लद्दाख में उथल-पुथल: सोनम वांगचुक की एनएसए हिरासत और हिंसक प्रदर्शनों का जटिल सच

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लेह: लद्दाख (ladakh) में बुधवार को भड़की हिंसा और उसके परिणामस्वरूप प्रसिद्ध शिक्षाविद् और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत गिरफ्तारी ने क्षेत्र की सामान्य शांत छवि को झकझोर कर रख दिया है। यह घटनाक्रम लद्दाख के भविष्य को लेकर चल रहे राजनीतिक आंदोलन, सुरक्षा बलों की भूमिका और सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लद्दाख पुलिस प्रमुख एस.डी. सिंह जमवाल के बयानों ने इस मामले को और भी अधिक जटिल बना दिया है, जिन्होंने वांगचुक को हिंसा का “मुख्य उत्प्रेरक” बताते हुए उनके विदेशी संबंधों और कथित रूप से हिंसा भड़काने के आरोप लगाए हैं।

ladakh पुलिस प्रमुख के आरोप

शनिवार को लेह में पत्रकारों से बात करते हुए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एस.डी. सिंह जमवाल ने वांगचुक की गिरफ्तारी को सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करने के लिए एक आवश्यक कदम बताया। उनके द्वारा उठाए गए प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:

  1. हिंसा का मुख्य उत्प्रेरक: जमवाल ने सीधे तौर पर सोनम वांगचुक को बुधवार की हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने दावा किया कि वांगचुक ने केंद्र सरकार और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच 6 अक्टूबर को निर्धारित होने वाली राजनीतिक वार्ता को “जानबूझकर बाधित” करने के लिए “काफी काम किया” था। पुलिस का मानना है कि यह हिंसा वार्ता प्रक्रिया को प्रभावित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी।
  2. विदेशी संबंध और पाकिस्तानी खुफिया लिंक: सबसे गंभीर आरोप यह है कि वांगचुक के विरोध प्रदर्शनों के वीडियो एक पाकिस्तानी खुफिया एजेंट (पीआईओ) द्वारा सीमा पार भेजे जा रहे थे। डीजीपी ने दावा किया कि पिछले महीने गिरफ्तार किए गए इस एजेंट ने वांगचुक के आंदोलनों की जानकारी पाकिस्तान को दी थी। इसने विदेशी ताकतों की संलिप्तता के सवाल खड़े किए हैं, हालांकि, इस दावे के ठोस सबूत अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
  3. विदेशी वित्त पोषण और एफसीआरए उल्लंघन: जमवाल ने कहा कि वांगचुक के खिलाफ विदेशी धन प्राप्ति (फॉरेन कंट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट – FCRA) के उल्लंघन की जांच चल रही है। यह कानून भारत में विदेशी दान के प्रवाह को विनियमित करता है। इस आरोप का मतलब है कि वांगचुक के संगठनों को विदेशों से अनधिकृत धन प्राप्त होने के आरोप हैं।
  4. संदेहास्पद विदेशी यात्राएं: पुलिस प्रमुख ने वांगचुक की विदेश यात्राओं पर सवाल उठाए, विशेष रूप से पाकिस्तान के डॉन अखबार के एक कार्यक्रम में भाग लेने और बांग्लादेश की यात्रा का जिक्र किया। उन्होंने यूट्यूब पर उपलब्ध वांगचुक के भाषणों का हवाला देते हुए कहा कि वह नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और यहां तक कि अरब स्प्रिंग जैसे विषयों पर बोलते हैं, जो उनके “इरादों” पर सवाल खड़े करते हैं।

बुधवार की हिंसा पर पुलिस का नजरिया

डीजीपी जमवाल ने बुधवार की घटनाओं का विस्तार से ब्योरा दिया, जिसे उन्होंने लद्दाख के इतिहास में “अभूतपूर्व” बताया। उनके अनुसार:

  • सुबह 11 बजे लगभग 5,000-6,000 प्रदर्शनकारियों ने लेह में मार्च किया, जिसका लक्ष्य सरकारी इमारतों और राजनीतिक दलों के कार्यालय थे।
  • पुलिस और सीआरपीएफ कर्मियों पर हुए हमले में 70-80 सुरक्षा बल के जवान घायल हुए, जिनमें से 32 को गंभीर चोटें आईं। एक सीआरपीएफ जवान की रीढ़ की हड्डी में चोट आई है और वह अस्पताल में है।
  • जमवाल ने दावा किया कि उनकी अपनी कार पर भी हमला किया गया और वह मामूली चोटों के साथ बच गए।
  • उन्होंने सुरक्षा बलों की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि उनके “अत्यंत सराहनीय” हस्तक्षेप के बिना पूरा लेह शहर जल चुका होता। उन्होंने विपक्ष के अंधाधुंध फायरिंng के दावों को खारिज कर दिया।
  • हिंसा में नागरिकों के बीच 70-80 लोग घायल हुए, जिनमें एक लड़की गंभीर रूप से घायल हुई, जिसे इलाज के लिए एयरलिफ्ट किया गया।

हिंसा के बाद अब तक 50 लोगों को गिरफ्तार किया

हिंसा के बाद अब तक 50 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें आंदोलन के कई प्रमुख नेता शामिल हैं। दिलचस्प बात यह है कि गिरफ्तार लोगों में तीन से चार नेपाली नागरिक भी हैं, हालांकि पुलिस ने कहा है कि प्रदर्शन में उनकी भूमिका की अभी जांच जारी है। हिंसा के बाद लगे कर्फ्यू में शनिवार को कुछ ढील दी गई। पुराने शहर और नए क्षेत्रों में दो-दो घंटे के लिए प्रतिबंध हटाए गए, जिससे लोगों को तीन दिन बाद जरूरी सामान खरीदने का मौका मिला। भारी पुलिस बल की तैनाती के बीच यह अवधि शांतिपूर्ण रही।

राजनीतिक प्रतिक्रिया: गिरफ्तारी की कड़ी आलोचना

केंद्र सरकार और प्रशासन के कदमों की विपक्षी दलों ने जमकर आलोचना की है।

  • लद्दाख ( ladakh) कांग्रेस ने कहा कि वांगचुक के खिलाब “बदनाम करने का अभियान और झूठे आरोप” उनकी साख को कम नहीं कर सकते, जो लद्दाख आंदोलन के “सबसे दिखाई देने वाले और मुखर चेहरे” हैं।
  • कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने स्थिति को “दुर्भाग्यपूर्वक संभाले जाने” और “राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम जैसे क्रूर कानून” के तहत गिरफ्तारी की निंदा की।
  • शिव सेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सरकार पर विरोधाभासी रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा, “जिस व्यक्ति ने हमारी सेनाओं के लिए काम किया है, उसे देशविरोधी कह कर एनएसए के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और आप पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेल रहे हैं जो भारत में आतंक फैलाता है।”

लद्दाख (ladakh) का आंदोलन और सोनम वांगचुक की भूमिका

इस पूरे संकट को समझने के लिए लद्दाख (ladakh) के वर्तमान राजनीतिक आंदोलन को जानना जरूरी है। अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर राज्य का विभाजन करके लद्दाख (ladakh) को एक अलग केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया। शुरू में इसका स्वागत किया गया, लेकिन बाद में स्थानीय लोगों की मांगें उभरीं:

  1. संवैधानिक सुरक्षा (अनुच्छेद 371): लद्दाख (ladakh) चाहता है कि उसे जम्मू-कश्मीर की तरह भूमि, नौकरियों और संस्कृति की सुरक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधान दिया जाए।
  2. लद्दाख (ladakh) के लिए विधानसभा: वर्तमान में लद्दाख (ladakh) में कोई निर्वाचित विधानसभा नहीं है, जिससे स्थानीय स्वायत्तता का अभाव है।
  3. नौकरियों में आरक्षण: स्थानीय युवाओं के लिए नौकरियों में आरक्षण की मांग है।

सोनम वांगचुक, जो अपने नवाचारी शिक्षा मॉडल और सर्द रेगिस्तान में स्थायी विकास के काम के लिए जाने जाते हैं, इस आंदोलन के प्रमुख चेहरे बन गए हैं। उन्होंने सरकार के साथ बातचीत के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति के गठन में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि, बातचीत प्रक्रिया धीमी रही है, जिससे स्थानीय स्तर पर असंतोष बढ़ा है।

एक जटिल पहेली

लद्दाख की वर्तमान स्थिति एक जटिल पहेली है, जहां स्थानीय आकांक्षाएं, सुरक्षा चुनौतियाँ और राजनीतिक रणनीतियाँ आपस में टकरा रही हैं। एक ओर, प्रशासन और पुलिस हिंसा को नियंत्रित करने और कथित राष्ट्रीय सुरक्षा खतरों से निपटने के अपने दायित्व का हवाला दे रहे हैं। सोनम वांगचुक जैसे लोकप्रिय व्यक्ति की एनएसए जैसे कड़े कानून के तहत गिरफ्तारी एक सख्त संदेश है कि हिंसक विरोध बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

दूसरी ओर, विपक्ष और आलोचकों का मानना है कि सरकार लद्दाख (ladakh)की वैध मांगों को नजरअंदाज कर रही है और शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क का इस्तेमाल कर रही है। वांगचुक की गिरफ्तारी को आंदोलन को कमजोर करने की एक रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है। अंततः, लद्दाख (ladakh) में स्थायी शांति और स्थिरता तभी संभव है जब सरकार स्थानीय लोगों की चिंताओं को गंभीरता से ले और एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करे जो पारदर्शी और समावेशी हो। बुधवार की हिंसा और उसके बाद की घटनाएं एक चेतावनी हैं कि असंतोष को लंबे समय तक दबाने से स्थिति और बिगड़ सकती है। लद्दाख के भविष्य का रास्ता बातचीत और विश्वास निर्माण से ही निकलेगा, न कि केवल कानून-व्यवस्था के कड़े उपायों से।

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