महाविद्यालय में हुआ एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन

माखननगर। श्री माखनलाल चतुर्वेदी शासकीय महाविद्यालय, माखननगर में प्राचार्य डॉ. नीता चौबे के मार्गदर्शन में भूगोल विभाग द्वारा एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार (national webinar) का सफल आयोजन किया गया। वेबिनार का विषय था — “भारत में जलवायु परिवर्तन एवं जैव विविधता”। यह कार्यक्रम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में आयोजित किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. नीता चौबे तथा शासकीय अग्रणी गृह विज्ञान कन्या महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. कामिनी जैन ने वेबिनार के प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि इस तरह के राष्ट्रीय स्तर के आयोजन विद्यार्थियों को शोध और नवाचार की दिशा में प्रेरित करते हैं।

वक्ताओं ने साझा किए अपने विचार

इस राष्ट्रीय वेबिनार (national webinar) में दो प्रमुख वक्ताओं को आमंत्रित किया गया था। पहले मुख्य वक्ता डॉ. देवकीनंदन भट्ट, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से थे। उन्होंने जैव विविधता की परिभाषा देते हुए इसके प्रकार, महत्व और संरक्षण की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की। डॉ. भट्ट ने बताया कि आज मानव जीवन तकनीकी युग में प्रवेश कर चुका है, जहां ChatGPT और Artificial Intelligence (AI) जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है, परंतु इन पर पूर्ण रूप से निर्भर होने के बजाय इन्हें सकारात्मक दिशा में प्रयोग करना आवश्यक है।

उन्होंने अपने व्याख्यान में Reduce, Reuse और Recycle (तीन R सिद्धांत) की महत्ता बताई और कहा कि ये सिद्धांत सतत विकास के मूल स्तंभ हैं। इसके साथ ही उन्होंने स्वच्छ भारत मिशन, नमामि गंगे अभियान, चिपको आंदोलन, और पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली (Environment Management System) पर भी अपने विचार व्यक्त किए।

डॉ. भट्ट ने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव केवल प्रकृति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधन और जैव विविधता सभी पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। उन्होंने शिक्षा और जन-जागरूकता के माध्यम से इस चुनौती का सामना करने पर बल दिया।

भारतीय संस्कृति और जलवायु परिवर्तन का संबंध

दूसरे मुख्य वक्ता डॉ. अनुराग पांडे, जगदीश सरन हिंदू स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अमरोहा (उत्तर प्रदेश) से थे। उन्होंने जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ते हुए धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

डॉ. पांडे ने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने बताया कि जहाँ प्रकृति जन्म से मनुष्य को प्राप्त होती है, वहीं संस्कृति मनुष्य के अनुभवों से विकसित होती है

उन्होंने ऋग्वेद, अथर्ववेद और श्रीमद्भागवत गीता के श्लोकों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें प्रकृति के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन की गहन भावना निहित है। डॉ. पांडे ने जल, अग्नि, वायु, सूर्य, वृक्ष और पशुओं की पूजा के धार्मिक महत्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय परंपराएं पर्यावरण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील रही हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि महर्षि चरक और सुश्रुत द्वारा रचित ग्रंथों में औषधीय पौधों और पर्यावरणीय संतुलन के संरक्षण का विस्तृत उल्लेख मिलता है, जो आधुनिक पर्यावरण विज्ञान के सिद्धांतों से मेल खाता है।

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विद्वानों की सहभागिता

इस राष्ट्रीय वेबिनार (national webinar) में देशभर के विद्वानों और शिक्षकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। कार्यक्रम में डॉ. नीता देशभरतार, डॉ. जी.एस. रघुवंशी, डॉ. प्रिया दर्शी ओझा, डॉ. रामेश्वर शिंदे, डॉ. अदिति जोशी, डॉ. मनमोहन द्विवेदी, डॉ. अनिता साहू, डॉ. आकांक्षा यादव और सुश्री शिवानी मालवीय द्वारा शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। सभी शोधपत्रों में पर्यावरणीय संकट, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, जैव विविधता संरक्षण के उपाय, तथा भारतीय पारंपरिक ज्ञान प्रणाली की भूमिका पर आधारित महत्वपूर्ण शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए।

कार्यक्रम संचालन

कार्यक्रम का संचालन श्री पंकज बैरवा ने अत्यंत कुशलता से किया। आभार प्रदर्शन वेबिनार (national webinar) के आयोजक एवं संयोजक डॉ. धर्मेंद्र सिंह चौहान द्वारा किया गया। उन्होंने सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों और सहयोगी सदस्यों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि यह वेबिनार (national webinar)न केवल ज्ञानवर्धक रहा, बल्कि पर्यावरण चेतना को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम भी बना। कार्यक्रम के सफल संचालन में डॉ. अमिताभ शुक्ला, दिग्विजय सिंह खत्री, अजय मेहरा, डॉ. क्षमा मेहरा, डॉ. कविता दुबे, डॉ. अनिता साहू, डॉ. आकांक्षा यादव, सुश्री शिवानी मालवीय और छात्र स्वस्तिक रावत की भूमिका सराहनीय रही।

शिक्षा के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश

इस राष्ट्रीय वेबिनार (national webinar) के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता संरक्षण आज की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौतियों में से एक हैं। भारत जैसे देश, जहाँ विविध प्राकृतिक संसाधन और सांस्कृतिक धरोहरें मौजूद हैं, वहां पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय पर्यावरण संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

महाविद्यालय द्वारा आयोजित यह वेबिनार (national webinar) न केवल एक शैक्षणिक पहल थी, बल्कि यह सतत विकास (Sustainable Development) की दिशा में एक सार्थक कदम भी रहा। इस आयोजन ने यह सिद्ध किया कि शिक्षा संस्थान केवल ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि पर्यावरण चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व के संवाहक भी हैं।

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