2030 तक अपर-मिडिल इनकम क्लब में भारत : आर्थिक छलांग या सुधारों की असली परीक्षा?

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स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की ताज़ा रिपोर्ट यह दावा करती है कि भारत 2030 तक अपर-मिडिल इनकम देश बन जाएगा और 2047 तक हाई-इनकम इकोनॉमी बनने का लक्ष्य भी “साध्य” है। आंकड़े प्रभावशाली हैं, टाइमलाइन आकर्षक है और तुलना उत्साहवर्धक। लेकिन सवाल यह है कि क्या आय वर्ग में यह छलांग आम भारतीय की ज़िंदगी में भी वही बदलाव लाएगी, जिसकी तस्वीर इन रिपोर्टों में खींची जा रही है?

तेज़ GDP, लेकिन असमान गति

भारत की GDP यात्रा को अक्सर एक उपलब्धि की तरह पेश किया जाता है—
$1 ट्रिलियन तक पहुंचने में 60 साल, लेकिन अगला ट्रिलियन सिर्फ 7 साल में और फिर हर 4–5 साल में एक नया मील का पत्थर। परंतु GDP का तेज़ी से बढ़ना अपने आप में सफलता नहीं, जब तक यह रोज़गार, मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा में समान गति से अनुवादित न हो। आज भी भारत की बड़ी आबादी अनौपचारिक क्षेत्र, कम वेतन और अस्थिर रोजगार में फंसी है। सवाल यह नहीं कि GDP कितनी बढ़ी, बल्कि यह है कि GDP की यह वृद्धि किसके हिस्से आई?

प्रति व्यक्ति आय: औसत का भ्रम

2030 तक प्रति व्यक्ति आय के $4,000 तक पहुंचने का अनुमान दिया जा रहा है। यह आंकड़ा सुनने में चीन और इंडोनेशिया की बराबरी जैसा लगता है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय एक औसत है, और भारत में औसत अक्सर वास्तविकता को ढक देता है। चंद उच्च-आय वर्ग और कॉरपोरेट मुनाफे जब आय को ऊपर खींचते हैं, तब करोड़ों लोग उसी औसत के नीचे संघर्ष कर रहे होते हैं। आय असमानता अगर इसी तरह बढ़ती रही, तो अपर-मिडिल इनकम का तमगा एक काग़ज़ी उपलब्धि बनकर रह जाएगा।

60 साल बनाम 20 साल : क्या सबक लिया गया?

SBI खुद मानता है कि भारत को निम्न आय से निम्न-मध्यम आय बनने में 60 साल लगे। उसके बाद रफ्तार तेज़ हुई। लेकिन यह रफ्तार संरचनात्मक सुधारों की देन कम और वैश्विक पूंजी, उपभोग आधारित वृद्धि और सरकारी खर्च पर ज्यादा टिकी दिखाई देती है।

अगर यही मॉडल आगे भी चलता रहा, तो जोखिम साफ हैं:

  • मैन्युफैक्चरिंग कमजोर
  • MSME पर दबाव
  • रोजगार वृद्धि GDP से पीछे
  • कृषि आय स्थिर

ऐसी स्थिति में हाई-इनकम देश का सपना टिकाऊ नहीं, बल्कि अस्थायी उछाल साबित हो सकता है।

वैश्विक रैंकिंग बनाम घरेलू सच्चाई

भारत के 95वें परसेंटाइल पर पहुंचने की बात की जा रही है। लेकिन वैश्विक रैंकिंग तब मायने रखती है, जब देश के भीतर:

  • कुपोषण कम हो
  • स्वास्थ्य खर्च जेब से न जाए
  • शिक्षा रोजगार से जुड़े

आज भी भारत मानव विकास सूचकांक (HDI) में अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरूप स्थान नहीं बना पाया है। यह असंतुलन चेतावनी है कि केवल आय वर्ग बदलना पर्याप्त नहीं।

2047 का हाई-इनकम लक्ष्य: साहसिक या आत्ममुग्ध?

2047 तक हाई-इनकम देश बनने के लिए 7.5–9% प्रति व्यक्ति GNI वृद्धि की बात की जा रही है। सवाल यह नहीं कि यह गणित संभव है या नहीं—सवाल यह है कि क्या मौजूदा नीति दिशा इस वृद्धि को समावेशी बना पाएगी?

  • बिना श्रम-प्रधान उद्योगों के
  • बिना गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा के
  • और बिना सार्वजनिक स्वास्थ्य निवेश के
    आगे बढ़ा, तो हाई-इनकम का टैग सामाजिक असंतोष की नींव भी बन सकता है।

वर्ग बदलने से देश नहीं बदलता

भारत का अपर-मिडिल इनकम देश बनना संभव है—इसमें संदेह नहीं।
लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या भारत एक ‘उच्च-आय समाज’ भी बनेगा?

क्योंकि—आय वर्ग बदलना आर्थिक घटना है, लेकिन जीवन स्तर बदलना राजनीतिक और नैतिक निर्णय।

अगर नीतियों का फोकस सिर्फ ग्रोथ चार्ट और वैश्विक तुलना तक सीमित रहा, तो 2030 की उपलब्धि भी 1960 की तरह एक अधूरा वादा बन सकती है।

विकसित भारत का रास्ता आंकड़ों से नहीं, न्यायसंगत वितरण और रोजगार से होकर जाता है।

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