ठा किसी ब्लॉक के प्रति नहीं, बल्कि शांति और मानवता के प्रति है।”
नेहरू (jawaharlal-nehru) की विदेश नीति भारत को “मध्यस्थ” और “विकासशील देशों की आवाज़” के रूप में स्थापित करने में सफल रही। उन्होंने चीन के साथ ‘पंचशील सिद्धांत’ का प्रस्ताव रखा — परस्पर सम्मान, आक्रमण न करना, समानता, सहयोग और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व।
हालांकि बाद में भारत-चीन युद्ध (1962) ने इस नीति पर प्रश्न खड़े किए, लेकिन उनकी मूल भावना — विश्व शांति और स्वतंत्र विदेश नीति — आज भी भारत की कूटनीति का आधार बनी हुई है।
उद्योग और अर्थव्यवस्था की नींव
आज भारत की औद्योगिक शक्ति, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयाँ, और मिश्रित अर्थव्यवस्था मॉडल — ये सब नेहरू (jawaharlal-nehru) युग की देन हैं। उन्होंने “नियोजित विकास” का मॉडल अपनाया और पांच वर्षीय योजनाओं की शुरुआत की, जिसमें कृषि, सिंचाई, ऊर्जा, खनन, भारी उद्योग और रोजगार को प्राथमिकता दी गई।
भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे स्टील प्लांट्स ने भारत को औद्योगिक राष्ट्र बनने की दिशा दी।
उन्होंने कहा था — “Dam is the temple of modern India.”
(“बांध आधुनिक भारत के मंदिर हैं।”)
नेहरू का यह विचार केवल विकास का प्रतीक नहीं था, बल्कि स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का दर्शन भी था। उनकी नीतियों ने भारत को औद्योगिक आधार दिया, जिसे बाद में हर सरकार ने आगे बढ़ाया।
सांस्कृतिक एकता और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा
नेहरू (jawaharlal-nehru) ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को उसकी ताकत माना। उन्होंने कहा — “हमारी संस्कृति अनेकता में एकता की प्रतीक है। भारत किसी एक धर्म या समुदाय का राष्ट्र नहीं, बल्कि सबका है।”
उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को भारतीय लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा बनाया। उनके नेतृत्व में संविधान में समान नागरिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई। उनकी दृष्टि में धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय था, शासन का नहीं।
बच्चों के प्रति नेहरू का स्नेह: ‘चाचा नेहरू’ की विरासत
पंडित नेहरू (jawaharlal-nehru) बच्चों को देश की “जीवंत आशा” कहा करते थे। वे अक्सर कहते थे — “आज के बच्चे कल के नागरिक हैं। उन्हें आज जैसा बनाएंगे, वैसा ही कल का भारत होगा।”
वे जब भी स्कूलों या बाल मेलों में जाते, बच्चों से घंटों बातें करते, उनके सवालों के जवाब देते और उन्हें बड़े सपने देखने की प्रेरणा देते। इसी स्नेह के कारण उनके निधन के बाद उनकी जयंती (14 नवंबर) को “बाल दिवस” (Children’s Day) के रूप में मनाया जाने लगा।
यह दिन केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकारों, शिक्षा और पोषण की दिशा में काम करने का संकल्प भी है।
नेहरू की आलोचना और उनकी स्थायी प्रासंगिकता
हालांकि नेहरू (jawaharlal-nehru) की नीतियों पर वर्षों से बहस होती रही है — विशेषकर चीन नीति, समाजवादी झुकाव और सरकारी नियंत्रण पर। लेकिन आलोचनाओं के बावजूद, कोई यह नकार नहीं सकता कि उनकी दूरदर्शिता ने भारत को स्थायित्व और दिशा दी।
राजनीतिक विश्लेषक रामचंद्र गुहा के शब्दों में — “नेहरू ऐसे नेता थे जिन्होंने भारत को केवल आज़ाद नहीं किया, बल्कि उसे सोचने, प्रश्न पूछने और आगे बढ़ने की क्षमता दी।”
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने सत्ता की बजाय संस्थाओं को मजबूत किया।
उनके बाद आने वाली हर सरकार ने उन्हीं संस्थाओं पर भरोसा किया — चाहे वह लोकतंत्र हो, योजना आयोग हो या शिक्षा प्रणाली।
आज भी प्रासंगिक है नेहरू की दृष्टि
आज जब दुनिया नई तकनीकी क्रांतियों और राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रही है, तब नेहरू की सोच पहले से ज्यादा प्रासंगिक लगती है।
उनका संदेश स्पष्ट था — “हम भविष्य से डरकर नहीं, उसे गढ़ने की क्षमता से महान बनते हैं।”
पंडित नेहरू (jawaharlal-nehru) केवल भारत के पहले प्रधानमंत्री नहीं थे, वे उस विचार के प्रतीक थे जिसने “आधुनिक भारत” की परिकल्पना को आकार दिया। लोकतंत्र की रक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था और शिक्षा पर उनका विश्वास आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणास्रोत है।