शाम होते ही ओपन बार (Open bar) में बदलता हाई स्कूल ग्राउंड – छात्रावास असुरक्षित

Open Bar

माखननगर का इकलौता हाई स्कूल ग्राउंड, जहां बच्चों को खेलना-कूदना चाहिए था, अब हर शाम open bar में बदल रहा है। शाम 7 बजे से रात 10 बजे तक मैदान में open drinking का नजारा आम है। बोतलें और प्याले यहां खेल के सामान की जगह लेते दिखते हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि मैदान के पास ही boys and girls hostels हैं, जिससे छात्रों की सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। लोगों का कहना है कि यह school ground turned into bar अब शराबियों का अड्डा बन चुका है, लेकिन administration negligence साफ नजर आती है।

Open Bar

माखननगर को लोग माखन दादा की नगरी कहते हैं। लेकिन हकीकत में यह नगरी अब “मलाईदार खेलों” की नहीं, बल्कि खुले आसमान के बार (open bar) की नगरी बन गई है। नगर का इकलौता हाई स्कूल ग्राउंड, जहां कभी बच्चों की किलकारियां और खेल-कूद की आवाजें गूंजनी चाहिए थीं, वहां अब बोतलों की खनक और ठहाकों का साम्राज्य है।

शाम सात बजे के बाद मैदान का नजारा बिल्कुल बदला-बदला होता है। यहां क्रिकेट की गेंद नहीं, बल्कि शराब की बोतलें घूमती हैं। खिलाड़ियों के हाथ में बल्ला नहीं, प्याला होता है। और अगर बच्चन जी इस मैदान से गुजरते, तो शायद अपनी ही कविता पर मुस्कुरा उठते—
“किसी ओर में आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला।
किसी ओर में आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला।”

सबसे दिलचस्प बात यह है कि मैदान के आसपास ही बॉयज़ और गर्ल्स छात्रावास हैं। यानी यह “नशे का महाकुंभ” सीधे शिक्षा की दहलीज़ पर सजाया जा रहा है। छात्र अगर खेलों से प्रेरित न भी हों, तो जीवन कौशल की यह ओपन क्लास रोज़ाना देख ही लेते हैं। एक छात्र ने मज़ाक में कहा—“यहां हम सीखते हैं कि टीमवर्क क्या होता है—एक बोतल खत्म हो जाए तो अगली तुरंत पास की जाती है।”

प्रशासन? वह तो शायद इसे सांस्कृतिक कार्यक्रम समझकर चुप बैठा है। आखिरकार, नगर के विकास की परिभाषा अब यही तो है—खेल मैदान में खेल नहीं, नशे की प्रतियोगिता हो।

माखननगर के लोग पूछ रहे हैं—क्या यही है वह सपनों का नगर, जहां मैदान युवाओं का भविष्य बनाने के बजाय, उन्हें बोतलों में डुबो रहा है?




नगर परिषद का पत्र: गलत तारीख़ स्वच्छता अभियान पर उठे सवाल

नगर परिषद का पत्र
नगर परिषद का पत्र

नगर परिषद का पत्र: गलत तारीख़, गलत संदेश — स्वच्छता अभियान पर उठे सवाल

नगर परिषद ने अपनी नई टाइम-ट्रैवल नीति को चुपके से लागू कर दिया है: पत्र पर साफ़ लिखा है ‘दिनांक 17.08.2025’, जबकि अभियान की शुरुआत 17.09.2025 बताई गई है। यानी हमारी नगर परिषद समय में पीछे जाकर स्वच्छता करवा रही है — आम जनता के भरोसे की सफाई के साथ-साथ कालक्रम की भी सफाई चल रही है।

ये भी पढ़े Hindi News|नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की वक्तृत्व कला

सीएमओ का बयान: ‘कंप्यूटर ऑपरेटर की गलती’

मुख्य नगर परिषद अधिकारी  जी.एस. राजपूत ने इस कलात्मक भूल का जिम्मेदार घोषित किया — ‘कंप्यूटर ऑपरेटर की गलती’। क्या यह वही ऑपरेटर है जो सुबह-शाम सिस्टम में लॉग इन करता है या वह अब हर सरकारी चूक का नया बहाना बन गया है? क्या हम किसी भी सार्वजनिक विफलता पर सबसे नज़दीकी USB और एक ‘एरर-लॉग’ थोप देंगे?

यह बात सिर्फ़ तारीख़ की नहीं; यह जवाबदेही और प्रोफेशनलिज़्म की बात है। सरकारी पत्राचार वह माध्यम है जिससे नागरिक विभाग पर भरोसा करते हैं; जब तारीख ही भ्रमित हो जाए तो फिर भरोसा कहाँ टिकेगा? ‘कंप्यूटर ऑपरेटर’ का नाम लेते ही अगर कागज़ पर मोहर लगाने वाले, चेक करने वाले और अंतिम अनुमोदन देने वाले सभी हाथ मिट जाते हैं, तो समझिए सिस्टम में पोक-होल्स हैं।

हास्यास्पद बनावट के साथ यह घटना यह भी बताती है कि गुणवत्ता नियंत्रण कहां गायब है। क्या समय की जाँच के लिए कोई प्रक्रिया नहीं है? क्या कोई दूसरा प्रूफरीडर मौजूद नहीं जो आख़िरी चरण में पत्र देखता हो?

अंतत: यह केवल एक प्रिंटिंग-त्रुटि नहीं; यह सार्वजनिक विश्वास पर एक ठेस है। नगर परिषद को चाहिए कि सार्वजनिक रूप से स्थिति स्वीकार करे, कंप्यूटर ऑपरेटर के बहाने को चुनौती दे और जिम्मेदार अधिकारियों की सूची प्रकाशित करे। नहीं तो नागरिक स्वेच्छा से सरकारी पत्रों के एडिटर बन बैठेंगे — और अगली बार यदि किसी नोटिस पर ‘17.07.2024’ छपा तो लोग समय-यात्रा की बजाय विभाग की लापरवाही पर मीम बनाकर जवाब देंगे।

भविष्य के लिए सुधार के सुझाव

कंप्यूटर ऑपरेटर की बजाय प्रक्रिया में दोष निकालें, कर्मचारियों को तारीख़-प्रमाणन का प्रशिक्षण दें और भविष्य के लिए स्पष्ट हेल्थ-नोटिस प्रक्रिया लागू करें।




फीस की तानाशाही : फीस नहीं तो पढ़ाई नहीं!

“फीस जमा करो, चाहे बच्चा हो या न हो।”

यह कैसी अजब-गजब शिक्षा व्यवस्था है भाई! फीस जमा नहीं की तो बच्चे को बोर्ड परीक्षा नहीं, खड़े रहने की परीक्षा पास करनी होगी। क्लास में बैठने की इजाज़त नहीं, मानो कुर्सियां और बेंचेज भी बैंक की ईएमआई पर हों।

RTE का बोर्ड स्कूलों पर ऐसे टंगा है जैसे दुकानदार “GST शामिल है” का पोस्टर लगाकर भी अलग से टैक्स वसूल ले। जिले में 435 निजी स्कूल चल रहे हैं, पर नियम पालन की गाड़ी शायद बिना पेट्रोल के खड़ी है।

यह भी कमाल है – बच्चा स्कूल गया ही नहीं, लेकिन फीस ऐसे वसूली जा रही है जैसे Netflix ने सब्सक्रिप्शन ऑटो-रिन्यू कर दिया हो। अब सवाल उठता है कि ना पढ़ाई, ना पढ़ाई का माहौल – तो फीस आखिर किस चीज़ की? हवा, धूप और स्कूल के नाम की ब्रांडिंग की?

एक पेरेंट्स की दर्द भरी दास्तां सुनिए – बच्ची पिछले साल फीस न दे पाई, तो इस साल भेजा ही नहीं। लेकिन स्कूल कहता है – “फीस तो लगेगी, चाहे बच्ची हो या न हो।” अरे साहब, यह शिक्षा है या पार्किंग चार्ज कि गाड़ी खड़ी हो या न हो, पैसा तो देना पड़ेगा!

अब सवाल बड़ा है – बच्चों की पढ़ाई फीस के कारण रुक रही है, लेकिन विभाग का मौन ऐसा है मानो सब ठीक-ठाक चल रहा हो। शायद शिक्षा विभाग सोचता हो – बच्चे खड़े हैं, तो कम से कम सीधी रीढ़ तो विकसित हो रही है!




निर्वाचन शाखा में ऑपरेटर की मनमानी से कर्मचारी त्रस्त, 20 साल से जमे कर्मचारी पर उठे सवाल

नर्मदापुरम। सीएम हेल्पलाइन पर की गई शिकायत ने निर्वाचन कार्यों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदीप कुमार साहू ने 24 अगस्त 2025 को शिकायत क्रमांक 34060516 दर्ज कराई थी। उनका आरोप है कि निर्वाचन कार्य के नाम पर कर्मचारियों को मनमाने आदेशों के जरिये ड्यूटी सौंप दी जाती है।

शिकायतकर्ता ने बताया कि—

  • आदेश बिना कारण बताए सीधे व्हाट्सऐप पर भेज दिए जाते हैं।
  • कई बार नायब तहसीलदार के बिहाफ में ऑपरेटर ही ड्यूटी तय कर देता है।
  • एक ही समय में अलग-अलग विभागों से कई आदेश थोप दिए जाते हैं, जिन्हें निभाना लगभग असंभव होता है।
  • इस दबाव के कारण कर्मचारी मानसिक तनाव झेल रहे हैं और काम की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है।

ये भी पढ़े एक शिक्षक पूरे विभाग पर भारी, अधिकारी भी भरते है पानी

स्थानांतरण नीति का उल्लंघन

शिकायत में भले सीधे नाम न लिया गया हो, लेकिन स्थानीय कर्मचारियों और जानकारों का कहना है कि समस्या की जड़ निर्वाचन शाखा में करीब 20 वर्षों से जमे एक ही कर्मचारी हैं। शिक्षा विभाग से आए इस कर्मचारी को वर्षों से न तो विभाग ने वापस बुलाया और न ही प्रशासन ने स्थानांतरित किया। जबकि सामान्य स्थानांतरण नीति के अनुसार किसी भी कर्मचारी को इतने लंबे समय तक एक ही पद पर टिके रहने की अनुमति नहीं है।

ऑपरेटर की भूमिका पर सवाल

निर्वाचन शाखा में पदस्थ ऑपरेटर पर भी गंभीर आरोप हैं। कहा जाता है कि वह अपने स्तर पर आदेश तैयार करता है और कर्मचारियों को थोप देता है। इस प्रक्रिया में न तो आवेदन लिए जाते हैं, न ही कर्मचारियों की आपत्तियों पर विचार होता है। शिकायतकर्ता ने इसे “मनमानी रवैया” बताया है।

ये भी पढ़े शिक्षक साहब का ‘लंबा अवकाश’, विभाग का छोटा सा नोटिस

जनभावना क्या कहती है?

तहसील कार्यालय को यह शिकायत ट्रांसफर कर दी गई है। अब देखना है कि अधिकारी क्या कदम उठाते हैं। लेकिन स्थानीय कर्मचारियों और नागरिकों की राय साफ है—

“जब तक निर्वाचन शाखा से राजेश मालवीय को हटाया नहीं जाता, तब तक समस्या का स्थायी हल संभव नहीं है। अन्यथा विभागीय कर्मचारी अपने मूल कार्य का निर्वहन ढंग से नहीं कर पाएंगे।”




डरिए मत! माखननगर में रेत डम्फर तो बस नाम के ही खतरा हैं, दुर्घटनाएं तो लगभग ‘गायब’ हैं

माखननगर। माखननगर की सड़कों पर बेतहाशा दौड़ते रेत डम्फरों को देखकर अगर आपकी रूह कांप जाती है और आपको लगता है कि ये किसी बड़े हादसे को न्योता दे देंगे… तो जनाब, आप बिल्कुल ग़लत हैं।
विधानसभा के मानसून सत्र में सरकार के जवाब ने साफ़ कर दिया है कि डम्फर से हादसों नहीं हो रहे हैं। जनवरी 2015 से जून 2025 तक माखननगर में कुल 1041 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 237 मौतें हुईं। इनमें डम्फरों का “योगदान” सिर्फ दो एक्सीडेंट और एक मौत रहा। यानी कुल दुर्घटनाओं का 0.19% और मौतों का 0.42%।
अब जब अगली बार डम्फर आपके बगल से गुज़रे तो डरिए मत। सोचिए कि आंकड़ों के हिसाब से आपका डर महज़ वहम है। और अगर डम्फर वाकई टक्कर मार भी दे, तो आंकड़ों में वो शायद गिनती लायक भी न निकले। बता दें कि यह मज़ेदार तथ्य और उसका दस्तावेज _*चुगली डॉट कॉम*_ से देनवा पोस्ट तक पहुँचे हैं।

*डम्फर से गई एक की जान*

माखननगर क्षेत्र में रेत डम्परों से हुई सड़क दुर्घटनाओं के केवल दो मामले दर्ज हैं। पहला मामला अपराध क्रमांक 449/18 का है, जो ग्राम गुजरवाड़ा, थाना माखननगर में हुआ। इसमें डम्पर क्रमांक MP-09 HH 3830 शामिल था। वाहन मालिक संजय जिराती पिता केदार (उम्र 42 वर्ष, निवासी पिपलदा, थाना खुड़ेल, जिला इंदौर) हैं, जबकि चालक भीमसिंह पिता भानसिंह परमार (उम्र 32 वर्ष, निवासी पिवडय, थाना खुड़ेल, जिला इंदौर) था। इस दुर्घटना में मृतक कृष्ण कुमार पिता रामनारायण यादव (उम्र 22 वर्ष, निवासी ग्राम गुजरवाड़ा, थाना माखननगर, जिला नर्मदापुरम) की मौत हुई। मामले में धारा 304-ए भादवि के तहत प्रकरण दर्ज किया गया और मृतक के परिजनों को शासन द्वारा 4 लाख रुपये की सहायता राशि दी गई।

*बिना बीमा फर्राटे से दौड़ रहा था डम्फर*

दूसरा मामला अपराध क्रमांक 296/19 का है, जिसकी घटना राजपूत ढाबा के आगे ग्राम आंचलखेड़ा, थाना माखननगर में हुई। इसमें डम्पर क्रमांक CG-13 D 5479 शामिल था। वाहन मालिक अर्पित पिता सतीश नारायण शुक्ला, निवासी भोपाल हैं और चालक वीर सिंह पिता लखनलाल लोवंशी, निवासी रायसेन था। इस दुर्घटना में कोई मृत्यु नहीं हुई। प्रकरण धारा 279 भादवि के तहत दर्ज किया गया, जिसमें आगे चलकर धारा 146/196 मोटर व्हीकल एक्ट का इजाफा किया गया, क्योंकि जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि वाहन का बीमा नहीं था।




शिक्षक पर विशेष : जिम्मेदारियाँ बढ़ीं, सम्मान घटा

भारत में गुरु को सदा से सर्वोच्च स्थान दिया गया है। लेकिन 21वीं सदी में आते-आते शिक्षक की भूमिका, चुनौतियाँ और सामाजिक स्थिति तेजी से बदली है। सवाल यह है कि क्या आज के शिक्षक वही गरिमा और सम्मान पा रहे हैं, जो कभी समाज में स्वाभाविक रूप से मिल जाता था?

तकनीक और व्यावसायिकता की चुनौती

आज शिक्षा डिजिटल हो चुकी है। ऑनलाइन क्लास, स्मार्ट बोर्ड और एआई आधारित लर्निंग ने विद्यार्थियों को सूचना-समृद्ध तो बना दिया है, परंतु यह ज्ञान और विवेक की गारंटी नहीं देता।
शिक्षक अब केवल किताबें पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि तकनीक का उपयोग करके विद्यार्थियों को दिशा देने वाला मार्गदर्शक बन गया है।
दूसरी ओर, शिक्षा का बाजारीकरण और कोचिंग कल्चर ने शिक्षण को मिशन से पेशे में बदल दिया है। परिणामस्वरूप, गुरु-शिष्य का आत्मीय रिश्ता कमजोर होता जा रहा है।

प्रशासनिक बोझ और हाशिये पर शिक्षक

सरकारी स्कूलों के शिक्षक केवल अध्यापन तक सीमित नहीं हैं। उन्हें जनगणना, चुनाव, टीकाकरण, सर्वेक्षण और सरकारी योजनाओं के कार्यों में भी लगाया जाता है।
इससे उनकी मूल भूमिका प्रभावित होती है और विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पाती।
निजी स्कूलों में दूसरी तरह की समस्याएँ हैं—यहाँ शिक्षक अक्सर अनुबंध पर काम करते हैं और उन्हें स्थायित्व या पर्याप्त वेतन नहीं मिलता।

बदलता छात्र और शिक्षक-छात्र रिश्ता

सोशल मीडिया और तकनीक ने विद्यार्थियों को अधिक जागरूक और प्रश्नाकुल बना दिया है। वे अब केवल जानकारी नहीं चाहते, बल्कि संवाद और चर्चा चाहते हैं।
यह शिक्षक के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए कि वे छात्रों को क्रिटिकल थिंकिंग और विवेकशीलता की ओर ले जा सकते हैं, और चुनौती इसलिए कि परंपरागत “गुरु वचनं प्रमाणम्” वाला दौर अब नहीं रहा।

सम्मान की कमी, जिम्मेदारी अधिक

आज समाज में शिक्षक का सम्मान पहले जितना नहीं रहा।
जहाँ कभी गुरुजनों के चरण स्पर्श करना परंपरा थी, वहीं आज शिक्षकों को अक्सर अभिभावकों और प्रबंधन की आलोचना झेलनी पड़ती है।
विडंबना यह है कि जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं, लेकिन गरिमा और सम्मान घटते जा रहे हैं।

समाधान की राह

शिक्षा को केवल व्यवसाय न मानकर चरित्र निर्माण का साधन बनाया जाए।

शिक्षकों को प्रशासनिक बोझ से मुक्त कर पूरी तरह अध्यापन पर केंद्रित होने दिया जाए।

डिजिटल युग में भी शिक्षक और छात्र के बीच मानवीय रिश्ता कायम रखा जाए।

सरकार और समाज दोनों यह समझें कि शिक्षक ही भविष्य का निर्माता है।

आज का शिक्षक यदि तकनीक और मूल्य दोनों का संतुलन साध ले, तो वह आने वाली पीढ़ियों को केवल काबिल नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बना सकता है।
शिक्षक दिवस पर यही संकल्प लेना जरूरी है कि शिक्षक को केवल नौकरी करने वाला कर्मचारी न समझा जाए, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का स्तंभ माना जाए।




संस्कृति और शिक्षा का संगम – स्व. मिश्रीलाल गुरुजी

नर्मदापुरम जिले का प्राचीन नगर सोहागपुर इतिहास, संस्कृति और शिक्षा—तीनों का संगम है। यह नगर कभी वाड़ासुर की राजधानी सोणितपुर कहलाता था। पलकमती (नर्मदा) नदी का तट, जमनी तालाब, स्वादिष्ट पान और कलात्मक सुराही इसकी पहचान रहे हैं। लेकिन सोहागपुर की असली पहचान इसकी शिक्षक परंपरा से है, जिसे आगे बढ़ाया स्व. मिश्रीलाल गुरुजी ने।

गुरुजी: शिक्षा और संस्कार के प्रतीक

मिश्रीलाल गुरुजी अंग्रेज़ी विषय के शिक्षक थे, लेकिन उनके लिए अध्यापन केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज निर्माण का मिशन था। सीमित साधनों और साधारण वेतन के बावजूद उन्होंने विद्यार्थियों को न केवल पढ़ाया, बल्कि उन्हें अनुशासन, ईमानदारी और नैतिकता का मार्ग भी दिखाया। यही कारण है कि उनके कई शिष्य आज उच्च पदों पर पहुँचकर भी गर्व से कहते हैं—“हम गुरुजी के छात्र हैं।”

गुरुजी के पुत्र, जो स्वयं सेवानिवृत्त इंजीनियर हैं, हर साल अपने पिता की पुण्यतिथि पर स्थानीय शिक्षकों का सम्मान करते हैं। यह परंपरा केवल एक परिवार की श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि इस बात का संदेश है कि समाज में गुरु का सम्मान सबसे ऊपर होना चाहिए।

बदलता समय और शिक्षा की चुनौतियाँ

आज का दौर शिक्षा को केवल “व्यवसाय” के रूप में देखने लगा है। कोचिंग कल्चर, डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रतिस्पर्धा की दौड़ ने शिक्षक-छात्र के रिश्ते की आत्मीयता को कम कर दिया है। सवाल उठता है—क्या आज के विद्यार्थी मिश्रीलाल गुरुजी जैसे किसी शिक्षक से वही आत्मीय मार्गदर्शन पाते हैं, जो उन्हें किताबों से बाहर जीवन की सच्चाइयाँ सिखाए?

सोहागपुर: संस्कृति और प्रकृति का संगम

सोहागपुर न केवल शिक्षा बल्कि अपनी प्राकृतिक धरोहर के लिए भी चर्चित है। देनवा नदी का तट और मढ़ई का क्षेत्र आज सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व का प्रवेश द्वार है। यह इलाका अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर दर्ज है। पर्यटक यहाँ जंगल सफारी के साथ-साथ इस नगर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को भी अनुभव करते हैं।

शिक्षक दिवस का सच्चा अर्थ

भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन कहा करते थे—“शिक्षक वह है, जो केवल पढ़ाता ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाता है।”
मिश्रीलाल गुरुजी का जीवन इसी विचार का प्रमाण है।

इसलिए शिक्षक दिवस केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि यह संकल्प है कि समाज शिक्षा को केवल व्यवसाय न समझे, बल्कि चरित्र और संस्कार निर्माण का आधार माने।

“गुरु का आदर करना केवल उनका सम्मान नहीं, बल्कि अपनी आत्मा का पोषण करना है।” – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

राकेश दुबे स्वतंत्र लेखक           



टैक्स राहत से आगे: स्वास्थ्य सेवाओं की असली चुनौती

जीएसटी काउंसिल की 56वीं बैठक में दवाओं, मेडिकल उपकरणों और बीमा पर कर घटाना निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है। इससे मरीजों और उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिलेगी। लेकिन इस राहत के पीछे छुपा सच यह है कि भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था अब भी गहरे संकट में है, और टैक्स में कटौती जैसी घोषणाएँ केवल सतही उपचार हैं।

बीमा पर 18% जीएसटी हटाना ऐतिहासिक कदम कहा जा रहा है। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि सरकार ने खुद स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च को लगातार कमतर रखा है। देश के जीडीपी का 2% से भी कम हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। नतीजा यह है कि आम नागरिक आज भी अपनी जेब से इलाज का 60% से अधिक खर्च करता है। सवाल यह है कि अगर सरकार बीमा को सस्ता करके लोगों को निजी कंपनियों की तरफ धकेल रही है, तो क्या यह असल में सार्वजनिक स्वास्थ्य से पल्ला झाड़ने की रणनीति नहीं है?

काउंसिल के इस बदलाव से न केवल इंसानों का इलाज कुछ सस्ता होगा, बल्कि वेटरिनरी सर्जिकल उपकरणों और सामानों की दरों में भी कटौती करने से जानवरों के इलाज में भी राहत मिलने की उम्मीद है. जीएसटी की सभी नई दरें 22 सितंबर 2025 से लागू होने जा रही हैं. आइए जानते हैं सरकार ने हेल्थकेयर में क्या-क्या चीजें सस्ती की हैं.

दवाओं, ग्लूकोमीटर, टेस्ट किट्स और ऑक्सीजन पर जीएसटी घटाना राहत तो है, लेकिन कोरोना काल में हमने देखा कि टैक्स दरें नहीं, बल्कि काला बाज़ारी और निजी कंपनियों की मुनाफाखोरी मरीजों पर सबसे बड़ा बोझ बनी। आज भी बड़ी फार्मा कंपनियाँ दवाओं की कीमतें मनमाने तरीके से तय करती हैं। सरकार की जिम्मेदारी केवल टैक्स कम करने तक सीमित नहीं रह सकती, उसे बाज़ार पर सख्त नियंत्रण और पारदर्शिता भी लानी होगी।

व्यक्तिगत हेल्थ इंश्योरेंस और लाइफ इंश्योरेंस-सभी प्रकार के स्वास्थ्य बीमा और जीवन बीमा पॉलिसीज को सस्ता किया गया है. जीएसटी काउंसिल ने बीमा पर लगने वाले 18% टैक्स को घटाकर जीरो कर दिया है. ऐसे में जीवन बीमा लेने वालों को अब सिर्फ इंश्योरेंस का प्रीमियम ही भरना होगा और इस पर कोई भी अतिरिक्त टैक्स नहीं देना होगा. यह हेल्थ इंश्योरेंस लेने वालों के लिए बड़ा फायदा है, क्योंकि एलआईसी को पहले से ही इनकम टैक्स में छूट मिली हुई है, वहीं अब जीएसटी भी हटने से बीमा लेना फायदे का सौदा होगा.

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब महँगाई, बेरोज़गारी और स्वास्थ्य खर्च जनता की सबसे बड़ी चिंता हैं। जीएसटी दरों में कटौती की घोषणा सुर्खियाँ तो बटोर लेती है, पर असली सवाल यह है कि क्या इससे गाँव-गाँव तक डॉक्टर, दवाइयाँ और अस्पताल पहुँचेंगे? ग्रामीण भारत अब भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की बदहाली से जूझ रहा है। शहरी गरीबों के लिए सरकारी अस्पतालों में न दवा है, न बेड। ऐसे में टैक्स राहत को “बड़ा सुधार” बताना जनता की आँखों में धूल झोंकने जैसा है।

सभी प्रकार की डायग्नोस्टिक किट्स और रीजेंट्स काउंसिल ने देश में बीमारियों की पहचान के लिए मौजूद सभी प्रकार की डायग्नोस्टिक किट्स सहित इनमें जांच के लिए इस्तेमाल होने वाले रीजेंट्स को सस्ता किया है. ऐसे में बाजार में रिटेल में मिलने वाली डायग्नोस्टिक किट्स जैसे प्रेग्नेंसी टेस्ट किट्स, एलर्जी टेस्ट किट्स, कैंसर टेस्ट किट्स, डायबिटीज टेस्ट किट्स और इन्फेक्शियस डिजीज टेस्ट किट्स आदि से जीएसटी की दरें 12 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई हैं.
जीएसटी काउंसिल का निर्णय राहत की घोषणा है, लेकिन सुधार की गारंटी नहीं। जब तक सरकार—

सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट नहीं बढ़ाती,

निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों की मनमानी पर लगाम नहीं लगाती,

और ग्रामीण-शहरी स्वास्थ्य ढांचे की खाई नहीं पाटती,
तब तक टैक्स राहत महज़ राजनीतिक प्रचार का औज़ार बनी रहेगी।

स्वास्थ्य पर राजनीति करना आसान है, लेकिन जनता को सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ देना ही असली जिम्मेदारी है। टैक्स घटाना शुरुआत है, मगर असली इलाज अभी बाकी है।




न्यायपालिका पर दबाव: क्या अब अदालतें भी फोन कॉल से तय होंगी?

मध्यप्रदेश हाई कोर्ट, जबलपुर में अवैध खनन से जुड़े मामले की सुनवाई अचानक उस समय सुर्खियों में आ गई, जब न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा ने खुद को इस केस से अलग कर लिया। वजह थी—भाजपा विधायक संजय पाठक का न्यायाधीश से सीधे फ़ोन पर संपर्क साधने की कोशिश।

न्यायमूर्ति मिश्रा ने इस बात का उल्लेख अपनी ऑर्डर शीट में दर्ज कर दिया और साफ कहा कि अब वह इस मामले की सुनवाई करने के इच्छुक नहीं हैं। यह घटना केवल एक मुकदमे तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और राजनीति के हस्तक्षेप पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

मामला क्या है?

कटनी निवासी आशुतोष दीक्षित ने बड़ी मात्रा में अवैध खनन की शिकायत आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) में की थी। आरोप था कि तय समयसीमा के भीतर जांच पूरी नहीं हुई और कार्रवाई में लापरवाही बरती गई। इसी कारण उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
इस याचिका में विधायक संजय पाठक को पक्षकार नहीं बनाया गया था। बावजूद इसके, पाठक और उनके परिवार के सदस्यों ने हस्तक्षेप आवेदन देकर अपनी बात रखने की अनुमति माँगी। यहीं से विवाद गहराया और फोन कॉल की घटना सामने आई।

न्यायिक स्वतंत्रता पर सवाल

भारत के संविधान का बुनियादी ढाँचा न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर टिका है। अगर किसी विधायक का फ़ोन कॉल किसी जज को केस से अलग होने के लिए मजबूर कर सकता है, तो यह संकेत है कि दबाव और हस्तक्षेप किस हद तक गहराए हुए हैं।

क्या यह न्यायाधीशों के निर्णय लेने की स्वतन्त्रता पर सीधा हमला नहीं है?

क्या यह भविष्य में गवाहों और याचिकाकर्ताओं को यह संदेश नहीं देता कि राजनीतिक रसूख अदालत तक पहुँच सकता है?

राजनीति और खनन का गठजोड़

मध्यप्रदेश में अवैध खनन लंबे समय से राजनीति और प्रशासन के गठजोड़ का प्रतीक माना जाता रहा है। जब शिकायतकर्ता न्याय की तलाश में अदालत जाता है और वहीं राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका जन्म लेती है, तो यह पूरा तंत्र कटघरे में खड़ा होता है।

आगे की चुनौती

अब मामला चीफ जस्टिस के पास गया है, जो यह तय करेंगे कि सुनवाई किस बेंच में होगी। लेकिन असली सवाल यह है कि:

क्या केवल बेंच बदलने से न्यायपालिका पर से दबाव का साया हट जाएगा?

या फिर इस घटना को एक उदाहरण मानकर राजनीतिक हस्तक्षेप के खिलाफ ठोस कदम उठाने होंगे?

यह प्रकरण हमें याद दिलाता है कि न्याय केवल अदालत के आदेशों से नहीं, बल्कि अदालत के विश्वास और स्वतंत्रता से भी जीवित रहता है। अगर न्यायमूर्ति को फोन कॉल जैसे हस्तक्षेप का ज़िक्र अपनी ऑर्डर शीट में दर्ज करना पड़े, तो यह संकेत है कि न्यायपालिका पर दबाव का खतरा वास्तविक है, काल्पनिक नहीं।




डिजिटल हाजिरी का नया : पारदर्शिता की आड़ में शिक्षकों पर सख्ती

मध्यप्रदेश सरकार ने सरकारी कॉलेजों में हाजिरी प्रणाली को पूरी तरह डिजिटल बनाने का ऐलान कर दिया है। अब प्रोफेसर से लेकर गेस्ट फैकल्टी तक सभी को सार्थक एप से ही उपस्थिति दर्ज करनी होगी। शासन का दावा है कि इससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी, लेकिन हकीकत यह है कि यह कदम शिक्षकों के लिए नई परेशानियों का सबब बन गया है।

आदेश के नाम पर सख्ती

आयुक्त प्रबल सिपाहा के आदेश में साफ कहा गया है कि सभी अधिकारी-कर्मचारी सिर्फ कार्यस्थल से ही हाजिरी लगाएंगे। क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालक (एडी) और कॉलेज प्राचार्य पर पूरी जिम्मेदारी डाली गई है और गड़बड़ी पाए जाने पर उन पर सीधे कार्रवाई होगी। यानी शासन ने जिम्मेदारी के नाम पर पूरी व्यवस्था का बोझ सीधे कॉलेज प्रशासन और शिक्षकों पर डाल दिया है।

आसान नहीं डिजिटल हाजिरी

सरकार का दावा है कि अब एनालिटिकल डैशबोर्ड से हाजिरी का डेटा रीयल-टाइम में कलेक्टर और आयुक्त तक जाएगा। लेकिन बड़े कॉलेज कैंपस (20–25 एकड़) और नेटवर्क की दिक्कतों के बीच हर बार एक ही स्थान से एप पर हाजिरी लगाना कितना व्यावहारिक होगा, इस पर कोई जवाब नहीं।

शिक्षकों की नाराजगी

प्राध्यापक संघ के अध्यक्ष प्रो. आनंद शर्मा का कहना है—
“शासन का उद्देश्य उपस्थिति वेरीफाई करना नहीं बल्कि शिक्षकों को परेशान करना है।”
वास्तव में, शिक्षकों का तर्क सही भी है। परीक्षा, प्रैक्टिकल और रिसर्च कार्य के बीच हर बार मोबाइल लेकर एक तय स्थान पर जाकर हाजिरी लगाना समय की बर्बादी ही है।

पारदर्शिता या अविश्वास?

सरकार इसे पारदर्शिता का कदम बता रही है, लेकिन असल में यह शिक्षकों पर अविश्वास की मुहर है। उपस्थिति की निगरानी अब सीधे प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचाई जाएगी, मानो शिक्षक ही सबसे गैर-जिम्मेदार कर्मचारी हों। सवाल यह है कि क्या जवाबदेही केवल डिजिटल निगरानी से ही तय होती है?

डिजिटल हाजिरी व्यवस्था कागजों पर भले ही पारदर्शिता की मिसाल बने, मगर ज़मीनी हकीकत में यह शिक्षकों के लिए झंझट और अविश्वास की नई जंजीर बनती दिख रही है। सुधार के नाम पर ऐसी कठोर व्यवस्थाएँ शिक्षा के माहौल को बेहतर बनाने के बजाय और जटिल बना सकती हैं।