पत्रकार पर हमला — लोकतंत्र पर हमला

जबलपुर में पत्रकार सुनील सेन पर हुआ जानलेवा हमला सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर चोट है। लोकतंत्र की बुनियाद स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता है। जब कलम को खामोश करने के लिए गुंडों और बंदूकों का सहारा लिया जाने लगे, तो यह किसी एक पत्रकार की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि पूरे समाज की चिंता का विषय बन जाती है।

सुनील सेन पर हुआ यह हमला सत्ता, पैसे और दबंगई के गठजोड़ की ओर साफ इशारा करता है। जिस तरह अस्पताल प्रबंधन और उससे जुड़े लोग खबर दबाने के लिए धमकियाँ दे रहे थे, और आखिरकार हमला करने तक पहुँच गए, वह इस बात का प्रमाण है कि सत्य को उजागर करना आज भी सबसे खतरनाक कामों में से एक है। सवाल उठता है — क्या सच लिखना अब गुनाह हो गया है?

इस घटना से पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। पत्रकार पर हमला करने वाले चाहे कितने भी रसूखदार क्यों न हों, उन्हें कानून के कठघरे तक लाना ही होगा। अन्यथा यह संदेश जाएगा कि पैसे और राजनीतिक पहुँच के दम पर कोई भी सच्चाई को दबा सकता है।

यह मामला केवल जबलपुर का नहीं है। पूरे देश में आए दिन पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं। कहीं उनकी हत्या कर दी जाती है, कहीं झूठे मुकदमों में फँसाया जाता है, और कहीं उनके परिवार तक को धमकियाँ दी जाती हैं। यह प्रवृत्ति खतरनाक है और सीधे-सीधे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर करने वाली है।

पत्रकारिता का काम सिर्फ सरकार या संस्थानों की गलतियों को उजागर करना नहीं, बल्कि जनता के हक़ की आवाज़ उठाना भी है। अगर पत्रकार डर कर चुप हो जाएँगे तो आम जनता की आवाज़ कौन बनेगा? इसलिए यह मामला किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज के अधिकारों का है।

सरकार और प्रशासन को चाहिए कि इस हमले की निष्पक्ष और कड़ी जांच कराए, दोषियों को सख़्त से सख़्त सज़ा दिलवाए और पत्रकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता दे। अगर सच लिखने वालों की आवाज़ दब गई तो लोकतंत्र का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा।




एक छात्र–एक शिक्षक: माखननगर का ‘आईआईटी’ मॉडल स्कूल!

माखननगर। सर्रा केसली प्राथमिक स्कूल आजकल पूरे ब्लॉक में चर्चा का विषय बना हुआ है। वजह भी खास है—यहाँ पूरे स्कूल में एक विद्यार्थी है और उसके लिए एक अलग शिक्षक! जी हाँ, यह वही अनोखा “वन टू वन कोचिंग मॉडल” है, जिसे बड़े-बड़े कोचिंग संस्थान भी देखकर शर्मिंदा हो जाएँ।

जनशिक्षक चंद्रशेखर मोरे ने एक साल पहले ही BRC कार्यालय को पत्र लिखकर इस स्कूल को मर्ज करने की सिफारिश कर दी थी। लेकिन, विभागीय फाइलें शायद इतनी लंबी छुट्टी पर चली गईं कि आज तक लौटकर नहीं आईं। शिक्षा विभाग की कार्यशैली ऐसी है जैसे कह रहा हो—“जल्दी क्या है, बच्चा तो अकेला है, भाग थोड़ी जाएगा!”

शिक्षक राजेंद्र राजपूत साहब भी गज़ब किस्मत वाले हैं। उन्हें न तो शोर-शराबे से जूझना पड़ता है और न ही क्लास कंट्रोल करना पड़ता है। बस एक विद्यार्थी के लिए ‘स्पेशल क्लास’। यह तो शिक्षा का ‘VIP सेक्शन’ हो गया।

उधर, ब्लॉक के अन्य स्कूलों में छात्र तो भरपूर हैं लेकिन शिक्षक नदारद। वहाँ बच्चे खुद ही एक-दूसरे को पढ़ाते हैं और अध्यापक सिर्फ नाम के लिए टंगे हैं। लगता है विभाग ने शिक्षकों को बाँटने की जगह लॉटरी सिस्टम शुरू कर दिया है।

BRC श्याम सिंह पटेल का कहना है कि उन्होंने सर्रा केसली के साथ-साथ धमासा टोला और गाजनपुर के स्कूलों का प्रस्ताव बनाकर DEO कार्यालय भेज दिया है। अब गेंद पूरी तरह DEO के पाले में है। लेकिन DEO महोदय कब गोल मारेंगे, यह रहस्य ही बना हुआ है।

गाँव वाले हँसते हुए कहते हैं—“सर्रा केसली वाला स्कूल तो असल में VIP स्कूल है, जहाँ एक-एक बच्चे को प्रधानाध्यापक स्तर का ध्यान मिलता है। काश, हमारे बच्चों को भी ऐसी ‘लक्ज़री क्लास’ मिल जाती!”




एसबीआई बैंक के सामने माखननगर का नया “टूरिस्ट स्पॉट”

माखन नगर के बीचोंबीच, ठीक SBI बैंक के सामने एक ऐसा ‘अनूठा स्थल’ विकसित हो चुका है जिसे देखकर नगरवासियों की आँखें चमक उठती हैं। बरसात के दिनों में यहां बना गड्ढा पानी से लबालब भरकर किसी छोटे तालाब का अहसास कराता है। लोग मजाक में इसे “मिनी स्मार्ट सिटी का वॉटर पार्क” कहने लगे हैं। राहगीरों के लिए यह गड्ढा ऐसा ‘सरप्राइज पैकेज’ है, जहां पैर रखते ही या तो छींटे पड़ते हैं या फिर जूते-मोज़े की धुलाई स्वतः हो जाती है।

प्रशासन की नींद हराम करने वाला गड्ढा
यह गड्ढा मानो नगर प्रशासन के सोए हुए सपनों को आईना दिखा रहा हो। नागरिकों का कहना है कि सड़क की मरम्मत का नाम सुनते-सुनते अब उनके कान पक चुके हैं। हर बारिश के साथ गड्ढा और गहरा होता जा रहा है, पर प्रशासन के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। नगर परिषद सीएमओ जी. एस. राजपूत का बयान भी किसी सुकून दायक लोरी से कम नहीं—“MPRDC को सूचना दे दी गई है, एक-दो दिन में रिपेयर हो जाएगा।” सवाल यह है कि यह “एक-दो दिन” कब पूरा होगा—इस बरसात में या अगली?

बैंक के सामने होने के कारण यह गड्ढा अब ग्राहकों और राहगीरों का ‘सेल्फी प्वॉइंट’ भी बन गया है। कई लोग तो मजाक में कहते हैं कि बैंक के सामने यह गड्ढा असल में “लोन के आँसुओं का तालाब” है। बच्चे इसे अपनी नाव तैराने का स्थल मान चुके हैं। वहीं दुकानदारों का कहना है कि ग्राहक गड्ढे की वजह से दुकान तक पहुँचने से कतराते हैं। लेकिन प्रशासन की उदासीनता ने इस गड्ढे को मानो नगर का “ब्रांड एंबेसडर” बना दिया है।

जहां एक ओर नगरवासी व्यंग्य में इस गड्ढे को जल कुंड कहकर पुकारते हैं, वहीं दूसरी ओर यह हादसों को न्योता देता है। रोज़ाना दोपहिया वाहन चालक इसमें फिसलते हैं, और पैदल चलने वाले पानी से बचते-बचते संतुलन खो बैठते हैं। फिर भी जिम्मेदार अधिकारी उसी ‘दो दिन’ वाली टेप रिकॉर्डिंग पर अटके हैं। लोग कहते हैं कि अगर यही हाल रहा तो जल्द ही इस गड्ढे पर मछली पालन विभाग का बोर्ड लग जाएगा।

नगर के बुद्धिजीवी व्यंग्य करते हैं कि “गड्ढा ही असली जागरूक है, बाक़ी सब तो सो रहे हैं।” सवाल उठता है कि प्रशासन और MPRDC आखिर कब इस तालाब को मिटाकर सड़क बनाएंगे? या फिर इसे स्थायी आकर्षण मानकर टिकट लगाकर “माखन नगर लेक व्यू” घोषित कर देंगे? फिलहाल नागरिक यही चाहते हैं कि अधिकारी आश्वासन के मीठे गीत गाने के बजाय सड़क पर पड़ी इस बड़ी समस्या को सचमुच रिपेयर करें, वरना आने वाली बरसात में यह गड्ढा माखन नगर का नया “ सरोवर” न बन जाए।

कुल मिलाकर, माखन नगर का यह गड्ढा अब प्रशासन की लापरवाही का जीवंत उदाहरण बन चुका है। जनता पूछ रही है—“प्रशासन कब जागेगा? या फिर हमें इस गड्ढे की आरती उतारकर इसे नगर देवता मान लेना चाहिए?”




तिरंगे से बड़ा पार्टी का झंडा? वायरल फोटो पर सियासत गरमाई

नर्मदापुरम। स्वतंत्रता के 79 साल बाद भी देश में तिरंगे के सम्मान को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहे। सोशल मीडिया पर वायरल एक तस्वीर में भाजपा का झंडा राष्ट्रीय ध्वज से बड़ा दिखाई देने का मामला सामने आया है। इस तस्वीर ने न सिर्फ राजनीति को गर्मा दिया है बल्कि आम जनता में भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

कांग्रेस का हमला

पूर्व कांग्रेस जिला अध्यक्ष पुष्पराज पटेल ने इस फोटो को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा करते हुए भाजपा पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने लिखा –
“ये है भाजपा का असली चाल, चरित्र और चेहरा तथा भ्रमिक राष्ट्रवाद। आज़ादी के 79 साल बाद भी ये लोग देश के झंडे को पार्टी के झंडे से बड़ा नहीं मानते।”

कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा बार-बार राष्ट्रवाद की बातें करती है, लेकिन जब तिरंगे के सम्मान की बात आती है तो वही सबसे पहले नियमों को तोड़ती है।

ध्वज संहिता क्या कहती है?

राष्ट्रीय ध्वज संहिता, 2002 के प्रावधानों के अनुसार –

किसी भी पार्टी, संगठन या संस्थान का झंडा राष्ट्रीय ध्वज से बड़ा या ऊँचा नहीं लगाया जा सकता।

तिरंगे की प्रतिष्ठा हमेशा सर्वोपरि होनी चाहिए।

इसका उल्लंघन राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत दंडनीय अपराध है।

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फोटो में दिख रही स्थिति सही पाई जाती है, तो यह ध्वज संहिता का स्पष्ट उल्लंघन है और प्रशासन को इसमें कार्रवाई करनी चाहिए।

भाजपा की सफाई

विवाद पर नगर भाजपा मंडल अध्यक्ष मनीष चतुर्वेदी ने कहा –
“मैं तीन दिनों से यहां नहीं था। मामला संज्ञान में आया है, इसकी जांच करूंगा।”

भाजपा नेताओं का कहना है कि हो सकता है यह आयोजन स्तर पर हुई चूक हो, लेकिन तिरंगे का अपमान करने का कोई उद्देश्य नहीं था।

जनता की प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया पर लोग इस मामले को लेकर विभाजित नजर आए। कुछ ने भाजपा पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगाया तो कुछ ने इसे विपक्ष का राजनीतिक हथकंडा बताया। कई यूजर्स ने लिखा कि “राष्ट्रवाद केवल भाषणों में नहीं, बल्कि तिरंगे के सम्मान में दिखना चाहिए।”

यह विवाद एक बार फिर साबित करता है कि देश की राजनीति में राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल अक्सर दलगत लाभ के लिए किया जाता है। लेकिन सच्चाई यही है कि तिरंगे का सम्मान किसी भी राजनीतिक झंडे या विचारधारा से ऊपर है।




क्या “वोट अधिकार यात्रा” बदलेगी बिहार का चुनावी समीकरण?

Rahul's 'Vote Adhikar Yatra' in Bihar starts today

नई दिल्ली/सासाराम। बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारी ने जैसे-जैसे रफ्तार पकड़ी है, वैसे-वैसे राजनीतिक दलों ने अपने-अपने मुद्दे और नैरेटिव गढ़ने शुरू कर दिए हैं। इसी कड़ी में रविवार को कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने रोहतास जिले के सासाराम से 16 दिवसीय “वोट अधिकार यात्रा” का आगाज़ किया। इस यात्रा का मकसद मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में हुई कथित गड़बड़ियों और “वोट चोरी” के आरोपों को जनता के बीच ले जाना है।

राहुल गांधी का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ़ चुनावी राजनीति नहीं बल्कि लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत “एक व्यक्ति, एक वोट” की रक्षा के लिए है। उन्होंने यात्रा शुरू होने से एक दिन पहले कहा था— “सोलह दिन, 20 से ज़्यादा ज़िले, 1,300 किलोमीटर की दूरी। हम जनता के बीच आ रहे हैं संविधान और मताधिकार की रक्षा के लिए।”

सासाराम से शुरुआत: कांग्रेस की जड़ों को पुनर्जीवित करने का प्रयास

यात्रा की शुरुआत सासाराम से होना प्रतीकात्मक भी है और रणनीतिक भी। यह इलाका कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ माना जाता रहा है। राहुल गांधी यहीं से यह संदेश देना चाहते हैं कि कांग्रेस अब बिहार में “सहायक दल” भर नहीं रहना चाहती, बल्कि केंद्र में खड़े होकर राजनीतिक एजेंडा तय करने की कोशिश कर रही है।

20 जिलों में पैठ और पटना में शक्ति प्रदर्शन

यह यात्रा 16 दिनों तक चलेगी और बिहार के 20 से अधिक जिलों से होकर गुज़रेगी। कुल 1,300 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली यह पदयात्रा तीन दिनों—20, 25 और 31 अगस्त—को विश्राम लेगी। समापन 1 सितंबर को पटना के गांधी मैदान में एक विशाल रैली से होगा। यह रैली न केवल यात्रा का चरम बिंदु होगी बल्कि महागठबंधन (INDIA ब्लॉक) की एकजुटता और ताक़त का भी प्रदर्शन मानी जाएगी।

महागठबंधन की साझा ज़मीन

यात्रा को विपक्षी गठबंधन के कई अहम दलों का समर्थन हासिल है।

राजद के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव इसमें राहुल गांधी के साथ होंगे।

भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य और सांसद राजा राम काराकाट भी इसमें शामिल होंगे।

सीपीएम की वरिष्ठ पदाधिकारी सुभाषिनी अली और सीपीआई के प्रतिनिधि भी भाग लेंगे।

इस बहुदलीय भागीदारी से महागठबंधन यह संदेश देना चाहता है कि यह केवल कांग्रेस की पहल नहीं बल्कि विपक्ष की साझा लड़ाई है।

चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की पृष्ठभूमि

कांग्रेस और उसके सहयोगियों का आरोप है कि SIR के बहाने भाजपा ने लाखों गरीबों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को मतदाता सूची से बाहर किया। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि “जनता और सामाजिक संगठनों के दबाव तथा सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही चुनाव आयोग को अपनी नीति में सुधार करना पड़ा।”

यहां कांग्रेस खुद को लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षक और भाजपा को “वोट चोरी” के आरोपी के रूप में पेश कर रही है।

चुनावी गणित पर असर?

विश्लेषकों के मुताबिक, इस यात्रा के कई संभावित राजनीतिक निहितार्थ हैं:

1. बिहार चुनाव की प्रस्तावना – यात्रा को विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकजुटता और जनसंपर्क का पहला बड़ा अभियान माना जा रहा है।

2. सामाजिक न्याय का नया संस्करण – दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और गरीब तबकों पर केंद्रित यह नैरेटिव महागठबंधन की पारंपरिक राजनीति को नए रूप में सामने लाता है।

3. कांग्रेस की भूमिका – पिछली बार महागठबंधन में कांग्रेस “जूनियर पार्टनर” की भूमिका में थी। यह यात्रा राहुल गांधी को केंद्र में लाकर पार्टी को निर्णायक स्थिति में लाने की कोशिश है।

4. भाजपा पर दबाव – भाजपा को मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता के मुद्दे पर लगातार जवाब देना पड़ सकता है।

जनता का मूड और चुनौतियाँ

हालांकि यात्रा का उद्देश्य जनांदोलन खड़ा करना है, लेकिन इसकी सफलता इस पर निर्भर करेगी कि ग्रामीण और शहरी मतदाता इसे किस नज़र से देखते हैं। क्या लोग इसे वाक़ई अपने मताधिकार की रक्षा की लड़ाई मानेंगे या इसे केवल चुनावी रणनीति समझकर नज़रअंदाज़ कर देंगे?

राहुल गांधी की “वोट अधिकार यात्रा” विपक्ष के लिए एक साहसिक दांव है। यह यात्रा उन्हें बिहार की राजनीति में फिर से प्रासंगिक बना सकती है और महागठबंधन को एक नया नैरेटिव दे सकती है। लेकिन असली परीक्षा 1 सितंबर को पटना के गांधी मैदान में होगी—जहां यह तय होगा कि यह यात्रा वाकई जनता के बीच आंदोलन बन पाई या केवल चुनावी एजेंडा तक सीमित रह गई।




राष्ट्रीय पर्व का असली रंग: तिरंगा यात्रा और त्योहार की गरिमा

तिरंगा यात्रा तिरंगे के सम्मान और राष्ट्रभक्ति के जज़्बे को जन-जन तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम है। यह यात्रा लोगों में राष्ट्रीय एकता का संदेश देती है और देश के प्रति गर्व की भावना जगाती है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह यात्रा राष्ट्रीय पर्व से पहले निकालना उचित है, और क्या राष्ट्रीय पर्व के दिन सरकारी संस्थाओं द्वारा परंपरागत रैली या समारोह न निकालना सही है?

राष्ट्रीय पर्व — चाहे 15 अगस्त हो या 26 जनवरी — केवल एक सरकारी अवकाश या औपचारिक ध्वजारोहण का दिन नहीं हैं। यह दिन हमारी आज़ादी की लड़ाई, बलिदानों और संविधान के मूल्यों को याद करने का अवसर है। इन दिनों का उत्सव जनभागीदारी से ही सार्थक बनता है। ध्वजारोहण, देशभक्ति गीत, बच्चों की प्रस्तुतियां और सार्वजनिक समारोह इस दिन की आत्मा होते हैं।

अगर तिरंगा यात्रा राष्ट्रीय पर्व से एक-दो दिन पहले निकाली जाए, तो यह पर्व का माहौल बनाने और जन-उत्साह जगाने का अच्छा तरीका है। यह यात्रा पर्व के पूरक के रूप में दिख सकती है। लेकिन जब किसी शासकीय संस्था द्वारा राष्ट्रीय पर्व के दिन रैली न निकालकर केवल पहले की यात्रा पर ही संतोष कर लिया जाता है, तब यह पर्व की गरिमा को कम कर देता है। इससे जनता के मन में यह संदेश जा सकता है कि असली पर्व का महत्व औपचारिकता में सिमट गया है।

सरकारी संस्थाओं की जिम्मेदारी केवल यात्रा निकालने तक सीमित नहीं है। उनका दायित्व है कि राष्ट्रीय पर्व के दिन पूरे सम्मान और गंभीरता के साथ कार्यक्रम आयोजित करें, जिसमें जनता की सक्रिय भागीदारी हो। राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान का अर्थ सिर्फ उसे हाथ में लेकर चलना नहीं है, बल्कि उसकी रक्षा करने वाले मूल्यों — स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे और लोकतंत्र — को व्यवहार में निभाना भी है।

समय आ गया है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस बात पर विचार करें:तिरंगा यात्रा एक उत्सव का हिस्सा है, पर राष्ट्रीय पर्व का विकल्प नहीं।
त्योहार तभी जीवंत रहेंगे जब उन्हें पूरे सम्मान, जनभागीदारी और परंपरा के साथ मनाया जाएगा।




नर्मदापुरम में 5,700 से ज्यादा बोरियां गायब, जांच के बाद खुल सकते हैं बड़े राज

नर्मदापुरम – जिले में अनाज उपार्जन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए ढ़ाई करोड़ रुपये मूल्य की मूंग के कथित घोटाले की जांच शुरू हो गई है। कलेक्टर सोनिया मीना ने 7 अगस्त 2025 को एसडीएम को पत्र क्रमांक/मूंग उपार्जन/ 25-26/465 जारी कर मामले की विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं।

क्या है मामला
आरोप का केंद्र आदि देव वेयरहाउस और सेवा सहकारी समिति बहारपुर हैं। निरीक्षण में पाया गया कि दोनों स्थानों पर कुल 5,719 बोरियां कम हैं, जिनकी कीमत करीब ₹2.5 करोड़ आंकी गई है।

कलेक्टर के पत्र में कहा गया है कि –

11, 17 और 28 जुलाई 2025 को जिला उपार्जन समिति ने निरीक्षण किया, जिसमें अमानक मूंग मिली।

22 जुलाई को नेफेड क्लस्टर हेड से पंचनामा मिला।

2 अगस्त को माखन नगर SWC प्रबंधक ने पंचनामा दिया।

4 अगस्त को प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर कलेक्टर ने जांच के आदेश दिए।

घोटाले की आहट
सूत्रों का दावा है कि वेयरहाउस और समिति में अमानक मूंग रखकर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है। अगर जांच निष्पक्ष हुई, तो एक बड़ा घोटाला सामने आने की संभावना है।

सवाल खड़े कर रही घटनाक्रम की टाइमलाइन

1. 11–28 जुलाई – निरीक्षण में गड़बड़ी का पता।

2. 22 जुलाई – नेफेड का पंचनामा।

3. 2 अगस्त – SWC प्रबंधक का पंचनामा।

4. 4 अगस्त – अंतिम रिपोर्ट, कलेक्टर को भेजी गई।

5. 7 अगस्त – एसडीएम को जांच आदेश।

जिले के किसान संगठनों का कहना है कि अगर इस तरह के मामले पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो न केवल किसानों का भरोसा टूटेगा, बल्कि सरकारी खरीदी प्रणाली की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में आ जाएगी।




Denvapost Exclusive : यह कैसी जांच? रसूखदार अंदर, किसान और मीडिया बाहर!

भोपाल से आई टीम ने आदिदेव वेयरहाउस में की जांच, लेकिन पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल

माखन नगर/भोपाल | विशेष रिपोर्ट – Denvapost

शनिवार दोपहर लगभग तीन बजे भोपाल से आई एक टीम सेवा सहकारी समिति बाहरपुर और आदिदेव वेयरहाउस में अमानक मूंग की जांच के लिए पहुंची। जांच की सूचना मिलने पर मीडिया प्रतिनिधि और कुछ किसान भी मौके पर पहुंचे, लेकिन उन्हें वेयरहाउस के भीतर प्रवेश नहीं करने दिया गया। टीम द्वारा यह कहा गया कि जांच स्थल पर केवल टीम सदस्य, वेयरहाउस और समिति के अधिकृत कर्मचारी ही मौजूद रह सकते हैं।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मीडिया और किसानों को बाहर रखा गया, तब कुछ रसूखदार लोग अंदर कैसे मौजूद थे? और उनकी मौजूदगी में की गई जांच की निष्पक्षता पर अब सवाल उठाए जा रहे हैं।

जांच दल में ये अधिकारी रहे शामिल:

संतोष सोलंकी – क्षेत्रीय प्रबंधक

जे. के. सक्सेना – सहायक गुणवत्ता निरीक्षक

डी. के. हवलदार – क्षेत्रीय प्रबंधक

राजेश अग्रवाल – क्षेत्रीय प्रबंधक

अनिल तिवारी – सहायक गुणवत्ता निरीक्षक

नीरज – गुणवत्ता निरीक्षक

सूत्रों की पुष्टि: स्टेक में अमानक मूंग और 3300 बोरी की अधिक बिलिंग

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, आदिदेव वेयरहाउस में अमानक मूंग स्टेक में पाई गई। वहीं, लगभग 3300 बोरियों की अतिरिक्त बिलिंग सामने आई है, जिसकी अनुमानित राशि करीब ₹1.40 करोड़ बताई जा रही है।

इस अनियमितता को समिति किस तरह “एडजस्ट” करेगी, यह Denvapost के पाठकों को बताने की जरूरत नहीं — पाठक खुद समझदार हैं।

टीम के किसी भी सदस्य ने मीडिया से बातचीत करने से साफ इनकार कर दिया और पूरी कार्रवाई को सिर्फ “रूटीन चेकअप” बताया।

एक अगस्त का पंचनामा और पुराने आरोप

एक अगस्त को NCML के क्लस्टर हेड और सुपरवाइजर द्वारा आदिदेव वेयरहाउस का निरीक्षण किया गया। यह खरीदी सेवा सहकारी समिति बाहरपुर द्वारा की जा रही थी। निरीक्षण के समय:

रनिंग स्टेक-19 में करीब 80–90 बोरी अमानक मूंग पाई गई

पूर्व में भी नेफेड और जिला उपार्जन समिति द्वारा इसी वेयरहाउस में अमानक खरीदी की पुष्टि की जा चुकी है

सर्वेयरों द्वारा बार-बार मना करने के बावजूद समिति द्वारा अमानक मूंग की खरीदी जारी रही

समिति को कई बार गुणवत्ता सुधार के निर्देश दिए गए, लेकिन पालन नहीं किया गया

अंततः सर्वेयर ने चालान रिजेक्ट करने का निर्देश जारी किया

तो क्या यह जांच महज दिखावा थी?

जब किसानों और मीडिया को बाहर रखकर जांच की जाए, और रसूखदार लोग अंदर मौजूद रहें, तो निष्पक्षता अपने आप संदेह के घेरे में आ जाती है।

क्या ये जांच वास्तव में अमानक खरीदी के दोषियों को बेनकाब करेगी, या फिर पहले की तरह यह भी “दफन” कर दी जाएगी?

पाठकों से अपील:

> अगर आप यह जानना चाहते हैं कि जांच के समय वेयरहाउस में कौन-कौन रसूखदार मौजूद थे, तो इस रिपोर्ट को लाइक करें, शेयर करें और कॉमेंट करें।

आपकी आवाज़ से ही सच्चाई सामने आएगी।




भारत-रूस तेल साझेदारी पर ट्रंप का सवाल: क्या अमेरिका भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को चुनौती दे रहा है?

'Heard India not going to buy Russian oil,' claims Donald Trump; calls it 'good step' - watch

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को एक विवादास्पद बयान में दावा किया कि उन्होंने भारत द्वारा रूस से तेल आयात रोकने की खबरें “सुनी” हैं और इसे एक “अच्छा कदम” बताया है। हालाँकि, भारत के विदेश मंत्रालय ने तत्काल प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उसे ऐसी किसी सूचना की जानकारी नहीं है और देश की ऊर्जा नीति पूरी तरह से बाज़ार की ताकतों और राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है।

ट्रंप का दावा और भारत पर व्यंग्य

ट्रंप ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा,

“मैं समझता हूँ कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा। मैंने यही सुना है, मुझे नहीं पता कि यह सही है या नहीं। यह एक अच्छा कदम है। देखते हैं क्या होता है।”

यह टिप्पणी ऐसे समय पर आई है जब उन्होंने भारत पर 25% टैरिफ लगाने और रूस के साथ जारी हथियार व ऊर्जा व्यापार पर अतिरिक्त दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी है। इससे पहले उन्होंने पाकिस्तान के साथ तेल समझौते की घोषणा करते हुए भारत पर तंज कसते हुए कहा था:

“कौन जानता है, हो सकता है कि वे किसी दिन भारत को तेल बेचें!”

उनकी यह टिप्पणी न केवल भारत की विदेश नीति पर सवाल उठाती है, बल्कि अमेरिकी दबाव की रणनीति को भी उजागर करती है।

भारत की प्रतिक्रिया: ‘तीसरे देश के चश्मे से मत देखिए’

भारत के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप की टिप्पणियों का संयमित लेकिन स्पष्ट जवाब दिया। मंत्रालय ने कहा:

“विभिन्न देशों के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंध अपने-अपने गुणों पर आधारित हैं और इन्हें किसी तीसरे देश के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। भारत और रूस के बीच एक स्थिर और समय-परीक्षित साझेदारी है।”

इस जवाब में स्पष्ट संकेत है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता नहीं करेगा, चाहे वैश्विक दबाव कितना भी क्यों न हो।

क्या ट्रंप भारत पर रणनीतिक दबाव बना रहे हैं?

डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीति व्यापारिक सौदों, दवाब और सार्वजनिक बयानों पर आधारित रही है। उनका यह दावा कि “भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा” बिना किसी प्रमाण के आया और यह भारत की स्वतंत्र नीति पर अप्रत्यक्ष प्रहार की तरह देखा जा रहा है।

भारत का रुख स्पष्ट है:

तेल आयात किसी एक देश की अनुमति या दबाव से संचालित नहीं होगा।

रूस के साथ ऊर्जा संबंध दीर्घकालिक, रियायती और रणनीतिक दृष्टि से लाभकारी हैं।




Denvapost Exclusive : पोषण ट्रैकर एप: तकनीक ने बढ़ाई पारदर्शिता या खड़ी की दीवारें?

नर्मदापुरम। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से लागू की गई पोषण ट्रैकर एप व्यवस्था, व्यवहारिक धरातल पर कई चुनौतियों से जूझ रही है। जिले की करीब 1470 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के सामने यह नई तकनीक सुविधा से अधिक बाधा बनकर सामने आई है।

तकनीक और ज़मीनी वास्तविकताओं में टकराव

नई व्यवस्था में लाभार्थियों को पोषण आहार वितरण से पहले उनके चेहरे की पहचान और आधार लिंक मोबाइल नंबर पर भेजे गए ओटीपी के जरिए सत्यापन किया जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में न तो नेटवर्क की सुविधा है और न ही लाभार्थियों के पास अपडेटेड मोबाइल नंबर। साथ ही, जिन कार्यकर्ताओं के पास विभाग द्वारा पहले दिए गए स्मार्टफोन हैं, उनकी तकनीकी गुणवत्ता इतनी कमज़ोर है कि न तो चेहरा स्कैन हो पाता है और न ही एप सुचारू रूप से काम करता है।

प्रमुख व्यवहारिक समस्याएं

आधार लिंक मोबाइल नंबर की अनुपलब्धता या सिम गुम होना।

दूरस्थ गांवों में नेटवर्क की अनुपस्थिति।

गर्भवती महिलाओं का केंद्र तक न पहुंच पाना।

पुराने मोबाइल की कैमरा और प्रोसेसिंग क्षमता सीमित।

एप की धीमी गति के कारण समय की बर्बादी।

ओटीपी न आने से वितरण बाधित।

सिर्फ माताओं को ही मिलेगा पोषण आहार

पहले पोषण आहार परिवार के किसी भी सदस्य को दिया जा सकता था, लेकिन अब एप के जरिए सिर्फ माताओं की फेस स्कैनिंग अनिवार्य कर दी गई है। इससे वे महिलाएं जो किसी कारणवश केंद्र नहीं पहुंच पातीं, उन्हें पोषण आहार नहीं मिल पा रहा है। यह परिवर्तन खुद एक नई समस्या बन गया है।

निजी खर्च में झांकता सरकारी भार

सुमित्रा अहीरवाल, जिला अध्यक्ष, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता संगठन के अनुसार: “शासन ने जो मोबाइल पहले दिए थे, अब वो तकनीकी रूप से अनुपयुक्त हो चुके हैं। नेटवर्क नहीं है, ओटीपी नहीं आता, एप हैंग होता है – ऐसे में हम पर नया मोबाइल खरीदने का दबाव आ रहा है।”

ऐसे काम करता है एप

1. लाभार्थी का चेहरा स्कैन किया जाता है।

2. उसके आधार से लिंक मोबाइल नंबर पर ओटीपी भेजा जाता है।

3. ओटीपी सफलतापूर्वक दर्ज होने के बाद ही पोषण आहार वितरण की पुष्टि होती है।

लेकिन जब मोबाइल नंबर बंद हो, बदले जा चुके हों या नेटवर्क ही न हो — तब यह पूरी प्रक्रिया रुक जाती है और सबसे अधिक प्रभावित होती है वह महिला या बच्चा जिसके लिए यह योजना बनाई गई थी।

क्या चाहिए सुधार के लिए?

विभाग को कार्यकर्ताओं को नई तकनीकी सुविधाएं (उन्नत स्मार्टफोन, नेटवर्क आधारित समाधान) देना होगा।

नेटवर्कविहीन क्षेत्रों के लिए ऑफ़लाइन वेरिफिकेशन मोड शुरू किया जाए।

ओटीपी आधारित प्रक्रिया के विकल्प के रूप में फिजिकल वेरिफिकेशन या रजिस्टर सिस्टम लागू किया जाए।

योजना के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, लचीलापन और व्यावहारिकता लाई जाए।

तकनीकी नवाचार आवश्यक है, लेकिन वह तभी सार्थक होता है जब नीतियों की ज़मीन हकीकत से जुड़ी हो। पोषण ट्रैकर एप की वर्तमान प्रणाली लाभ की बजाय लाचारियों और तकनीकी उलझनों का पर्याय बनती जा रही है। ज़रूरत है कि नीति निर्माता जमीनी रिपोर्टों को गंभीरता से लें और व्यवस्था को ऐसा स्वरूप दें, जो लाभार्थी केंद्रित हो, न कि केवल डाटा केंद्रित।