संविधान दिवस: क्या हम वाकई उसके मूल्यों के प्रति ईमानदार हैं?

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26 नवंबर—संविधान दिवस (constitution)। सरकारी दफ्तरों में कार्यक्रम होंगे, मंचों पर भाषण होंगे, सोशल मीडिया पर शुभकामनाएँ तैरेंगी। लेकिन एक सवाल आज भी वहीं खड़ा है—क्या हम वाकई संविधान के प्रति ईमानदार हैं, या सिर्फ औपचारिकता निभा रहे हैं?

संविधान (constitution) एक किताब नहीं, ज़मीर है

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसे “सामाजिक क्रांति का माध्यम” कहा था, लेकिन दुखद विडंबना यह है कि संविधान (constitution) का नाम लेने वाले बहुत मिलते हैं, उसे निभाने वाले कम।संविधान में जो न्याय, समानता और स्वतंत्रता लिखी गई है, वह अक्सर भाषणों में तो चमकती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में धुंधली पड़ जाती है।

सिद्धांत एक ओर, व्यवहार दूसरी ओर

संविधान कहता है कि कानून सबके लिए समान है, लेकिन देश और राज्यों के कई हिस्सों में प्रशासनिक ढाँचा आम नागरिक के लिए अलग और सत्ताधारियों के लिए अलग नज़र आता है। नीतिगत भ्रष्टाचार, ट्रांसफर उद्योग, शासन में पारदर्शिता की कमी—यह सब संविधान (constitution) की आत्मा पर सीधा प्रहार है।

स्थानीय स्तर पर संवैधानिक मूल्यों की मौत

मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले का उदाहरण ही लें—
पटवारियों की संदिग्ध पोस्टिंग, विभागों में फर्जीवाड़ा, शिक्षा विभाग में मनमानी, फर्जी पत्रकारों का दखल, और अधिकारियों की जवाबदेही का अभाव—ये घटनाएँ बताती हैं कि संविधान (constitution) केवल संविधान भवन में सुरक्षित है, ज़मीन पर नहीं।

जब कानून लागू करने वाला ढाँचा ही कानून से ऊपर बैठ जाए, तब संविधान (constitution) की गरिमा कैसे बच सकती है?

मीडिया और आरटीआई: दो हथियार, एक खतरा

संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। आरटीआई हमें सच जानने का अधिकार देता है।लेकिन आज स्थिति यह है कि असली पत्रकार खतरे में हैं,फर्जी पत्रकार ब्लैकमेलिंग में लगे हैं और प्रशासन अक्सर इन्हीं फर्जी लोगों का उपयोग खुद को बचाने या विरोधियों को घेरने के लिए करता है।

संविधान का उद्देश्य यह नहीं था।

स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र की आँखें हैं, लेकिन आज वहीं सबसे ज्यादा धुँधला किया जा रहा है।लोकतंत्र चुनौतियों से नहीं, चुप्पी से मरता है।
संविधान का सबसे बड़ा खतरा कोई विदेशी आक्रमणकारी नहीं—हमारी अपनी उदासीनता है।अधिकारों की बात बहुत होती है,कर्तव्यों को कोई याद नहीं रखता।संस्था का सम्मान तब तक है, जब तक वह हमारे मुफ़ीद है और जैसे ही प्रणाली हमारे खिलाफ खड़ी होती है, हम उसे कोसने लगते हैं।यही दोहरा चरित्र संविधान को चोट पहुँचाता है।

क्या संविधान दिवस सिर्फ फोटो-सेशन रह गया है?

हर साल इस दिन शपथ दोहराई जाती है, लेकिन अगले ही दिन वही पुरानी कार्यप्रणाली लौट आती है— कार्यालयों में भेदभाव,शिकायतों की अनदेखी,भ्रष्टाचार की खुली बोली और जनता को सिर्फ कागजों में सम्मान। संविधान दिवस का उद्देश्य “याद” नहीं, “सुधार” था—लेकिन सुधार सबसे कम दिखाई देता है।

अब जरूरत है—बचाने की नहीं, निभाने की

संविधान (constitution) किताब में सुरक्षित है, लेकिन उसकी आत्मा तभी सुरक्षित होगी जब प्रशासन निष्पक्ष और जवाबदेह हो,भ्रष्टाचार को शून्य सहनशीलता मिले,समाज जाति, धर्म, भाषा के झगड़ों में न फँसे और नागरिक अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी गंभीरता से लें।

संविधान (constitution) मजबूत है। लेकिन वह उतना ही मजबूत है जितने हम—नागरिक, पत्रकार, अधिकारी, नेता और संस्थाएँ—उसे बनाते हैं।

अंत में, एक तीखा प्रश्न

क्या हम संविधान दिवस मना रहे हैं या संविधान (constitution) का दिन मनाकर बाकी 364 दिन उसे भूल जाते हैं? जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलता, तब तक न लोकतंत्र सुरक्षित है, न संविधान।

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