गर्मियों में रोज खाएं दही…स्ट्रेस होगा गायब! वजन भी होगा कम, और फायदे जान हो जाएंगे हैरान

उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत में गर्मी लगातार तेजी से बढ़ रही है. तेज धूप, बढ़ते तापमान और गर्म हवाओं के करण शरीर में पानी की कमी होने लगती है जिसे डिहाइड्रेशन कहते हैं. ऐसे में लोग शरीर को शीतल बनाए रखने के लिए अपनी डाइट में बदलाव करते हैं. वह अपनी डाइट में उन्हीं फूड्स को शामिल करते हैं जिन फूड्स की तासीर ठंडी होती है, उन्हें ज़रूर खाना चाहिए जैसे तरबूज़, खरबूज़ फल, लस्सी, छाछ, आम का पना और दही. दही एक ऐसी चीज़ है जिसे आपको हर मील में लेना चाहिए. .

रायबरेली की आयुर्वेदिक चिकित्सालय शिवगढ़ की प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ. स्मिता श्रीवास्तव (बीएएमएस आयुर्वेद) बताती हैं कि गर्मियों में रोज दही के सेवन से न सिर्फ आपका शरीर ठंडा रहता है बल्कि स्वास्थ्य भी बेहतर होता है. दही शरीर में पैदा होने वाली अत्यधिक गर्मी को कम करने में मदद करता है और स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है. गर्मियों के मौसम में दही का सेवन करने से हमारे शरीर में डिहाइड्रेशन नहीं होता. दही में कैल्शियम के अलावा प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, मैग्नीशियम, पोटेशियम, सोडियम, फॉस्फोरस, जिंक, कॉपर, सेलेनियम, विटामिन-सी, विटामिन-बी 6, विटामिन-ए, विटामिन-बी, विटामिन-के जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं. दही का प्रतिदिन सेवन करने से हमारे शरीर की इम्युनिटी मजबूत होती है.

स्ट्रेस बस्टर भी है दही
डॉ. स्मिता श्रीवास्तव ने Local 18 को बताया कि गर्मी के मौसम में दही न सिर्फ हल्का बल्कि सबसे फायदेमंद फूड है. यह आपको गर्म तापमान में हाइड्रेट करने के साथ एनर्जी के स्तर को भी बढ़ाता है. इसमें आप थोड़ा-सा नमक और चीनी मिलाकर खा सकते हैं. दही स्ट्रेस बस्टर भी है, जो आपके बेचैनी को तुरंत कम कर सकता है. दही आंत की सेहत को दुरुस्त रखता है. दही प्रोबायोटिक भी होता है जो हमारी हड्डियों दांतों को मजबूत करने के साथ ही हमारा वजन घटाने में भी कारगर होता है. इसमें कुछ ऐसे बैक्टीरिया पाए जाते हैं जो हमारे शरीर की इम्युनिटी को मजबूत करने में कारगर होते हैं.

Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Denvapost किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.




अद्भुत! 6 बीमारियों की छुट्टी कर देगी चिरोल, पत्तियां पीलिया से लेकर गठ‍िया तक में कारगर, जानें कई और अचूक फायदे

अद्भुत! 6 बीमारियों की छुट्टी कर देगी बंदर बाटी, पत्तियां पीलिया से लेकर गठ‍िया तक में कारगर, जानें कई और अचूक फायदे

Benefits Of Chilbil Leaf: आयुर्वेद में तमाम ऐसे पेड़-पौधों का जिक्र है, जो सेहत के लिए औषधि की तरह काम करते हैं. चिलबिल इनमें से एक है. इसको कान्‍जो, वाओला, स‍िलब‍िल, कांजू, चिरोल, बंदर पापड़ी और बंदर बाटी जैसे कई नामों से जाना जाता है. इसके फायदों को देखते हुए इसे औषधीय पेड़ भी कहा जा सकता है. आयुर्वेद में च‍िलब‍िल पेड़ की पत्तियां, बीज और छाल का इस्‍तेमाल औषधि के रूप में क‍िया जाता है. दरअसल, चिलबिल की पत्तियों में मौजूद गुण गठ‍िया रोग, डायब‍िटीज, एक्‍ज‍िमा, पीलिया आद‍ि बीमार‍ियां को ठीक करने की क्षमता रखते हैं. राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय लखनऊ के आयुर्वेदाचार्य डॉ. सर्वेश कुमार ने इसके फायदों के बारें में बताया है.

01

Canva

पीलिया का बुखार ठीक करे: डॉ. सर्वेश कुमार बताते हैं कि पीलिया का बुखार शरीर को तोड़ देता है. इससे इंसान का शरीर पीला पड़ जाता है. इससे निजात पाने के लिए लोग तमाम चीजों का सेवन करते हैं, लेकिन चिलबिल की पत्तियां अधिक कारगर साबित हो सकती हैं. इसके लिए चिलबिल की पत्तियों को पीस लें, फिर इसमें काली मिर्च और लहसुन को पका कर इसका जूस पी सकते हैं. वहीं, सामान्य बुखार में आप छाल के लेप को भी माथे पर लगा सकते हैं. (Image- Canva)

02

Canva

गठ‍िया दर्द ठीक करे: चिलबिल की पत्तियों में एंटी इंफ्लेमेटरी गुण होता है. ये सूजन को कम करने में मदद करता है, साथ ही दर्द से भी राहत दिलाता है. ऐसे में यदि आपके घुटने या जोड़ों में दर्द की समस्‍या है तो आप च‍िलब‍िल का इस्‍तेमाल कर सकते हैं. इसके लिए आपको च‍िलब‍िल के पत्तों को धोकर पीसना है और उसका लेप बनाकर दर्द वाली जगह पर लगाना है. ऐसा करने से आपका दर्द दूर हो जाएगा. आप चाहें तो इसके अर्क का सेवन भी किया जा सकता है. (Image- Canva)

03

Canva

पेट दर्द से निजात: पेट दर्द होने पर चिलबिल की पत्तियों का सेवन काफी कारगर हो सकता है. दरअसल, ये दो तरीके से काम करता है. पहले तो ये दर्द को शांत करता है और फिर पेट को राहत दिलाता है. ये गैस की समस्या में भी कारगर है. तो, चिलबिल की पत्तियों को पीस लें और फिर इसे शहद में मिला कर इसका सेवन करें. ये पेट दर्द से राहत दिलाने में कारगर तरीके से काम करेगा. (Image- Canva)

04

Canva

एक्जिमा: एक्जिमा में चिलबिल की पत्तियां काफी कारगर तरीके से काम कर सकती है. चिलबिल की पत्तियां खुजली और जलन को कम करने में मदद कर सकती है. आप इन पत्तियों को पीस कर और इसमें कपूर मिला कर अपनी खुजली वाली जगहों पर लगा सकते हैं. इसका एंटीबैक्टीरियल और एंटीइंफ्लेमेटरी गुण एक्जिमा से राहत दिलाने में मददगार होगा. (Image- Canva)

05

Canva

दाद-खाज खुजली: दाद-खाज खुजली में चिलबिल काफी कारगर तरीके से काम कर सकता है. ये एंटीबैक्टीरियल और एंटीइंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर है जो कि दाद-खाज को कम करने में मदद कर सकता है. इसके लिए चिलबिल की पत्तियों को पीस लें और इसमें कपूर व नारियल तेल मिला कर लगा लें. रेगुलर इसका इस्तेमाल इस समस्या से निजात पाने में मदद करेगा. (Image- Canva)

06

Canva

ब्‍लड शुगर कंट्रोल करे: यदि आपको डायब‍िटीज है तो आपको ब्‍लड शुगर लेवल कंट्रोल करने के ल‍िए च‍िलब‍िल का इस्‍तेमाल करना चाह‍िए. च‍िलब‍िल की छाल को पीसकर पाउडर बना लें और उसमें आंवला का चूरण बनाकर आपको करीब दो ग्राम हर द‍िन लेना है इससे ब्‍लड शुगर लेवल कंट्रोल रहेगा. (Image- Canva)




छिलके जैसी उतर रही है हाथों-पैरों की त्वचा, हो सकते हैं ये बड़े कारण, 5 उपायों से पाएं छुटकारा, दोबारा सॉफ्ट होगी स्किन

What is skin Peeling: अक्सर कुछ लोगों के हाथों और पैरों की त्वचा की ऊपरी परत छिलके (Skin Peeling On Hand) की तरह सूखकर उतरने लगती है. यह देखने में अजीब सा लगता है. वैसे तो ये मानसून सीजन में अधिक होता है, लेकिन कुछ लोगों को गर्मी के मौसम में भी ये समस्या होने लगती है. इसे स्किन पीलिंग (Skin Peeling) कहा जाता है, जिसमें त्वचा की ऊपरी परत हटने लगती है. स्किन की परत कई कारणों से उतरने लगती है. मायोक्लिनिक डॉट ओआरजी में छपी एक खबर के अनुसार, स्किन लगातार पर्यावरणीय तत्वों के संपर्क में रहती है. धूप, हवा, गर्मी, ड्राइनेस और हाई ह्यूमिडिटी से त्वचा में जलन होने से त्वचा छिल सकती है. कई बार स्किन पीलिंग निम्न कारणों से हो सकती है-

स्किन पीलिंग के कारण (Causes of peeling skin)
आनुवंशिक रोग, जिसमें दुर्लभ त्वचा विकार, जिसे एक्रल पीलिंग स्किन सिंड्रोम कहते हैं. ये भी त्वचा की ऊपरी परत को हटाने का कारण बनता है.
केमिकल युक्त साबुन, क्रीम आदि का अधिक इस्तेमाल
एलर्जिक रिएक्शन
इंफेक्शन, फंगल इंफेक्शन
कैंसर और इसका ट्रीटमेंट
ड्राई स्किन
मेडिकेशन साइड एफेक्ट्स
कॉन्टैक्ट डर्मटाइटिस
एथलीट्स फूट
सोरायसिस
सनबर्न
पोषक तत्वों की कमी

त्वचा के छिलने की समस्याओं को दूर करने के उपाय
1 अगर आपकी भी हाथों और पैरों की त्वचा से स्किन उतर रही है तो आप इस बात पर गौर करें कि कहीं आपकी स्किन बहुत अधिक ड्राई तो नहीं रहती है. रूखी त्वचा के कारण त्वचा बार-बार छिलती है तो अपने हाथों को 10 मिनट के लिए गर्म पानी में डुबाकर रखें. इससे आपके हाथ और पैर मुलायम बनेंगे. ड्राइनेस दूर होगी.

2 इस समस्या को दूर करने के लिए विटामिन ई तेल से हथेलियों की मालिश करें. इससे नमी बनाए रखने में मदद मिलेगी. हाथों में चमक आएगी, ड्राइनेस दूर होगी.

3 हाथों की ड्राइनेस, सनबर्न, सोरायसिस आदि पर आप एलोवेरा जेल लगा सकते हैं. इससे मालिश करें और थोड़ी देर ऐसे ही रहने दें. गर्म पानी से धोएं और नारियल का तेल लगा लें.

4 नारियल का तेल लगाने से भी अपने हाथों की ड्राइनेस दूर कर सकते हैं. ये तेल लगाकर 5 मिनट तक मसाज करें.

5. पानी का सेवन पर्याप्त मात्रा में करते रहें. इससे स्किन में नमी बनी रहेगी. हाइड्रेटेड रहने से आपको ये समस्या नहीं होगी.




सद्गुरु जग्‍गी वासुदेव की तरह तेज सिरदर्द, फिर ब्रेन में ब्‍लीडिंग, जान लें कौन सी बीमारी के हैं लक्षण?

Sadhguru Jaggi Vasudev: आध्‍यात्मिक गुरु सदगुरु जग्‍गी वासुदेव की हाल ही में अपोलो अस्‍पताल में ब्रेन की सर्जरी हुई है. सद्गुरु को अचानक मस्तिष्‍क की ऐसी गंभीर बीमारी ने घेर लिया था कि उनको 17 मार्च को अस्‍पताल में भर्ती किया गया और डॉक्‍टरों की टीम ने आनन-फानन में इस सर्जरी को अंजाम दिया.

नई दिल्‍ली के इंद्रप्रस्‍थ अपोलो अस्‍पताल में सद्गुरु की सर्जरी करने वाले सीनियर कंसल्‍टेंट न्‍यूरोलॉजिस्‍ट डॉ. विनीत सूरी ने बताया कि की इस बीमारी की शुरुआत चार हफ्ते पहले हुई जब उन्‍हें अचानक सिर में तेज दर्द महसूस हुआ. इस दर्द को वे कई हफ्तों से झेल रहे थे और इसे इग्‍नोर कर अपने रूटीन काम कर रहे थे. हालांकि 15 मार्च को एक बार फिर तेज दर्द होने के बाद उनकी हालत बिगड़ती चली गई. एमआरआई और सीटी स्‍कैन में सद्गुरु के ब्रेन में ब्‍लीडिंग और सूजन का भी पता चला. फिलहाल सद्गुरु की हालत तो स्थिर है और वे ठीक हो रहे हैं. लेकिन आपको बता दें कि यह बीमारी किसी भी व्‍यक्ति को हो सकती है. आइए जानते हैं इसके बारे में…

दिमाग में ब्‍लीडिंग यानि हो सकता है ये…
जब दिमाग में खून की नसें कमजोर और दवाब में होती हैं तो हैमरेजिक स्‍ट्रोक यानि इंट्रासेरेब्रल हैमरेज हो सकता है. इसमें ब्रेन में ब्‍लीडिंग हो सकती है. इसकी शुरुआत सिर में गंभीर दर्द से होती है.

किन वजहों से होती है ये बीमारी..
. ऐसा होने का मुख्‍य कारण हाई ब्‍लड प्रेशर हो सकता है. लंबे समय से चले आ रहे ब्‍लड प्रेशर के चलते यह झटका लगता है.
. धूम्रपान की वजह से भी हैमरेजिक स्‍ट्रोक होता है.
. मोटापा भी इसके लिए जिम्‍मेदार होता है.
. अगर किसी का आहार खराब है, ज्‍यादा कैलोरी वाला है या एमाइलॉइड नाम का प्रोटीन दिमाग की धमनियों में जम गया है तो ये परेशानी हो सकती है.

क्‍या होते हैं लक्षण
. इसमें गंभीर सिरदर्द होता है.
. कमजोरी होती है.
. शरीर के एक तरफ सुन्‍न हो जाता है.
. देखने में दिक्‍कत हो सकती है.
. सोचने-समझने की क्षमता कम हो जाती है.

सभी लोग रखें ध्‍यान
सद्गुरु को जो दिक्‍कत हुई है वह किसी भी आम इंसान को हो सकती है. खासतौर पर बीपी के मरीजों को. ऐसे में अगर ऐसा कोई लक्षण सामने आए तो बीमारी को बिना इग्‍नोर किए तत्‍काल डॉक्‍टर की सलाह लेनी चाहिए.




कुत्‍ता काट ले तो कहां लगवाएं रेबीज की मुफ्त वैक्‍सीन, प्राइवेट अस्‍पताल में ए‍क डोज कीमत से लेकर जानें सब कुछ

Anti Rabies Vaccine after Dog Biting: अगर कुत्‍ता या बिल्‍ली काट ले तो घबराएं नहीं. बल्कि काटे हुए घाव को कपड़े धोने वाले साबुन और पानी की धार से करीब 15 मिनट तक लगातार धोएं. इसके बाद बिना देर किए सीधे एंटी रेबीज की वैक्‍सीन लगवाने के लिए मरीज को अस्‍पताल लेकर जाएं. 24 घंटे के अंदर रेबीज की वैक्‍सीन का लगना जरूरी है.

भारत सरकार, एंटी रेबीज कंट्रोल प्रोग्राम के तहत रेबीज की वैक्‍सीन मुफ्त लगाती है. आज आपको बताते हैं कि यह वैक्‍सीन आखिर किन अस्‍पतालों में मिलती है? क्‍या प्राइवेट अस्‍पतालों में इस वैक्‍सीन के लिए कोई चार्ज देना पड़ता है?

कुत्‍ता काट ले तो वैक्‍सीन के लिए कहां जाएं?
वैसे तो भारत सरकार और राज्‍य सरकारों की ओर से सभी सरकारी अस्‍पतालों, सीएचसी और पीएचसी सेंटरों पर एंटी रेबीज वैक्‍सीन उपलब्‍ध कराई जाती हैं. कई बार इन वैक्‍सीनों के कम टेंपरेचर पर रखरखाव और 6 दिनों के अंदर वायल खत्‍म करने की बाध्‍यता के चलते यह वैक्‍सीन छोटे सरकारी अस्‍पतालों या सेंटरों पर नहीं उपलब्‍ध नहीं रहती. ऐसे में जिला अस्‍पताल बेहतर विकल्‍प हो सकता है.

. दिल्‍ली में आरएमएल, सफदरजंग अस्‍पताल, लोकनायक जयप्रकाश अस्‍पताल, जीटीबी अस्‍पताल, दीनदयाल उपाध्‍याय अस्‍पताल, हिंदू राव अस्‍पताल, चाचा नेहरू अस्‍पताल आदि में यह एंटी रेबीज वैक्‍सीन फ्री मिलती है.

. नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद आदि शहरों में जिला अस्‍पतालों में यह वैक्‍सीन 24 घंटे मुफ्त उपलब्‍ध रहती है.

. प्राइवेट अस्‍पतालों या एंटी रेबीज क्‍लीनिकों या निजी अस्‍पतालों में भी रेबीज की वैक्‍सीन मिलती है हालांकि इसके लिए चार्ज देना पड़ता है.

कितनी वैक्‍सीन लगती हैं?
कई साल पहले कुत्‍ता, बिल्‍ली या बंदर के काटने पर एंटी रेबीज वैक्‍सीन की 9 डोज पेट पर दी जाती थीं लेकिन अब सिर्फ 4 और 5 डोज बांह पर और बच्‍चों की जांघ पर लगाई जाती हैं.

इंड्राडर्मल या इंट्रामस्‍कुलर..
. आजकल वैक्‍सीन दो तरह से लगती है. इंट्रामस्‍कुलर यानि हाथ की मांसपेशी के अंदर लगती है और इसकी कुल 5 डोज, डॉग या एनिमल बाइट एक्‍सपोजर के 0, तीसरे, सातवें, 14वें और 28 वें दिन लगती है.

. जबकि दूसरी वैक्‍सीन है इंट्राडर्मल वैक्‍सीन जो त्‍वचा की लेयर के अंदर लगती है. यह उसी दिन, तीसरे, सातवें और 28 वें दिन पर लगती है. आजकल ज्‍यादातर अस्‍पतालों में यही वैक्‍सीन लगाई जा रही है.

प्राइवेट अस्‍पताल में क्‍या है कीमत
. प्राइवेट अस्‍पतालों में एंटी रेबीज क्‍लीनिकों में वैक्‍सीन की एक डोज की कीमत 250 रुपये से 300 रुपये तक होती है. ऐसे में 4 डोज के लिए 1200 रुपये तक देने पड़ते हैं. हालांकि पैसिव इम्‍यूनिटी के लिए एक बार लगने वाले एंटी रेबीज सीरम की कीमत 1500 से 2000 के आसपास होती है. जबकि सरकारी अस्‍पतालों में यह वैक्‍सीन पूरी तरह निशुल्‍क है.

वैक्‍सीन के बाद हो सकती हैं ये दिक्‍कतें
. वैक्‍सीन वाली जगह पर हल्‍की खुजली हो सकती है.
. बुखार आ सकता है.
. बॉडी पेन हो सकता है.
. त्‍वचा पर लाल दाने हो सकते हैं.
. सिरदर्द
. ऊबकाई आना
. पेट में दर्द
. थकान

वैक्‍सीन लगने के बाद क्‍या न करें
. इंजेक्‍शन लगी जगह को रगड़ें या खुजलाएं नहीं.
. अगर वैक्‍सीन वाली जगह पर दर्द भी हो रहा हो तो वहां कुछ भी न लगाएं.
. सबसे जरूरी बात है कि रेबीज वैक्‍सीन के कोर्स को जरूर पूरा करें.

रेबीज की मौजूद हैं ये वैक्‍सीन
एनसीडीसी की एंटी रेबीज कंट्रोल प्रोग्राम की गाइडलाइंस कहती हैं कि जो भी वैक्‍सीन डीजीसीआई ने अप्रूव की हैं, वहीं लगाई जानी चाहिए. फिलहाल आरएमएल अस्‍पताल में रेबीज ह्यूमन डिप्‍लोइड सेल वैक्‍सीन (Rabies human diploid cell vaccine), वैरो सैल वैक्‍सीन (Vero cell rabies vaccine) लगाई जाती हैं. इस वैक्‍सीन की एक डोज में .1 एमएल लगता है.




भर भर के खाते हैं विटामिन D, मल्‍टी-विटामिन की गोलियां, असर जानकर उड़ जाएंगे होश

Vitamin D Supplement: आप भी मेडिकल स्‍टोर से विटामिन डी, ई या मल्‍टीविटामिन की गोलियां झोला भरकर घर ले आते हैं और फिर सपरिवार रोजाना इनका सेवन करते हैं तो आपको यहीं रुकने की जरूरत है. अगर आप दलील देते हैं कि आपके लिए तो डॉक्‍टर ने विटामिन की गोलियां पर्चे पर लिखी थीं और बिला नागा खाने का आदेश दिया था. ये गोलियां तो नुकसान भी नहीं करती हैं, तो फिर इन्‍हें खाने में क्‍या हर्ज है?

तो आपको बता दें कि विटामिन या मल्‍टीविटामिन की गोलिया, लिक्विड या सैशे जितनी चाहे मर्जी नहीं खा सकते. इसकी भी लिमिट होती है. इसकी भी ओवरडोज होती है. शरीर में विटामिन या मिनरल्‍स भी टॉक्सिक लेवल पर पहुंचते हैं और उसके बाद ऐसा जहर फैलाते हैं कि जीवनभर दवा खाने के बाद भी बीमारी ठीक नहीं होती.

विटामिन डी ओवरडोज दे सकती है मौत!

हाल ही में विटामिन डी की ओवरडोज की वजह से यूके में एक बुजुर्ग की मौत का मामला सामने आया था. जबकि भारत में सैकड़ों मरीज अस्‍पतालों में ओवरडोज की वजह से पैदा हुई बीमारियों को लेकर पहुंचते हैं. डॉक्‍टरों की मानें तो विटामिन डी या मल्‍टीविटामिन की ओवरडोज टॉक्सिक हो सकती है.

सप्‍लीमेंट्स की ओवरडोज कर रही बीमार
यथार्थ सुपरस्‍पेशलिटी अस्‍पताल नोएडा एक्‍सटेंशन में नेफ्रोलॉजी विभाग के हेड, सीनियर कंसल्‍टेंट डॉ. उपेंद्र सिंह कहते हैं कि बहुत सारे लोग विटामिन सप्‍लीमेंट्स की ओवरडोज की वजह से किडनी की शिकायतें लेकर आते हैं. किसी भी सप्‍लीमेंट्स की ओवरडोज का खराब असर किडनी पर पड़ता है.

क्‍या होती है ओवरडोज?
आमतौर पर डॉक्‍टर किसी भी व्‍यक्ति में विटामिन डी का लेवल 20 से भी बहुत कम हो जाने पर दो महीने तक विटामिन डी के सैशे या टेबलेट्स देते हैं और फिर उसके बाद लेवल चेक करते हैं. सामान्‍य उम्र में विटामिन डी का लेवल 20 से 40 के बीच होना चाहिए. हालांकि लोग एक बार दवा लिखवाने के बाद महीनों तक इन्‍हें बराबर खाते रहते हैं. वे यह सोचते हैं कि उनमें विटामिन डी बढ़ रहा है, जबकि 50 के पार जाते ही यह टॉक्सिक हो जाता है और यह नुकसान कर रहा होता है.

मरीज कैसे बंद करें ओवरडोज?
डॉ. उपेंद्र कहते हैं कि विटामिन, मल्‍टीविटामिन या कैल्शियम जिस किसी के भी सप्‍लीमेंट्स आपकी जरूरत को देखते हुए डॉक्‍टरों ने जितने दिन के लिए लिखे हैं, बस उतने दिन ही इनका सेवन करें. इसके बाद सेवन को स्‍टॉप कर दें. ध्‍यान रहे कि 3 महीने से ज्‍यादा कोई भी सप्‍लीमेंट अपनी मर्जी से कंटिन्‍यू न करें. ऐसा करके आप ओवरडोज के साइड इफैक्‍ट से बच सकते हैं.




आपका ब्‍लड प्रेशर होता है हाई? किडनी पर आफत आने वाली है, ये है बीपी की खतरनाक रेंज, AIIMS के डॉ. ने दी वॉर्निंग

High Blood Pressure causes kidney disease: हाई ब्‍लड प्रेशर आजकल कॉमन हो गया है. सिर्फ बड़े ही नहीं बच्‍चों में भी बीपी बढ़ने के मामले देखे जा रहे हैं. भारत में तो 30 फीसदी से ज्‍यादा आबादी, यानि कि हर तीसरा व्‍यक्ति इस बीमारी का शिकार हो चुका है. यही वजह है कि जब भी आप किसी भी बीमारी का इलाज कराने अस्‍पताल जाते हैं तो सबसे पहले आपका ब्‍लड प्रेशर नापा जाता है. शायद आपको न पता हो लेकिन हार्ट अटैक से लेकर ब्रेन हेमरेज या ब्रेन स्‍ट्रोक जैसी बीमारियों का कारण बन चुका उच्‍च रक्‍तचाप किडनी के लिए और भी ज्‍यादा खराब है. हाई बीपी की वजह से किडनी फेल्‍योर के मामले बढ़ रहे हैं. ऐसे में प्राइवेट हो या सरकारी अस्‍पताल, किडनी डायलिसिस से लेकर ट्रांसप्‍लांट तक के लिए इनमें मरीजों की लंबी लाइनें लग चुकी हैं और कई-कई साल की वेटिंग चल रही है.

अगर आपको भी हाई ब्‍लड प्रेशर की समस्‍या है और बीपी कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं तो निश्चित मानिए कि आपकी किडनी पर संकट आने वाला है. लेकिन आपको हाई बीपी की इस खतरनाक रेंज के बारे में पता होना बहुत जरूरी है. इतना ही नहीं अगर आपका बीपी फ्लक्‍चुएट करता है, यानि कभी हाई और कभी लो हो जाता है तो यह भी आपकी किडनी की हेल्‍थ के लिए खराब है.

एम्‍स में डिपार्टमेंट ऑफ नेफ्रोलॉजी के एचओडी प्रो. दीपांकर भौमिक कहते हैं कि बीपी और किडनी आपस में जुड़े हुए हैं क्‍योंकि किडनी का एक काम शरीर में ब्‍लड प्रेशर को कंट्रोल करना भी है. भारत में 50 फीसदी आबादी को हाइपरटेंशन की परेशानी है. इन लोगों को ब्‍लड प्रेशर हाई रहता है. अगर बीपी कंट्रोल नहीं होता तो मान लीजिए कि धीरे-धीरे किडनी खराब होने की स्थिति आ सकती है. इसका दूसरा पहलू भी है कि अगर किसी की किडनी खराब होती है तो भी बीपी बढ़ने लगता है. इसलिए बीपी से किडनी खराब होती है और किडनी खराब होने से बीपी बढ़ता है.

ये है बीपी की खतरनाक रेंज
डॉ. भौमिक बताते हैं कि स्‍वस्‍थ रक्तचाप के पैरामीटर 80-120 से थोड़ा आगे बढ़कर देखें तो आमतौर पर एडल्‍ट्स में डायस्‍टोलिक बीपी अधिकतम 80 और सिस्‍टोलिक बीपी अधिकतम 130 तक को नॉर्मल माना जा सकता है, लेकिन जैसे ही इससे आगे 140, 150 या इससे और ऊपर बीपी बढ़ता है तो खतरनाक होता चला जाता है. सिस्‍टोलिक बीपी का 140 से ऊपर बढ़ने से किडनी पर असर पड़ना शुरू हो जाता है.

कई केसेज में देखा जाता है कि कुछ लोगों का बीपी कभी बढ़ता है और कभी एकदम घट जाता है. ऐसी स्थिति में डायस्‍टोलिक बीपी 60-50 तक नीचे चले जाने पर भी कोई दिक्‍कत नहीं देता लेकिन सिस्‍टोलिक बीपी अगर 90 से नीचे चला जाए तो कई कठिनाइयां आने लगती हैं. मरीज को उल्टियां होती हैं, चक्‍कर आते हैं और इसका प्रभाव भी किडनी पर पड़ता है. ऐसे में सिस्‍टोलिक बीपी का 90 की रेंज से नीचे चले जाना भी नुकसानदेह है.

क्‍या होता है सिस्‍टोलिक और डायस्‍टोलिक बीपी..
इसमें समझने वाली चीज है कि जब भी बीपी नापते हैं तो दो तरह से बीपी आता है, एक ऊपर वाला, जिसकी रेंज 120 तक होती है, इसे सिस्‍टोलिक बीपी कहते हैं और दूसरा होता है नीचे वाला, जिसकी रेंज 80 तक होती है, इसे डायस्‍टोलिक बीपी कहते हैं. सिस्‍टोलिक बीपी वह होता है जब दिल धड़कता है, औेर दिल घड़कने के बाद जो शांति रहती है, उस हिस्‍से में नापे गए बीपी को डायस्‍टोलिक बीपी कहते हैं. किडनी हो या हार्ट सिस्‍टोलिक बीपी ही बढ़ने पर परेशानी पैदा करता है.

बार बार चेक कराएं बीपी

डॉ. भौमिक कहते हैं कि अगर आप स्‍वस्‍थ भी हैं तो भी अपने बीपी की जांच नियमित रूप से कराते रहें. वहीं अगर आपको बीपी की समस्‍या है तो आप बीपी की रेंज को बढ़ने मत दीजिए. उसे कंट्रोल करके रखिए. अगर बार-बार आपका बीपी खतरनाक रेंज से ऊपर जाता रहा है तो आपको क्रॉनिक किडनी डिजीज या एक्‍यूट किडनी डिजीज होने के चांसेज हैं.




आपके शरीर में दिखाई दे रहे हैं ये लक्षण? भूल से भी कर दिए इग्‍नोर तो किडनी का बैठ जाएगा भट्टा, जाम हो जाएगा गुर्दे का फंक्‍शन

Kidney kharab hone ke lakshan: किडनी शरीर का बेहद जरूरी अंग है. यह सिर्फ शरीर से हानिकारक रसायनों को बाहर ही नहीं करती बल्कि ब्‍लड प्रेशर को भी कंट्रोल करती है. अगर ये खतरनाक पदार्थ हमारे शरीर से बाहर निकलना बंद हो जाएं और अंदर ही जमा होने लगें तो 24 घंटे भी जिंदा रह पाना मुश्किल है. इसलिए किडनी का ध्‍यान रखना बेहद जरूरी है लेकिन आजकल की लाइफस्‍टाइल से किडनी फंक्‍शन में दिक्‍कतें आ रही हैं. हर उम्र के मरीजों को किडनी की परेशानियां हो रही हैं. हालांकि किडनी खराब होने से पहले कुछ वार्निंग संकेत देती है. अगर आपके भी शरीर में कुछ बदलाव हो रहा है और इन 4 लक्षणों में से कम से कम दो या तीन दिखाई दे रहे हैं तो इग्‍नोर करना बंद कीजिए और मान लीजिए कि आपकी किडनी भी जवाब देने जा रही है और आपको तुरंत किडनी के डॉक्‍टर को दिखाना चाहिए.

ये हैं किडनी में परेशानी के 5 लक्षण

. हाथ पैरों में अचानक सूजन आना- गुड़गांव के मारेंगो एशिया अस्‍पताल में नेफ्रोलॉजी एंड किडनी ट्रांसप्‍लांट मेडिसिन चेयरमैन और एम्‍स नई दिल्‍ली के पूर्व एचओडी नेफ्रोलॉजी डॉ. संजय अग्रवाल कहते हैं कि अगर किसी व्‍यक्ति को हाथ-पैरों या पेट पर किडनी एरिया में अचानक सूजन आनी शुरू हो जाए तो यह किडनी की परेशानी का लक्षण है. उसे तुरंत किडनी की जांच करानी चाहिए.

. पेशाब करने में परेशानी- अगर किसी व्‍यक्ति को पेशाब करने में परेशानी हो रही हो, यूरिन में ब्‍लड आ रहा हो, यूरिन में पस या मवाद आ रहा हो, यूरिन के फ्लो में दिक्‍कत हो, रुक रुक के पेशाब आ रहा हो या कम आ रहा हो तो तत्‍काल किडनी की जांच कराएं.

. डायबिटीज-बीपी की परेशानी है- डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि डायबिटीज और हाई ब्‍लड प्रेशर किडनी के दुश्‍मन हैं. अगर एक युवा व्‍यक्ति को डायबिटीज है और बीपी 130 से ऊपर रहता है तो उसको निश्चित ही किडनी फेल्‍योर या किडनी की दिक्‍कतें शुरू हो सकती हैं. ऐसा व्‍यक्ति किडनी के हाई रिस्‍क ग्रुप में आता है. इसलिए इन लोगों को किडनी का रूटीन चेकअप जरूर कराते रहना चाहिए.

. परिवार में बीमारी- अगर किसी के परिवार में किडनी रोग का इतिहास रहा है या उम्र 60 साल से ऊपर हो चुकी है तो भी किडनी की बीमारी की संभावना बढ़ जाती है. गुर्दे की बीमारी आनुवांशिक रूप से भी आ जाती है.




पुरुषों से महिलाओं में फैलता है ये वायरस और कर देता है तबाह! बन जाता है कैंसर, दिखाई देते हैं बस ये लक्षण

Causes and Symptoms of Cervical Cancer: बीमारी ऐसी चीज है, अगर सावधानी नहीं रखी तो वह किसी से भी और कहीं से भी आ सकती है, फिर चाहे वह चीज या व्‍यक्ति कितना ही प्रिय क्‍यों न हो. आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन एक वायरस ऐसा भी है जो पुरुषों के साथ शारीरिक संपर्क में आने के बाद महिलाओं में फैलता है. यह वायरस धीरे धीरे महिलाओं के गर्भाशय में बढ़ता रहता है और एक समय के बाद जीवन तबाह कर देता है. कई सालों तक इन्‍फेक्‍शन फैलाने के बाद यह वायरस कैंसर बन जाता है. भारत में लाखों महिलाएं हर साल इस कैंसर की वजह से जान गंवाती हैं.

आपको बता दें कि महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर पुरुष के साथ शारीरिक संपर्क में आने के बाद फैलता है. इसके लिए ह्यूमन पैपिलोमा वायरस जिम्‍मेदार होता है. यही वजह है कि भारत सरकार 9 से 14 साल की लड़कियों को सर्वाइकल कैंसर की वैक्‍सीन लगाने का वादा कर चुकी है. ताकि शारीरिक संपर्क की उम्र से पहले ही लड़कियों को सुरक्षित किया जा सके. आइए जानते हैं सर्वाइकल कैंसर के कारण और लक्षणों के बारे में..

सर्वाइकल कैंसर होने के कारण
पीजीआई चंडीगढ़ और लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेजों में दो दशक से ज्‍यादा प्रोफेसर रहीं जानी मानी गायनेकोलॉजिस्‍ट डॉ. शारदा जैन बताती हैं कि सर्वाइकल कैंसर एचपीवी (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) के कारण होता है. एचपीवी शरीर में प्रवेश करके गर्भाशय के अंदरूनी हिस्से में संक्रमण करता है और बिना कोई लक्षण प्रकट किए यह बढ़ता जाता है और कैंसर का रूप ले लेता है. हालांकि 70 फीसदी महिलाओं में यह 30 साल की उम्र तक डायग्‍नोस हो जाता है.

क्‍यों होता है सर्वाइकल कैंसर
सर्वाइकल कैंसर मुख्‍य रूप से हाई रिस्‍क ह्यूमन पैपिलोमा वायरस समूह टाइप्‍स के इन्‍फेक्‍शन की वजह से होता है. एचपीवी के 100 से ज्‍यादा प्रकार हैं, जिनमें से करीब एक दर्जन ऐसे हैं जो कैंसर जैसी बीमारी के लिए जिम्‍मेदार होते हैं. आमतौर पर एचपीवी शारीरिक संबंध बनाने के बाद मेल से फीमेल में ट्रांसफर होता है या ट्रांसमिट होता है. लड़के या पुरुष एचपीवी वायरस के रिजर्वोयर होते हैं. इनसे महिलाओं में यह वायरस फैलकर कैंसर बनाता है.

ये होते हैं सर्वाइकल कैंसर के लक्षण
डॉ. शारदा कहती हैं कि सर्वाइकल कैंसर का पता हेल्‍थ एक्‍सपर्ट स्‍क्रीनिंग से ही लगा सकते हैं. इसका कोई प्रकट लक्षण नहीं दिखाई देता. यही वजह है कि यह सालों-साल छुपा रहता है और भारत में खासकर तीसरी या चौथी स्‍टेज पर जाकर महिलाओं में यह डिटेक्‍ट हो पाता है. तब तक काफी देर हो चुकी होती है और अधिकांश महिलाएं जान गंवा देती हैं.

हालांकि अगर कैंसर फैल रहा है तो कुछ लक्षण सामने आ सकते हैं जैसे वेजाइना से गाढ़ा बदबूदार पदार्थ या खून आ रहा है और उसमें दुर्गंध भी आ रही है तो यह इसका लक्षण हो सकता है. शारीरिक संबंध बनाने के बाद भी अगर ऐसा ही खूनी डिस्‍चार्ज होता है तो यह भी दिक्‍कत है. मासिक धर्म अगर लंबे समय तक चल रहा है और पेशाब करने में दर्द होना भी इसका एक लक्षण है. इसके अलावा कमजोरी, थकान, भूख न लगना, मलाशय में भी दर्द आदि इसके लक्षण हैं.

क्‍या है उपाय
डॉ. कहती हैं कि सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए भारत में वैक्‍सीन बन चुकी है. यह वैक्‍सीन शारीरिक संपर्क में आने के बाद भी उतनी ही कारगर है, जितनी की शारीरिक संबंध बनाने से पहले तक है. इसलिए महिलाएं इस वैक्‍सीन को लगवा सकती हैं. इसके अलावा रुटीन स्‍क्रीनिंग भी एक विकल्‍प है. सर्वाइकल कैंसर 100 फीसदी प्र‍िवेंटेबल है. इससे बचा जा सकता है. बस जागरुकता की जरूरत है.




अस्थमा के मरीजों के लिए वरदान है नालों के किनारे मिलने वाला कांटेदार पौधा! ऐसे करें सेवन

हमारे आसपास ऐसे हजारों पेड़-पौधे और घास मौजूद हैं, जिनका उपयोग दवाओं के निर्माण में होता है .आयुर्वेद में ऐसे पेड़-पौधों को बहुत महत्व दिया जाता है. अक्सर जब जड़ी-बूटियों की बात होती है, तो तुलसी, गिलोय या आंवला की सबसे ज्यादा बात होती है. लेकिन कई ऐसे पौधे हैं जिनको बहुत अधिक महत्व नहीं मिल पाता .ऐसा ही एक पौधा है कटेरी का पौधा. आयुर्वेद में कटेरी को औषधि माना जाता है. यह एक प्रकार का कटीला पौधा है. इसमें एंटी अस्थमा के गुण पाए जाते हैं. इसे कई नामों से जाना जाता है. कुछ जगहों पर कंटकारी, तो कुछ जगहों पर भटकटैया कहा जाता है.

कटेरी को पौधा नहर एवं नालों के किनारे पाया जाता है. जिस पर पीले एवं बैंगनी रंग फूल होते हैं एवं इसकी पत्तियां कंटीली होती हैं. आयुर्वेद में इसका उपयोग विभिन्न रोगों का उपचार में किया जाता है. इसकी कई अन्य प्रजातियां भी पाई जाती हैं जिन्हें छोटी बड़ी और श्वेत कटेरी भी कहते हैं. कंटकारी का मतलब होता है जो गले के लिए अच्‍छी हो. ये अस्थमा गले में खराश आदि समस्‍याओं को दूर करने की क्षमता रखता है.

इन रोगों के इलाज में कारगर
रायबरेली की आयुर्वेदिक चिकित्सक डा.आकांक्षा दीक्षित (एमडी आयुर्वेद) के मुताबिक यह पौधा शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है. इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं. यह कफ और पित्त की समस्याओं को दूर करने में बेहद कारगर होता है. इसका उपयोग कई दवाओं के निर्माण में किया जाता है. इस पौधे की पत्तियां, जड़, फूल सभी औषधि है. इसका स्वाद कड़वा और तासीर गर्म होती है. यह मूत्र संबंधी रोग, बुखार, पथरी को सही करने में कारगर होता है.

इस मात्रा में करें सेवन
डॉ. आकांक्षा दीक्षित बताती हैं कि इसकी पत्तियों का काढ़ा पीने से अस्थमा सही हो जाता है. इसके अर्क का दूध या पानी में मिलाकर सेवन किया जा सकता है. इसके बीजों का धुआं लेने से दांत का दर्द एवं कीड़े गायब हो जाएंगे. इसकी जड़ का उपयोग पथरी के इलाज के लिए किया जाता है. इस जड़ी बूटी का पूरा पौधा, जड़ और फल उपयोग में लाया जाता है. इसका पाउडर 1 से 3 ग्राम, काढ़ा 40 से 80 मि.ली लेना सुरक्षित माना जाता है. डॉ. आकांक्षा दीक्षित बताती हैं कि मरीज की स्थिति और बीमारी के आधार पर इस जड़ी बूटी का रूप और खुराक निर्धारित की जाती है.

Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Denvapost किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.