भारत के लोकतंत्र पर मंडराता अघोषित संकट!

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। यह वाक्य लंबे समय तक केवल एक राजनीतिक परिचय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक रहा। संविधान, चुनाव, न्यायपालिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थागत संतुलन—इन सबने मिलकर यह भरोसा पैदा किया कि तमाम विविधताओं और संघर्षों के बावजूद भारत एक सभ्य लोकतांत्रिक राष्ट्र बना रहेगा। लेकिन आज जब हम अपने आसपास की घटनाओं को देखते हैं, तो एक असहज सवाल खड़ा होता है—क्या लोकतंत्र केवल चुनावों तक सिमट गया है? क्या उसकी आत्मा धीरे-धीरे खत्म हो रही है?

देश के अलग-अलग हिस्सों में घट रही घटनाएं देखने में भले अलग लगती हों, लेकिन वे एक ही गहरे संकट की ओर संकेत करती हैं। कहीं मजदूर न्यूनतम मजदूरी की मांग करते हुए सड़कों पर हिंसक टकराव में उतर रहे हैं, कहीं न्यायपालिका पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कहीं लाखों मतदाताओं के नाम वोटर सूची से रहस्यमय तरीके से हटा दिए जाते हैं, तो कहीं अदालतें खुलेआम नफरत फैलाने वाले भाषणों को अपराध मानने से इनकार कर देती हैं। ये घटनाएं केवल प्रशासनिक विफलताएं नहीं हैं; ये लोकतंत्र के उस नैतिक ढांचे के दरकने के संकेत हैं, जिस पर पूरा गणराज्य खड़ा होता है।

डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने संविधान सभा में चेतावनी दी थी कि भारत में लोकतंत्र केवल “ऊपरी मिट्टी की एक पतली परत” है। उनका आशय यह था कि भारतीय समाज के भीतर जातिवाद, सांप्रदायिकता, असमानता और सत्ता-पूजा जैसी प्रवृत्तियां इतनी गहरी हैं कि यदि लोकतांत्रिक मूल्यों की निरंतर रक्षा न की जाए, तो यह परत कभी भी उड़ सकती है। आज उनकी यह चेतावनी भयावह रूप से सच साबित होती दिखाई दे रही है।

लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं है। यह विश्वास का तंत्र है—यह भरोसा कि कानून सबके लिए समान होगा, न्याय निष्पक्ष होगा, राज्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा और संस्थाएं सत्ता के सामने झुकेंगी नहीं। लेकिन जब न्यायपालिका राजनीतिक दबावों से घिरी दिखे, जब चुनावी प्रक्रिया पर ही संदेह खड़े होने लगें, जब गरीब नागरिक को अपने मृत परिजन का शव बैंक तक ले जाकर यह साबित करना पड़े कि वह सचमुच मर चुका है, तब लोकतंत्र केवल एक औपचारिक ढांचा बनकर रह जाता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि समाज धीरे-धीरे इस असामान्यता को सामान्य मानने लगा है। नफरत भरे भाषण अब राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुके हैं। धार्मिक ध्रुवीकरण चुनावी लाभ का साधन बन गया है। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूल प्रश्न पीछे धकेल दिए गए हैं, जबकि पहचान की राजनीति को केंद्र में ला दिया गया है। सत्ता के लिए समाज को बांटना अब शर्म की बात नहीं रही, बल्कि सफल राजनीतिक प्रबंधन का प्रतीक बना दिया गया है।

यह संकट केवल सरकार का नहीं है; यह सामाजिक संवेदनहीनता का भी संकट है। देश का एक बड़ा वर्ग अब केवल अपने निजी हितों तक सीमित होता जा रहा है। आर्थिक असमानता इतनी बढ़ चुकी है कि समाज दो हिस्सों में बंटता दिखता है—एक वह वर्ग जिसके पास संसाधनों, अवसरों और सत्ता तक पहुंच है, और दूसरा वह विशाल वर्ग जो केवल जीवित रहने की जद्दोजहद में फंसा हुआ है। लोकतंत्र समान अवसरों की जमीन पर फलता-फूलता है, लेकिन जब असमानता ही व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन जाए, तब लोकतंत्र खोखला हो जाता है।

राजनीतिक दलों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। विचारधारा अब अवसरवाद के सामने कमजोर पड़ती दिख रही है। दल-बदल केवल राजनीतिक रणनीति नहीं रह गया, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता के पतन का प्रतीक बन गया है। जनता जिस विश्वास के आधार पर नेताओं को चुनती है, वही विश्वास सत्ता और लाभ की राजनीति में टूट जाता है। जब निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के जनादेश से अधिक व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य को महत्व देने लगें, तब लोकतंत्र प्रतिनिधित्व का नहीं, सौदेबाजी का माध्यम बन जाता है।

लेकिन शायद सबसे बड़ा संकट न्यायपालिका को लेकर पैदा हो रहा अविश्वास है। लोकतंत्र में न्यायपालिका अंतिम उम्मीद होती है। नागरिक यह मानकर जीता है कि यदि कार्यपालिका और राजनीति अन्याय करेंगी, तो अदालतें संविधान की रक्षा करेंगी। मगर जब अदालतें नागरिक अधिकारों की रक्षा में उदासीन दिखें, जब संवैधानिक अधिकारों के हनन को मामूली प्रशासनिक भूल की तरह देखा जाए, तब लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है।

आज स्थिति यह है कि संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना को राष्ट्रविरोध से जोड़ दिया जाता है। सवाल पूछने वालों को संदेह की नजर से देखा जाता है। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता से सवाल करने के बजाय उसका प्रचारक बनता जा रहा है। विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र सोच को नियंत्रित करने की कोशिशें हो रही हैं। यह सब किसी स्वस्थ लोकतंत्र के संकेत नहीं हैं।

इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र अचानक खत्म नहीं होता। वह धीरे-धीरे कमजोर होता है—संस्थाओं में अविश्वास से, नागरिक अधिकारों के क्षरण से, असहमति के दमन से और समाज में फैलाई गई नफरत से। जब जनता अन्याय को सामान्य मानने लगे और सत्ता जवाबदेही से मुक्त हो जाए, तब लोकतंत्र केवल नाम भर रह जाता है।

फिर भी उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी आत्म-सुधार की क्षमता होती है। नागरिक समाज, स्वतंत्र पत्रकारिता, संवेदनशील न्यायिक हस्तक्षेप और जागरूक नागरिक अब भी इस गिरावट को रोक सकते हैं। लेकिन इसके लिए सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि संकट वास्तविक है। लोकतंत्र को केवल राष्ट्रगान, चुनाव और भाषणों से नहीं बचाया जा सकता; उसे बचाने के लिए संस्थाओं की स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और नागरिक अधिकारों की रक्षा करनी होगी।

भारत केवल एक भूगोल नहीं है; यह एक संवैधानिक विचार है। यदि यह विचार कमजोर पड़ता है, तो हमारे पास केवल सत्ता का ढांचा बचेगा, लोकतंत्र नहीं। और किसी भी राष्ट्र के लिए इससे बड़ा खतरा नहीं हो सकता कि वह अपने लोकतंत्र को खो दे, जबकि उसे यह भ्रम बना रहे कि सब कुछ सामान्य है।




चरम राष्ट्रवाद : जब देशभक्ति धीरे-धीरे कट्टरता में बदलने लगती है

राष्ट्रप्रेम किसी भी समाज की सबसे सकारात्मक भावनाओं में से एक माना जाता है। अपने देश, संस्कृति, भाषा और इतिहास पर गर्व करना स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। यही भावना लोगों को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करती है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब राष्ट्रप्रेम संतुलन खो देता है और धीरे-धीरे चरम राष्ट्रवाद में बदलने लगता है।

आज दुनिया के कई देशों में राजनीति, मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रवाद को एक शक्तिशाली भावनात्मक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। राष्ट्रप्रेम की भावना को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है कि जो व्यक्ति सरकार, व्यवस्था या नीतियों पर सवाल पूछे, उसे सीधे “राष्ट्रविरोधी” साबित करने की कोशिश होने लगती है। यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र कमजोर और कट्टरता मजबूत होने लगती है।

देशभक्ति और चरम राष्ट्रवाद में मूलभूत अंतर समझना बेहद जरूरी है।
देशभक्ति अपने देश से प्रेम करना सिखाती है।
चरम राष्ट्रवाद दूसरों से घृणा करना सिखाने लगता है।

एक सच्चा देशभक्त अपने देश की कमियों पर सवाल भी उठाता है, सुधार की मांग भी करता है और संविधान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने की बात भी करता है। लेकिन चरम राष्ट्रवाद अक्सर सवालों को खतरे की तरह देखने लगता है। वहां आलोचना को सुधार का माध्यम नहीं, बल्कि “देशद्रोह” के रूप में प्रचारित किया जाता है।

इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी राष्ट्रवाद अंधभक्ति में बदला, परिणाम विनाशकारी रहे। जर्मनी में Adolf Hitler ने राष्ट्रवाद को भावनात्मक उन्माद में बदल दिया। लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि उनका राष्ट्र और नस्ल दुनिया में सर्वोच्च है। धीरे-धीरे लोकतंत्र खत्म हुआ, असहमति कुचली गई और अंततः World War II जैसी भयावह त्रासदी सामने आई।

चरम राष्ट्रवाद की सबसे खतरनाक विशेषता यह होती है कि वह समाज को “हम” और “वे” में बांट देता है। लोग नागरिक कम और पहचान आधारित समूहों के सदस्य ज्यादा बन जाते हैं। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर श्रेष्ठता की भावना पैदा की जाती है। फिर राजनीति इन भावनाओं को भड़काकर सत्ता मजबूत करने का माध्यम बना लेती है।

सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र कर दिया है। आज कुछ सेकंड के वीडियो, उत्तेजक भाषण और भावनात्मक नारों के जरिए लोगों को तुरंत प्रभावित किया जा सकता है। जो जितना आक्रामक दिखता है, वह उतना “राष्ट्रवादी” घोषित कर दिया जाता है। तर्क, तथ्य और संवैधानिक मूल्यों की जगह शोर और भीड़ की मानसिकता ले लेती है।

विडंबना यह है कि चरम राष्ट्रवाद अक्सर उन लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी कमजोर करता है, जो वास्तव में राष्ट्र की ताकत होती हैं। न्यायपालिका, मीडिया, विश्वविद्यालय और स्वतंत्र संस्थाओं पर सवाल उठाने वालों को “राष्ट्रहित” के नाम पर चुप कराने की कोशिश होने लगती है। जबकि लोकतंत्र की असली ताकत सवाल पूछने की आजादी में होती है, न कि एकरूप सोच में।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि चरम राष्ट्रवाद आमतौर पर भावनाओं पर आधारित होता है, तथ्यों पर नहीं। इतिहास को चयनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, भावनात्मक नारों को तर्क से ऊपर रखा जाता है और जनता को लगातार यह एहसास दिलाया जाता है कि राष्ट्र “खतरे” में है। डर और गुस्सा राजनीति के सबसे प्रभावी उपकरण बन जाते हैं।

एक स्वस्थ राष्ट्र वही होता है जहां नागरिक अपने देश से प्रेम करें, लेकिन संविधान, लोकतंत्र और मानवता को भी उतना ही महत्व दें। जहां सैनिक का सम्मान हो, लेकिन शिक्षक, किसान, मजदूर और वैज्ञानिक भी राष्ट्रनिर्माता माने जाएं। जहां राष्ट्रध्वज पर गर्व हो, लेकिन मानवाधिकारों और असहमति का भी सम्मान हो।

आज सबसे बड़ी आवश्यकता संतुलित राष्ट्रवाद की है — ऐसा राष्ट्रवाद जो जोड़ने का काम करे, तोड़ने का नहीं। जो विविधता को कमजोरी नहीं, ताकत माने। जो आलोचना से डरे नहीं, बल्कि उसे सुधार का अवसर समझे।

क्योंकि जब राष्ट्रप्रेम विवेक खो देता है, तब वह लोकतंत्र के लिए चुनौती बन जाता है। और जब सवाल पूछना अपराध लगने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि राष्ट्रवाद धीरे-धीरे चरम राष्ट्रवाद में बदल रहा है।

राष्ट्र किसी एक नेता, एक विचारधारा या एक समूह का नाम नहीं होता। राष्ट्र उन करोड़ों लोगों का साझा विश्वास होता है जो अलग-अलग विचारों के बावजूद साथ रहते हैं। इसलिए देशभक्ति का अर्थ सत्ता से सहमति नहीं, बल्कि देश और उसके लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति ईमानदारी होना चाहिए।

अन्यथा इतिहास बार-बार यही साबित करता है कि चरम राष्ट्रवाद शुरुआत में शक्ति जैसा दिखता है, लेकिन अंत में समाज को विभाजन, भय और संघर्ष की ओर धकेल देता है।




चोर पहले से ज्ञात, केस फिर भी अज्ञात!

देश में अपराध रोकने की जिम्मेदारी जिस संस्था के कंधों पर है, आज वही संस्था कई बार अपने काम करने के तरीके को लेकर सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई देती है। आम नागरिक जब किसी चोरी, लूट या अपराध का शिकार होता है, तो सबसे पहले पुलिस थाने का दरवाजा खटखटाता है। उसे उम्मीद होती है कि कानून उसकी रक्षा करेगा, अपराधी पकड़े जाएंगे और न्याय मिलेगा। लेकिन विडंबना यह है कि कई मामलों में पुलिस का पूरा ध्यान अपराध रोकने से ज्यादा “खुलासा” करने की कला पर केंद्रित दिखाई देता है।

सबसे हास्यास्पद स्थिति तब बनती है जब पुलिस आरोपी को पकड़ने के बाद भी मामला “अज्ञात आरोपी” के खिलाफ दर्ज करती है और फिर कुछ दिनों बाद उसी आरोपी को मीडिया के सामने पेश कर “बड़ी सफलता” का ढोल पीटती है। मानो अपराधी कोई अंतरराष्ट्रीय गिरोह का मास्टरमाइंड हो, जिसे खोजने में एजेंसियों के पसीने छूट गए हों।

आजकल पुलिसिया प्रेस नोट पढ़िए तो लगता है जैसे किसी फिल्म का ट्रेलर चल रहा हो —“पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली… घेराबंदी की गई… आरोपी भागने लगा… पुलिस ने बहादुरी दिखाते हुए पकड़ लिया…”और अंत में पता चलता है कि आरोपी वही है, जिसे पुलिस पहले से जानती थी, इलाके में उसका पुराना रिकॉर्ड था और कई बार थाने में उसका आना-जाना भी रहा है।

लेकिन असली सवाल यह है कि यदि आरोपी पहले से पहचान में था तो मामला “अज्ञात” क्यों दर्ज हुआ?क्या कानून की किताब में “अज्ञात” शब्द अब सिर्फ एक औपचारिकता बन चुका है?या फिर यह “खुलासा उद्योग” का हिस्सा है, जहां अपराध से ज्यादा उसकी प्रस्तुति महत्वपूर्ण हो गई है?

अब स्थिति यह हो गई है कि चोरी होने के बाद जनता अपराधी पकड़ने से ज्यादा पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस का इंतजार करती है। पुलिस आरोपी पकड़ती कम और फोटो ज्यादा खिंचवाती दिखाई देती है। बरामद सामान को इस अंदाज में सजाया जाता है मानो किसी प्रदर्शनी का उद्घाटन होने वाला हो। एक पुरानी बाइक, दो मोबाइल, तीन हजार रुपए और एक जंग लगी रॉड के साथ आरोपी को खड़ा कर दिया जाता है। फिर बयान आता है —“आरोपी से पूछताछ जारी है, अन्य वारदातों के खुलासे की संभावना है।”यानी अपराधी पकड़ने से ज्यादा “संभावनाएं” पकड़ी जा रही हैं।व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस अपराध को होने से रोकना चाहिए, उसी के बाद उसका “खुलासा” उपलब्धि माना जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे डॉक्टर मरीज को बीमार होने से रोकने के बजाय बीमारी बढ़ने का इंतजार करे ताकि बाद में ऑपरेशन कर वाहवाही लूट सके।

यह भी कम दिलचस्प नहीं कि कई बार चोरी की घटनाओं में पुलिस पहले पीड़ित से ही सवाल-जवाब करती है, मानो वही संदेह के घेरे में हो। “दरवाजा खुला क्यों था?”, “इतना सामान घर में क्यों रखा?”, “सीसीटीवी क्यों नहीं लगाए?”लेकिन जब जनता पुलिस से पूछे कि गश्त क्यों नहीं थी, अपराधी खुलेआम क्यों घूम रहे थे, पुराने बदमाशों पर निगरानी क्यों नहीं थी — तब जवाब अक्सर मौन में मिलता है।दरअसल, आज अपराध नियंत्रण से ज्यादा “इमेज मैनेजमेंट” का दौर चल रहा है। अपराध का ग्राफ चाहे बढ़े, लेकिन प्रेस नोट की भाषा हमेशा विजयी रहती है। चोरी की घटनाएं लगातार होती रहेंगी, लेकिन यदि हर चोरी के बाद एक प्रेस वार्ता हो जाए तो व्यवस्था स्वयं को सफल मान लेती है।

कई बार तो ऐसा लगता है कि पुलिस और अपराधियों के बीच एक मौन समझौता चल रहा हो —“तुम चोरी करते रहो, हम खुलासा करते रहेंगे।”जनता बीच में सिर्फ दर्शक बनी रहती है।सबसे दुखद पहलू यह है कि आम आदमी धीरे-धीरे इस व्यवस्था को सामान्य मानने लगा है। उसे अब अपराध से ज्यादा यह चिंता रहती है कि “कम से कम सामान मिल जाए।” यानी न्याय की उम्मीद छोटी होकर सिर्फ बरामदगी तक सीमित हो गई है।

सोचिए, यदि कोई किसान हर साल फसल बर्बाद होने के बाद सिर्फ यह कहे कि “अगली बार सुधार करेंगे”, तो क्या उसे सफल किसान माना जाएगा?फिर पुलिस व्यवस्था में अपराध रोकने की विफलता को सफलता की तरह क्यों प्रस्तुत किया जाता है?आज जरूरत इस बात की है कि पुलिस व्यवस्था अपनी प्राथमिकताओं पर गंभीरता से विचार करे।

अपराध होने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करना आसान है, लेकिन अपराध होने से पहले उसे रोकना असली पुलिसिंग है। इलाके के बदमाशों पर निगरानी, नियमित गश्त, तकनीकी जांच, मुखबिर तंत्र की सक्रियता और जनता के साथ विश्वास — यही किसी भी मजबूत कानून व्यवस्था की पहचान होती है।लेकिन यदि व्यवस्था सिर्फ “अज्ञात आरोपी” से “खुलासा” तक की यात्रा में ही उलझी रहेगी, तो अपराधियों का मनोबल बढ़ेगा और जनता का भरोसा घटेगा।

आजकल पुलिस की सबसे बड़ी उपलब्धि अपराध रोकना नहीं, बल्कि अपराध होने के बाद उसका पोस्टर बनाना रह गई है।और जनता भी अब इस तमाशे की इतनी अभ्यस्त हो चुकी है कि जब तक प्रेस नोट में “बड़ी सफलता” न लिखा हो, उसे लगता ही नहीं कि कोई कार्रवाई हुई है।कानून व्यवस्था का असली उद्देश्य भयमुक्त समाज बनाना होना चाहिए, न कि “खुलासों” की प्रतियोगिता।




प्रशिक्षण पहले, आदेश बाद में—माखननगर का प्रशासनिक खेल!

देश में जनगणना कोई सामान्य सरकारी प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह राष्ट्र की नीतियों, योजनाओं और संसाधनों के वितरण की बुनियाद होती है। लेकिन जब इसी महत्वपूर्ण कार्य की शुरुआत ही प्रशासनिक लापरवाही और विरोधाभास से भरे आदेशों के साथ हो, तो सवाल सिर्फ एक कार्यालय या अधिकारी पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर उठना लाज़मी हो जाता है।

मध्यप्रदेश के माखननगर से जारी जनगणना 2027—मकान सूचीकरण एवं मकानों की गणना के लिए प्रगणक नियुक्ति पत्र इन दिनों चर्चा का विषय बने हुए हैं। 24 अप्रैल 2026 से 27 अप्रैल 2026 के बीच जारी इन आदेशों ने प्रशासनिक गंभीरता की बजाय एक अजीब विडंबना को उजागर कर दिया है।

सबसे पहले बात उस बिंदु की, जो इस पूरे मामले का केंद्र है—प्रशिक्षण की अनिवार्यता। आदेश में साफ-साफ लिखा गया है कि “आपको निम्नानुसार प्रशिक्षण में भाग लेना अनिवार्य है।” यह निर्देश अपने आप में सही और आवश्यक है, क्योंकि जनगणना जैसे कार्य के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन बेहद जरूरी होता है। लेकिन जैसे ही इन आदेशों में दी गई प्रशिक्षण तिथियों पर नजर जाती है, पूरा मामला हास्यास्पद हो जाता है।

24 अप्रैल को जारी पत्र में प्रशिक्षण की तारीखें 15, 16 और 17 अप्रैल 2026 दी गई हैं, जबकि 27 अप्रैल को जारी पत्र में 10, 11 और 12 अप्रैल 2026। यानी प्रशिक्षण पहले ही संपन्न हो चुका है और उसके बाद आदेश जारी हो रहे हैं कि प्रशिक्षण में भाग लेना “अनिवार्य” है।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या प्रशासन समय से पीछे चल रहा है, या फिर आदेश जारी करने की प्रक्रिया ही एक औपचारिकता बनकर रह गई है?

अगर प्रशिक्षण पहले ही दिया जा चुका था, तो नियुक्ति पत्र समय पर क्यों नहीं जारी किए गए? और यदि यह सिर्फ एक “कॉपी-पेस्ट” त्रुटि है, तो क्या इतनी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में भी बुनियादी सावधानी बरतना जरूरी नहीं समझा गया?

यहां एक और गंभीर विरोधाभास सामने आता है। आदेश में जनगणना अधिनियम 1948 की धारा 5 और 11 का हवाला देते हुए कर्मचारियों को यह स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि उन्हें एक लोक सेवक माना जाएगा और जनगणना कार्य में सहयोग करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इतना ही नहीं, कार्य से इंकार करने पर ₹1000 तक का जुर्माना और तीन वर्ष तक की सजा का प्रावधान भी बताया गया है। यानी एक तरफ कर्मचारियों को कानून का डर दिखाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ वही आदेश खुद अपनी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर रहा है।

क्या कानून सिर्फ नीचे के कर्मचारियों के लिए है? या फिर अधिकारियों के लिए अलग नियम लागू होते हैं?

इस पूरे मामले में सबसे पेचीदा पहलू है—जिम्मेदारी का धुंधलापन। चार्ज अधिकारी के रूप में तहसीलदार महेंद्र सिंह चौहान का नाम सामने आता है, लेकिन वे अवकाश पर हैं। उनकी जगह नायब तहसीलदार सुनील गढ़वाल को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

अब स्थिति यह है कि आदेशों पर हस्ताक्षर किसके हैं, और आधिकारिक पहचान (आईडी) किसकी उपयोग हो रही है—यह खुद एक प्रशासनिक पहेली बन गई है। यदि नायब तहसीलदार कार्यभार संभाल रहे हैं, तो क्या उन्होंने इन आदेशों को पढ़े बिना हस्ताक्षर कर दिए? और यदि हस्ताक्षर तहसीलदार के नाम से हो रहे हैं, तो क्या यह प्रक्रिया नियमों के अनुरूप है?

नायब तहसीलदार का यह कहना कि “हम दिखवाते हैं कि क्या गलती हुई है”, अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। क्या इतने महत्वपूर्ण आदेश बिना सत्यापन के जारी किए जा रहे हैं? और यदि हां, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी से सीधा खिलवाड़ है।

इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प, लेकिन चिंताजनक तर्क सामने आया—एक ऑपरेटर का कहना कि “फॉर्म में यह लाइन एडिट नहीं हो रही थी।”

यह तर्क सुनने में जितना साधारण लगता है, उतना ही गंभीर संकेत देता है। क्या अब सरकारी आदेश सॉफ्टवेयर की सीमाओं के अनुसार बनाए जाएंगे? क्या एक साधारण सुधार—जैसे पेन से तारीख ठीक करना—भी अब प्रशासनिक प्रक्रिया से बाहर हो गया है?

अगर एक लाइन एडिट नहीं हो रही थी, तो क्या पूरी प्रक्रिया को ही गलत जानकारी के साथ आगे बढ़ाना उचित था?
यह न केवल प्रशासनिक अक्षमता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि जिम्मेदारी से बचने के लिए किस तरह तकनीकी बहानों का सहारा लिया जा रहा है।

जवाबदेही किसकी तय होगी?

हमारे प्रशासनिक ढांचे में अक्सर यह देखा गया है कि छोटी-सी गलती पर निचले स्तर के कर्मचारियों पर तुरंत कार्रवाई हो जाती है। नोटिस, निलंबन और विभागीय जांच आम बात है। लेकिन जब गलती ऊपर के स्तर पर होती है, तो वही मामला “तकनीकी त्रुटि” या “प्रक्रियात्मक चूक” कहकर दबा दिया जाता है।

क्या इस मामले में भी वही परंपरा दोहराई जाएगी?क्या फिर से छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया जाएगा और अधिकारी जिम्मेदारी से बच निकलेंगे? जनगणना जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्य में इस तरह की लापरवाही न सिर्फ प्रक्रिया को कमजोर करती है, बल्कि जनता के विश्वास को भी ठेस पहुंचाती है। जब आदेश ही स्पष्ट और सही नहीं होंगे, तो कार्यान्वयन की गुणवत्ता पर भरोसा कैसे किया जा सकता है?

यह मामला केवल तारीखों की गड़बड़ी या हस्ताक्षर की तकनीकी समस्या नहीं है। यह उस मानसिकता का प्रतीक है, जिसमें काम की गंभीरता से ज्यादा औपचारिकता को महत्व दिया जाता है। जहां आदेश जारी करना एक प्रक्रिया है, लेकिन उसकी शुद्धता और समयबद्धता कोई प्राथमिकता नहीं। अब समय आ गया है कि इस पूरे मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। यह तय होना चाहिए कि गलती कहां हुई, किस स्तर पर हुई और उसके लिए कौन जिम्मेदार है। सबसे महत्वपूर्ण—क्या कार्रवाई सिर्फ कर्मचारियों तक सीमित रहेगी, या अधिकारियों तक भी पहुंचेगी?

क्योंकि अगर कानून का डर सिर्फ नीचे तक सीमित रहेगा और ऊपर तक नहीं पहुंचेगा, तो ऐसे आदेश बार-बार मज़ाक बनते रहेंगे—और जनगणना जैसे गंभीर कार्य भी।

Disclaimer: प्रकाशन से जुड़े कानूनी प्रावधानों के कारण संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए जा सकते, हालांकि वे सुरक्षित अभिलेख के रूप में संरक्षित हैं।




सफेद साड़ी, हवाई चप्पल और सियासत की धार

ममता बनर्जी का ‘सादा’ लेकिन ‘घातक’ राजनीतिक चेहरा

भारतीय राजनीति में ताकत की पहचान अक्सर बड़े काफिलों, भारी-भरकम सुरक्षा और चमकदार व्यक्तित्व से की जाती रही है। लेकिन इस स्थापित धारणा को अगर किसी ने सबसे ज्यादा चुनौती दी है, तो वह हैं ममता बनर्जी।
सफेद सूती साड़ी और हवाई चप्पल में नजर आने वाली यह नेता आखिर इतनी “घातक” कैसे बन गई—यह सवाल आज की राजनीति को समझने के लिए बेहद अहम है।

दरअसल, ममता बनर्जी की सादगी केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि एक सशक्त राजनीतिक रणनीति है। यह सादगी उन्हें सीधे आम जनता से जोड़ती है। जहां बाकी नेता सत्ता के प्रतीक बनते हैं, वहीं ममता खुद को संघर्ष और जमीन से जुड़े नेतृत्व का प्रतीक बनाती हैं। यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है।

उनका राजनीतिक सफर किसी विरासत का परिणाम नहीं, बल्कि संघर्ष की उपज है। सिंगूर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों ने उन्हें सड़कों से उठाकर सत्ता के केंद्र तक पहुंचाया। इस सफर ने उनके व्यक्तित्व में एक ऐसी आक्रामकता और दृढ़ता भर दी, जो उन्हें अन्य नेताओं से अलग करती है। वह टकराव से पीछे हटने वाली नेता नहीं, बल्कि उसे अपनी राजनीतिक शैली का हिस्सा मानने वाली नेता हैं।

ममता बनर्जी की भाषा और अंदाज भी उतने ही सीधे हैं जितनी उनकी छवि सादी है। वे बिना लाग-लपेट के अपनी बात रखती हैं और विरोधियों पर खुलकर हमला करती हैं। यही कारण है कि उनके समर्थक उन्हें “जनता की सच्ची आवाज” मानते हैं, जबकि विरोधी उन्हें “टकराव की राजनीति” का चेहरा बताते हैं।

यहां “घातक” शब्द का अर्थ समझना जरूरी है। यह किसी हिंसक प्रवृत्ति का संकेत नहीं, बल्कि उस राजनीतिक क्षमता का प्रतीक है, जिसमें एक नेता अपने विरोधियों के लिए कठिन चुनौती बन जाता है। ममता बनर्जी की सादगी, संघर्ष और आक्रामकता का मिश्रण उन्हें चुनावी राजनीति में बेहद प्रभावी बनाता है। वह केवल चुनाव नहीं लड़तीं, बल्कि मुद्दों और नैरेटिव को अपने पक्ष में मोड़ने की क्षमता रखती हैं।

हालांकि, उनकी राजनीति आलोचनाओं से अछूती नहीं है। उन पर कई बार यह आरोप लगता रहा है कि उनकी कार्यशैली अत्यधिक केंद्रीकृत और टकरावपूर्ण है। विपक्ष का मानना है कि उनके शासन में असहमति के लिए पर्याप्त स्थान नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यही कठोरता उनके समर्थकों के लिए मजबूत नेतृत्व का प्रतीक बन जाती है।

ममता बनर्जी का व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में ताकत केवल संसाधनों या बाहरी दिखावे से नहीं आती। असली ताकत उस भरोसे में होती है, जो जनता अपने नेता पर करती है।
उनकी सफेद साड़ी और हवाई चप्पल एक प्रतीक हैं—सादगी का, संघर्ष का और उस राजनीतिक शक्ति का, जो बिना शोर किए भी सबसे ज्यादा असर डालती है।

आज जब राजनीति में छवि और ब्रांडिंग का महत्व बढ़ता जा रहा है, ममता बनर्जी यह साबित करती हैं कि सादगी भी एक मजबूत ब्रांड हो सकती है—और कभी-कभी यही सादगी सबसे ‘घातक’ साबित होती है।




मंत्री के आदेश की अनदेखी? केसला जनपद में ‘चार्ज’ पर सियासी-प्रशासनिक टकराव, आठ महीने से भटक रहा लेखाधिकारी

नर्मदापुरम। शासन के स्पष्ट निर्देश, मंत्री का लिखित आदेश और स्थानांतरण के आठ महीने बाद भी एक अधिकारी को उसका वैधानिक प्रभार (चार्ज) न मिलना—यह कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला मामला बन चुका है। केसला जनपद पंचायत में सहायक लेखाधिकारी के प्रभार को लेकर खड़ा हुआ विवाद अब खुलकर शासन बनाम प्रशासन की टकराहट का रूप लेता दिख रहा है।

मामले के केंद्र में हैं सहायक लेखाधिकारी पद पर पदस्थ किए गए राकेश उपाध्याय, जिन्हें लगभग आठ महीने पहले केसला जनपद पंचायत में पदस्थ किया गया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज तक उन्हें उनके पद का प्रभार नहीं दिया गया। उल्टा, भृत्य से पदोन्नत होकर सहायक ग्रेड-3 बने दिलीप डांग को इस महत्वपूर्ण पद का प्रभार सौंप दिया गया। सवाल यह उठता है कि जब विधिवत पदस्थ अधिकारी मौजूद है, तो फिर प्रभार किसी अन्य को क्यों और किस आधार पर दिया गया?

मंत्री का पत्र भी बेअसर!

मामले ने उस वक्त और तूल पकड़ लिया जब प्रदेश के आर्थिक एवं सांख्यिकी मंत्री जगदीश देवड़ा ने 26 मार्च 2026 को जिला पंचायत सीईओ को पत्र लिखकर स्पष्ट निर्देश दिए कि राकेश उपाध्याय को सहायक लेखाधिकारी का प्रभार सौंपा जाए। यह कोई मौखिक निर्देश नहीं, बल्कि विधिवत लिखित आदेश था।

लेकिन सवाल यहीं से और गंभीर हो जाता है—क्या मंत्री का पत्र अब सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है? क्योंकि पत्र जारी हुए एक महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

सीईओ की सफाई या टालमटोल?

इस पूरे मामले पर जब जिला पंचायत सीईओ हिमांशु जैन से सवाल किया गया, तो उन्होंने जवाब दिया कि “कर्मचारी की सर्विस बुक मंगाई गई है और यह देखा जा रहा है कि उसकी पूर्व पदस्थापनाएं कहां-कहां रही हैं। उसी के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।”

यह तर्क कई मायनों में सवालों के घेरे में है। प्रशासनिक जानकारों का साफ कहना है कि किसी भी अधिकारी को प्रभार देने का संबंध उसकी सर्विस बुक से नहीं होता, बल्कि उसके वर्तमान पदस्थापन आदेश और योग्यता से होता है। ऐसे में ‘सर्विस बुक’ की आड़ में फैसले को टालना कहीं न कहीं संदेह को और गहरा करता है।

नियमों की अनदेखी या ‘सेटिंग’ का खेल?

सूत्रों की मानें तो यह पूरा मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि ‘सेटिंग’ और ‘प्रभाव’ का खेल भी हो सकता है। जिस पद पर वित्तीय अधिकार जुड़े होते हैं, वहां प्रभार देना या न देना सीधे तौर पर आर्थिक निर्णयों को प्रभावित करता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर किसके दबाव में एक विधिवत पदस्थ अधिकारी को दरकिनार किया जा रहा है?

क्या यह महज संयोग है कि एक भृत्य से पदोन्नत कर्मचारी को उस पद का प्रभार दे दिया गया, जहां पहले से एक नियमित अधिकारी मौजूद है? या फिर इसके पीछे कोई और कहानी छिपी है?

प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने जिला पंचायत स्तर की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यदि एक मंत्री के लिखित आदेश के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो आम कर्मचारी और नागरिकों के लिए यह संदेश क्या जाता है?

  • क्या प्रशासन अब जनप्रतिनिधियों के निर्देशों को नजरअंदाज करने लगा है?
  • क्या नियमों की व्याख्या मनमर्जी से की जा रही है?
  • क्या पदस्थापन आदेशों का कोई महत्व नहीं रह गया है?

ये सवाल सिर्फ केसला जनपद पंचायत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर डालते हैं।

राकेश उपाध्याय का मामला अब एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यशैली का प्रतीक बन गया है। एक अधिकारी, जिसे शासन ने विधिवत पदस्थ किया, वह आठ महीने से अपने ही अधिकार के लिए इंतजार कर रहा है। यह स्थिति न सिर्फ उसके पेशेवर सम्मान को ठेस पहुंचाती है, बल्कि शासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाती है।




फोटोकॉपी वाला कन्या विवाह: जब सिस्टम ने जिम्मेदारी Xerox कर दी

लोकतंत्र में आमंत्रण सिर्फ एक कार्ड नहीं होता, वह सम्मान का प्रतीक होता है। लेकिन जब आमंत्रण ही “फोटो कॉपी” बनकर रह जाए और उसमें न नाम हो, न गरिमा—तो समझ लीजिए कि आयोजन से पहले ही उसकी आत्मा का कन्यादान हो चुका है।

मामला है 19 अप्रैल को आयोजित होने वाले मुख्यमंत्री कन्या विवाह समारोह का, जो हर साल बड़े उत्साह और गरिमा के साथ होता आया है। लेकिन इस बार जो हुआ, वह प्रशासनिक लापरवाही का ऐसा उदाहरण बन गया है, जिसे देखकर खुद “व्यवस्था” भी शर्मा जाए।

इस बार आयोजन से ज्यादा चर्चा आमंत्रण कार्ड की हो रही है—और वह भी इसलिए कि वह “कार्ड” कम और “फोटो कॉपी प्रयोग” ज्यादा लग रहा है। न उसमें अतिथियों के नाम, न कोई औपचारिकता, बस एक फोटो कॉपी पकड़ाओ और कह दो—“आ जाइए, कार्यक्रम है।” जैसे कोई शादी नहीं, बल्कि मोहल्ले की क्रिकेट मैच की घोषणा हो रही हो।

जनपद सदस्य सरिता राजीव का दर्द भी कुछ ऐसा ही है। उनका कहना है कि यदि सामूहिक विवाह जैसा बड़ा आयोजन होना था, तो कम से कम एक बैठक तो बुलाई जा सकती थी। लेकिन यहां तो बैठक भी “कल्पना लोक” में ही आयोजित हो गई और निर्णय धरती पर लागू हो गया। लोकतंत्र में संवाद की जगह अब “डाउनलोड और फॉरवर्ड” ने ले ली है।

सबसे मजेदार स्थिति तब बनती है जब जिम्मेदार अधिकारी खुद ही कहते नजर आते हैं—“हमें तो कुछ पता ही नहीं।” पंचायत इंस्पेक्टर हरि प्रसाद बरेले को प्रभारी बना दिया गया, लेकिन उन्हें जानकारी ही नहीं। यानी कप्तान को पता ही नहीं कि मैच किस मैदान में है, और टीम पहले से खेल रही है।

जनपद पंचायत सीईओ रंजीत ताराम का बयान तो और भी दिलचस्प है। वे छुट्टी से लौटे और सीधे एक ऐसे आयोजन के प्रभारी बन गए, जिसके बारे में उन्हें उसी दिन पता चला। बैठक हुई या नहीं—इसकी जानकारी भी नहीं। यह स्थिति कुछ वैसी ही है जैसे कोई छात्र परीक्षा देने पहुंचे और उसे वहीं पता चले कि आज उसका पेपर है।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह “आनन-फानन संस्कृति” आई कहां से? क्या यह वही प्रशासन है जो हर छोटे से छोटे कार्यक्रम के लिए महीनों की तैयारी करता है? या फिर यह एक नया प्रयोग है—जहां पहले आयोजन करो, बाद में सोचो?

देखें तो यह पूरा मामला “फोटो कॉपी लोकतंत्र” का बेहतरीन उदाहरण बन चुका है। यहां निर्णय भी कॉपी-पेस्ट, संवाद भी कॉपी-पेस्ट और आमंत्रण भी कॉपी-पेस्ट। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां मूल प्रति किसी को नहीं मिलती।

कन्या विवाह जैसा आयोजन सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं होता, यह समाज की संवेदनाओं से जुड़ा होता है। इसमें शामिल हर परिवार अपने सपनों और सम्मान के साथ आता है। लेकिन जब आयोजन की तैयारी ही इस तरह की हो, तो सवाल उठना लाजमी है कि क्या हम सिर्फ औपचारिकता निभा रहे हैं?

यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं हम “कार्यक्रम करने” की होड़ में “कार्यक्रम की गरिमा” तो नहीं खो रहे? क्या अब प्रशासनिक दक्षता का मतलब सिर्फ यह रह गया है कि तारीख तय करो और किसी तरह कार्यक्रम निपटा दो?

अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में शायद निमंत्रण कार्ड की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। एक व्हाट्सएप मैसेज आएगा—“आज शादी है, समय मिले तो आ जाना।” और नीचे लिखा होगा—“Forwarded many times।”

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दुखद पहलू यह है कि जिन जनप्रतिनिधियों को सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया जाना चाहिए था, उन्हें मोबाइल संदेशों और फोटो कॉपी से बुलाया जा रहा है। यह न सिर्फ उनकी गरिमा का सवाल है, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर भी प्रश्नचिन्ह है।

अंत में, जनपद सीईओ की बात शायद सबसे सटीक लगती है—“ऐसे आयोजन आनन-फानन में नहीं होने चाहिए।” लेकिन सवाल यह है कि यह समझ पहले क्यों नहीं आई? क्या हर बार हमें एक “फोटो कॉपी विवाद” का इंतजार करना पड़ेगा, तब जाकर हम सीखेंगे?

फिलहाल, यह आयोजन होने जा रहा है। लोग आएंगे, शादियां होंगी, फोटो खिंचेंगे और सब कुछ सामान्य दिखेगा। लेकिन इस “फोटो कॉपी आमंत्रण” की कहानी प्रशासनिक इतिहास में एक हल्के-फुल्के व्यंग्य के रूप में जरूर दर्ज हो जाएगी—जहां आमंत्रण से ज्यादा उसकी अनुपस्थिति चर्चा में रही।

और शायद आने वाले समय में यह उदाहरण प्रशिक्षण सत्रों में पढ़ाया जाएगा—
“कैसे एक गंभीर आयोजन को मजाक में बदला जा सकता है, सिर्फ एक आमंत्रण कार्ड के जरिए।”




बंद नंबर, बंद जवाबदेही: सरकारी तंत्र की सुस्त रफ्तार

कहते हैं भारत डिजिटल हो रहा है। हर चीज़ ऑनलाइन, हर सुविधा एक क्लिक पर… लेकिन अगर आपने कभी किसी सरकारी विभाग के बोर्ड पर लिखे नंबर पर फोन मिलाया हो, तो आपको सच्चाई का “नेटवर्क एरर” तुरंत मिल जाएगा।

कई सरकारी दफ्तरों में आज भी बड़े गर्व से BSNL के लैंडलाइन नंबर चमकते हुए दिखाई देंगे—जैसे कोई विरासत हो, जिसे संभालकर रखा गया हो। फर्क बस इतना है कि ये विरासत अब “स्वर्गवासी” हो चुकी है। नंबर हैं, लेकिन सेवा नहीं। फोन है, लेकिन घंटी नहीं। और जवाबदेही… वो तो शायद किसी दूसरे विभाग में ट्रांसफर हो गई है।

आप फोन लगाइए—पहले तो लगेगा ही नहीं। अगर लग गया तो या तो “यह नंबर अस्तित्व में नहीं है” सुनने को मिलेगा, या फिर घंटी ऐसे बजेगी जैसे किसी पुराने खंडहर में गूंज रही हो… जहां कोई उठाने वाला नहीं।

मजेदार बात यह है कि इन नंबरों को बड़े ही आत्मविश्वास के साथ हर जगह छापा जाता है—दीवारों पर, वेबसाइट पर, पंपलेट पर… मानो सरकार कह रही हो, “लो, नंबर दे दिया… अब बात करना तुम्हारी जिम्मेदारी!”

अब सवाल यह नहीं है कि नंबर बंद क्यों हैं। असली सवाल यह है कि क्या इन नंबरों को अपडेट करने के लिए भी किसी “विशेष अभियान” की जरूरत है? क्या इसके लिए भी कोई योजना बनेगी—“मिशन नंबर अपडेट 2027”?

शायद अधिकारियों की सोच कुछ ऐसी हो—“जब तक बोर्ड टंगा है, नंबर लिखा है… काम पूरा है।” भले ही जनता कॉल करते-करते थक जाए, लेकिन बोर्ड की इज्जत बनी रहनी चाहिए!

डिजिटल इंडिया के इस दौर में सरकारी नंबरों की हालत देखकर ऐसा लगता है कि टेक्नोलॉजी आगे बढ़ गई है, लेकिन फाइलें अभी भी 90 के दशक में अटकी हुई हैं।

अगर नंबर चालू नहीं है, तो कम से कम उसके नीचे यह भी लिख दीजिए:
“यह नंबर केवल देखने के लिए है, काम के लिए नहीं।”

कम से कम जनता को उम्मीद तो नहीं बंधेगी!

क्योंकि जनाब, यहां फोन नहीं बजता… सिर्फ सिस्टम की खामोशी गूंजती है।




माखननगर का पुस्तक मेला बना मज़ाक! किताबें गायब, छूट नदारद, प्रशासन की ‘औपचारिकता’ उजागर

माखननगर। शासन के निर्देश पर विद्यार्थियों और अभिभावकों को राहत देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया पुस्तक मेला माखननगर में पूरी तरह से फेल साबित हुआ। कागजों में योजनाएं बड़ी-बड़ी और जमीनी हकीकत पूरी तरह खोखली—यही तस्वीर इस मेले में देखने को मिली। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह आयोजन सिर्फ औपचारिकता निभाने और आंकड़ों में सफलता दिखाने के लिए किया गया, जबकि असल में पालकों को राहत देने का उद्देश्य कहीं नजर नहीं आया।

जिला पंचायत सीईओ हिमांशु जैन द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि कलेक्टर के आदेशानुसार सभी विकासखंडों में पुस्तक मेले लगाए जाएं, ताकि नवीन शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए विद्यार्थियों को किताबें, स्टेशनरी, यूनिफॉर्म, जूते और बैग उचित दरों पर उपलब्ध कराए जा सकें। लेकिन माखननगर में इन निर्देशों की खुलेआम अनदेखी होती नजर आई।

सोमवार 6 अप्रैल को बीईओ सुषमा पीपरे की उपस्थिति में मेले का शुभारंभ तो किया गया, लेकिन आयोजन की पोल उसी समय खुल गई जब यहां महज पांच स्टेशनरी दुकानों ने ही हिस्सा लिया। हैरानी की बात यह रही कि इन दुकानों पर किताबों की भारी कमी थी, जबकि अन्य सामान जैसे कॉपी, पेन, बैग आदि उपलब्ध थे। सबसे गंभीर बात यह रही कि जिन किताबों के लिए यह मेला लगाया गया था, उन्हीं पर कोई छूट नहीं दी जा रही थी।

दुकानदारों ने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें पुस्तक डीलरों से ही किसी प्रकार की छूट नहीं मिलती, तो वे ग्राहकों को कैसे डिस्काउंट दें। इसका मतलब साफ है कि प्रशासन ने बिना किसी समन्वय और तैयारी के मेले का आयोजन कर दिया, जिससे पूरी योजना का मकसद ही खत्म हो गया।

स्थिति और भी शर्मनाक तब हो गई जब यह सामने आया कि मेले में स्कूल यूनिफॉर्म और जूतों की एक भी दुकान नहीं लगी। जबकि शासन के निर्देशों में इन सभी वस्तुओं को शामिल करने की बात कही गई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि जब जरूरी सामग्री ही उपलब्ध नहीं कराई जा सकी, तो फिर इस मेले का आयोजन किस उद्देश्य से किया गया?

प्रशासन की लापरवाही यहीं खत्म नहीं होती। मेले का कोई व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं किया गया, जिससे अधिकांश अभिभावकों को इसकी जानकारी ही नहीं मिल सकी। नतीजा यह रहा कि मेले में गिने-चुने पालक ही पहुंचे। जो पहुंचे, उन्हें भी निराशा ही हाथ लगी।

इतना ही नहीं, मेले के समय को लेकर भी भारी लापरवाही देखने को मिली। जहां मेला सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक चलना था, वहीं दुकानदारों ने शाम 4 बजे ही दुकानें समेट लीं। इससे साफ जाहिर होता है कि न तो प्रशासन ने कोई निगरानी रखी और न ही दुकानदारों पर कोई जवाबदेही तय की गई।

अभिभावक सुमित डेरिया ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए बताया कि उन्होंने नर्मदापुरम से अपने बच्चे की किताबें खरीदीं, जहां एनसीईआरटी की किताबों पर 5 प्रतिशत और प्राइवेट प्रकाशनों की किताबों पर 10 प्रतिशत तक छूट मिली। माखननगर में भी वे इसी उम्मीद से आए थे, लेकिन यहां न तो किताबें सही तरीके से उपलब्ध थीं और न ही कोई छूट दी जा रही थी। ऊपर से जब वे पहुंचे तो दुकानें पहले ही बंद हो चुकी थीं।

इस पूरे मामले में जब जिम्मेदार अधिकारियों से बात की गई तो उन्होंने भी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया। बीईओ सुषमा पीपरे ने इसे “पहली बार का प्रयास” बताते हुए कहा कि ऊपर से निर्देश थे और कॉपियों पर कुछ डिस्काउंट मिल रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ “पहली बार” का बहाना बनाकर इतनी बड़ी लापरवाही को नजरअंदाज किया जा सकता है?

वहीं डीईओ एल.एन. प्रजापति ने तो सीधा पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यदि किताबें नहीं हैं या डिस्काउंट नहीं मिल रहा है, तो एसडीएम से संपर्क करें। यह बयान प्रशासन की जिम्मेदारी से भागने की मानसिकता को उजागर करता है।

एसडीएम जय सोलंकी ने जरूर यह कहा कि यदि मेले में छूट नहीं मिल रही है तो वे इसकी जांच करवाएंगे और पालकों को राहत दिलाने का प्रयास करेंगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब मेला मात्र दो दिन का और एक दिन लगभग खत्म हो चुका है, तब इस तरह की कार्रवाई का क्या औचित्य रह जाता है?

यह पूरा घटनाक्रम प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या सिर्फ ऊपर से आए आदेशों को पूरा करने के लिए ऐसे आयोजन किए जा रहे हैं? क्या जमीनी स्तर पर उनकी गुणवत्ता और उद्देश्य की कोई समीक्षा नहीं होती?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन अभिभावकों को आर्थिक राहत देने के लिए यह मेला आयोजित किया गया था, क्या उन्हें वास्तव में कोई फायदा मिला? जवाब साफ है—नहीं। उल्टा उन्हें समय और उम्मीद दोनों का नुकसान हुआ।

माखननगर का यह पुस्तक मेला इस बात का उदाहरण बन गया है कि कैसे सरकारी योजनाएं कागजों में तो प्रभावी दिखती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर पूरी तरह फेल हो जाती हैं। यदि प्रशासन वास्तव में छात्रों और पालकों के हित में काम करना चाहता है, तो उसे ऐसे आयोजनों की सिर्फ औपचारिकता निभाने के बजाय उनकी गुणवत्ता और प्रभावशीलता पर ध्यान देना होगा।

अब देखना यह है कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। फिलहाल तो माखननगर के पालकों के मन में यही सवाल गूंज रहा है—क्या यह मेला उनके लिए था या सिर्फ प्रशासन की फाइलों के लिए?




कलम का क्रांतिकारी और आज की राजनीति पर सवाल: माखनलाल चतुर्वेदी जयंती पर विशेष

भारत की स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि वह एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करने का सपना भी था, जहां ईमानदारी, नैतिकता और जनसेवा सर्वोपरि हों। इस स्वप्न को शब्दों में ढालने वाले महान साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी थे—माखनलाल चतुर्वेदी। उनकी जयंती आज केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीति और समाज का आईना देखने का भी दिन है।

स्वतंत्रता संग्राम: आदर्शों की राजनीति

माखनलाल चतुर्वेदी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जिस राजनीति को देखा और जिया, वह त्याग, बलिदान और सिद्धांतों पर आधारित थी। उस समय राजनीति सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का संकल्प थी।

नेताओं के लिए पद नहीं, बल्कि उद्देश्य महत्वपूर्ण था। जेल जाना, संघर्ष करना और व्यक्तिगत सुखों का त्याग करना—यही उस दौर की राजनीति की पहचान थी।

सेवा या सत्ता का खेल?

आज का राजनीतिक परिदृश्य कई सवाल खड़े करता है।
राजनीति अब आदर्शों से अधिक प्रबंधन और समीकरणों का खेल बनती जा रही है।

  • दल बदलना अब सामान्य हो चुका है
  • विचारधारा की जगह अवसरवाद ने ले ली है
  • चुनावी वादे अक्सर सत्ता मिलने के बाद भूल जाते हैं
  • जनहित के मुद्दे कई बार राजनीतिक स्वार्थों के नीचे दब जाते हैं

भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग और प्रशासनिक दबाव—ये समस्याएं अब अपवाद नहीं, बल्कि कई जगहों पर व्यवस्था का हिस्सा बनती जा रही हैं।

यदि माखनलाल चतुर्वेदी आज होते, तो वे निश्चित ही अपनी लेखनी से इस स्थिति पर तीखा प्रहार करते। वे सवाल करते कि जिस स्वतंत्रता के लिए इतनी कुर्बानियां दी गईं, क्या वह केवल सत्ता के खेल के लिए थी?

पत्रकारिता और राजनीति का बदलता रिश्ता

चतुर्वेदी जी ने पत्रकारिता को सत्ता के खिलाफ एक मजबूत आवाज बनाया था।
आज, कई बार मीडिया और राजनीति के रिश्तों पर भी सवाल उठते हैं।

जहां पत्रकारिता का एक हिस्सा सत्ता के करीब दिखाई देता है, वहीं सच्चाई बोलने वाले पत्रकारों को दबाव और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

यह स्थिति उस आदर्श के विपरीत है, जिसे माखनलाल चतुर्वेदी ने स्थापित किया था—जहां कलम केवल सच के लिए चलती थी, किसी दबाव या स्वार्थ के लिए नहीं।

‘पुष्प की अभिलाषा’ बनाम आज का स्वार्थ

माखनलाल चतुर्वेदी की अमर रचना ‘पुष्प की अभिलाषा’ त्याग और समर्पण की चरम अभिव्यक्ति है।

“मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक…”

यह पंक्ति आज की राजनीति से सवाल करती है—
क्या आज का नेतृत्व भी उसी त्याग और समर्पण की भावना से काम कर रहा है?
या फिर व्यक्तिगत लाभ और सत्ता की लालसा ने उस भावना को पीछे छोड़ दिया है?

आज की राजनीति को बदलने की सबसे बड़ी ताकत युवाओं के पास है।
यदि युवा जागरूक होंगे, सवाल पूछेंगे और सही नेतृत्व का चयन करेंगे, तो राजनीति भी दिशा बदलेगी।

माखनलाल चतुर्वेदी का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा है—कि बदलाव केवल आलोचना से नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदारी से आता है।

माखनलाल चतुर्वेदी की लेखनी आज भी जैसे हमें चेतावनी देती है—
“यदि राजनीति से नैतिकता खत्म हो जाएगी, तो लोकतंत्र केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा।”

माखनलाल चतुर्वेदी की जयंती केवल माल्यार्पण और भाषण तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

यह दिन हमें खुद से यह पूछने का अवसर देता है—

  • क्या हम ईमानदार राजनीति का समर्थन कर रहे हैं?
  • क्या हम भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं?
  • क्या हम अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का सही उपयोग कर रहे हैं?

आज जरूरत है कि हम राजनीति को फिर से सेवा, त्याग और नैतिकता की दिशा में ले जाएं—यही माखनलाल चतुर्वेदी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।