बार-बार पॉटी भागता है बच्‍चा? तो हड्डियों का हो जाएगा चूरा, ये विटामिन हो रहा कम, आज से ही खिलाएं Vitamin D3 रिच फूड्स

Vitamin D deficiency symptoms in child: छोटे बच्चों में वैसे तो कई बार पॉटी जाने की आदत होती है लेकिन अगर आपका बड़ा बच्‍चा भी बार-बार पॉटी भागता है और उसके पेट से पानी निकलता है तो आपको सावधान हो जाना चाहिए. वहीं अगर आपके बच्‍चे को लगभग हर महीने दस्‍त लग जाते हैं या और किसी बीमारी के बजाय दस्‍त ही होते हैं तो यह छोटी परेशानी नहीं है. आपको जानकर हैरत होगी लेकिन यह चीज उसकी हड्डियों को गलाकर चूरन बना देगी और उसकी ग्रोथ पर बुरा असर पड़ेगा.

अगर आपके भी बच्‍चे के साथ ऐसा होता है और आप इसे मौसमी बीमारी मानकर दवा दिलाने ले जाते हैं और फिर आराम से बैठ जाते हैं तो आपको बता दें कि अस्‍पतालों में ज्‍यादातर मामले ऐसे ही आ रहे हैं. जब मम्मियों को पता ही नहीं है कि जिसे वे सामान्‍य बीमारी समझ रहीं हैं, दरअसल उनके बच्‍चे के शरीर में एक जरूरी विटामिन की कमी होती जा रही है.

राम मनोहर लोहिया अस्‍पताल में डिपार्टमेंट ऑफ ऑर्थोपेडिक्‍स में प्रोफेसर डॉ. सतीश कुमार बताते हैं कि आरएमएल में बहुत सारे ऐसे छोटे बच्‍चे आ रहे हैं जिनमें विटामिन्‍स और कैल्शियम की कमी पाई जा रही है. इनमें विटामिन डी की कमी के बच्‍चे बहुत ज्‍यादा हैं. इसकी वजह से शरीर में कैल्शियम भी घट रहा है और बच्‍चों की हड्डियां कमजोर हो रही हैं.

हड्डियों पर पड़ता है बुरा असर..
डॉ. कहते हैं कि अगर बच्‍चे को बार बार दस्‍त हो रहे हैं और कम अवधि में कई बार ऐसा ही देखने को मिल रहा है तो समझ लें कि आपके बच्‍चे में विटामिन डी 3 की कमी हो गई है. बार बार दस्‍त लगना विटामिन डी की कमी का सबसे प्रमुख लक्षण है. दस्‍त के साथ थकान और कमजोरी बढ़ने से बच्‍चे की हड्डियां और मांसपेशियां दोनों ही ग्रोथ करना बंद कर देती हैं.

कई रिसर्च बताते हैं कि विटामिन डी की कमी से आंत न्‍यूट्रीशन का अवशोषण नहीं कर पाती और दस्‍त हो जाता है. अगर आपके बच्‍चे में ऐसा हो रहा है तो तुरंत डॉक्‍टर को दिखाएं और न्‍यूट्रीशन की जांच कराएं.

न दें विटामिन डी सप्‍लीमेंट्स
अपने बच्‍चों को विटामिन डी के सप्‍लीमेंट्स न दें. डॉक्‍टर कहते हैं कि ऊपर से सप्‍लीमेंट के रूप में विटामिन डी की टेबलेट, विटामिन डी के शैशे या सिरप न दें. बल्कि बच्‍चों को रोजाना सूरज की रोशनी में कम से कम एक घंटे तक रोजाना खेलने दें.

खाने में दें ये चीजें..
डॉ. सतीश कहते हैं कि विटामिन डी की कमी पूरी करनी है तो सबसे जरूरी है बच्‍चे को दोनों टाइम पेट भरके खाना खिलाना. इस खाने में दाल, चावल, सब्जी, रोटी और दही होना बेहद जरूरी है. बच्‍चे को दूध जरूर दें. इसके अलावा विटामिन डी की पूर्ति के लिए बच्‍चे को हरी सब्जियां खिलाएं, इनमें पालक विटामिन डी का सबसे बेस्‍ट सोर्स है.




पेट साफ करने में चमत्कारी है यह पीला फल, कोने कोने में जमी गंदगी कर देगा क्लीन, फायदे कर देंगे हैरान

Papaya Health Benefits: पेट साफ करने के लिए अक्सर पपीता खाने की सलाह दी जाती है. माना जाता है कि कब्ज के मरीज नियमित रूप से पपीता का सेवन करें, तो काफी हद तक राहत मिल सकती है. पपीता खाने में टेस्टी होने के साथ स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है. डाइजेस्टिव सिस्टम को बूस्ट करने के लिए पपीता खाना फायदेमंद होता है. अगर आपका पेट साफ नहीं हो रहा है, तो आप एक्सपर्ट की सलाह पर पपीता का सेवन शुरू कर सकते हैं. पपीता में फाइबर समेत तमाम पोषक तत्व होते हैं, जो पेट के कोने-कोने में जमी गंदगी साफ कर सकते हैं. पेट की सेहत के लिए पपीता चमत्कारी है.

वेबएमडी की रिपोर्ट के अनुसार पपीता में दो विशेष एंजाइम होते हैं. पहला पपेन और दूसरा काइमोपपेन. ये दोनों ही एंजाइम शरीर में जाकर प्रोटीन को पचाते हैं. इससे हमारे पाचन तंत्र को मदद मिल सकती है. पेट की सेहत को दुरुस्त करने के लिए पपीता को अत्यधिक लाभकारी माना जाता है. पपीता शरीर की सूजन कम करने में असरदार होता है. पेट की खराबी से राहत पाने के लिए मिलने वाली कुछ ओवर-द-काउंटर दवाओं में पपेन पाया जाता है. अगर आपको कब्ज की समस्या है, तो पपीता का सेवन शुरू कर सकते हैं. हालांकि जिन लोगों को पपीता से एलर्जी है, वे खाने से पहले अपने डॉक्टर से कंसल्ट करें. पपीता का सेवन करने से अपच, सीने में जलन, एसिड रिफ्लक्स और पेट के अल्सर से राहत मिल सकती है. पपीता में भरपूर मात्रा में फाइबर होता है, जिससे हमारे पाचन तंत्र को मजबूती मिलती है.

जानकारों की मानें तो पपीता शरीर के वजन को भी कंट्रोल करता है और बॉडी को डिटॉक्स करने में मदद करता है. हार्ट हेल्थ के लिए पपीता को अत्यधिक लाभकारी माना जा सकता है. पपीता में कई पावरफुल एंटी ऑक्सीडेंट, विटामिन व मिनरल्स पाए जाते हैं. पपीता कोलेस्ट्रॉल को भी मैनेज करता है और कार्डियोवैस्कुलर डिजीज का रिस्क कम करता है. पपीता में पाए जाने वाले विटामिन ए और बीटा कैरोटीन फेफड़ों में सूजन को रोकने में मदद करते हैं. यह धूम्रपान करने वालों के लिए फायदेमंद है. इसका नियमि सेवन अस्थमा से बचा सकता है. पपीता को स्किन हेल्थ के लिए अच्छा माना जाता है. यह स्किन को स्वस्थ व चिकना बनाए रखता है. स्किन प्रॉब्लम एक्जिमा को कंट्रोल करने में यह फल बेहद प्रभावी है. पपीता में मौजूद विटामिन ए को बालों के लिए लाभकारी माना जाता है.




100 साल तक हड्डियां रहेंगी फौलादी, रोज इतना कैल्शियम लेना करें शुरू, यहां देखें उम्र के हिसाब से चार्ट

Daily Calcium Requirement By Age : हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हड्डियों का मजबूत होना जरूरी है. हड्डियां शरीर का आधार होती हैं और इनके कमजोर होने पर लोगों के लिए चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाता है. हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए कैल्शियम का अहम योगदान होता है. कैल्शियम एक तत्व होता है, जो अन्य मिनरल्स के साथ मिलकर मजबूत क्रिस्टल बनाता है. इससे हड्डियों को मजबूती मिलती है. हमारे शरीर में सबसे ज्यादा कैल्शियम हड्डियों में पाया जाता है. यही वजह है कि बोन हेल्थ को बेहतर बनाए रखने के लिए प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम लेना चाहिए. कैल्शियम हमें खाने-पीने की चीजों से मिलता है और डेयरी प्रोडक्ट्स को इसका बेहतरीन सोर्स माना जाता है. आज आपको बताएंगे कि उम्र के हिसाब से लोगों को रोज कितने कैल्शियम की जरूरत होती है.

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (UCSF) की रिपोर्ट के मुताबिक 1-3 साल तक के बच्चों के लिए प्रतिदिन 500 mg कैल्शियम की जरूरत होती है. 4-8 साल की उम्र तक रोजाना 800 mg कैल्शियम की जरूरत होती है. 9-18 साल की उम्र के लोगों को रोज 1300 mg कैल्शियम लेना चाहिए. 19-50 साल की उम्र के लोगों के लिए डेली 1000 mg कैल्शियम इनटेक की जरूरत होती है. 51-70 साल की उम्र में एक दिन में 1200 मिलीग्राम कैल्शियम और 70 या इससे अधिक उम्र के लोगों को रोज 1200 मिलीग्राम कैल्शियम लेना चाहिए. इतनी मात्रा में नियमित रूप से कैल्शियम लेने से हड्डियां लंबी उम्र तक मजबूत रह सकती हैं. आसान भाषा में कहें, तो उम्र बढ़ने के साथ लोगों को अपना कैल्शियम इनटेक बढ़ा देना चाहिए, ताकि हड्डियों के डिजेनरेशन की प्रोसेस को धीमा किया जा सके.

कैल्शियम से भरपूर फूड्स की बात करें, तो डेयरी प्रोडक्ट और ड्राई फ्रूट्स को कैल्शियम का बेहतरीन सोर्स माना जा सकता है. हरी पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फल और सीड्स को कैल्शियम की जरूरत पूरा करने के लिए अच्छा माना जाता है. दालों, सीड्स और मछली में भी भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है. कई रिसर्च की मानें तो 250 ग्राम दूध में करीब 270 मिलीग्राम कैल्शियम होता है. अगर कोई व्यक्ति दिन में एक-दो कप दूध पिए, तो कैल्शियम की पूर्ति हो सकती है. इसके अलावा 100 ग्राम सोयाबीन में करीब 277 मिलीग्राम कैल्शियम होता है. 100 ग्राम बादाम में करीब 270 मिलीग्राम कैल्शियम होता है. 100 ग्राम चिया सीड्स में 631 मिलीग्राम कैल्शियम होता है, जो 2 गिलास दूध से भी ज्यादा है. अगर आप खाने-पीने की चीजों से कैल्शियम नहीं ले पा रहे, तो डॉक्टर की सलाह पर कैल्शियम सप्लीमेंट ले सकते हैं.




ऊंची चोटी पर बर्फ के बीच योग करने का वीडियो वायरल

Video of doing yoga amidst snow on a high peak goes viral

बर्फ के फाहों के बीच योग करते हुए

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हो रही है जिसमें ऊंची चोटी पर बर्फ के फांहों के बीच में एक महायोगी योग करते हुए दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोग इस वीडियो को खूब वायरल कर जहां इसे सनातन धर्म शक्ति से भी जोड़ा जा रहे हैं तो वहीं कुछ लोग इसे एआई जेनरेटेड बता रहे हैं।

आज हम आपको इस खबर के माध्यम से इस वीडियो की पूरी सच्चाई बताने वाले है। यह वीडियो कुल्लू जिला की सराज घाटी का है का जिसमें वास्तविकता में एक सिद्धयोगी बादल और धुंध में आसमान से गिरते फाहों के बीच योग साधना में लीन हैं। इन सिद्ध योगी का नाम सत्येंद्र नाथ है जो मूलतः कुल्लू जिला बंजार के रहने वाले हैं। इनका मंडी जिला के बालीचौकी में कौलान्तक पीठ नाम से आश्रम जहां ये पिछले 20 से 22 वर्षों से योग साधना कर रहे हैं।

ईशपुत्र के नाम से जानते है लोग

महायोगी सत्येंद्र नाथ के गुरु ईशनाथ थे उनका शिष्य होने के कारण इनको लोग ईशपुत्र पुकारते हैं। ईशपुत्र हिमालय की सिद्ध परम्परा के योगी हैं। इनका वास्तविक नाम महायोगी सत्येंद्र नाथ है। ये कौलान्तक पीठ के पीठाधीश्वर हैं जो हिमालय के सिद्धों की एकमात्र पीठ है और देव परम्परा को आधार मान कर चलती हैं। ईशपुत्र के चाहने वाले बहुत से देशों में फैले हुए हैं। 8 से भी अधिक देशों में कौलान्तक पीठ योग और देवधर्म का प्रचार करती है। ईशपुत्र क्योंकि एक पीठाधीश्वर हैं तो उनके आसपास सदैव उनके शिष्य रहते हैं। ईशपुत्र हिमालय के योगी हैं तो इनको सदा पहाड़ों, घने जंगलों, नदियों, झरनो पर साधना, ध्यान, समाधी का अभ्यास करते हुए देखा जा सकता हैं।




‘दंगल गर्ल’ सुहानी भटनागर की जिस बीमारी से हुई मौत, वह स्किन से शुरू होती लेकिन हो जाती है घातक, ये हैं लक्षण और कारण

Dangal actor Suhani Bhatnagar: फिल्म दंगल में आमिर खान के साथ काम करने वाली सुहानी भटनागर की सिर्फ 19 साल में हुई मौत से हर कोई हैरान है. आखिर इतनी कम उम्र में स्किन से शुरू होने वाली इस बीमारी से सुहानी भटनागर की मौत क्यों हुई. मीडिया रिपोर्ट की मानें तो सुहानी भटनागर को डर्मेटोमायोसाइटिस (dermatomyositis) की बीमारी थी. वैसे तो यह बीमारी लक्षण से बहुत सामान्य लगती है लेकिन कब यह खतरनाक हो जाए किसी को मालूम नहीं. 11 दिन पहले सुहानी भटनागर को एम्स में भर्ती किया गया था. टेस्ट में पता चला कि उन्हें डर्मेटोमायसिस की बीमारी थी.

क्या है डर्मेटोमायोसाइटिस की बीमारी
मायो क्लिनिक के मुताबिक डर्मेटोमायोसाइटिस एक रेयर अनकॉमन डिजीज है जो आमतौर पर पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को ज्यादा होती है. इसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी बहुत कमजोर हो जाती है. यानी शरीर बीमारियों से लड़ने के काबिल नहीं रह पाती है. इसका एकमात्रा इलाज स्टेरॉयड है लेकिन इससे इम्यून सिस्टम के और अधिक प्रभावित होने का खतरा रहता है. इस बीमारी में सेल्स में इंफ्लामेशन हो जाती है जिसके मांसपेशियां तेजी से कमजोर होने लगती है और स्किन पर रैशेज होने लगते हैं.

डर्मेटोमायोसाइटिस के लक्षण
डर्मेटोमायोसाइटिस के लक्षण या तो बहुत देर से दिखते हैं या अचानक भी दिख सकते हैं. आमतौर पर इसका पहले संकेत स्किन में बदलाव से शुरू होता है. स्किन सबसे पहले वॉयलेट या डस्की कलर की होने लगती है. इससे स्किन पर रैशज होने लगते हैं. यह रैशेज सामान्य तौर पर चेहरा और आंखों के आसपास दिखते हैं. रैशज से खुजली भी होती है और दर्द भी होता है.

डर्मेटोमायोसाइटिस में इम्यून सिस्टम कमजोर होने के कारण मसल्स काफी कमजोर होने लगते हैं. हिप्स, थाय, शोल्डर, हाथ का उपरी हिस्सा और गर्दन के मसल्स काफी तेजी से कमजोर होने लगते हैं. यह कमजोरी बाई और दाई दोनों तरफ हो सकती है जो धीरे-धीरे बहुत खराब स्थिति में ले जाती है.

डर्मेटोमायोसाइटिस के कारण
मायो क्लिनिक के मुताबिक डर्मेटोमायोसाइटिस के कारणों का अब तक पता नहीं चल पाया है. लेकिन यह ऑटोइम्यून डिसॉर्डर की तरह ही होती है. इसमें इम्यून सिस्टम गलती से अपने हेल्दी टिशू पर हमला करने लगता है. इसमें जेनेटिक और पर्यावरणीय कारण भी भूमिका निभाते हैं. पर्यावरणीय कारणों में वायरस इंफेक्शन, सूर्य की तेज रोशनी, कुछ दवाइयां और स्मोकिंग भी इसकी वजह हो सकती है.

डर्मेटोमायोसाइटिस में जटिलताएं
डर्मेटोमायोसाइटिस के कारण खाने निगलने में परेशानी होती हो सकती है. इससे निमोनिया का खतरा रहता है. सांस लेने में दिक्कत हो सकती है. इस स्थिति में कार्डियोवैस्कुलर डिजीज, लंग डिजीज और यहां तक कि कैंसर का भी खतरा हो सकता है.

कब जाए डॉक्टर के पास
यदि आपकी स्किन में रैशेज निकल गए हैं और मसल्स में काफी कमजोरी महसूस हो रही है तो तुरंत डॉक्टर के पास भागें.




फ्लश करते समय आप बंद करते हैं टॉयलेट का ढक्कन? अगर नहीं तो जरूर कीजिए, वरना मुसीबत गले पड़ जाएगी

अगर आपके माता-पिता हमेशा आपको फ्लश करने से पहले टॉयलेट का ढक्कन बंद करने के लिए कहते थे, तो वास्‍तव में वे सही थे. और एक्‍सपर्ट कहते हैं कि आपको हमेशा ऐसा करना चाह‍िए. आमतौर पर हम वेस्टर्न टॉयलेट का इस्तेमाल करने के बाद इसे फ्लश करके सीधा बाहर निकल जाते हैं. हम सभी के जीवन का एक नियमित हिस्सा है, लेकिन यह खतरनाक है. मुसीबत कभी भी आपके गले पड़ सकती है.

डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलोराडो बोल्डर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इस पर रिसर्च की. पाया क‍ि फ्लशिंग के समय टॉयलेट का ढक्कन खुला रखने से कई खतरनाक बैक्टीरिया हवा के कॉन्टेक्ट में आ जाते हैं. उस वक्‍त टॉयलेट हवा में एक तरह का जेट उत्पन्न करता है, जो कटोरे से पांच फीट ऊपर तक कणों को ले जा सकता है. इन कणों में रोगाणु, वायरस और बैक्टीरिया शामिल होते हैं, जो सिर्फ 8 सेकेंड के अंदर आप तक पहुंच सकते हैं. तो अगर आपको संक्रमण से बचना है तो हमेशा टॉयलेट का ढक्कन बंद करके ही फ्लश करना चाहिए.

नग्न आंखों से दिखाई नहीं देतीं
वैज्ञान‍िकों ने कहा, ये तरल बूंदें आमतौर पर नग्न आंखों से दिखाई नहीं देतीं. इन्‍हें देखने के ल‍िए आपको लेजर का उपयोग करना होगा. इनमें ई. कोली, नोरोवायरस और संभवतः यहां तक कि कोरोनोवायरस जैसे खतरनाक रोगाणु होते हैं. ये कण 6.6 फीट प्रति सेकंड की गति से बाहर निकल सकते हैं, और 1.5 मीटर ऊपर तक पहुंच सकते हैं. खास बात सबसे बड़ी बूंदें सेकंड के भीतर सतहों पर जाकर चिपक जाती हैं, लेकिन हल्के कण कई मिनटों तक हवा में लटके रहते हैं. ये नाक के बालों से बचकर फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं और आपको बीमार कर सकते हैं.




रात में गला सूखने की वजह, जानिए इस समस्या से कैसे बचें और गला सूखने पर क्या करें?

Dry Mouth- India TV Hindi

Image Source : FREEPIK
मुंह सूखने की वजह

कुछ लोगों को रात में गला सूखने की समस्या बहुत ज्यादा होती है। रात में सोते सोते अचानक आंख खुलती है तो मुंह सूखा होता है। बुजुर्ग लोगों को ये परेशानी काफी ज्यादा होती है। बढ़ती उम्र के साथ गला सूखने की समस्या इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि मुंह में सलाइवा बनना कम होने लगता है। मुंह सूखने की वजह सलाइवा कम बनना है। कई बार दवाओं के साइड इफेक्ट्स, मुंह से सांस लेने, ज्यादा कैफीन का सेवन और शराब पीने से भी रात में गला सूखने की समस्या होने लगती है। गला सूखना लोगों को सामान्य और बड़ी मामूली बात लगता है। लेकिन अक्सर ऐसा होता है तो आपको इसकी वजह जानना जरूरी है।

रात में अचानक गला सूखने की वजह

  1. मुंह से सांस लेना- जो लोग रात में सोते वक्त मुंह खोलकर सांस लेते हैं ऐसे लोगों का गला सूखने लगता है। अगर आपको ऐसी आदत है तो इसे बदलने की कोशिश करें। सर्दी या खासी होने पर नाक बंद हो जाती है तो लोग मुंह से सांस लेने लगते हैं। जिससे मुंह सूखने लगता है। अगर बिना वजह मुंह से सांस लेने की आदत है तो एक बार डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
  2. भरपूर पानी पिएं- मुंह सूखने की वजह शरीर में पानी की कमी भी हो सकती है। दिनभर में बॉडी को हाइड्रेट रखें। दिन में कम से कम 10 गिलास पानी जरूर पिएं। जब पानी कम पीते हैं तो मुंह सूखने की समस्या हो सकती है।
  3. कैफीन और निकोटिन का सेवन न करें- ज्यादा कैफीन वाली चीजों जैसे चाय, कॉफ़ी से बचें। इससे शरीर डिहाइड्रेट होता है। जब शरीर में पानी की कमी होती है तो मुंह सूखने लगता है। जो लोग ज्यादा स्मोकिंग करते हैं उनको भी रात में गला सूखने की समस्या होती है। इसलिए इन दोनों आदतों से दूरी बना लें।
  4. अलकोहल से दूरी बनाएं- जब आप अल्कोहल का सेवन करते हैं तो रात में प्यास लगती है। कई बार ज्यादा ड्रिंक करने पर मुंह सूखने की परेशानी और भी बढ़ जाती है। इसलिए जितना हो सके अल्कोहल के सेवन से दूरी बनाए रखें।



music therapy in aiims delhi : भारतीय संगीत की धुनों से बोलना सीखेंगे ब्रेन स्‍ट्रोक के मरीज, म्‍यूजिक थेरेपी क्‍या है? एम्‍स की डॉ. दीप्ति से जानें

Music Therapy in Aiims Delhi: ऑल इंडिया इंस्‍टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांइसेज दिल्‍ली हमेशा से ही गंभीर से गंभीर रोगों के लिए बेहतरीन और इनोवेटिव इलाज ढूंढकर लाता है. अब यहां ब्रेन स्‍ट्रोक के मरीजों का इलाज दवाओं से नहीं बल्कि संगीत से होगा. ब्रेन स्‍ट्रोक के बाद अपने बोलने और समझने की क्षमता खो चुके ये मरीज भारत की लोकप्रिय धुनें गुनगुना कर बोलना सीखेंगे. भारत में पहली बार अफेजिया से जूझ रहे मरीजों के लिए म्‍यूजिक थेरेपी का भारतीय मॉड्यूल तैयार किया जा रहा है और इसमें एम्‍स के न्‍यूरोलॉजी विभाग के डॉक्‍टरों की मदद आईआईटी दिल्‍ली कर रहा है. क्‍या है यह थेरेपी और कैसे करेगी काम, आइए जानते हैं एम्‍स दिल्‍ली में न्‍यूरोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ. दीप्ति विभा से…

क्‍या है अफीजिया बीमारी?
ब्रेन स्‍ट्रोक आने के बाद 21 से 38 फीसदी मरीजों में अफीजिया की बीमारी हो जाती है. डॉ. दीप्ति कहती हैं कि इसमें मरीज के ब्रेन का बायां हिस्‍सा काम करना बंद कर देता है. इस हिस्‍से की वजह से ही सामान्‍य व्‍यक्ति किसी बात को समझता है, बोलता है और अपनी फीलिंग्‍स को अभिव्‍यक्‍त करता है. अफीजिया के मरीज एक छोटा शब्‍द या वाक्‍य भी नहीं बोल पाते हैं, ऐसे में इन्‍हें फिर से बोलना सिखाने के लिए स्‍पीच थेरेपी आदि दी जाती हैं लेकिन विदेशों में इसके लिए म्‍यूजिक थेरेपी बहुत पॉपुलर है.

क्‍या होती है म्‍यूजिक थेरेपी?
डॉ. दीप्ति विभा कहती हैं कि अफीजिया में ब्रेन का बायां हिस्‍सा तो प्रभावित होता है लेकिन दांया हिस्‍सा एकदम स्‍वस्‍थ रहता है. ब्रेन के दांये हिस्‍से की वह से व्‍यक्ति संगीत को समझता है, उसे गुनगुनाता है और याद रखता है. देखा गया है कि अफीजिया का जो मरीज एक शब्‍द जैसे ‘पानी’ भी बोलकर नहीं मांग पाता, वह पूरा का पूरा गीत गुनगुना लेता है. इसलिए म्‍यूजिक थेरेपी में मरीज के दांये हिस्‍से को एक्टिव करके उसे संगीत की शैली में बोलना और एक्‍सप्रेस करना सिखाया जाता है. इसके लिए बाकायदा एक तय मॉड्यूल होता है, रिसर्च होती है और फिर इसे मरीजों पर एप्‍लाई किया जाता है.

सबसे पहले इस थेरेपी में छोटे-छोटे शब्‍दों को लय में, संगीत की किसी धुन में बोला जाता है, इसके बाद बड़े बड़े सेंटेंस यानि वाक्‍यों को म्‍यूजिक के साथ बोला जाता है और मरीजों को भी ऐसा करने के लिए कहा जाता है. क्‍योंकि उनके ब्रेन का दांया हिस्‍सा काम कर रहा है तो वे इसे आसानी से समझ तो सकते ही हैं, उसे लय में एक्‍सप्रेस भी कर पाते हैं. इसके लिए कुछ कॉमन धुनें तय की जाती हैं, जिनसे मरीज वाकिफ होते हैं, उदाहरण के लिए रघुपत‍ि राघव राजा राम या ऐ मेरे वतन के लोगो…. ये धुनें ज्‍यादातर भारतीय जानते हैं.

कहां दी जाती है म्‍यूजिक थेरेपी?
अभी तक म्‍यूजिक थेरेपी विदेशों में उनकी भाषाओं के म्‍यूजिक या धुनों के माध्‍यम से दी जाती है. भारत में भी ये थेरेपी मरीजों को दी गई है लेकिन चूंकि इसमें विदेशी म्‍यूजिक होता है तो भारतीय मरीज उसे न तो अच्‍छे से समझ पाते हैं और न ही खुद को उससे जोड़ पाते हैं, इसलिए यह बहुत सफल नहीं हुई. इसलिए

क्‍या कर रहे हैं एम्‍स और आईआईटी दिल्‍ली?
प्रोफेसर बताती हैं कि एम्‍स और आईआईटी दिल्‍ली मिलकर आईसीएमआर फंडेड न केवल अफीजिया के मरीजों पर एक स्‍टडी करने जा रहे हैं, बल्कि सबसे पहले भारतीय संगीत और धुनों का मॉड्यूल तैयार करने जा रहे हैं. आईआईटी दिल्‍ली के एक डॉक्‍टर कर्नाटक संगीत में महारथी भी हैं और वे संगीत की बारीकियों को जानते हैं, ऐसे में उनके साथ मिलकर कुछ सामान्‍य धुनों को तलाशा जा रहा है, इन्‍हें मॉड्यूल में रखा जाएगा और फिर मरीजों पर रिसर्च करके इसका अध्‍ययन किया जाएगा.

डॉ. दीप्ति कहती हैं कि एम्‍स में करीब 70 फीसदी मरीज उत्‍तर भारतीय गांवों से आते हैं, ऐसे में मॉड्यूल तैयार करते समय यहां के प्रचलित संगीत और धुनों को ध्‍यान में रखा जा रहा है. साथ ही जैसे-जैसे मरीज स्‍टडी के लिए आएंगे, उनके परिजनों से भी उनकी पसंद को लेकर बातचीत की जाएगी.

कौन मरीज कर सकते हैं संपर्क
एम्‍स में की जाने वाली इस स्‍टडी के लिए न्‍यूरोलॉजी विभाग ने ब्रेन स्‍ट्रोक के बाद बोलने की क्षमता खो चुके मरीजों के परिजनों से अपील की है कि वे इस स्‍टडी में शामिल करने के लिए मरीज को एम्‍स जरूर लेकर आएं. मरीज का निशुल्‍क रूप से इलाज होगा. इसके लिए 8929466866 इस नंबर पर एम्‍स में संपर्क भी कर सकते हैं. ब्रेन स्‍ट्रोक अफीजिया वाले 60 मरीजों पर यह स्‍टडी होगी. सबसे पहले 30 मरीजों को म्‍यूजिक थेरेपी, जबकि अन्‍य 30 को स्‍टेंडर्ड इलाज दिया जाएगा. इसके बाद हर 3 महीने पर उन सभी में होने वाले बदलावों को नोट किया जाएगा. इस तरह जो भी रिजल्‍ट होगा वह सामने आएगा.




ये हैं 5 वैक्‍सीन जिन्‍हें फ्री नहीं लगाती सरकार, लेकिन इनमें छुपा है आपके बच्चे की सेहत का राज

Vaccines for Children not covered in Immunization schedule: भारत में जन्‍म के बाद से ही सरकार राष्‍ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत निशुल्‍क टीके लगवाती है ताकि बच्‍चे का गंभीर संक्रामक रोगों से बचाव हो सके. इनमें जन्‍म से ही बीसीजी, डीपीटी के टीके के साथ मम्‍स, रूबेला, मीजल्‍स, टिटनेस, ओरल पोलियो ड्रॉप के अलावा ओपीवी और हेपेटाइटिस बी के टीके और कुछ बूस्‍टर्स आदि लगाए जाते हैं. हालांकि इसके बावजूद कुछ ऐसी गंभीर बीमारियां हैं, जिनकी वैक्‍सीन भारत में मौजूद भी हैं और आपके बच्‍चे को इसकी जरूरत भी है लेकिन चूंकि वे राष्‍ट्रीय टीकाकरण में शामिल नहीं हैं और फ्री नहीं लगते तो अधिकांश लोग उन्‍हें अपने बच्‍चों को नहीं लगवाते हैं. हेल्‍थ एक्‍सपर्ट की मानें तो इन टीकों को भले ही सरकार नहीं लगवा रही लेकिन इन्‍हें आप निजी रूप से अपने बच्‍चों के लगवा सकते हैं और उन्‍हें स्‍वस्‍थ रख सकते हैं.

आइए नेशनल टैक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्‍यूनाइजेशन के चीफ डॉ. नरेंद्र कुमार अरोड़ा से जानते हैं उन 5 वैक्‍सीन के बारे में जो आपके बच्‍चों की सेहत के लिए बेहद जरूरी हैं और इन्‍हें आप किसी भी प्राइवेट क्‍लीनिक या अस्‍पताल में जाकर लगवा सकते हैं.

1. इन्‍फ्लूएंजा फ्लू की वैक्‍सीन (Influenza Vaccine)
छोटे बच्‍चे अक्‍सर इन्‍फ्लूएंजा यानि सीजनल फ्लू की चपेट में आते हैं. जब भी मौसम बदलता है, बच्‍चों को सर्दी, खांसी, बुखार और जुकाम हो जाता है. ऐसे में मौसमी वायरल संक्रमण से बचने के लिए 5 साल तक के बच्‍चों को इन्‍फ्लूएंजा फ्लू की वैक्‍सीन लगवाई जा सकती है. यह वैक्‍सीन भारत में उपलब्‍ध है और इसकी अनुमानित कीमत 1800 से 2000 के बीच है. हालांकि इसे लगवाने से करीब 1 साल तक बच्‍चे को बार-बार होने वाले वायरल संक्रमण से राहत मिल जाती है.

2. टायफॉइड का टीका (Typhoid Vaccine)
टाइफॉइड सिर्फ छोटे बच्‍चों को ही नहीं बल्कि बड़ों को भी होता है. ज्‍यादातर आबादी कभी कभी इस बीमारी की शिकार हो ही जाती है. टाइफॉइड का टीका भी अपने देश में उपलब्‍ध है लेकिन चूंकि यह इम्‍यूनाइजेशन कार्यक्रम में शामिल नहीं है तो इसे भी प्राइवेट तरीके से ही लगवाना होगा. कुछ लोग टॉइफाइड की वैक्‍सीन को लगवाने में पैसे खर्च होंगे इसलिए नहीं लगवाते हैं. जबकि इसे लगवाना चाहिए. अच्‍छी बात है कि यह टीका 2 साल की उम्र के बाद कभी भी लगवाया जा सकता है. कोई भी महिला और पुरुष दो तरह से टायफॉइड का टीका ले सकते हैं, पहला है टाइफाइड कंजुगेट वैक्‍सीन यानि इंजेक्‍शन के माध्‍यम से और दूसरा है टीवाई 21 ए यानि ओरल वैक्‍सीन के रूप में.

3. रेबीज
पब्लिक हेल्‍थ में रेबीज का टीका काफी मायने रखता है. कुत्‍ता, बंदर या बिल्‍ली के काटने से फैलने वाला रोग रेबीज काफी खतरनाक होता है. भारत में एंटी रेबीज वैक्‍सीन लगाई जाती है. खासतौर पर जिन घरों में कुत्‍ते, बिल्‍ली पाले जाते हैं, या जिन मुहल्‍लों और इलाकों में ये जानवर खुले घूमते हैं, वहां के लोगों को यह टीका लगवाना चाहिए.

4. हेपेटाइटिस ए का टीका (Hepatitis A Vaccine)
हेपेटाइटिस बी का टीका तो राष्‍ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में है लेकिन हेपेटाइटिस ए यानि एचएवी वायरस का टीका इस कार्यक्रम में नहीं है और यह फ्री भी नहीं लगता लेकिन इसे लगवाना सही है. इस वैक्‍सीन को 1 साल की उम्र के बाद कभी भी लगवाया जा सकता है. हेपेटाइटिस ए से होने वाले 70 फीसदी मामलों में लिवर का गंभीर रोग पीलिया होता है यह संक्रमित खाने-पीने से एक दूसरे में भी फैल जाता है. भारत में कई बार इसका आउटब्रेक भी देखा गया है. इसलिए कुछ पैसा खर्च करके अपने बच्‍चों को एचएवी कवर देना फायदे का सौदा है.

5. ह्यूमन पैपिलोमा वायरस की वैक्‍सीन (HPV Vaccine)

भारत सरकार ने 9 से 14 साल की लड़कियों को फ्री एचपीवी वैक्‍सीन देने का फैसला किया है. हालांकि लड़कों को लेकर ऐसी कोई घोषणा नहीं हुई है लेकिन एक्‍सपर्ट की मानें यह दोनों के लिए ही जरूरी है. इसे लड़के और लड़क‍ियों दोनों को ही शारीरिक संपर्क में आने से पहले दे दिया जाए तो यह बहुत ज्‍यादा कारगर है.

हाल ही में सीरम इंस्‍टीट्यूट ऑफ इंडिया की ओर से बनाई गई एचपीवी की वैक्‍सीन को बच्‍चे ही नहीं महिलाएं 46 की उम्र तक लगवा सकती हैं, वहीं पुरुष भी इस वैक्‍सीन को बेस्‍ट रिजल्‍ट के लिए 26 साल की उम्र से पहले-पहले या इससे ज्‍यादा उम्र में भी लगवा सकते हैं.




मिल गया कैंसर का इलाज! पहली बार भारतीय थेरेपी से मरीज कैंसर मुक्त घोषित, जानिए क्या है ये

कुछ महीने पहले, भारत के दवा नियामक सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन-सीडीएससीओ ने सीएआर-टी सेल थेरेपी के व्यावसायिक उपयोग को मंजूरी दी थी. यह थेरेपी कई रोगियों के लिए जीवनरक्षक बन गई है, जिनमें दिल्ली स्थित गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट कर्नल डॉ. वीके गुप्ता भी शामिल हैं. डॉ. गुप्ता के पास भारतीय सेना में काम करने का 28 साल का अनुभव है. उन्होंने केवल 42 लाख रुपये भुगतान करके ये थेरेपी हासिल की है, जबकि विदेशों में इसी तरह की थेरेपी की कीमत 4 करोड़ रुपये से अधिक है. अमेरिका में साल 2017 में इस थैरेपी को मंजूरी दी गई थी.

ये थेरेपी NexCAR19, ImmunoACT ने विकसित की है, जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (IITB), IIT-B और टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में स्थापित कंपनी है. यह बी-सेल कैंसर (प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाओं में बनने वाले कैंसर के प्रकार) जैसे ल्यूकेमिया और लिम्फोमा के इलाज पर केंद्रित है.

सीडीएससीओ ने पिछले साल अक्टूबर में इस थेरेपी के कॉमशियल इस्तेमाल की अनुमति दी थी. अभी ये भारत के 10 शहरों के 30 हास्पिटलों में उपलब्ध है. इसकी मदद से 15 साल से अधिक आयु के मरीज जो बी-सेल कैंसर से पीड़ित हैं, उनका उपचार किया जा सकता है.

ब्लड कैंसर का इलाज
काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर CAR-T सेल थैरेपी से ब्लड कैंसर का इलाज किया जाता है. इस थेरेपी का इस्तेमाल लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमिया और बी-सेल लिंफोमा जैसे गंभीर कैंसर के इलाज में किया जाएगा. एंटीजन रिसेप्टर (सीएआर)-टी सेल थेरेपी कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एक एडवांस तकनीक है. इस तकनीक की मदद से मरीज के शरीर में मौजूद व्हाइट ब्लड सेल्स के टी सेल्स को निकाला जाता है.इसके बाद टी सेल्स और व्हाइट ब्लड सेल्स को अलग करके संशोधित करने के बाद मरीज के शरीर में डाला जाता है. ये प्रक्रिया एक ही बार की जाती है. इसके बाद शरीर में टी सेल्स कैंसर से लड़ने और उन्हें खत्म करने का काम करते हैं.

ब्लड कैंसर के मरीज की सेल से ही सीएआर टी सेल थेरेपी दी जाती है. यह थेरेपी ब्लड कैंसर के ऐसे मरीजों पर भी कारगर साबित हो रही है जिन पर सभी तरह के इलाज फेल हो गए हैं. इसलिए अब दूसरा इलाज देने की बजाय सीधे इसी थेरेपी से इलाज किया जा रहा है.

अमरीका के मुकाबले बहुत सस्ती
अपोलो समूह के सभी अस्पतालों द्वारा अभी तक 16 मरीजों को सीएआर-टी सेल थेरेपी दी गई है. 2012 में सबसे पहले अमेरिका में इस थेरेपी से एक मरीज का इलाज किया गया था, जो सफल रहा. इसके बाद 2014 में भारत में इस तकनीक को विकसित करने का काम आईआईटी मुंबई ने शुरू किया था. भारत में यह तकनीक अमरीका के खर्च के दसवें हिस्से में ही उपलब्ध है. हालांकि, आम लोगों के लिए यह महंगी है.

थेरेपी देने के बाद मरीज को एक से दो सप्ताह तक हॉस्पिटल में भर्ती रखना पड़ता है, जिससे उसकी अच्छे से देखभाल की जा सके और होने वाले साइड इफेक्ट का भी उपचार किया जा सके.

क्या है सीएआर-टी सेल थेरेपी
सीएआर-टी सेल थेरेपी को अक्सर ‘लिविंग ड्रग्स’ के रूप में जाना जाता है. इसमें एफेरेसिस नामक प्रक्रिया के माध्यम से रोगी की टी-कोशिकाओं (एक प्रकार की सफेद रक्त कोशिकाएं जिनका कार्य कैंसर कोशिकाओं से लड़ना है) को निकालना शामिल है.
फिर इन टी-कोशिकाओं को एक नियंत्रित प्रयोगशाला सेटिंग के अधीन एक सुरक्षित वाहन (वायरल वेक्टर) द्वारा आनुवंशिक रूप से संशोधित किया जाता है, ताकि वे अपनी सतह पर संशोधित कनेक्टर्स को अभिव्यक्त कर सकें जिन्हें काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर्स (सीएआर) कहा जाता है.

इन सीएआर को विशेष रूप से एक प्रोटीन को पहचानने के लिए डिज़ाइन किया जाता है, जो कुछ कैंसर कोशिकाओं पर असामान्य रूप से अभिव्यक्त होता है. फिर उन्हें वांछित खुराक तक बड़ी मात्रा में तैयार किया जाता है और सीधे रोगी को लगा दिया जाता है.