
रीवा। मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग में एक बार फिर लापरवाही का गंभीर मामला सामने आया है। जिले में ई-अटेंडेंस प्रणाली के आधार पर जारी किए गए कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) मृत शिक्षकों तक को भेज दिए गए, जिससे विभाग की प्रक्रियाओं और निगरानी प्रणाली पर कई सवाल खड़े हो गए हैं। यह मामला सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी का नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों के स्तर पर गंभीर उदासीनता का परिणाम दिखाई देता है।
पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी लापरवाहियां
शिक्षा विभाग में इस तरह की भूलें नई नहीं हैं। इससे पहले भी सेवानिवृत्त और मृत शिक्षकों के नाम पर विभाग द्वारा नोटिस जारी किए जाने के मामले सामने आ चुके हैं। पिछले महीने जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय से एक नोटिस जारी हुआ था जिसमें प्राचार्य के रूप में जिस शिक्षक का नाम शामिल था, वह स्वयं उसी नोटिस का प्राप्तकर्ता बना, क्योंकि पुराने रिकॉर्ड से उनका नाम हटाया ही नहीं गया था।
संयुक्त संचालक कार्यालय से भी इसी तरह के त्रुटिपूर्ण नोटिस जारी होने की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं, लेकिन विभाग में सुधार की प्रक्रिया अब तक मजबूत नहीं हो सकी है। इससे सिस्टम पर भरोसा कमजोर होने के साथ-साथ प्रशासनिक क्षमता पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं।
ई-अटेंडेंस लागू, विरोध के बाद भी कड़ाई से अमल
प्रदेश में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के समय-समय पर स्कूल पहुंचने की निगरानी के लिए ई-अटेंडेंस प्रणाली लागू की गई थी। प्रारंभ में शिक्षकों द्वारा इसका विरोध भी किया गया, लेकिन विभाग ने इसे अनिवार्य कर दिया। इसके तहत हर शिक्षक को मोबाइल ऐप या टेबलेट पर अपनी उपस्थिति दर्ज करनी होती है।
हालांकि, इसके बावजूद विभाग की ओर से निगरानी और डेटा अपडेट को लेकर गंभीर लापरवाहियां सामने आ रही हैं। अक्टूबर महीने की उपस्थिति रिपोर्ट निकालकर जिन शिक्षकों की उपस्थिति शून्य या बहुत कम मिली, उन्हें एकसमान तरीके से नोटिस जारी कर दिए गए, बिना यह जांचे कि वे शिक्षक जीवित भी हैं या नहीं।
मृत शिक्षकों को जारी किए गए नोटिस—डेटा अपडेट में भारी चूक
इस बार लापरवाही का सबसे गंभीर पहलू यह है कि विभाग ने ऐसे शिक्षकों को भी नोटिस दे डाले जिनकी मृत्यु दो से तीन साल पहले ही हो चुकी है। इनमें शामिल हैं—
1. देवतादीन कोल – खर्रा हायर सेकेंडरी स्कूल, नईगढ़ी (मऊगंज)
इनकी मृत्यु 19 मई 2023 को हो चुकी है। बावजूद इसके इन्हें ई-अटेंडेंस शून्य रहने का नोटिस जारी किया गया।
2. छोटेलाल साकेत – प्राथमिक शाला दुबगवां, मऊगंज
इन्हें भी उपस्थिति दर्ज न करने का नोटिस मिला, जबकि उनकी मौत 29 मई 2025 को हो चुकी है।
3. रामगरीब दीपांकर – प्राथमिक स्कूल बैरिहा, नईगढ़ी
इन्हें विभाग ने 3 दिन में जवाब देने को कहा है, जबकि इनका निधन 17 फरवरी 2025 को ही हो गया था।
इन सभी मामलों में यह साफ है कि पोर्टल पर मृत शिक्षकों के नाम हटाए ही नहीं गए थे, जिससे उनकी उपस्थिति रिपोर्ट शून्य दिखाई दी और स्वचालित प्रणाली ने नोटिस जनरेट कर दिए।
DEO ने स्वीकार की तकनीकी त्रुटि, नोटिस निरस्त करने की बात कही
जिला शिक्षा अधिकारी रामराज मिश्रा ने मामले को स्वीकारते हुए कहा कि—
“ई-अटेंडेंस रिपोर्ट पोर्टल से जनरेट होती है। संकुल प्राचार्यों को समय-समय पर नाम अपडेट करना चाहिए, लेकिन त्रुटिवश कुछ नाम डिलीट नहीं किए गए। मृतकों को जारी किए गए नोटिस निरस्त किए जाएंगे और सूची में सुधार कराया जाएगा।”
हालांकि, सवाल यह उठता है कि जब सूची में मृत शिक्षकों के नाम लंबे समय से दर्ज थे, तो इसे अपडेट करने के लिए कोई नियमित जांच क्यों नहीं हुई? और बिना परीक्षण किए इन नोटिसों को कलेक्टर के अनुमोदन के लिए कैसे भेज दिया गया?
संकुल प्राचार्यों की बड़ी लापरवाही उजागर
विभाग का कहना है कि मृत शिक्षकों के नाम पोर्टल पर बने रहने की जिम्मेदारी संकुल केंद्रों के प्राचार्यों की है। उन्हें नियमित रूप से—
सेवानिवृत्त,मृत,स्थानांतरित शिक्षकों
के नाम अपडेट करने होते हैं।
लेकिन इस मामले में जिन शिक्षकों को नोटिस जारी हुआ है, उनकी मृत्यु 2 से 3 वर्ष पहले हुई थी, जो साबित करता है कि पोर्टल अपडेट को लेकर विभाग और संकुल केंद्र दोनों में गंभीर उदासीनता बनी हुई है।
क्या है पूरा सिस्टम और कहाँ हुई चूक?
1. ई-अटेंडेंस डेटा पोर्टल से स्वत: जनरेट होता है
लेकिन सूची अपडेट न होने से मृत शिक्षक भी “अनुपस्थित” सूची में चले जाते हैं।
2. नोटिस जारी करने से पहले कोई मानव समीक्षा नहीं हुई
यदि अधिकारी उपस्थिति रिपोर्ट की जांच करते, तो यह त्रुटि सामने आ जाती।
3. कलेक्टर की स्वीकृति भी बिना परीक्षण के भेजी गई
नोटिस में कलेक्टर अनुमोदन का उल्लेख है, जिससे प्रशासन की कार्यशैली पर प्रश्न उठते हैं।
4. संकुल प्राचार्य नियमित रूप से डेटा अपडेट नहीं कर रहे
जिसके कारण कई पुराने रिकॉर्ड अब भी पोर्टल पर सक्रिय हैं।
शिक्षा विभाग की जवाबदेही क्यों जरूरी?
इस तरह की घटनाएँ सीधे-सीधे विभाग की विश्वसनीयता पर असर डालती हैं। यदि मृत, सेवानिवृत्त या स्थानांतरित कर्मचारियों की उपस्थिति भी अधिकारियों की नजर में नहीं है, तो इसका मतलब है—
मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी
जांच प्रक्रिया का अभाव
पोर्टल प्रबंधन में गंभीर खामियाँ
प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही
ई-अटेंडेंस सिस्टम का उद्देश्य स्कूलों में अनुशासन और पारदर्शिता बढ़ाना है, लेकिन यदि सिस्टम की ही विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाए, तो यह पूरी प्रक्रिया के उद्देश्य को कमजोर कर देता है।
रीवा जिले में मृत शिक्षकों को नोटिस जारी होना सिर्फ तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही का परिणाम है। यह घटना साबित करती है कि सिस्टम मजबूत होने के बावजूद यदि निगरानी और डेटा अपडेट में गंभीर कमी रहेगी, तो ऐसे शर्मनाक मामले सामने आते रहेंगे।
अब देखना यह है कि शिक्षा विभाग इस त्रुटि से कोई सीख लेता है या फिर भविष्य में ऐसी घटनाएँ फिर दोहराई जाएंगी।