डिजिटल गुलामी का सौदा: राफेल और भारत की रणनीतिक चूक

भारत और फ्रांस के बीच प्रस्तावित 114 फाइटर जेट का सौदा बीते एक दशक का सबसे बड़ा रक्षा करार बताया जा रहा है। इसे भारतीय वायुसेना की ताकत में “गेम चेंजर” के तौर पर पेश किया गया। लेकिन जब इस डील की परतें खुलती हैं, तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती, जितनी प्रचार में दिखाई गई। हवाई ताकत बढ़ाने के नाम पर भारत एक ऐसी डिजिटल जंजीर खरीद रहा है, जो भविष्य में उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को गंभीर रूप से सीमित कर सकती है।

ओपन आर्किटेक्चर का भ्रम

राफेल को भारतीय नीति-निर्माताओं के सामने एक ओपन-आर्किटेक्चर मल्टीरोल फाइटर के रूप में पेश किया गया। दावा किया गया कि इसमें स्वदेशी हथियारों और सेंसरों का “ईज़ी इंटीग्रेशन” संभव है। लेकिन व्यवहारिक सच्चाई यह है कि राफेल एक डसॉल्ट-नियंत्रित बंद इकोसिस्टम है—कुछ वैसा ही जैसे एप्पल का आईफोन। बाहर से अत्याधुनिक, भीतर से पूरी तरह लॉक।

भारत इस जेट को उड़ा तो सकता है, लेकिन उसे अपने मुताबिक ढालने का अधिकार उसके पास नहीं है। न मिशन सिस्टम पर नियंत्रण, न फ्लाइट कंट्रोल लॉजिक, न ही रडार इंटरफेस और सबसे अहम—सोर्स कोड। हर बदलाव, हर अपग्रेड, हर हथियार इंटीग्रेशन के लिए भारत को डसॉल्ट की मंजूरी, तकनीकी सहयोग और मोटी फीस चुकानी होगी।

प्रीमियम फाइटर की प्रीमियम चूक
राफेल की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी कीमत नहीं, बल्कि उसकी निर्भरता है। अस्त्र Mk-1 और रुद्रम-I जैसी स्वदेशी मिसाइलों को “India-Specific Upgrades” कहा गया। यह शब्द ही बता देता है कि ये राफेल की मूल क्षमताएं नहीं हैं, बल्कि कस्टम पैच हैं। इनके लिए डसॉल्ट को सॉफ्टवेयर दोबारा लिखना पड़ता है, इंटरफेस बदलने पड़ते हैं, फ्लाइट ट्रायल और सर्टिफिकेशन करने होते हैं—और हर चरण के साथ बिल बढ़ता जाता है।
आज भी अस्त्र का ऑपरेशनल इंटीग्रेशन अधूरा है और रुद्रम-I इंतजार में है। यह भारतीय हथियारों की कमजोरी नहीं, बल्कि उस प्लेटफॉर्म की सच्चाई है, जहां डिजिटल कंट्रोल OEM के हाथ में हो।

रडार: असली रणनीतिक चूक
सबसे गंभीर गलती रडार को लेकर हुई। भारत ने शुरुआत में ही स्वदेशी AESA रडार पर जोर नहीं दिया और थेल्स के फ्रेंच रडार को स्वीकार कर लिया। आधुनिक हवाई युद्ध में रडार सिर्फ “आंख” नहीं होता, बल्कि पूरा किल-चेन मैनेजर होता है—टारगेटिंग, डेटा फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और हथियार नियंत्रण सब उसी से तय होते हैं।

जिसके हाथ में रडार सॉफ्टवेयर है, उसी के हाथ में लड़ाई की चाबी है। बिना सोर्स कोड और बिना भारतीय रडार के भारत हर बड़े अपग्रेड के लिए फ्रांस पर निर्भर रहेगा। यह निर्भरता शांति के समय असहज और युद्ध के समय खतरनाक साबित हो सकती है।

स्वदेशी बनाम विदेशी डिजिटल किला

एक तरफ तेजस, Mk-II और AMCA जैसे कार्यक्रम हैं, जहां भारतीय रडार, भारतीय हथियार और भारतीय मिशन कंप्यूटर मिलकर साझा आर्किटेक्चर बनाते हैं। दूसरी तरफ भारत ने अपनी सबसे महंगी फाइटर फ्लीट को एक विदेशी डिजिटल किले में बंद कर दिया है। नतीजा यह होगा कि भले ही राफेल भारत में बने या असेंबल हों, लेकिन उनका दिमाग और नर्वस सिस्टम फ्रांस के हाथ में रहेगा।

राफेल डील केवल एक रक्षा खरीद नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच की परीक्षा है। अगर भारत भविष्य की लड़ाइयों में सचमुच आत्मनिर्भर और निर्णायक भूमिका चाहता है, तो उसे प्लेटफॉर्म से ज्यादा कंट्रोल पर जोर देना होगा। वरना हम ऐसे प्रीमियम हथियारों के मालिक बनते रहेंगे, जिन्हें हम पूरी तरह अपना नहीं सकते।

हवाई ताकत बढ़ाना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है—उस ताकत पर पूरा भारतीय नियंत्रण। वरना यह सौदा इतिहास में एक महंगी लेकिन दूरगामी रणनीतिक चूक के रूप में दर्ज होगा।

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