
देनवा पोस्ट एक्सक्लूसिव। भारतीय राजनीति में जब भी किसी मजबूत, निर्णायक और दूरदर्शी नेता का नाम लिया जाता है, तो इंदिरा गांधी (iron-lady) का नाम सबसे ऊपर आता है। विश्व-राजनीति में उन्हें “आयरन लेडी ऑफ इंडिया” की उपाधि सिर्फ प्रशंसा नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, नीति-निर्णयों और संकट के समय दिखाए गए साहस का प्रमाण है।
अपने कार्यकाल में उन्होंने ऐसी नीतियाँ और फैसले लिए, जिन्होंने न सिर्फ भारत की दिशा बदल दी, बल्कि उन्हें विश्व नेतृत्व की पंक्ति में भी सबसे अलग दर्जा दिलाया।
राजनीतिक विरासत और शुरुआती संघर्ष
इंदिरा गांधी (iron-lady) देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुत्री थीं। बचपन से ही स्वतंत्रता आंदोलन, महात्मा गांधी की विचारधारा और कांग्रेस की राजनीति का सीधा प्रभाव उन पर पड़ा।
लेकिन यह कह देना आसान होगा कि उन्हें नेतृत्व विरासत में मिला। वास्तविकता यह है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद पार्टी के भीतर भी उन्हें “कमज़ोर PM” कहा गया, यहां तक कि विपक्ष ने उन्हें “गूँगी गुड़िया” तक कहा।
इंदिरा ने यही चुनौती अपनी ताकत बना ली। धीरे-धीरे उन्होंने अपने फैसलों और कार्यशैली के दम पर वह छवि गढ़ी, जिसने आगे चलकर उन्हें देश की सबसे मजबूत महिला नेता बना दिया।
भारत को खाद्यान्न संकट से बाहर निकाला
1960 का दशक भारत के लिए खाद्यान्न संकट का दौर था। देश को अनाज के लिए अमेरिका की PL-480 सहायता पर निर्भर रहना पड़ता था।
इसी समय इंदिरा गांधी (iron-lady) ने साहसिक निर्णय लेकर हरित क्रांति का रास्ता तैयार किया—
- उन्नत बीज
- आधुनिक कृषि तकनीक
- सिंचाई के लिए बड़े बांधों का निर्माण
- खाद और कीटनाशक की उपलब्धता
- कृषि विश्वविद्यालयों का विस्तार
इसके बाद पंजाब, हरियाणा और पश्चिम यूपी में गेंहू की रिकॉर्ड उत्पादन हुआ और भारत पहली बार खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना। यह इंदिरा के नेतृत्व की पहली बड़ी सफलता थी।
बैंकों का राष्ट्रीयकरण: गरीबों को आर्थिक मुख्यधारा में लाने का प्रयास
1969 में इंदिरा गांधी (iron-lady) ने 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया।
यह फैसला उस दौर में बेहद साहसिक माना गया, क्योंकि इसका सीधा टकराव बड़े उद्योगपतियों और निजी बैंक मालिकों से था।
इस कदम ने देश की वित्तीय संरचना में क्रांतिकारी परिवर्तन किया—
- बैंकिंग सेवाएँ ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचीं
- किसानों, महिलाओं और छोटे व्यापारियों को कर्ज मिलना आसान हुआ
- सरकार को गरीबोन्मुखी योजनाएँ लागू करने में मदद मिली
राष्ट्रीयकरण इंदिरा गांधी (iron-lady) की उस राजनीति को मजबूत आधार देता है, जिसे “गरीबी हटाओ” के नारे के साथ सामाजिक-आर्थिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जाता है।
1971 का युद्ध: पाकिस्तान पर निर्णायक विजय और बांग्लादेश का निर्माण
इंदिरा गांधी (iron-lady) का सबसे ऐतिहासिक क्षण 1971 में आया, जब उन्होंने पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध का नेतृत्व किया।
पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में मानवाधिकार संकट और शरणार्थियों की भारी आमद के बाद भारत के पास निर्णायक कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
6 दिसंबर 1971 को भारत ने पूर्वी पाकिस्तान के पक्ष में युद्ध की घोषणा की।
13 दिनों में निर्णायक विजय मिली।
93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया — जो विश्व इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य सरेंडर में से एक है।
यह जीत इंदिरा गांधी (iron-lady) को विश्व-राजनीति में “आयरन लेडी” के रूप में स्थापित करने का निर्णायक क्षण बन गई। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर की चेतावनियों और दबावों को नजरअंदाज करते हुए उन्होंने भारत के राष्ट्रीय हित की रक्षा की।
पोखरण-I (1974): परमाणु शक्तियों की श्रेणी में भारत का प्रवेश
1974 में इंदिरा गांधी (iron-lady) ने पोखरण में भारत का पहला शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण कराया, जिसे ऑपरेशन “स्माइलिंग बुद्धा” के नाम से जाना जाता है।
यह परीक्षण उस समय दुनिया के लिए एक झटका था क्योंकि भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था का परमाणु शक्ति बनना अंतरराष्ट्रीय समीकरण बदलने वाला कदम था।
इस निर्णय ने भारत को सामरिक शक्ति के रूप में स्थापित किया और इंदिरा गांधी (iron-lady) का कद एक वैश्विक नेता के रूप में और बढ़ गया।
दुनिया की पहली निर्वाचित महिला प्रधानमंत्री
इंदिरा गांधी सिर्फ भारतीय राजनीति ही नहीं, पूरी दुनिया में महिला नेतृत्व का प्रतीक बनीं।
1966 में जब उन्हें प्रधानमंत्री चुना गया, तब विश्व में महिला नेतृत्व लगभग न के बराबर था।
उनकी स्थिरता, दृढ़ता और संघर्ष क्षमता ने राजनीति में महिलाओं की भूमिका को नई परिभाषा दी।
आपातकाल 1975: इंदिरा का सबसे विवादित और निर्णायक अध्याय
25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की।
यह उनका सबसे विवादास्पद निर्णय माना जाता है।
आपातकाल के दौरान—
- प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध
- विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी
- राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण
इन कदमों ने लोकतंत्र पर कई सवाल खड़े किए।
लेकिन आपातकाल के वास्तविक कारणों को समझना भी आवश्यक है—
- देश में आंतरिक अस्थिरता
- जेपी आंदोलन की उग्र स्थिति
- न्यायालय का फैसला
- आर्थिक चुनौतियाँ
बाद में इंदिरा गांधी (iron-lady) ने 1977 में चुनाव करवाकर सत्ता छोड़ दी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पुनः बहाल किया।
1978–79 के कठिन दौर के बाद वह 1980 में फिर प्रचंड बहुमत से सत्ता में लौटीं, जो उनकी लोकप्रियता और जनविश्वास का बड़ा प्रमाण था।
ऑपरेशन ब्लू स्टार और अंतिम अध्याय
1984 में पंजाब में बढ़ती उग्रवाद की समस्या से निपटने के लिए उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार को मंजूरी दी।
यह निर्णय अत्यंत कठिन था क्योंकि इसमें राजनीतिक, धार्मिक और सुरक्षा से जुड़े भारी जोखिम थे।
इसी कार्रवाई के परिणामस्वरूप 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या कर दी गई।
उनकी मृत्यु के साथ ही भारत ने अपनी सबसे प्रभावशाली, दृढ़ और वैश्विक रूप से सम्मानित नेता को खो दिया।
इंदिरा गांधी (iron-lady) का जीवन साहस, संघर्ष और नेतृत्व का प्रतीक है।
उन्होंने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, राजनीतिक कौशल और राष्ट्रीय हित के प्रति समर्पण से विश्व राजनीति में भारत की पहचान को मजबूत बनाया। उनके फैसलों से भले विवाद जुड़े हों, लेकिन यह सच है कि इंदिरा गांधी जैसा नेतृत्व भारत की राजनीति में दुर्लभ है।
आज भी वह इतिहास में एक ऐसी महिला नेता के रूप में याद की जाती हैं, जिन्होंने साबित किया कि मजबूत इच्छाशक्ति और निर्णायक नेतृत्व किसी देश की दिशा बदल सकता है।