इंदौर नगर निगम के सम्मेलन में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर उठा विवाद अब सियासी तूफान में बदल चुका है। कांग्रेस के दो पार्षदों द्वारा ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाने और कथित विवादित बयान देने के बाद पार्टी ने उनसे दूरी बना ली है। इस घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर ही असहज स्थिति पैदा कर दी है, वहीं भाजपा को बड़ा मुद्दा मिल गया है।
कांग्रेस ने झाड़ा पल्ला, अंदरूनी नाराज़गी बढ़ी
विवाद सामने आते ही शहर कांग्रेस ने दोनों महिला पार्षदों का खुलकर बचाव नहीं किया। इसके उलट, रुबीना इक़बाल के खिलाफ निष्कासन का प्रस्ताव भोपाल भेज दिया गया है।
इस फैसले से पार्टी के अल्पसंख्यक नेताओं में नाराज़गी देखी जा रही है। कई नेताओं का मानना है कि कांग्रेस ने दबाव में आकर अपने ही जनप्रतिनिधियों से दूरी बना ली।
‘वंदे मातरम्’ अब कांग्रेस कार्यक्रमों में अनिवार्य
विवाद के बाद इंदौर शहर कांग्रेस ने सभी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य कर दिया है। इस फैसले पर भी पार्टी के भीतर मतभेद सामने आए हैं।
कांग्रेस नेता अमीनुल खान सूरी ने कहा,
“‘वंदे मातरम्’ गाने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसे अनिवार्य करना गलत है। देशभक्ति आदेश से नहीं, भावना से होती है। कांग्रेस की विचारधारा में स्वतंत्रता और स्वैच्छिकता महत्वपूर्ण है।”
जीतू पटवारी की चुप्पी पर सवाल
इस पूरे विवाद में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की चुप्पी भी चर्चा का विषय बन गई है। छतरपुर दौरे के दौरान जब मीडिया ने उनसे सवाल किया, तो उन्होंने बिना जवाब दिए आगे बढ़ना ही उचित समझा।
उनकी इस चुप्पी को लेकर सियासी गलियारों में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।
भाजपा का हमला तेज
वहीं भाजपा ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाते हुए कांग्रेस पर हमला तेज कर दिया है। शुक्रवार को इंदौर के कई वार्डों में भाजपा कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस के पुतले जलाए और ‘वंदे मातरम्’ गाकर विरोध दर्ज कराया।
भाजपा इस मुद्दे को राष्ट्रवाद से जोड़कर कांग्रेस को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है।
क्या कह रहे हैं राजनीतिक जानकार
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘वंदे मातरम्’ जैसे संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दे पर स्पष्ट रुख न लेना कांग्रेस के लिए नुकसानदायक हो सकता है। खासकर तब, जब विपक्ष इसे राष्ट्रवाद के मुद्दे के रूप में उभार रहा है।
आगे क्या?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांग्रेस इस विवाद पर आधिकारिक और स्पष्ट रुख कब तक सामने लाती है।
फिलहाल, इंदौर का यह मामला प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ चुका है—जहां देशभक्ति, विचारधारा और राजनीतिक रणनीति आमने-सामने नजर आ रही हैं।