पाकिस्तान तक पहुंचा मंकीपॉक्स, बढ़ते मामलों ने डराया; भारत में अस्पतालों-हवाई अड्डों पर अलर्ट

खतरनाक एमपॉक्स यानी मंकीपॉक्स अफ्रीका के बाद भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में दस्तक दे चुका है। इसे लेकर हमारे देश के भीतर चिंता बढ़ती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) मंकीपॉक्स प्रकोप को इंटरनेशनल पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर चुका है। डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयसस ने बताया कि 15 अगस्त को मंकीपॉक्स पर आपातकालीन समिति ने बैठक की। इस दौरान बताया गया कि 12 से अधिक देशों में बच्चों और वयस्कों में मंकीपॉक्स के मामलों की पुष्टि हुई है। वायरस का एक नया स्वरूप फैल रहा है। साथ ही, महाद्वीप में टीके की खुराकें बहुत कम उपलब्ध हैं।

वैश्विक स्तर पर एमपॉक्स को लेकर मौजूदा स्थिति को देखते हुए भारत सरकार भी पूरी तरह से अलर्ट है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि मंकीपॉक्स को लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। इसके तहत, इमरजेंसी वार्ड बनाने और हवाई अड्डों पर सतर्कता बढ़ाने जैसे एहतियाती कदम उठाए गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने अस्पतालों को रैशेज वाले मरीजों की पहचान करने के निर्देश दिए हैं। उनके लिए आइसोलेशन वार्ड तैयार करने को कहा गया है। दिल्ली में 3 नोडल अस्पताल (सफदरजंग, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और राम मनोहर लोहिया अस्पताल) को इसके लिए चिह्नित किया गया है।

एयरपोर्ट पर सावधानी बरतने के निर्देश

रिपोर्ट के मुताबिक, संदिग्ध मरीजों की आरटी-पीसीआर और नेजल स्वैब जांच की जाएगी। साथ ही, एयरपोर्ट पर आवश्यक सावधानी बरतने के लिए सतर्क कर दिया गया है। वहीं, कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने अन्य देशों में सामने आए मंकीपॉक्स के मामलों पर चिंता जताई है। उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को पत्र लिखकर मुंबई हवाई अड्डे पर सख्त परीक्षण और पृथकवास नियमों को लागू करने की मांग की। उन्होंने सरकार से भारत में इसके प्रसार को रोकने के लिए उचित कदम उठाने की अपील की। चव्हाण ने एक्स पर कहा, ‘मंकीपॉक्स हमारे पड़ोस तक पहुंच गया है। हमें कार्रवाई करनी होगी। मैंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर ऐसे देशों से आने वाले सभी यात्रियों के लिए मुंबई एयरपोर्ट पर सख्त परीक्षण और पृथकवास नियमों को लागू करने की मांग की है, जहां मंकीपॉक्स संक्रमण का अधिक खतरा है।’

अफ्रीका में गंभीर हो रहे एमपॉक्स के हालात

बता दें कि अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने हाल ही में घोषणा की थी कि मंकीपॉक्स प्रकोप सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति है। इसमें 500 से अधिक मौतें हुई हैं। वायरस के प्रसार को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद का आह्वान किया गया। वहीं, पाकिस्तान में अब तक एमपॉक्स वायरस के कम से कम 3 मरीज पाए गए हैं। सरकार ने इस बीच हवाई अड्डों पर जांच प्रणाली को मजबूत करने का फैसला किया है। पाकिस्तान में एमपॉक्स के मिले मामले एशिया में इस रोग की दस्तक है और यह अधिक आसानी से फैल सकता है। तीनों मरीज उत्तर-पश्चिम में स्थित खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत के हैं, जो अफगानिस्तान की सीमा से लगा उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र है। यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि ये मरीज एमपॉक्स के किस स्वरूप से पीड़ित है। क्या यह वही स्वरूप है जिसकी पुष्टि सबसे पहले अफ्रीका के बाहर स्वीडन में हुई थी।




क्या नाक में तेल डालने से ठीक हो जाती हैं दिमागी बीमारियां और तनाव? काफी फेमस है नस्य विधि

पूरी दुनिया में दिमाग को शांत करने के कई तरीके प्रचलित हैं लेकिन, आयुर्वेद में मौजूद एक अनोखी विधि भी काफी कारगर मानी गई है. आयुर्वेद में “नस्य” विधि का एक महत्वपूर्ण स्थान है जिसमें नाक के जरिए औषधीय तेल या अन्य तरल पदार्थ डालकर इलाज किया जाता है. इसे न केवल नाक और साइनस की समस्याओं के लिए बल्कि मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों के उपचार में भी प्रभावी माना जाता है. आयुर्वेद के अनुसार, नस्य विधि मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को शुद्ध करने का एक शक्तिशाली तरीका है, जो मानसिक विकारों, सिरदर्द, और स्मृति संबंधित समस्याओं को ठीक करने में मदद करती है. आयुर्वेदाचार्य इस विधि की प्रक्रिया और इसके फायदे विस्तार से बताते हैं.

क्या है नस्य विधि
नस्य विधि पंचकर्म की पांच प्रमुख विधियों में से एक है. इसका उद्देश्य शरीर के ऊपरी हिस्से की शुद्धि करना है. इस विधि में औषधीय तेल, घी या अन्य तरल पदार्थ को नाक के जरिए शरीर में प्रवेश कराया जाता है. नाक को “द्वार” माना जाता है जिसके जरिए मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र तक औषधियों को पहुंचाया जा सकता है. आयुर्वेद में कहा गया है कि “नासा ही शिरसो द्वारम.” यानी नाक हमारे मस्तिष्क का प्रवेश द्वार है.

कैसे काम करती है नस्य विधि

1. नाक और मस्तिष्क का कनेक्शन: आयुर्वेद के अनुसार, नाक का सीधा संबंध मस्तिष्क से होता है. नाक के माध्यम से डाले गए औषधीय तेल मस्तिष्क के उन हिस्सों तक पहुँचते हैं जो तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित करते हैं. इससे मानसिक विकार, तनाव और अन्य मस्तिष्क संबंधी समस्याओं का इलाज किया जा सकता है.

2. तंत्रिका तंत्र को संतुलित करना: नस्य विधि का मुख्य उद्देश्य तंत्रिका तंत्र को संतुलित करना है. इसमें उपयोग किए गए तेल तंत्रिकाओं को पोषण देते हैं और उन्हें स्वस्थ रखते हैं. इसके परिणामस्वरूप मानसिक शांति और स्पष्टता प्राप्त होती है.

3.वात दोष को नियंत्रित करना: आयुर्वेद में तीन दोष (वात, पित्त, कफ) होते हैं, जिनका संतुलन स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक होता है. नस्य विधि विशेष रूप से वात दोष को नियंत्रित करने में मदद करती है, जो मानसिक विकारों और तनाव का मुख्य कारण होता है.

नस्य विधि की प्रक्रिया

1. तैयारी: नस्य विधि को करने से पहले शरीर और मन को शांत और स्थिर करना आवश्यक होता है. इसके लिए व्यक्ति को एक आरामदायक स्थिति में बैठाया जाता है. सिर को थोड़ा पीछे की ओर झुकाकर बैठाया जाता है, ताकि नाक के मार्ग से तेल आसानी से मस्तिष्क तक पहुँच सके.

2.तेल का चयन: नस्य विधि के लिए विशेष प्रकार के औषधीय तेलों का उपयोग किया जाता है. ये तेल आयुर्वेदाचार्य द्वारा व्यक्ति की समस्या और दोष के अनुसार चुने जाते हैं. सामान्यतः तिल का तेल, अनुतैल, या ब्राह्मी घृत जैसे औषधीय तेलों का प्रयोग किया जाता है.

3.तेल डालना: नाक की दोनों नासिका छिद्रों में 2 से 5 बूंद तेल डाला जाता है. इसके बाद व्यक्ति को धीरे-धीरे सांस लेने और तेल को अंदर खींचने के लिए कहा जाता है.

4.आराम और मालिश: तेल डालने के बाद व्यक्ति को कुछ मिनटों तक आराम करने की सलाह दी जाती है. साथ ही सिर और गर्दन की हल्की मालिश की जाती है, जिससे तेल आसानी से मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र तक पहुँच सके.

5.शुद्धिकरण: तेल डालने के बाद, व्यक्ति को हल्के से नाक और साइनस को साफ करने के लिए कहा जाता है. इससे शेष तेल और विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जाते हैं.

क्या है नस्य विधि के फायदे
नस्य विधि मस्तिष्क को पोषण देती है, जिससे चिंता, अवसाद, तनाव, और अनिद्रा जैसी मानसिक समस्याओं में सुधार होता है. इस विधि का उपयोग स्मृति शक्ति बढ़ाने और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को सुधारने के लिए भी किया जाता है. नस्य विधि माइग्रेन, साइनसाइटिस, और अन्य प्रकार के सिरदर्द में राहत प्रदान करती है.नस्य विधि तंत्रिका तंत्र को मजबूत करती है और न्यूरोलॉजिकल विकारों का इलाज करती है. नस्य विधि सांस संबंधी समस्याओं जैसे नाक बंद, साइनस, और एलर्जी में भी फायदेमंद होती है.

क्या नस्य विधि सुरक्षित है?.
राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय नगर बलिया के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र यादव (एमडी) बताते हैं कि नस्य विधि को प्रशिक्षित आयुर्वेद चिकित्सक के निर्देशन में किया जाना चाहिए. गलत तरीके से या बिना सही मार्गदर्शन के नस्य विधि का उपयोग करने से समस्याएं हो सकती हैं. यदि व्यक्ति को नाक, साइनस, या श्वसन तंत्र से संबंधित कोई गंभीर समस्या है, तो इस विधि को अपनाने से पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए.




बाजार में जामुन ने दी दस्तक, सेहत के लिए है बेहद गुणकारी

 बारिश के बाद शहर में सीजन का पहला जामुन आ चुका है. बाजार में चारों तरफ जामुन ही जामुन छा गया है. लेकिन क्या आपको पता है कौन सा जामुन है अच्छा. तो आइए आज हम आपको बताएंगे कैसे अच्छे जामुन की पहचान करनी चाहिए. जामुन सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है. इसमें कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं. जामुन को इंडियन ब्लैकबेरी भी कहते है. इसमें एस्ट्रीन्जेंट और एंटी-ड्यूरेटिक जैसे गुण शामिल होते हैं. किसानों के अनुसार जामुन तीन तरह के होते हैं. हल्का नीला, गहरे बैंगनी या काले रंग और फिर छोटे दाने वाला. जिसमें सबसे स्वादिष्ट गहरे बैंगनी या काले रंग वाला जामुन होता है. हल्के नीले रंग का जामुन खट्टा होता है.उसका सेवन करने से आपके दांत खट्टे हो जाएंगे. किसान राजेंद्र सिंह मेहरा ने बताया कि काले रंग का जामुन सबसे ज्यादा स्वादिष्ट होते हैं, उसके अंदर एक बड़ा बीज होता है. तो जब भी आप जामुन खरीदने जाएं तो इसी रंग का जामुन खरीदें. यह आपके स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा होता है.

जामुन को कैसे करें अच्छे से साफ

जामुन खाने से पहले उसे अच्छी तरह से साफ करना ज़रूरी है. सबसे पहले, जामुन को छूने से पहले अपने हाथों को अच्छे से धो लें. जामुन की जितनी मात्रा आप खाने वाले हैं, उसे एक छलनी में निकाल लें और बहते पानी के नीचे धोएं. अगर आपको लगता है कि जामुन पर मिट्टी या गंदगी लगी है, तो उसे ब्रश या स्पॉन्ज से हल्के से साफ़ करें. उसके बाद आप जामुन का सेवन कर सकते हैं.

भरपूर मात्रा में होता है आयरन

हल्द्वानी में आयुर्वेद के वरिष्ठ डॉक्टर विनय खुल्लर ने बताया कि जामुन का इतिहास अगर देखा जाये तो इसको कई सदियों से आयुर्वेदिक उपचार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. जामुन में विटामिन सी और आयरन भरपूर मात्रा में होता है, जो आपके हीमोग्लोबिन काउंट को बेहतर बनाने में मदद करता है. रक्त में ग्लूकोज का स्तर अधिक होने पर जामुन का एक अन्य महत्वपूर्ण घटक एल्कॉजिक एसिड स्टार्च के शर्करा में रूपांतरण को नियंत्रित करने में सहायक है.

Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Denvapost.com किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.




शरीर में विटामिन बी12 की कमी होने पर नजर आते हैं ये 10 गंभीर लक्षण, न करें इग्नोर, जानें किन्हें है अधिक खतरा

Symptoms of Vitamin B12 Deficiency: कई तरह के विटामिंस होते हैं और सभी शरीर के लिए महत्वपूर्ण हैं. इन्हीं में से एक है विटामिन बी12. इस विटामिन की शरीर को एनर्जी प्रोडक्शन, डीएनए सिंथेसिस, सेंट्रल नर्वस सिस्टम फंक्शन, रेड ब्लड सेल्स को बनाने आदि के लिए जरूरी होता है. उम्र के साथ विटामिन बी12 को फूड से एब्जॉर्ब करने की क्षमता कम होने लगती, ऐसे में इसकी कमी बुजुर्गों में कॉमन है. इसका ये मतलब नहीं कि बच्चों, वयस्कों, गर्भवती महिलाओं में इसकी कमी नहीं हो सकती है. विटामिन बी12 की कमी के कारण जब शरीर में रेड ब्लड सेल्स नहीं बनते हैं तो बॉडी में खून की कमी हो जाती है. इस कारण आप एनीमिया से ग्रस्त हो सकते हैं. चूंकि, ये विटामिन शरीर में नहीं बनता है इसलिए इसकी पूर्ति कुछ फूड्स और सप्लीमेंट्स से की जाती है. विटामिन बी12 की कमी के कारण शरीर में कई लक्षण नजर आते हैं. इन लक्षणों को समय पर पहचान लेना कई समस्याओं से बचे रहने के लिए बेहद जरूरी है.

विटामिन बी 12 की कमी के लक्षण
वेबएमडी में छपी एक खबर के अनुसार, यदि आपके शरीर में विटामिन बी12 की कमी है तो आप एनीमिया से ग्रस्त हो सकते हैं. हालांकि, इसकी कमी शरीर में बहुत माइल्ड है तो आपको कोई लक्षण नजर नहीं आएगा, लेकिन अधिक कमी होने से आपको निम्न प्रकार के लक्षण महसूस हो सकते हैं. ये दिखें तो आप डॉक्टर से जरूर संपर्क करें.

– यदि आप विटामिन बी12 की कमी से ग्रस्त हैं तो आपको देखने में समस्या महसूस हो सकती है. विजन लॉस (Vision loss) हो सकता है.
– मानसिक समस्याएं जैसे मेमोरी लॉस, डिप्रेशन, व्यवहार में बदलाव आदि शुरू हो सकती है.
-इस विटामिन की कमी होने से आपको सुन्नपन, झुनझुनी, मांसपेशियों में कमजोरी होने के साथ ही चलने-फिरने में भी दिक्कत आ सकती है.

– बार-बार आपको शरीरिक रूप से कमजोरी, थकान, हल्कापन महसूस हो सकता है.
-दिल की धड़कनें बढ़ना और सांस लेने में तकलीफ महसूस होना भी विटामिन बी 12 की कमी के लक्षण हैं.
– त्वचा का पीला नजर आना, जीभ, मुंह में छाले होना, भी इस विटामिन की कमी के संकेत हो सकते हैं.
– यदि आपको लगातार कब्ज, दस्त, भूख न लगने, गैस बनने की समस्या है तो हो सकता है शरीर में विटामिन बी12 कम हो.
– वजन लगातार कम होना भी इस विटामिन की कमी का संकेत हो सकता है.

विटामिन बी12 फूड सोर्स
विटामिन बी 12 आपको कई खाद्य पदार्थों से प्राप्त हो सकता है. आप एनिमल फूड्स से इसे प्राप्त कर सकते हैं. इसमें डेयरी प्रोडक्ट्स, अंडा, मछली, मीट, चिकन आदि का सेवन कर सकते हैं. साथ ही ब्रोकली, सोयाबीन, दही, मशरूम में भी ये काफी होता है.




आपको ही क्‍यों ज्‍यादा काटते हैं मच्‍छर? स‍िर पर बनाते हैं ऐसा झुंड की प‍िंड छुड़ाना मुश्किल, जान लीज‍िए असली वजह

आपने कभी गौर क‍िया होगा कि शाम के वक्‍त जब आप अपने दोस्‍तों के साथ बाहर खड़े होते हैं तो अक्‍सर क‍िसी एक दोस्‍त के स‍िर पर ही सबसे ज्‍यादा मच्‍छर आपको नजर आते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि अपने दोस्‍तों के बीच आप ही वो हों, ज‍िसके आसपास सबसे ज्‍यादा मच्‍छर घूमते हैं? गर्मियों के आते ही मच्‍छरों ने भी अपना प्रकोप द‍िखाना शुरू कर द‍िया है. शाम के वक्‍त और रात के समय तो कई बार ये मच्‍छर सोने भी नहीं देते. लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि आख‍िर कुछ लोगों को ज्‍यादा मच्‍छर क्‍यों काटते हैं? इसके पीछे वजह है आपका ब्‍लड ग्रुप. आइए बताते हैं कि मच्‍छर के काटने का और आपके ब्‍लड ग्रुप का आपस में क्‍या कनेक्‍शन है.

इस ब्‍लड ग्रुप के खून के प्‍यासे हैं मच्‍छर
दरअसल कई र‍िसर्च में ये बात सामने आ गई है कि इंसानों को स‍िर्फ मादा मच्‍छर ही काटती हैं. उनके काटने के पीछे या कहें आपका खून पीने के पीछे प्रजनन असली वजह होती है. ये मादा मच्‍छर आपके रक्‍त में मौजूद पोषक तत्‍वों को लेने के बाद ही अंडे देती हैं. ऐसे में जापानी वैज्ञान‍िकों की मानें तो A ब्‍लड ग्रुप की तुलना में O ब्‍लड ग्रुप के लोगों के प्रति मच्‍छर ज्‍यादा आकर्ष‍ित होते हैं. ऐसा माना जाता है कि मच्‍छरों को ‘ओ’ ब्‍लड ग्रुप वालों को खून ज्‍यादा पसंद आता है और इसी ब्‍लड ग्रुप के लोगों को ज्‍यादा मच्‍छर भी काटते हैं. कई र‍िसर्च में ये साबित हुआ है कि ‘ओ’ ब्‍लडग्रुप वालों का मेटाबॉल‍िक रेट ज्‍यादा होता है और इसल‍िए मच्‍छर ऐसे लोगों के प्रति आकर्ष‍ित होते हैं.

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मच्‍छर अक्‍सर ओ ब्‍लडग्रुप वाले लोगों के पास आते हैं.  Image: Canva

कार्बन डाईऑक्‍साइड करती है आकर्ष‍ित
इसके साथ ही कार्बन डाईऑक्‍साइड की गंध भी मच्‍छरों को तेजी से इंसानों की तरफ आकर्ष‍ित करती है. मादा मच्‍छर अपने सेंसिंग ऑर्गन से कार्बन डाईऑक्‍साइड की गंध पहचान कर मानव शरीर के प्रति आकर्ष‍ित होती हैं. यही वजह है कि जब आप रात में चैन से सो रहे होते हैं, तब मच्‍छर CO2 की गंध पहचान आपके पास आ जाते हैं.

वैज्ञान‍िकों की मानें तो मानव शरीर के कुछ व‍िशेष फ्लूइड भी मच्‍छरों को आकर्ष‍ित करते हैं, जैसे यूर‍िक एसिड, लैक्‍ट‍िक एस‍िड, अमोन‍िया की महक आदि. ऐसी महक ज‍िन मनुष्‍यों के पास से आती है, मच्‍छर वहां ज्‍यादा मंडराते हैं.




बेल का जूस हमारे शरीर को ठंडा रखने के साथ ही सेहत को कई तरह से फायदा पहुंचाता

गर्मियों के मौसम में पसीना अधिक निकलता है. इसलिए ज्यादा से ज्यादा पानी पीने और बॉडी को हाइड्रेट रखने की सलाह दी जाती है. लेकिन आखिर कितना पानी पीयें. सिर्फ पानी ही काफी नहीं. शरीर को लू से बचाने के लिए कुछ और भी लेना जरूरी है. बेल एक ऐसा फल है जिसका जूस सारी जरूरतें पूरी कर देगा.

बेल का जूस हमारे शरीर को ठंडा रखने के साथ ही सेहत को कई तरह से फायदा पहुंचाता है. बेल का जूस पीने से बॉडी हाइड्रेटेड रहती है और लू लगने का डर भी कम होता है. बेल बीटा-कैरोटीन, प्रोटीन, थायमिन, विटामिन सी (Vitamin C) और राइबोफ्लेविन से भरपूर फल है जो हमारी सेहत के लिए काफी अच्छा माना जाता है.

8 लाख सालाना पैदावार

केसरीपुरा के किसान जय प्रकाश काफी वर्षो से बिल की खेती कर रहे हैं. बेल की खेती करते हुए इन्हें लगभग 14,15 वर्ष हो गए हैं. इनके यहां लगभग 600 पेड़ हैं जो 2 हैक्टर ( लगभग 20 बीघा जमीन ) में लगा रखें हैं. इनसे सालाना 8-7 लाख रूपये के फल की पैदावार होती है.

मार्केट में जबरदस्त डिमांड
जय प्रकाश ने बताया बेल के पेड़ में सर्दी और बारिश के मौसम में पानी की आवश्यकता नहीं होती. गर्मी में पानी दिया जाता है. इनका रख रखाव भी किया जाता है. ताकि मौसमी कीड़े और जड़ों में होने वाले रोग से बचाया जा सके. बेल के पेड़ में गलने की दिक्कत होती है. तब इसमें नीला थोथा डाला जाता है. ताकि जड़ें खराब न हों. बेल के औषधीय गुण होने के कारण इसकी डिमांड बहुत ज्यादा है. जय प्रकाश अपने बेल को मंडियों में बेचते है. इसके अलावा जयपुर, चौमू आदि जगहो के व्यापारी भी खरीद कर ले जाते हैं. अभी इनका मार्केट प्राइज 18-20 रूपये/ किलो है. जयप्रकाश को इससे काफी अच्छी कमाई हो रही है.

बेल के अनगिनत फायदे
बेल के जूस के फायदों के बारे में जानकारी देते हुए डॉक्टर हेमलता ढाका ने बताया ये गर्मी में लू लगने से बचाता है. बेल का जूस पीने से डाइजेशन (Digestion) बेहतर होता है. कब्ज, एसिडिटी और क्लॉटिंग की समस्या से राहत मिलती है. पेट ठंडा रहता है इसलिए मुंह में छालों से भी राहत मिलती है. बेल का जूस खून को साफ करने का भी काम करता है. लिहाजा स्किन संबंधी समस्याएं इससे दूर होती हैं.




चिंता और तनाव को एक समझने की ना करें गलती, दोनों में है जमीन आसमान का अंतर, ऐसे करें पहचान

Difference Between Stress And Anxiety: वैसे तो तनाव और चिंता यानी स्‍ट्रेस और एंग्‍जायटी के बीच के अंंतर को पहचानना आसान नहीं, लेकिन इनके बीच एक महीन रेखा होती है जो दोनों को अलग कर देती है. हालांकि अगर दोनों के लक्षणों पर गौर करें तो अंतर को आप बड़ी आसानी से पहचान सकते हैं और खुद की मानसिक परेशानियों को दूर करने का प्रयास बेहतर तरीके से कर सकते हैं. कहा जा सकता है कि बदलती दुनिया में हर वक्‍त भागदौड़, बढ़ती जिम्‍मेदारियां, खराब लाइफस्‍टाइल, एक जगह घंटों बैठकर काम करना जैसी चीजों ने मानसिक परेशानियों को बढ़ाने का काम किया है. इन्‍हीं मानसिक परेशानियों में से एक है स्‍ट्रेस का बढ़ना और दूसरा है हर वक्‍त एंग्‍जायटी महसूस होना. तो आइए जानते हैं कि दोनों के बीच क्‍या अंतर है और दोनों के क्‍या क्‍या लक्षण हैं.

तनाव और चिंता के लक्षण कैसे पहचानें(Symptoms of stress and anxiety)
तनाव के लक्षण
हेल्‍थलाइन के मुताबिक, चक्कर आना, मांसपेशियों में तनाव, मतली और दस्त जैसी डाइजेशन की समस्याएं, नींद न आना, गुस्सा या चिड़चिड़ापन, सिर दर्द, पसीना आना, बेचैनी, भूख न लगना, हार्ट बीट बढ़ जाना आदि तनाव के लक्षण हो सकते हैं.

चिंता के लक्षण
चिंता में भी तनाव जैसे लक्षण होते हैं लेकिन ऐसे लक्षण लंबे समय तक रहता है. इसके अलावा हर वक्‍त कुछ गलत होने का डर, हाथ पैर में सुन्‍नता जैसी फीलिंग, ब्रेन फॉग के लक्षण भी नजर आते हैं.

चिंता और तनाव में क्‍या है अंतर
दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर है ट्रिगर की उपस्थिति. मसलन, जब आपके बच्‍चे घर आते हैं तो परेशान करने लगते हैं तो आप तनाव झेलने लगते हैं, परीक्षा आने वाली है तो भी पास फेल होने को लेकर तनाव में आ जाते हैं. लेकिन चिंता की कोई वजह यानी ट्रिगर करने वाली चीज, हर बार सामने हो, ऐसा नहीं होता है.

क्‍या है चिंता और तनाव की वजह?
जब हम फिजिकल मेंटल प्रेशर महसूस करते हैं तो हमें स्‍ट्रेस यानी कि तनाव होता है. यह तनाव आमतौर पर जीवन में बड़े बदलाव से पहले महसूस होता है. जैसे, शादी होना, बच्‍चे का जन्‍म, नई जगह मूव करना, नई नौकरी, परिवार में किसी की मौत आदि.

इस तरह तनाव और चिंता दिखने में तो समान से लगते हैं, लेकिन दोनों में काफी अंतर होता है.  इस तरह आप अगर इन पर ध्‍यान दें और इन्‍हें दूर करने का प्रयास करें तो आप मानसिक परेशानी को बेहतर तरीके से ठीक कर सकते हैं.




प्रेग्नेन्सी का होता है महिलाओं की सेहत पर गहरा असर, तेजी से बढ़ने लगती है उम्र, रिसर्च का दावा

एक महिला के शरीर में सबसे नाटकीय परिवर्तनों में से एक तब होता है जब वह गर्भवती होती है नौ महीनों और उसके बाद के कई महीनों के दौरान, एक महिला मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत सारे बदलावों से गुजरती है. एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि गर्भावस्था का असर महिलाओं की जैविक उम्र पर भी पड़ता है. एक महिला जितनी अधिक बार गर्भवती होती है, उतनी ही तेजी से उसकी जैविक उम्र बढ़ती है. साथ ही गर्भावस्था का महिला के शरीर पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है.

प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, जो महिलाएं गर्भवती हो चुकी हैं, उनमें उन महिलाओं की तुलना में जैविक उम्र बढ़ने के अधिक लक्षण दिखाई देते हैं, जो पहले कभी गर्भवती नहीं हुई थीं.

कैलेन रेयान मेलमैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में कोलंबिया यूनिवर्सिटी एजिंग सेंटर में एक सहयोगी अनुसंधान वैज्ञानिक हैं. वह अपनी टीम के साथ फिलीपींस में 1700 से अधिक लोगों के डेटा का अध्ययन करती हैं जो एक सर्वेक्षण का हिस्सा थे.

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उम्र ढलने को लेकर इसअध्ययन पर शोधकर्ता 2005 से काम कर रहे थे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Shutterstock)

अध्ययन की शुरुआत में, 2005 में, सभी प्रतिभागी 20-25 आयु वर्ग के थे. उन सभी ने अपने रक्त के नमूने दिए थे और अपने प्रजनन और यौन इतिहास पर कुछ सवालों के जवाब दिए थे, जिनमें ये सवाल भी शामिल थे कि वे कितनी बार गर्भवती हुई थीं और क्या उन गर्भधारण के परिणामस्वरूप जीवित बच्चे पैदा हुए थे या नहीं.

रेयान और उनकी टीम ने छह ऐसी एपिजेनेटिक घड़ियों का उपयोग किया, जिन्होंने 19 विभिन्न संकेतकों का आकलन किया. अध्ययन में पाया गया कि “जो महिलाएं कम से कम एक बार गर्भवती हुई थीं, वे उसी उम्र की उन महिलाओं की तुलना में जैविक रूप से अधिक उम्र की थीं जो गर्भवती नहीं हुई थीं.”

इसके अलावा, अध्ययन में पाया गया कि गर्भावस्था के कारण चार महीने से लेकर एक वर्ष से अधिक समय तक उम्र तेजी से बढ़ती है, जो कभी गर्भवती नहीं हुई महिलाओं की तुलना में प्रति वर्ष लगभग 3 प्रतिशत अधिक होती है. साथ ही, एक या उससे कम गर्भधारण वाली महिलाओं की तुलना में एक से अधिक गर्भधारण वाली महिलाओं की उम्र पांच महीने तक अधिक होती है.




खतरनाक महामारी के नजदीक पहुंच गई है दुनिया, यह वायरस कोविड से 100 गुना अधिक मारक, एक्सपर्ट का दावा

क्या दुनिया में फिर से कोविड-19 की तरह महामारी फैलने वाली है? यह सवाल नया नहीं है. पांच साल पहले दुनिया भर में फैली महामारी ने दुनिया को यह असहसास दिला दिया था कि मानवजाति ऐसी की भी महामारी से निपटने के लिए तैयार नहीं है. एक विशेषज्ञ की माने तो अब इस पर गंभीरता से विचार करने की पड़ने वाली है क्योंकि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि दुनिया खतरनाक रूप से अगली महामारी के नजदीक पहुंच गया है. इसकी वजह पक्षियों से फैलने वाला एक एवियन वायरल है जिसने पहले ही दुनिया में असर दिखाना शुरू भी कर दिया है.

इस समय दुनिया भर में एवियन फ्लू के मामले इंसानों में तेजी से बढ़ रहा है. हाल ही में अमेरिका के टेक्सास में नया मामला सामने आया है जिससे देश के चिकित्सकीय पेशेवरों में बहुत ही खतरनाक और मारक एच5एन1 स्ट्रेन को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है. यही कारण है कि पिट्सबर्ग के एक बर्ड फ्लू रिसर्चर डॉ सुरेश कुचिपुड़ी ने चेताया है कि अगली महामारी बहुत नजदीक है.

इसकी वजह यह है कि यह वारयस संक्रमित लोगों में से आधों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है. व्हाइट हाउस ब्रीफिंग पर बोलते हुए डॉ कुचिपुड़ी ने बताया कि यह वायर कई सालों या शायद दशकों से ही महामारी की सूची में शीर्ष पर रहा था. लेकिन अब यह खतरनाक तौर पर महामारी फैलाने के नजदीक आ गया है.

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यह वायरस कोविड से 100 गुना ज्यादा खतरनाक बताया जा रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Canva)

एच5एन1 ने पहले ही महामारी के वायरस होने के कई संकेत दे डाले हैं. यह वैश्विक स्तर पर फैल चुका है. इसे पक्षियों से फैलने वाला इस वायरस ने इंसान सहित कई स्तनपायी जानवरों को संक्रमित किया है यह कोई ऐसा वायरस नहीं है जो फैलने वाला है बल्कि यह पहले ही फैल चुका है और फैल रहा है.

केवल उम्मीद ही की जा सकती है कि इसकी दर कम होगी लेकिन यह भी हो सकता है कि वह ज्यादा म्यूटेट हो कर अधिक मारक हो जाए. फिर भी दुनिया के कई विशेषज्ञ मानते हैं दुनिया के कई देश जिसमें विकसित देश भी शामिल हैं, को अपने स्वास्थ्य तंत्र को महामारी से निटपने के लिये खुद को तैयार करने की जरूरत है.




पीलिया का दुश्मन है गन्ने का रस, रोज एक गिलास पीने से लीवर रहेगा परफेक्ट, एक्सपर्ट से जानें फायदे

गन्ने का रस पूरी तरह से प्राकृतिक एवं पूर्णतः वसा-रहित पेय पदार्थ है. गर्मियों में ये हर स्तर के लोगों की प्यास बुझाने के साथ उन्हें इंस्टेंट एनर्जी भी प्रदान करता है. जानकारों की मानें तो, एक ग्लास अर्थात 240 मिलीलीटर शुद्ध गन्ने के रस में लगभग 250 कैलोरी और 30 ग्राम प्राकृतिक शक्कर पाई जाती है. हालांकि यह वसा (फैट), कोलेस्ट्रॉल, फाइबर और प्रोटीन रहित है, पर इसमें सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पॉस्फोरस इत्यादि जैसे तत्त्व मौजूद रहते हैं.अक्सर हम इसके रस को पीते हुए ठंडा–ठंडा कुल वाली फीलिंग लेते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि ये हमें तरोताज़ा रखने के साथ–साथ अनगिनत स्वास्थवर्धक खूबियां भी देता है.

इंस्टेंट एनर्जी के साथ शरीर को रखता है हाइड्रेट
पिछले 16 वर्षों से देश के कई राज्यों में एक मशहूर फैमिली मेडिसिन चिकित्सक के तौर पर काम कर चुके, पश्चिम चम्पारण ज़िले के डॉ. देवेश चटर्जी ने लोकल 18 को बताया कि गन्ने का रस एक ऐसा पेय पदार्थ है, जिसके सेवन से हमें दर्जनों स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं. सबसे पहले तो इसमें बड़ी मात्रा में सुक्रोस पाए जाते हैं, जो आपके शरीर में ग्लूकोस का संचार करता है. जिससे हमें कैलोरी के साथ इंस्टेंट एनर्जी मिलती है.

इसके अलावे इसमें पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस तथा विभिन्न विटमिन जैसे जरूरी तत्व मिलते हैं, जो हमारे बेहतर स्वास्थ्य के लिए बेहद आवश्यक हैं. खास बात यह है कि यदि आप गन्ने के रस का सेवन हल्के नमक के साथ करते हैं. इससे आपके शरीर में डिहाइड्रेशन जैसी समस्या कभी भी उत्पन नहीं होगी. हालांकि बहुत अधिक मात्रा में इसके कंजप्शन से भी बचना चाहिए.

प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ कब्ज़ एवं पीलिया में रामबाण
डॉ. देवेश ने लोकल 18 को बताया कि अन्य पेय पदार्थों की तुलना में गन्ने का रस ज्यादा सुपाच्य होता है. इसे डाइजेस्ट करने में पाचन तंत्रों को कुछ खास मशक्कत नहीं करनी पड़ती है. इसका सेवन पाचन क्रिया को सुचारू रूप से चलाने में मदद करता है तथा कब्ज एवं अपच जैसी समस्याओं से भी राहत दिलाता है. बकौल देवेश, गन्ने के रस का सबसे सटीक इस्तेमाल लिवर से जुड़े रोग जैसे पीलिया (जॉन्डिस ) के लिए किया जाता है.

यह शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है. इतना ही नहीं, इस रस में मौजूद विटामिन और मिनरल्स शरीर के रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है. गर्मियों में इसका सेवन आपके शरीर में पानी की कमी से होने वाली कमजोरी को भी दूर करता है. तो अब जब भी आप गन्ने के रस का सेवन करें, तो सिर्फ इससे ठंडा–ठंडा, कूल-कूल वाली फीलिंग ही ना लें, बल्कि इससे होने वाले स्वास्थ्यवर्धक फायदों का भी ध्यान रखें.