
भारत की पवित्र नदियों में नर्मदा का स्थान विशिष्ट है। गंगा जहाँ मोक्षदायिनी मानी जाती हैं, वहीं नर्मदा को स्वयं शिवस्वरूपा कहा गया है। नर्मदा परिक्रमा केवल नदी की यात्रा नहीं, बल्कि यह मन, विचार और जीवन के परिष्कार की साधना है। यह परिक्रमा व्यक्ति को भौतिकता से निकालकर प्रकृति, समाज और स्वयं से जोड़ती है।
नर्मदा: एक नदी नहीं, जीवंत देवी
पुराणों के अनुसार नर्मदा का अवतरण भगवान शिव के पसीने से हुआ माना जाता है। स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण और वायु पुराण में नर्मदा की महिमा का विस्तार से वर्णन है। मान्यता है कि नर्मदा के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है, और उसके जल के स्पर्श से आत्मा पवित्र होती है।
इसी कारण नर्मदा को रेवा, शंकरजा और महानदी भी कहा जाता है।
परिक्रमा की परंपरा और नियम
नर्मदा परिक्रमा लगभग 2600 किलोमीटर की पैदल यात्रा है, जो अमरकंटक से आरंभ होकर अरब सागर तक जाती है और पुनः अमरकंटक लौटती है। परिक्रमा का मूल नियम है—
- नर्मदा को सदैव दाईं ओर रखना
- नदी को पार न करना
- पैदल यात्रा करना
- संयम, सात्त्विक आहार और सेवा भाव रखना
यह नियम परिक्रमा को एक साधारण यात्रा से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक अनुशासन बना देते हैं।
आत्मशुद्धि और जीवन परिवर्तन की साधना
नर्मदा परिक्रमा को तपस्या कहा गया है। महीनों और वर्षों तक चलने वाली यह यात्रा व्यक्ति को—
- धैर्य
- सहनशीलता
- त्याग
- और आत्मनिरीक्षण
सिखाती है।
परिक्रमा के दौरान व्यक्ति समाज के हर वर्ग से मिलता है—आदिवासी, किसान, संत, गृहस्थ—और जीवन को नए दृष्टिकोण से समझता है। यही कारण है कि कहा जाता है—
“नर्मदा परिक्रमा मनुष्य को बाहर नहीं, भीतर से बदलती है।”
सामाजिक समरसता की मिसाल
नर्मदा परिक्रमा भारतीय सामाजिक एकता का अनूठा उदाहरण है। मार्ग में बसे गाँवों के लोग बिना किसी भेदभाव के परिक्रमावासियों को—
- भोजन
- विश्राम
- और सहयोग
प्रदान करते हैं।
यह परंपरा आज भी जीवित है और बताती है कि भारतीय संस्कृति सेवा और सह-अस्तित्व पर आधारित है।
पर्यावरण चेतना की धरोहर
नर्मदा परिक्रमा प्रकृति के साथ सहजीवन का पाठ पढ़ाती है। परिक्रमावासी जंगलों, घाटों, पहाड़ियों और खेतों से गुजरते हुए यह अनुभव करते हैं कि—
- नदी केवल जलधारा नहीं
- बल्कि जीवन का आधार है
आज जब नर्मदा प्रदूषण, अवैध खनन और अतिक्रमण से जूझ रही है, तब परिक्रमा हमें नदी संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का संदेश देती है।
नर्मदा और मध्यप्रदेश की पहचान
नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवनरेखा है। अमरकंटक, मंडला, जबलपुर, नर्मदापुरम, ओंकारेश्वर, महेश्वर जैसे तीर्थ न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र हैं। नर्मदा परिक्रमा इन सभी स्थलों को एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरोती है।
आधुनिक युग में नर्मदा परिक्रमा का संदेश
आज के भागदौड़ भरे, उपभोक्तावादी जीवन में नर्मदा परिक्रमा हमें—
- धीमे चलने
- कम में जीने
- और प्रकृति के साथ संतुलन बनाने
का संदेश देती है।
यह यात्रा सिखाती है कि विकास का अर्थ केवल निर्माण नहीं, संरक्षण और संवेदना भी है।
नर्मदा परिक्रमा एक धार्मिक अनुष्ठान से कहीं आगे है। यह भारतीय जीवन दर्शन की चलती-फिरती पाठशाला है, जहाँ आस्था, पर्यावरण, समाज और आत्मा—सब एक साथ चलते हैं।
जब तक नर्मदा बहती रहेगी, तब तक परिक्रमा की यह परंपरा हमें याद दिलाती रहेगी कि— नदी को बचाना, जीवन को बचाना है।