ग्रीनलैंड की बर्फ सिर्फ़ आर्कटिक में नहीं पिघल रही—उसका असर मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और सुंदरबन तक महसूस किया जाएगा। फिर भी भारत की राजनीतिक और नीतिगत चुप्पी यह सवाल उठाती है:
क्या भारत जलवायु संकट का शिकार है या मूक साझेदार?
दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप, ग्रीनलैंड, जिसमें वैश्विक ताजे पानी का लगभग 10 प्रतिशत भंडार है, 2025 में 105 गीगाटन बर्फ खो चुका है। वैज्ञानिक चेतावनी साफ है—पूरी बर्फ पिघली तो समुद्र 7 मीटर ऊपर जाएगा। भारत जैसे तटीय देश के लिए यह विनाश का ब्लूप्रिंट है, फिर भी सत्ता के गलियारों में सन्नाटा है।
भारत डूबेगा, लेकिन फैसले वाशिंगटन करेगा?
ग्रीनलैंड पर अमेरिका की नज़र, ट्रंप युग की “खरीद” वाली सोच और खनिज-सैन्य लालच, पूरी दुनिया देख रही है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड विरोध कर रहे हैं, लेकिन भारत—जो खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज़ कहता है—इस लूट पर सवाल तक नहीं उठाता।
भारत की विदेश नीति यहाँ नैतिक नहीं, रणनीतिक रूप से निष्क्रिय दिखती है।
जो देश समुद्र-स्तर बढ़ने से सबसे ज़्यादा प्रभावित होगा, वही देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नाम लेने से बच रहा है।
पर्यावरण की दुहाई, घर में कोयला
भारत जलवायु मंचों पर क्लाइमेट जस्टिस की बात करता है, लेकिन घरेलू स्तर पर कोयला विस्तार, तटीय विनियमन नियमों में ढील और पर्यावरणीय मंज़ूरियों की फास्ट-ट्रैक राजनीति यह साबित करती है कि नीति और भाषण में गहरी खाई है।
ग्रीनलैंड में खनन का विरोध करना तब तक खोखला है, जब तक भारत खुद विकास के नाम पर पर्यावरणीय बलिदान क्षेत्र बनाता रहेगा।
मीथेन आर्कटिक में, मार सुंदरबन में
ग्रीनलैंड की बर्फ से निकलती मीथेन गैस, महासागरीय धाराओं में बदलाव और चरम मौसम—इनका सीधा असर भारत पर पड़ेगा।
सुंदरबन का डूबना,ओडिशा-आंध्र का तट कटाव,मुंबई-कोच्चि में समुद्री बाढ़
ये भविष्य की नहीं, वर्तमान की घटनाएँ हैं। फिर भी भारत की जलवायु नीति, ग्रीनलैंड जैसे वैश्विक संकटों को विदेशी मामला मानकर किनारे कर देती है—यह रणनीतिक भूल नहीं, नीतिगत अपराध है।
ग्रीनलैंड पर चुप्पी, भविष्य पर सौदा
अगर ग्रीनलैंड पूरी तरह पिघला, तो यह किसी एक महाशक्ति की हार नहीं होगी—यह उन देशों की हार होगी जिन्होंने
बोलने की ताक़त होते हुए भी चुप्पी चुनी, और पीड़ित होने के बावजूद सत्ता से सवाल नहीं पूछा।
भारत के लिए सवाल अब नैतिक नहीं, अस्तित्व का है।
क्या भारत केवल सम्मेलन में तालियाँ बजाने वाला देश रहेगा,
या आर्कटिक को सैन्य-खनन मुक्त क्षेत्र घोषित करने की खुली मांग करेगा?
ग्रीनलैंड आज पिघल रहा है।
भारत अगर आज नहीं बोला, तो कल उसके तट बोलने लायक भी नहीं बचेंगे।