
माखननगर (नर्मदापुरम)। धान कटाई का सीजन शुरू होते ही पराली प्रबंधन (Paddy Stubble Management) का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। इसी कड़ी में भारतीय किसान संघ (kisan-sangh) माखननगर तहसील इकाई ने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपते हुए किसानों की प्रमुख मांगों को सामने रखा है। किसान संघ का कहना है कि शासन द्वारा पराली प्रबंधन के लिए अब तक ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं, जिससे किसानों पर दंडात्मक कार्रवाई का खतरा मंडरा रहा है।
धान कटाई के बाद बढ़ी पराली की चुनौती
किसान संघ (kisan-sangh) ने ज्ञापन में लिखा है कि इस वर्ष खरीफ फसल की कटाई धूमधाम से शुरू हो चुकी है और धान उत्पादन भी अच्छा हुआ है। हालांकि, पराली निस्तारण (stubble disposal) की कोई ठोस योजना शासन-प्रशासन की ओर से किसानों को नहीं मिली है।
संघ (kisan-sangh) का कहना है कि सरकार ने पूर्व वर्षों की तरह पराली प्रबंधन के लिए न तो पर्याप्त मशीनरी उपलब्ध कराई है, न ही सहायता राशि दी गई है। ऐसे में किसानों के सामने पराली जलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
किसान संघ (kisan-sangh) ने प्रशासन से की चार मुख्य मांगें
भारतीय किसान संघ (kisan-sangh) माखननगर इकाई द्वारा ज्ञापन में चार प्रमुख मांगें रखी गई हैं:
- प्रत्येक 100 एकड़ जमीन पर दो बेलर मशीनें दी जाएं ताकि पराली को उपयोगी रूप में परिवर्तित किया जा सके।
- जिन क्षेत्रों में बेलर या मशीन उपलब्ध नहीं है, वहां सेवा, श्रमदान या मिट्टी ढकने की सुविधा किसानों को दी जाए ताकि जलाने की नौबत न आए।
- तहसील और ब्लॉक स्तर पर मशीनों की उपलब्धता की सूची सार्वजनिक की जाए ताकि किसान समय पर उनका उपयोग कर सकें।
- पराली प्रबंधन में सहयोग करने वाले किसानों को 90 प्रतिशत अनुदान पर मशीन उपलब्ध कराई जाए।
संघ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि प्रशासन ने सात दिनों के भीतर मांगों पर कार्रवाई नहीं की, तो किसान संगठन आंदोलन की राह अपनाने को विवश होगा।
किसान नेताओं ने कहा—“किसानों को अपराधी न बनाएं”
ज्ञापन सौंपने के दौरान किसान संघ (kisan-sangh) के अध्यक्ष राजेश दीवान और मंत्री गोपाल मीना ने कहा कि किसान पहले ही बढ़ती लागत, महंगे डीजल और मौसम की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं।
अब पराली जलाने पर जुर्माना लगाना या FIR दर्ज करना किसानों के साथ अन्याय है।
राजेश दीवान ने कहा — “सरकार किसानों को सहयोग नहीं कर रही, सिर्फ दंड का डर दिखा रही है।
अगर प्रशासन समाधान नहीं देगा, तो किसान मजबूर होकर विरोध करेंगे।”
गोपाल मीना ने कहा — “हम पराली नहीं जलाना चाहते, लेकिन विकल्प न होने से ऐसा करना पड़ता है।
यदि शासन सच में प्रदूषण कम करना चाहता है, तो किसानों को उपकरण और जागरूकता दे।”
क्या है पराली जलाने का मुद्दा?
हर साल धान की फसल कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में बची पराली को जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है। यह समस्या विशेष रूप से उत्तर भारत के राज्यों — पंजाब, हरियाणा और मध्यप्रदेश — में गंभीर रूप लेती है।
पराली जलाने से कार्बन उत्सर्जन, धूलकण (PM2.5) और ग्रीनहाउस गैसें बढ़ती हैं, जिससे न केवल पर्यावरण बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित होती है।
शासन-प्रशासन ने बीते वर्षों में पराली जलाने पर रोक लगाने के निर्देश जारी किए हैं, लेकिन किसानों का कहना है कि बिना वैकल्पिक प्रबंधन के यह रोक व्यावहारिक नहीं है।
प्रशासन के लिए चुनौती: प्रतिबंध या समाधान?
नर्मदापुरम जिले में कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा धान पर आधारित है। ऐसे में पराली प्रबंधन का मुद्दा प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है।यदि समय पर बेलर मशीनें, ट्रॉली कवर्स या कम्पोस्ट उपकरण नहीं दिए गए, तो किसानों द्वारा पराली जलाने की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशासन को केवल निगरानी या दंडात्मक कार्रवाई से ज्यादा समाधान आधारित नीति अपनानी चाहिए।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार के अनुसार — “पराली को जैविक खाद में बदलने के लिए जागरूकता और मशीनरी दोनों जरूरी हैं। यदि शासन सही दिशा में प्रोत्साहन दे, तो पराली प्रदूषण नहीं, वरदान साबित हो सकती है।”
स्थानीय स्तर पर किसान आंदोलन की चेतावनी
भारतीय किसान संघ (kisan-sangh) ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि 7 दिनों के भीतर जिला प्रशासन ने उनकी मांगों पर अमल नहीं किया, तो माखननगर से लेकर नर्मदापुरम कलेक्टोरेट तक प्रदर्शन किया जाएगा।
संघ (kisan-sangh) के सदस्यों का कहना है कि वे शांतिपूर्ण आंदोलन की राह अपनाएंगे, लेकिन किसानों को नजरअंदाज करना स्वीकार नहीं करेंगे। संघ के अनुसार, ज्ञापन की प्रति जिला कलेक्टर, कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और तहसीलदार माखननगर को सौंप दी गई है।