निजी स्कूलों की हड़ताल जायज!

नर्मदापुरम:  मध्यप्रदेश सरकार में स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप की चेतावनी के बाद भी नर्मदापुरम के निजी स्कूल संचालक सोमवार से हड़ताल पर चले गए हैं। जिले के 430 में से अधिकांश स्कूल बंद रहे। स्कूल को बंद रखने की जानकारी स्कूल मैनेजमेंट की ओर से पालको को वॉट्सएप के माध्यम से रविवार को दे दी गई थी। स्कूल कब तक बंद रहेंगे यह नही बताया।यह तब है जब इसकी जानकारी मिलने पर शिक्षा मंत्री ने सख्त लहजे में कहा था कि ‘आप नौनिहाल के भविष्य को गढ़ने वाले व्यक्ति हैं अगर नौनिहालों के भविष्य से खिड़वाड़ करेगें ‘ तो इसका परिणाम ठीक नही होगा। इसके बाद भी निजी स्कूलों का इस तरह से हड़ताल पर चले जाने को क्या जायज ठहराया जा सकता हैं? सरकार द्वारा निजी स्कूलों के लिए आरटीई एक्ट लाया गया है जिसमें समस्त निजी स्कूल आते है। फिर क्या यह स्कूल कानून से ऊपर हो गए? अविभावकों ने सालों से निजी स्कूलों का दंश झेला है। सरकार ने थोड़ी सी सख्ती क्या कि निजी स्कूल संचालक सड़क पर आकर आंदोलन करने लगे।

नॉन प्राफिट आर्गनाईजेशन फिर प्राफिट के लिए हल्ला क्यो?

जबकि अधिकतर निजी स्कूल जिस सोसायटी के अंर्तगत रजिस्टर होकर संचालित हो र​हे है। वह सब नॉन प्राफिट आर्गेनाईजेशन हैं।जब नॉन प्राफिट आर्गेनाईजेशन में जमकर पैसा कमाया जा रहा है। उसी पर प्रशासन ने जब आपत्ति उठाई तो फिर हड़ताल की क्या आवश्यकता थी। निजी स्कूल तो नॉन प्राफिट आर्गेनाईजेशन हैं। कही ऐसा तो नही कि निजी स्कूलों ने गलत रजिस्ट्रेशन कराकर टेक्स लायबिलिटी के नाम पर सरकार से टेक्स में छूट से ले रहे है और मुनाफा जमकर कमा रहे हो। कही न कही निजी स्कूलों को इसबात की चिंता सता रही है कि सरकार उनके मुनाफे को कम कर रही हैं। जबकि सरकार व प्रशासन की मंशा इसे नियंत्रित करने की हैं। न की इन स्कूलों को अब खुली छूट दी जाए।

विरोध किस बात का कर रहे
निजी स्कूल संचालक विरोध किस बात का कर रहे हैं। यह बात भी समझ से परे नजर आ रही हैं। जब एक्ट हैं तो कानून का पालन सबको करना हैं। फिर कानून के पालन करने में आ​पत्ति क्यो? अगर किसी स्कूला को गलती से कोई नोटिस जारी भी हो गया हैं। तो उसे अपील का अधिकार है वह अपील कर सकता है। यदि नोटिस सही है तो कानून सबके लिए बराबर है और यदि आपने कानून तोड़ा हैं तो इसका डंड भोगना पड़ेगा। फिर आपको किसा रिकवरी से आपत्ति हैं।

छोटे स्कूलों को उठाना होगा नुकसान
जिले के सभी छोटे बड़े निजी स्कूल हड़ताल पर तो चले गए। लेकिन इसका खामयाजा छोटे स्कूलों ज्यादा उठाना पड़ेगा। शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह की सख्ती के साथ मना करने के बाद भी निजी स्कूल संचालक हड़ताल पर चले गए। क्योकि बड़े स्कूल आर्थिक रूप से सक्षम है किसी भी घाटा को उठाने एवं किसी भी समस्या को मैनेज करने में लेकिन ऐसा नही लगता की छोटे निजी स्कूल शासन या प्रसाशन की किसी भी सख्ती निपट सके। आने वाले समय में छोटे स्कूलों को ही इस हड़ताल का सबसे ज्यादा खामयाजा उठाना पड़ सकता हैं।




Denvapost Exclusive:जिओं (Jio)का मोहपाश में बंधे हम

देश में इंटरनेट क्रांति के लिए जो अपनी पीठ थपथपा रहा है , इन्हीं के पापा कहा करते थे कर लो दुनिया मुठ्ठी में धीरूभाई अंबानी जब टेलीकॉम सेक्टर के लिए जोड़ी फोन ऑफर लेकर आए थे। लेकिन पिताजी के संदेश को बेटे ने अपने हाथ में ले लिया है और वह सही मायने में दुनिया को मुट्ठी में करने निकल चुके शुरुआत उसकी भारत के 140 करोड लोगों से हुई है। मैं यह क्यों कह रहा हूं क्योंकि हाल ही में जियो ने जिस तरह से प्रेडेटरी प्राइसिंग करके सबसे पहले लोगों तक रीच पहुंचाई लोगों तक सस्ते दामों में अपनी आदत लगाई और अब धीरे-धीरे उन लोगों को अपने तरीके से जैसे मदारी डमरू पर नचा रहा हो कुछ उसे तरीके से अपनी प्राइसिंग से लोगों को नचा रहा है । Jio के द्वारा हाल ही में टैरिफ हाई करके 12.50 परसेंट से 25% तक इजाफा किया गया है और इस इजाफा से जिओ को और टेलीकॉम सेक्टर को लगभग 50000 करोड रुपए एक ही बार में मुनाफे के रूप में प्राप्त हो जाएंगे।  साथियों की बहुत महत्वपूर्ण बात है कि अर्थशास्त्र में इस बात को मोनोपोलिस्टिक अप्रोच कहा जाता है। एकाधिकार प्रकार का व्यवहार कहा जाता है जिसमें कोई भी कंपनी पहले लोगों की आवश्यकता बनती है और फिर अपने कंपटीशन को खत्म करती है। कंपटीशन को खत्म करके अपने हिसाब से मार्केट को बनाती है उसका जीवंत उदाहरण आप में से अधिकांश  ने जिओ का उदय होते हुए देखा है।

ट्रैप में फंसते चले गए

जब शुरुआत में जियो आया तब क्या कह कर आया आज जियो (Jio)क्या कर रहा है और उससे आगे हमारी पूरी जिंदगी को हाथ में रखने के लिए उसने क्या तरीके अपनाए हैं। आज विस्तार से जानते हैं  क्योंकि हमारी याददाश्त थोड़ी कमजोर है हम जल्दी भूल जाते हैं कि कहां से क्या चीज शुरू हुई थी कहां तक पहुंच गई थी । इसलिए इसे शुरू से बताते है ताकि आपको यह याद दिलाया जा सके कि आप एक ट्रैप में कैसे फंसते चले गए हैं। कैसे जियो ने सारे कंपीटीटर्स (competitors) को पहले नुकसान पहुंचाया सरकारी बीएसएनल को बर्बाद ही कर दिया। उसके बाद में जब लोगों के पास विकल्प के रूप में कुछ नहीं बचा तो jio ने अपनी तरफ से लोगों को टैरिफ हाई करके उन्हें बर्बादी की तरफ ले जाने का रास्ता तय कर दिया है। इसमें कही न कही हमारी ही गलती है हमे फ्री की आदत जो है। अभी भी हम समझ रहे हैं पैसे का लाभ ही तो है सारी बातें समझिए और कल कोई आपके साथ क्या-क्या कर सकते हैं। यानी कि उनके पिताजी ने जो दुनिया के लिए संदेश दिया था कि कर लो दुनिया मुठ्ठी में उनके बेटे ने खुद ने अपने हाथ में करने का तरीका अपनाया। 140 करोड़ आबादी को सर्विस देने के नाम पर देश में केवल चार कंपनियां मौजूद है और उनमें से भी लगभग 45 करोड़ यूजर बेस लेकर के केवल एक कंपनी जिओ बैठी हुई है अपने आप में सोचने का विषय है कि देश में किस तरह से हमारे देश में मोनोपोलिस्टिक(monopolistic) तरीके से हम पर कंट्रोल किया जा रहा है आज jio आपको न केवल इंटरनेट दे रहा है फाइनेंशियल सर्विसेज दे रहा है बाजार की सुविधा दे रहा है आपकी हर एक जरूरत की पूर्ति करने के लिए सामने आ गया है इस बात को बहुत गंभीरता से समझने की आवश्यकता है आपको समझने की आवश्यकता है कि पहले आपको आदत डाली गई और आदत डालकर अब आप पर कब्जा करने की तैयारी चल रही है। बड़ी कंपनियां किस तरह से हमें कंट्रोल करती है इसका जीता जागता उदाहरण यह jio का बनाया हुआ जाल है। जिसे आप देख सकते हैं इस jio के जाल में  टीवी चैनल, जिओ सिनेमा, म्यूजिक, न्यूज़जिओ के नाम पर आप विचार करिए। इंटरनेट से होने वाली सर्विसेज को आप दिमाग में लेकर आइए और आपके दिमाग में जिओ की इमेज आ जाएगी। जिओ ने हाल ही में अपनी फाइनेंशियल सर्विस शुरूआत की है जिओ मार्ट शुरू किया है तो आज आपको यह पता चलेगा कि कैसे इंटरनेट को उपलब्ध कराकर दादागिरी करने वाले मुकेश अंबानी दादागिरी पर उतर आए हैं ।

Jio का उदय

मुकेश अंबानी की दादागिरी के उतरने की शुरुआत कितने भोलेपन से हुई थी कि देश के अंदर आज यह कंपनी 21.6 ट्रिलियन रू की बन चुकी है। Jio का उदय कैसे शुरू हुआ था। एक व्यापारी हुए नाम था धीरूभाई अंबानी धीरूभाई अंबानी के बारे में कहा जाता है कि वह गल्फ कंट्रीज में पेट्रोल वेंडर का कार्य किया करते थे। देश में आए कपड़े का व्यापार किया दो संताने हुई मुकेश और अनिल। धीरूभाई अंबानी ने अपनी पत्नि कोकिलाबेन के साथ मिलकर देश में बहुत सारे उद्योग धंधों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। धीरूभाई अंबानी वर्ष 2002 में जब नहीं रहे और 70 साल की उम्र में जब उनका निधन हो गया तो यह कारोबार जगत के लिए यह एक बड़ा झटका था। धीरूभाई अंबानी के जाने के बाद मुकेश अंबानी ने पेट्रोकेमिकल और रिफाइनरी का काम संभाला और अनिल को टेलीकॉम फाइनेंस और एनर्जी यूनिट में मिल गए कहा जाता है कि अनिल थोड़े व्यवहार में जिद्दी थे और उन्हें बिजनेस की समझ नहीं थी। उन्होंने उन धंधे में हाथ डाला जो की कॉम्पिटेटिव नहीं थे और इस प्रकार से वह लगातार नुकसान झेलते चले गए। सूत्रों की माने तो जिस रिलायंस को धीरूभाई अंबानी ने शुरू किया था। “कर लो दुनिया मुठ्ठी में ” वह असल में मुकेश अंबानी का आईडिया बताया जाता था और कहा जाता है कि मुकेश अंबानी जब इस प्रकार से अनिल अंबानी को रिलायंस दिया गया था। उससे काफी परेशान थे लेकिन दोनों भाइयों ने एक एग्रीमेंट किया था कि हम 10 साल तक दोनों एक दूसरे के फील्ड में कदम नहीं रखेंगे। एक बार अनिल अंबानी को आगे निकलने दो फिर मैं अपना दोबारा से एंट्री करुंगा।

2010 में मुकेश ने अपना दिमाग लगाना शुरू किया क्योंकि 2012 में इनका समय पूरा हो रहा था कि मुझे टेलीकॉम में उतरना है और इन्होंने धीरे-धीरे जिओ की बुनियाद बुनियाद 2010 के आसपास शुरू कर दी थी। कहा जाता हैं कि 2010 में रिलायंस इंडस्ट्रीज में 48 सौ करोड़ में इन्फोटेक ब्रॉडबैंड सर्विस लिमिटेड कंपनी की 95% हिस्सेदारी खरीदी। ब्रॉडबैंड सर्विस लिमिटेड यही देश की वह कंपनी थी जिसके पास उस समय 4G नेटवर्क का स्पेक्ट्रम था। इस नेटवर्क स्पेक्ट्रम को लेने वाली एक कंपनी अकॉर्डिंग टू एग्रीमेंट बिटवीन टू ब्रदर्स (According to agreement between two brothers)होने को तो फ्रंट फेस में जियो नहीं हो सकती थी। इसलिए किसी दूसरी कंपनी ने 4G स्पेक्ट्रम खरीदा था। लेकिन रिलायंस जिओ ने बाद में इसी का नाम बदलकर रिलायंस जिओ कर दिया। दिसंबर 2013 में 4G के लिए भारतीय एयरटेल से समझौता किया गया और कहा गया कि जो समुद्र से आने वाली इंटरनेट केबल है वह जियो रिलायंस एयरटेल का इस्तेमाल करेगा और साथ में वॉयरलैस पावर और इंटरनेट ब्रॉडबैंड सर्विस भी वह एयरटेल का इस्तेमाल करेगा। धीरे धीरे अनिल अंबानी की रिलायंस कम्युनिकेशन पिछड़ती चली गई और रिलायंस कम्युनिकेशंस के साथ भी एक समझौता कर लिया गया की 4G स्पेक्ट्रम फैलाने हैं वह भी मदद करें इस प्रकार से रिलायंस जिओ ने अपनी 4G सर्विसेज के लिए एंट्री करना शुरू कर दिया। 27 दिसंबर 2015 को सबसे पहले रिलायंस ने अपने कर्मचारियों को जिओ की सर्विसेज उपलब्ध कराई 4g सर्विस अपने कर्मचारियों को 2015 में उपलब्ध कराई दिसंबर के अंदर और कहां की एक बार आप उसे करके देखिए। मुकेश अंबानी ने डिजिटल रिवोल्यूशन लाने के लिए वर्ष 2016 में भाषण दिया और कहां की हम दुनिया में वह सर्विस बनने जा रहे हैं जो डाटा का और कॉल का पैसा नहीं लेगी। यह बात सही है कि जिस समय पर रिलायंस ने यह काम किया उसे समय भारत के अंदर डाटा के चार्ज अलग होते थे कॉल के चार्ज अलग देने पड़ते थे। कॉल और डाटा अलग-अलग डाटा हुआ करता था लेकिन आज जो हम वास्तविकता में चर्चा कर रहे हैं कि ₹200 प्रति जीबी हुआ करता था। आप वह मिटाने के लिए आए थे कहीं ऐसा तो नहीं जिस तरह से आप प्राइस बढ़ते जा रहे हैं। आपकी भी असली मंशा वही हो कि मुझे इस समय तक इन्हें वापस लेकर जाना है। क्योंकि जिस तरह से अपने शुरुआत की थी तब यह कहा था कि वॉइस कॉल फ्री रहेगा डाटा के लिए पे करना होगा और वह भी बहुत नॉमिनल पे करना होगा।

डेटागिरी की शुरूआत
इसे गांधीजी के अंदर अगर गांधीगिरी कहा जाता था तो हम इस डाटागिरी कहेंगें इस तरह से आपने अपना प्रचार किया तो इस प्रकार से प्रॉपर तरीके से इन्होंने दुनिया के सामने एक तहलका सा मचा दिया कि इंडिया में एक ऐसा सर्विस प्रोवाइडर आ गया है। जिसमें तीन-चार महीने के लिए तो अनलिमिटेड इंटरनेट ही फ्री कर दिया है और प्रतिदिन के हिसाब से आप 4GB डाटा यूज करिए 3 महीने तक लोगों को पहले कंजप्शन हैबिट डलवाई गई। यानी कि एक ऐसा नशा जिसकी लोगों को आदत नहीं थी। जब ₹200 का 1GB डाटा मिल रहा था और लोग पूरे महीने चला लेते थे। आपने 4 जीबी प्रतिदिन देकर के 3 महीने तक फ्री देने की आदत डालवाई फ्री अनलिमिटेड कॉलिंग कार्रवाई 100 मैसेज के अंदर रोजाना देने की सुविधा दी । लोगों को लगा कि भाई साहब यह तो दुनिया में एकदम तहलका है अब बड़ी इंटरेस्टिंग बात यह था कि अगर 4 जीबी डाटा आप किसी को देने लगोगे तो वह प्रतिदिन उसे डाटा का क्या करेगा इस डाटा के लिए इन्होंने 6000 से ज्यादा मूवी फ्री में उपलब्ध कराई एक करोड़ से ज्यादा गाने उपलब्ध कराए। की अगर आपको डाटा मिल गया तो कंज्यूम कहां करोगे डाटा मिल गया। लेकिन 2016 में वास्तविकता में सस्ते इंटरनेट के कारण इंटरनेट क्रांति ने जन्म लिया आज जो इंटरनेट बेस में सर्विसेज है। फिर चाहे वह उबर और जोमैटो हो फिर चाहे यूट्यूब पर चलने वाला कंटेंट के बहुत आसानी से उपलब्ध होने से बहुत तेजी से फैलना शुरू हुआ।

कांपिटिव मार्केट खड़ा किया
इन्होंने बहुत ही सुगम तरीके से लोगों को अपने साथ एंट्री करने का तरीका बनाया अनलिमिटेड फ्री कॉल अनलिमिटेड एचडी वीडियो ना जाने क्या-क्या सुविधा देकर अपने साथ में दे दिया शुरुआती तौर पर इन्होंने इंटरनेट का सदुपयोग करने के लिए इतने सारे एप्लीकेशन अपने लेवल पर भी उपलब्ध करवाई इसमें म्यूजिक था जिसमें गाने थे जिसमें चैटिंग थी जिसमें मूवीज ,सिनेमा,, जिओ टीवी, जियोसावन, जिओ न्यूज़, जिओ सिक्योरिटी जो आप इंटरनेट की चीज याद कर सकते हैं वह लगभग इनके पास फिलहाल उपलब्ध है जिस समय यह आए थे जब इंटरनेट इतना महंगा था इन्होंने इंटरनेट के दामों को एकदम धड़ाम से नीचे गिरा दिया इंटरनेट के दाम को नीचे गिरने से मार्केट में यानी इंटरनेट प्रोवाइडर जो कंपनियां थी एयरटेल, वोडाफोन जैसी जो कंपनी थी उनको नुकसान हुआ। जिओ का शुरुआत जबरदस्त हुआ दिसंबर 2016 तक फ्री ऑफर दिया गया उसे फ्री ऑफर 2017 तक हैप्पी न्यू ईयर ऑफर करके दे दिया। जिसमें अनलिमिटेड डाटा डाल रहे थे फ्री की आदत डाल रहे थे धीरे-धीरे लोग इसे जुड़ते चले गए की दिसंबर तक ही उनके पास 52 मिलियन सब्सक्राइबर जिओ एप पर हो गए थे। यानी एक तरह से इन्होंने जिओ यूजर्स की संख्या में हैप्पी न्यू ईयर हंड्रेड मिलियन सब्सक्राइबर क्रॉस कर दिया। हालांकि इनकी शिकायत करने के लिए बड़ी सारी कंपनियां कंपटीशन ऑफ इंडिया भी गई लेकिन वहां पर कोई सुनवाई नहीं हो सकी और फाइनली ऑफर चलता रहा कंपनियों को भी इनके तरह नीचे उतरकर सस्ते ऑफर देने पड़े। फिर जब मार्च का ऑफर खत्म हुआ तो अगले 12 महीने के लिए अब प्राइम मेंबरशिप ले आए। प्राइम मेंबरशिप ज्वाइन करो ₹99 में सारी फैसेलिटीज मिलती रहेगी और अगर इंटरनेट यूज करना है तो उसके लिए फिर एक फीस तय कर दी गई।

इंटरनेट एडिक्ट बनाया

धीरे-धीरे इन्होंने लोगों को पहले सस्ते की आदत डाली आदत डाल करके इन्होंने प्रॉपर तरीके से इंटरनेट का यूज करते हुए। उसका कंजप्शन की हैबिट डेवलप करी कंजप्शन हैबिट के साथ में अब उनकी इसी आदत का जैसे एक ड्रग एडिक्ट को पहले ड्रग का हल्का सा डोज दिया जाता है फिर उसके बाद में उसकी उसकी आदत का ही दुरुपयोग करने के लिए कहा जाता है। कि अब तेरी आदत पड़ गई पहले फ्री में खिलाया अब खरीदने पर मजबूर किया। ऐसा इन्होंने इंटरनेट के साथ किया साल भर के लिए जो चीज मुफ्त में थी तब धीरे-धीरे इनके दाम वसूलने शुरू किया। जिओ प्राइम मेंबरशिप ₹99 के हिसाब से कर दी और अनलिमिटेड जो डाटा है वह 303 के हिसाब से कर दिया नए-नए इन्होंने ऑफर्स में कहा कि अगर आप जियो मनी उसे करते हैं। तो ₹50 तक का कैशबैक नहीं मिलेगा आपको जानकर आश्चर्य होगा जियो ने 2017 के अंदर 31 करोड रुपए का लॉस बुक किया जो कि लोगों को देखकर लगा कि यार यह तो बहुत जबरदस्त लॉस कर लिया है। लेकिन इन्होंने एक ही झटके में जिओ यूजर्स के द्वारा 99 रूपीस का जैसे ही सब्सक्रिप्शन लिया 247 करोड रुपए रेज कर लिया। कि एक बार लोगों को सब्सक्राइबर बना दो ₹99 का भेजो मार्केट की प्रेडेटरी प्राइसिंग कहते हैं दूसरों को खा जाने वाली प्राइसिंग कहते हैं। इन्होंने इतना सस्ता कर दिया था कि दूसरी कंपनी ऑलमोस्ट बर्बादी के कगार पर पहुंच गई। जो लोग फोन खरदने के इच्छुक नही थे उसे ₹1500 का फोन दिया और कहा कि 3 साल तक उसे इस्तमाल करो फिर जाकर वापस पैसे ले जाना फ्री इंटरनेट मिलता रहेगा। ऐसा करके उन्होंने 5 करोड़ फोन बेच डालें 1500 करोड़ में और फोन 2 ₹3000 में उतारा और 5 करोड़ से ज्यादा फोन इन्होंने मात्र 2 साल के अंदर अंदर बेंच दिए।

हम जब आए तो हमने देखा ₹200 का डाटा ₹5 में उपलब्ध करा दिया। जिओं से पहले बीएसएनएल एयरसेल भारतीय एयरटेल और 5 अन्य कंपनियां डाटा प्रोवाइड हुआ करती थी लगभग 10 मोबाइल करियर थे 2016 में उन 10 मोबाइल करियर को इन्होंने पूरी तरह खत्म कर दिया। आज मार्केट के अंदर चार मोबाइल करियर बच्चे हैं। एक तो जबरदस्ती सरकार की बैसाखी के सहारे चल रहा है ले देकर के बाकी जो दो बचे हैं एयरटेल और वोडाफोन इसमें से एयरटेल ही है जो कि उनके साथ कंपटीशन में है और फिलहाल के लिए एयरटेल भी अब इनकी गतिविधियां सीख गया है। क्योंकि वह भी इनकी तरह पहले सस्ते प्राइस करता है और जब यह प्राइस बढ़ाते हैं तो वह भी बढ़ा देता है और इस तरह का मार्केट जिसको पहले तोड़ा गया प्रेडेटरी प्राइसिंग से सबको आदत डाली गई। अपने ऊपर निर्भर कर दिया गया यही प्रक्रिया मोनोपोलिस्टिक मार्केट कहलाती है। फिलहाल के लिए जियो मोनोपोली की तरफ बढ़ रहा है। यह जैसा कर रहा है बाकी कंंपनी वैसा ही कर रही है। चाहे फिर एयरटेल हो या वोडाफोन।

मुकेश अंबानी की नेटवर्क में इस इंटरनेट क्रांति के बाद जबरदस्त इजाफा हुआ लगातार इनका फाइनेंशियल ईयर गो करता चला गया लगातार सब्सक्राइबर बढ़ते चले गए। कहा जाता है कि वर्तमान में जहां इंडिया में लगभग 82 करोड़ इंटरनेट यूजर है उनमें से 45 करोड़ अकेले जियो के पास है यानी 45.9846 करोड़ डाटा यूजर्स इस समय जिओ के पास है जिसकी वजह से इंडिया दुनिया में दूसरा सबसे ज्यादा इंटरनेट यूजर बन गया है। इनके द्वारा इंटरनेट सस्ते में उपलब्ध कराकर जो क्रांति लाई गई उसे क्रांति को फिर इन्होंने झंडे दिखाने शुरू किया। 2021 मे जब प्राइस बढ़ाए थे तब लोगों को बहुत जबरदस्त तरीके से रिएक्शन देने का मौका मिला था। 2021 के बाद आज अचानक इन्होने 25 फीसदी प्राइस बढ़ा दिया न केवल इन्होने बल्कि वोडाफोन औेर एयरटेल ने भी अपने टेरिफ प्लान में बदलाव किया है। हम तीनो कंपनियों के हाथ की कठपुतली बन गए हैं।

फिर तो बीएसएनल ही अच्छा

हो सकता है सरकार को संसाधनों के नाम पर प्राइवेट कंपनियों से पैसा लगवाना था ताकि देश में आसानी से संचार की क्रांति लाई जा सके लेकिन यही कारण है कि सरकारी इंटरफ्रेंस बहुत ज्यादा जरूरी होती है सरकार के द्वारा कंपनियों को बेचने का जो विचार होता है वह इसीलिए त्यागना चाहिए क्योंकि कंपनियां जब सरकार से निकल जाती है। इस तरह से दुनिया को अपने इशारे पर नचाती है सरकार जो बार-बार कंपनियों को बेचने के लिए डिसइनवेस्टमेंट कर दो। कंपनियों को बेच दो यह सोचने की आवश्यकता है कि सरकारी कंपनियां मार्केट में होना जरूरी है मानाकि सारी कंपनियां सरकार नहीं चला सकती लेकिन अपना एक रोल मॉडल सरकार वहां पर हमेशा खड़ा रखें कि बेटा तुम्हें कंपटीशन हमेशा इससे देना होगा आज कहां जा सकता है कि बीएसएनएल में जहां बीएसएनएल के कर्मचारियों के द्वारा कार्य करने में जो न इच्छा थी उसका नुकसान बीएसएनल को भुगतना पड़ा यह तो आधा सत्य है ही आधा सत्य यह भी कहा जा सकता है कि अगर सरकार अपनी तरफ से बीएसएनल को जिओ के बराबर टक्कर देने के लिए मार्केट में खड़ा रखती। तो आज मार्केट में एक ऐसा प्लेयर होता जो इस प्राइस हाई को रोकने के लिए पूरी तरह प्रयास करता यही कारण है कि लोग अब बीएसएनएल के पोस्टर लगा रहे हैं कि भाई फिर तो बीएसएनल ही अच्छा है। जो इतने रुपए में दे रहा है अब लेकिन लोगों को अच्छे की आदत पड़ गई है 4G नेट के नेटवर्क की आदत पड़ गई है। सरकारी बैसाखी के सहारे चल रहा है बीएसएनएल आज भी भाई साहब नहीं लगेगा की लड़ाई लड़ रहा है। विचार करने की आवश्यकता है कि दुनिया पर जिस प्रकार से इन प्राइवेट कंपनियों ने हमें लगता है कि सरकार एनडीए की है कि सरकार यूपीए की है कि सरकार इंडिया की सरकार असल मायने में इन कंपनियों की है। दुनिया भर में इस तरह की कंपनियों ने अपनी तरफ से बवाल मचा के रखा हुआ है।

परफेक्ट कंपटीशन इज द बेस्ट

मैं आपको बता दू कि मार्केट में परफेक्ट कंपटीशन इज द बेस्ट जब आप सब्जी मंडी के अंदर देख कर आते हैं कि साहब हम गए और बढ़िया से सस्ते दामों पर माल खरीद कर ले आए लेकिन मोनोपोलिस्टिक जो कंपटीशन है इसमें आपको जो हो सामने वाला बोलेगा वह देना पड़ेगा और हमारे देश में यह बहुत बड़ी बदकिस्मती है 140 करोड़ की आबादी वाले देश में देश के सभी संसाधनों पर कुछ ही बिजनेसमैन का कब्जा है जिनमें से अंबानी एक है और अंबानी के पास में इस तरह से जियो का जो कंट्रोल है वह न केवल और यह व्यवस्था होनी चाहिए कि जो एक सर्विस उपलब्ध करा रहा है वह दूसरी सर्विस में एंट्री ना करें क्योंकि इसके पास में एक बार जनता का डाटा आ गया इसके पास में इंटरनेट की हैबिट आ गई अब यह लोगों को अलग-अलग तरह की सुविधा देने की बात करें जिओ व्हाट्सएप से समझौता कर लिया है व्हाट्सएप के थ्रू अपने पास में पैसा लगा दिया है मार्क जुकरबर्ग से पैसा ले लिया है फिर यह आने वाले समयमें मिलकर के लोगों के घर पर सब्जी बेचने का काम शुरू करेगा यानी पूरे देश को क्या असल में जिओ ही चलाएगा क्या असल में पूरे देश को अंबानी ही चलाएगा यह असल महीने में एक मोनोपोलिस्टिक मार्केट का सबसे भीषण उदाहरण देश में बनने जा रहा है। आने वाले समय में यह चीज बहुत ज्यादा खतरनाक हो सकती है क्योंकि केवल इतना सब प्राइस बड़ा करके 47,500 करोड रुपए इन्होंने 1 मिनट में बाहर निकाल लिए यानी इंटरनेट के माध्यम से दम बड़ा करके यह सब कर लिया है तो क्या हो गया बिल्कुल सही कह रहे हैं अब आपकी आदतें क्योंकि आपने इंटरनेट पर जाकर मूवी देखी तो उसने मूवी को देने वाला जो था डिज्नी उसको खरीद लिया है। क्रिकेट देखते समय 5 करोड लोग लाइव क्रिकेट देख रहे थे सब हॉटस्टार पर आज उसको इसने परचेस कर लिया है यानि पहले इंटरनेट दिया इंटरनेट का उपयोग करने के लिए आपको फिल्में दिखाई फिल्मों के लिए आपको डिज्नी की आदत हॉटस्टार की आदत लगे वहीं पर अब आपके लिए इंटरनेट को उपलब्ध कराकर इसने उस कंपनी को परचेस कर लिया। अब इनका कब्जा होता चला जा रहा है टीवी पर लगभग हर सेक्टर में जहां पर आप लोग मूवी देखने के लिए अमेजॉन या फिर नेटफ्लिक्स यूज करते हैं। इसी तरह से इन्होंने न्यूज़ चैनल सीएनबीसी मनी कंट्रोल अपने न्यूज़ चैनल बना लिए जैसे आप लोग व्हाट्सएप वगैरा अपना खरीद लिया है। इसी प्रकार जिओ जीएसटी जिओ फाइबर जिओ क्लाउड यह सब करके इन्होंने पूरी तरह से एजुकेशन सेक्टर हेल्थ सेक्टर हो सब तरफ से इन्होंने अपना ही मार्केट बना दिया और आने वाले समय में तो यह जो बिग बॉस्केट अमेजॉन फ्लिपकार्ट को टक्कर देने जिओं मार्केट खड़ा कर लिया। इनका कंसोलिडेटेड रेवेन्यू है वह 23.6 परसेंट बड़ा 2022—23 में 9,74,864 करोड रुपए का रेवेन्यू इंक्रीज किया है। कि हमको तो जिओ की जरूरत है और जिओ की जरूरत है तो ऐ जेसा चाहेंगे वैसा करेगें। आप देखिए कि अभी अपनी जिओ फाइनेंशियल सर्विसेज लेकर आ रहे हैं जियो फाइनेंशियल सर्विस आते ही देश की टॉप फाइव में पहुंच जाती है। क्योंकि उनके पास डाटा है आपका भी हमारा भी आपके मोबाइल में ऑटोमेटिक फ्लैश कर जाएगा कि जिओ आ गया है आप उसके थ्रू इंटरनेट का यूज कर रहे हैं। जियो फाइनेंशियल सर्विसेज के शेयर 350 रुपए चल रहे हैं कि अंबानी के द्वारा जो मुकेश अंबानी के द्वारा काम किया जा रहा है इस काम काम में जहां देश के साथ पहले देश को साथ लेकर चलने की बात थी। आपने यह सुविधाओं का उपयोग करके लोगों के साथ 25% टैरिफ हाई करना कैसे जस्टिफाई किया जा सकता है।

आपका शांत रहना ही आपके लिए खतरा

सरकार को आवश्यकता है इस प्रकार की मोनोपोलिस्टिक एप्रोच रखने वाली कंपनियों के साथ सख्ती से पेश आए उनसे सवाल करें सरकारी जांच हो और यह तय किया जाए कि देश के अंदर सारे संसाधन किसी एक व्यक्ति के हाथ में ना चले जाए। यह प्लान इनका सबसे बेसिक प्लान है कि आपको चीज सस्ते में मिलेंगे लेकिन सस्ते की आदत लगाकर सस्ते की आदत आप प्रेडेटरी प्राइसिंग के माध्यम से इसलिए लगा पाते हैं क्योंकि आपके पास भर भर के पैसा है।आप अपना पैसा लगाकर सब कुछ फ्री कर दो तो दुनिया वैसे ही बर्बाद हो जाएगी और कंपनियां सरवाइव नहीं कर पाएंगी।आप फिर जब अपने पास सबको का लेंगे तो आप ऐसे ही करेंगे 2021 में अपने रेट बढ़ाई अब 2024 में अपडेट कर 25 परसेंट रेट सीधा बढ़ा ले गए। देश के अंदर जनता को भी अवेयर होने की आवश्यकता है कि आप किसी के हाथ कठपुतली ना बने जागरूक रहे इस तरह की चीजों पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे।इस बात को केवल उपभोक्ता के रूप में ना सुनते रहे की हमारे साथ ही नही सबके साथ ही तो हुआ हैंं। आपका यही शांत रहना ही आपके लिए बहुत बड़ी चुनौती बना हुआ है फिलहाल के लिए आप समझ लीजिए कि देश को किसी और आप अपनी तरफ से जियो के हाथ में जाता हुआ देख रहे हैं क्या आने वाले समय में यह प्लान कर रहे हैं अपने हिसाब से प्लान करें।

(यह ख़बर इंटरनेट एवं सूत्रों से प्राप्त जानकारी के आधार पर प्रकाशित हैं)




Denvapost Exclusive:निजी स्कूल के शिक्षकों के लिए एक वेतन निर्धारण समिति का गठन क्यो नही?

नर्मदापुरम : सरकार के लिए प्रत्येक योग्य युवा को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करना संभव नहीं है, इसलिए शिक्षित युवाओं की पसंद निजी क्षेत्र ही बनी हुई है। निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं में केवल वे ही पनपते और पोषित होते हैं जो कर्मचारी हितैषी होते हैं और अपने कर्मचारियों को सम्मानजनक और दैनिक जीवन जारी रखने वाला वेतन या सम्मानजनक वेतन देते हैं। ऐसा वेतन जो कर्मचारी की आर्थिक और सामाजिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त हो। वह वेतन जिसके आधार पर एक कर्मचारी उस संस्थान की बेहतरी के लिए अपनी सारी क्षमता का निवेश करता है जिसमें वह काम कर रहा है। ऐसा वेतन जिसके माध्यम से उसे अन्य कार्य करने की आवश्यकता नहीं होती है जो अन्यथा उसके मूल कार्य में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।

नर्मदापुरम में निजी क्षेत्र के सबसे बड़े नियोक्ता निजी स्कूल हैं। इन विद्यालयों में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने के लिए हजारों शिक्षक कार्यरत हैं। प्रत्येक स्कूल सर्वोत्तम योग्य युवाओं में से उन शिक्षकों को नियुक्त करने का प्रयास करता है जो उनके संस्थानों में शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सफल बनाएंगे और जो शिक्षा क्षेत्र में आधुनिक रुझानों के अनुसार काम करेंगे और प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण से उत्पन्न चुनौतियों को समाप्त करेंगे। वे शिक्षक जो आधुनिक छात्रों की ज्ञान पिपासा को शांत करेंगे या सर्वोत्तम शिक्षा प्रदान करने के लिए निजी स्कूलों को बेहतरीन और प्रतिष्ठित शिक्षण संकाय को नियुक्त करना होगा। सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों को नियुक्त करने के लिए निजी स्कूलों को उन्हें उचित वेतन देना होगा। जब हम समाचार पत्रों में शिक्षण स्टाफ की भर्ती के लिए निजी स्कूलों के विज्ञापन देखते हैं, तो प्रत्येक पद को पढ़ाने के लिए योग्यता और अनुभव को मोटे अक्षरों में लिखा जाता है, जबकि जब वेतन की बारी आती है तो इसे छोटे और सरल शब्दों में लिखा जाता है जैसे “pay negotiable” बातचीत योग्य। हम सभी इस negotiable वेतन की अनकही कहानी जानते हैं। इन शिक्षकों को साक्षात्कार और अन्य प्रक्रियाओं के अधीन किया जाता है और उन्हें बताया जाता है कि उन्हें बुनियादी बातों पर कोई समझौता किए बिना किसी भी कीमत पर संस्थान के नियमों और शर्तों का पालन करना होगा। जब वेतन पर चर्चा होती है तो उम्मीदवारों से कहा जाता है कि उन्हें एक महीने या उससे अधिक के लिए परीक्षण पर रखा जाएगा और उसके बाद ही उन्हें उचित वेतन प्रदान किया जाएगा, जब तक कि उन्हें न्यूनतम वेतन के साथ काम करना होगा और अपनी योग्यता साबित करनी होगी।

एक निजी स्कूल में शामिल होने वाले शिक्षक के लिए उपयुक्त वेतन क्या है? एक कुशल श्रमिक प्रति माह कम से कम 25000-30000 रुपये कमाता है और एक गैर-कुशल श्रमिक, जिसे उदाहरण के लिए शिक्षा की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं है, 15000-20000 रुपये की मासिक राशि कमाता है। कुशल श्रमिक जिनके पास अपनी मशीनरी और उपकरण हैं, वे पहले से कहीं अधिक कमाते हैं। बताए गए आंकड़े. यह एक सर्वविदित तथ्य है कि अधिकांश निजी स्कूलों में वेतन 15000 रुपये तक नहीं पहुंचता है। ऐसे कई निजी स्कूल हैं जहां शिक्षकों का वेतन 5000 रुपये से कम है। कई प्रतिष्ठित स्कूल अपने शिक्षकों को वेतन दे रहे हैं जो सवालिया निशान लगाता है। उनके नाम और प्रसिद्धि पर मोटी कमाई करने और यहां तक ​​कि माता-पिता की जेब खाली करने के बावजूद वे शिक्षकों को केवल मूंगफली देते हैं। इन असहाय शिक्षकों को न तो वार्षिक वेतन वृद्धि का प्रावधान है और न ही अनुकरणीय प्रदर्शन दिखाने पर उन्हें सूप प्रदान किया जा रहा है, हालांकि अपवाद हो सकते हैं लेकिन केवल कुछ ही। जब कोई शिक्षक इस अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करता है तो उसे बिना किसी पूर्व सूचना के नौकरी से हटा दिया जाता है।

हर शिक्षित और योग्य युवा के पीछे उसके माता-पिता और परिवार की मेहनत और पसीने की कमाई होती है। यह निवेश इसलिए किया जाता है ताकि एक ऐसे उद्धारकर्ता का पोषण किया जा सके जो जरूरत के समय परिवार का बोझ उठाए और ऐसे युवाओं को विशेष रूप से गरीबों के परिवारों में एकमात्र आशा के रूप में देखा जाता है। निजी स्कूल के शिक्षक जैसे युवा अपने वेतन के बजट में अपने बीमार माता-पिता के लिए दवाएँ भी नहीं खरीद सकते हैं, परिवार के लिए अन्य आवश्यक वस्तुओं की खरीद की तो बात ही दूर है। एक स्कूल शिक्षक को आधुनिक छात्रों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अद्यतन रहना होगा और आधुनिक तकनीकी उपकरणों से लैस होना होगा। ज्वलंत प्रश्न यह है कि क्या निजी स्कूल के शिक्षक अपने वेतन की सीमा के भीतर स्कूल में ड्रेस कोड बनाए रखने में सक्षम हैं? शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण वस्तुओं की खरीद की तो बात ही छोड़िए।

पिछले दो वर्षों से कोविड-19 महामारी में निजी विद्यालय के शिक्षकों की आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गई है। कई निजी स्कूल के शिक्षकों को महीनों तक वेतन नहीं दिया गया और कुछ मामलों में उन्हें एक पैसा भी नहीं दिया गया, जिससे इन शिक्षकों और उनके परिवारों को लॉकडाउन के महीनों में भुखमरी का सामना करना पड़ा। एक निजी स्कूल के शिक्षक ने शिकायत की कि वर्ष 2020 में उन्हें 12 महीनों में से केवल दो महीने का वेतन दिया गया। यह केवल एक असहाय और गरीब निजी स्कूल शिक्षक की आपबीती नहीं है, बल्कि लगभग सभी निजी स्कूल शिक्षकों की कहानी है।
शिक्षकों को कम वेतन दिया जाना निजी स्कूलों की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाता है। यह न्यूनतम वेतन गारंटी अधिनियम (एमडब्ल्यूजीए) की धज्जियां उड़ाता है। यह शिक्षित युवाओं की संपत्ति का शोषण है जो सफल राष्ट्र की जान हैं। यह शिक्षा व्यवस्था एवं तत्संबंधी केन्द्रों का अपमान है। यह साक्षरता मिशन और उसके पैरोकारों के साथ मजाक है। यह अपनी समग्रता और निरपेक्षता में ईमानदारी से शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य को गलत साबित करता है।

स्कूल शिक्षा विभाग और श्रम विभाग को निजी स्कूल के शिक्षकों के बचाव में आना चाहिए और ऐसे नियम और कानून बनाने चाहिए जो निजी स्कूल मालिकों द्वारा शिक्षकों की भर्ती के आधार को नियंत्रित करेंगे। निजी स्कूल के शिक्षकों के लिए एक वेतन निर्धारण समिति का गठन किया जाना चाहिए और एक सम्मानजनक वेतन निर्धारण समिति का गठन किया जाना चाहिए। प्राइवेट स्कूल के शिक्षकों को दिया जाने वाला वेतन निर्धारित किया जाए ताकि प्राइवेट स्कूल के शिक्षकों का शोषण न हो सके। पीएसटी के लिए उचित एवं सम्मानजनक वार्षिक वेतन वृद्धि का प्रावधान होना चाहिए। निजी स्कूल के शिक्षकों द्वारा दर्ज की गई शिकायतों को देखने के लिए एक शिकायत निवारण कक्ष स्थापित किया जाना चाहिए।




सरकार बनते ही महाराष्ट्र से बिहार तक NDA में बढ़ी रार

एक तरफ जहां महाराष्ट्र में शिवसेना (शिंदे गुट) और अजित पवार की एनसीपी मोदी कैबिनेट में जगह नहीं मिलने से नाराज बताए जा रहे हैं, वहीं, यूपी, बिहार और झारखंड में भी बीजेपी और एनडीए में सब ठीक नहीं है।

सरकार बनते ही महाराष्ट्र से बिहार तक NDA में बढ़ी रार, कई जगह BJP की अंतर्कलह भी आई सामने
सरकार बनते ही महाराष्ट्र से बिहार तक NDA में बढ़ी रार, कई जगह BJP की अंतर्कलह भी आई सामने

लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आने के बावजूद बीजेपी ने भले ही एनडीए के झंडे तले सरकार बना ली हो, लेकिन सरकार गठन के चंद दिन भी नहीं हुए हैं और बिहार से महाराष्ट्र तक एनडीए में खटपट उभर कर सामने आने लगी है। वहीं कई जगह बीजेपी की भी अंतर्कलह बाहर आने लगी है। एक तरफ जहां महाराष्ट्र में शिवसेना (शिंदे गुट) और अजित पवार की एनसीपी मोदी कैबिनेट में जगह नहीं मिलने से नाराज बताए जा रहे हैं, वहीं, यूपी, बिहार और झारखंड में भी बीजेपी और एनडीए में सब ठीक नहीं है।

महाराष्ट्र में एनसीपी-शिवसेना नाराज

बात करें महाराष्ट्र की तो एनडीए के दो घटक दल एनसीपी और शिवसेना नाराज बताए जा रहे हैं। मोदी कैबिनेट में शिवसेना को एक राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) मिला है। 7 सांसद होने के बावजूद कैबिनेट में जगह नहीं मिलने की वजह से शिवसेना नेता श्रीरंग बारणे ने नाराजगी जाहिर भी की है। श्रीरंग ने कहा कि एनडीए में जो पार्टियां 4- 5 सीटें जीती हैं उन्हें भी कैबिनेट मंत्री का पद दिया गया है। वहीं, हमने 7 सीटें जीती हैं लेकिन एक भी कैबिनेट पद नहीं दिया गया। शिवसेना के सांसद प्रतापराव जाधव को केंद्र सरकार में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी मिली है। हालांकि, शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे के बेटे श्रीकांत शिंदे ने श्रीरंग बारणे के बयान का खंडन किया है और बिना शर्त मोदी सरकार को समर्थन की बात कही है।

कैबिनेट में जगह नहीं मिलने से NCP भी खफा

महाराष्ट्र सरकार में डिप्टी सीएम अजित पवार की एनसीपी भी मोदी कैबिनेट में जगह नहीं मिलने से नाराज है। बीजेपी की ओर से एनसीपी को राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की पेशकश हुई थी मगर एनसीपी ने इसे ठुकरा दिया। एनसीपी कैबिनेट मंत्री से नीचे कुछ भी मानने को तैयार नहीं है। सूत्रों का कहना है कि एनसीपी प्रफुल्ल पटेल को केंद्र में भेजना चाहती थी। एनसीपी की नाराजगी की वजह यह भी है कि बिहार से जीतन राम मांझी को कैबिनेट में शामिल किया गया है जबकि उनकी पार्टी ने भी एक ही सीट जीती है। गौरतलब है कि एनसीपी ने महाराष्ट्र में 4 सीटों पर चुनाव लड़ा था मगर उन्हें जीत सिर्फ एक सीट पर मिली है।

अजित पवार से छगन भुजबल नाराज?

एनसीपी अध्यक्ष अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार ने गुरुवार को राज्यसभा उपचुनाव के लिए पार्टी के उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया। इससे एनसीपी में कई लोगों के नाराज होने की खबर है। हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री छगन भुजबल ने दावा किया कि वह इस नामांकन के लिए अपना दावा खारिज होने से नाराज नहीं हैं। लेकिन कहा जा रहा है कि भुजबल अजित पवार के इस फैसले से खासा नाराज है। भुजबल ने पहले राज्यसभा सदस्य बनने की अपनी इच्छा के बारे में बताया था।

बिहार में उपेंद्र कुशवाहा नाराज

राष्ट्रीय लोक मोर्चा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने काराकाट से अपनी हार पर खुली नाराजगी जताई थी। चुनाव परिणाम के बाद 6 जून को पटना एयरपोर्ट पर उपेंद्र कुशवाहा ने मीडिया से कहा था, “हारा हूं या हराया गया हूं। सबको मालूम है, सबको पता है सारी चीजें। चूक हुई या चूक करवाया गया ये सबको मालूम है। हमें खुलकर बोलने की जरूरत नहीं है। पवन सिंह फैक्टर बना या बनाया गया ये सबको पता है। हमको कुछ नहीं कहना है। सभी लोगों को पता है सब कुछ। अब किसी से इस बारे में बात करके क्या फायदा।” कुशवाहा बिहार के काराकाट से एनडीए उम्मीदवार थे मगर परिणाम सामने आने पर वह तीसरे स्थान पर रहे। काराकाट सीट से सीपीआईएमएल के राजा राम सिंह ने बाजी मारी। वहीं, निर्दलीय पवन सिंह दूसरे स्थान पर रहे।

बिहार में NDA में नहीं है सब ठीक

इस चुनाव में बिहार में पिछली बार की तुलना में एनडीए को 9 सीटों का नुकसान हुआ है। जिसके बाद एनडीए में सबकुछ ठीक नहीं होने की खबरें आने लगी हैं। राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने अखबार में छपी एक खबर के साथ सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, “एनडीए के सभी घटक दलों के नेताओं से करबद्ध निवेदन है कि ऐसी खबरों को पब्लिक डोमेन में जाने से रोकें-बचें क्योंकि इस तरह की खबरें आपस में कटुता बना-बढ़ा सकती है। आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति को जन्म दे सकती है। चुनाव परिणाम की समीक्षा अतिआवश्यक है परन्तु यह हमारा आंतरिक मामला है।” खबर में लिखा है कि बीजेपी को जेडीयू का वोट ट्रांसफर नहीं हुआ।

बिहार बीजेपी प्रमुख के खिलाफ ही खुला मोर्चा

बिहार बीजेपी की बात करें तो गया से बीजेपी के दो बार सांसद रहे हरि मांझी ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक के बाद एक कई पोस्ट कर कहा कि सम्राट चौधरी ने लोकसभा चुनाव में हेलीकॉप्टर से खूब प्रचार किया मगर वे अपनी जाति (कुशवाहा) के वोट भी पार्टी या गठबंधन को नहीं दिलवा सके। मांझी ने यहां तक कह दिया कि इसी कारण औरंगाबाद, काराकाट, बक्सर और आरा में बीजेपी और एनडीए को हार का सामना करना पड़ा।

हरि मांझी ने एक अन्य पोस्ट में कहा कि उन्होंने चुनाव से पहले सम्राट चौधरी को कई बार फोन किए लेकिन उन्होंने बात नहीं की। इससे पहले एक पोस्ट में मांझी ने बिहार में बीजेपी का अध्यक्ष बदलने की मांग की थी। उन्होंने कहा कि बिहार में जो भी अगला अध्यक्ष हो वो कम से कम हम जैसे कार्यकर्ताओं की सुध ले। वह अपनी क्षेत्र की बात रखने के लिए समय दे। ये सब चीजें सिर्फ घोर भाजपाई में ही मिल सकती है।

यूपी में संजय निषाद नाराज

लोकसभा चुनाव में बीजेपी के सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश में लगा है, जहां पार्टी केवल 33 सीटें जीत पाई है। एनडीए में शामिल निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद भी संत कबीरनगर से चुनाव हार गए। बेटे की हार पर संजय निषाद ने साफ कहा कि बीजेपी की वजह से मेरा बेटा चुनाव हार गया। यूपी में बीजेपी के खराब प्रदर्शन पर मंत्री धर्मवीर प्रजापति ने कहा कि संविधान और आरक्षण बीजेपी के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। हम इन आरोपों का जवाब नहीं दे पाए।

झारखंड में एनडीए में शामिल आजसू नाराज

झारखंड के गिरिडीह लोकसभा सीट से लगातार दूसरी बार जीतने वाले आजसू के सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी भी मोदी कैबिनेट में जगह नहीं मिलने से नाराज हैं। उन्होंने साफ कहा कि एनडीए के घटक दलों की बैठक में सभी को उचित प्रतिनिधित्व देने की बात कही गई थी मगर मोदी मंत्रिमंडल में आजसू को नजरअंदाज किया गया है। गठबंधन धर्म के तहत सभी दल को सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पार्टी स्तर पर हम इस मामले पर विचार कर आगे की रणनीति तय करेंगे। हालांकि, आजसू प्रमुख सुदेश महतो ने अब तक इस पर खुलकर कुछ नहीं बोला है।




एक ट्वीट से मचा बवाल: अब CPCB दिल्ली ने ली माखननगर की आवोहवा की सुध, किसी ने नहीं सोचा था बात इतनी दूर तलक जाएगी

माखननगर: नर्मदापुरम जिले के एक छोटे से कस्बे माखननगर (Makhan Nagar)के छोटे से मैदान में गिट्टी डंप से उठ रही धूल…किसने सोचा था बात इतनी दूर तलक जाएगी। सच बताएं तो किसी ने नहीं, लेकिन 21 मई को एक ट्वीट ने उस समय बवाल मचा दिया जब ये पता चला कि भारत सरकार के अधीन दिल्ली (Delhi) के एक दफ्तर ने इस मामले में चिट्ठी दौड़ा दी। मामले में मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पहले ही कार्रवाई कर चुका है, पर अब CPCB दिल्ली (Delhi) ने भी मामले में संज्ञान लेते हुए माखननगर की आवोहवा की सुध ले ली है। इसकी पुष्टी खुद CPCB दिल्ली (Delhi) ने एक ट्वीट पर रिप्लाई करते हुए की है।

CPCB दिल्ली ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को लिखा

डंपिंग यार्ड में माखननगर के सिराली कॉलोनी के रहवासी इलाके में उठा धूल का गुबार दिल्ली (Delhi) वालों की आंखों से भी बच नहीं पाया। सेंट्रल पाल्यूशन कंट्रोल बोर्ड यानी CPCB दिल्ली ने मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस मामले में सख्त एक्शन लेने के लिए लिख दिया है। इसके बाद जो कार्रवाई अब तक अवैध गतिविधि के रोक तक सीमित मानी जा रही थी अब वह जिम्मेदारों पर तगड़े जुर्माने और बड़ी कार्रवाई तक भी पहुंच सकती है।

नगर का पहला मामला जिसमें CPCB दिल्ली हुआ इन्वॉल्व

माखननगर का यह पहला मामला है जिसमें अब CPCB दिल्ली (Delhi) भी इन्वॉल्व हो गया है। CPCB दिल्ली (Delhi) ने मध्यप्रदेश के मुख्यालय पर पत्र लिखकर पूरे मामले की जानकारी मांगी है। साथ ही एयर एक्ट 1981 के अंतर्गत कार्रवाई करने के लिए भी निर्देशित किया है।

ये है मामला

बिंदल डेवलपर्स माखननगर थाने से सिराली कॉलोनी की नहर तक और मुख्य सड़क पर आरा मशीन से लेकर सुमित्रा पब्लिक स्कूल तक सड़क चौड़ीकरण का काम करने वाला है।निर्माण के नाम पर बिंदल डेवलपर्स ने नगर के रहवासी इलाके सिराली कॉलोनी डंपिंग यार्ड बना लिया। जहां गिट्टी की लोडिंग अनलोडिंग हो रही थी।इसी जगह पर मिक्सिंग के लिए सीपी 30 प्लांट लगाने की भी तैयारी थी।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ये की थी कार्रवाई

शिकायत मिलने के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम ने 14 मई को माखननगर का निरीक्षण किया था।शिकायत मिलने के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम ने 14 मई को माखननगर का निरीक्षण किया था।

निरीक्षण के दौरान टीम ने पाया कि गिट्टी की डंपिंग होने के कारण फ्यूजिटिव इमिशन्स की समस्या हो रही है।प्रदूषण को रोकने के लिए मौके पर कोई उपाय नहीं किये गए। इससे वायु प्रदूषण की स्थिति बन रही है।

मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी अभय सराफ ने पीडब्ल्यूडी के एसडीओ के साथ ही एसडीएम और सीएमओ को पत्र लिखकर तत्काल लोडिंग अनलोडिंग पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिये हैं।

साथ ही बिना अनुमति के रहवासी इलाके में डंपिंग यार्ड बनाने के लिए जिम्मेदार पर 7 दिनों में कार्रवाई करने को कहा है।

वायु प्रदूषण हमारे लिए कितना खतरनाक

डंपिंग या सीपी 30 प्लांट रहवासी इलाके में चलता तो यहां धूल उड़ने से हवा में PM 10 और PM 2.5 की मात्रा बढ़ जाती। ये कण हमारे मुंह और फेफड़ों के जरिए शरीर के अंदर चले जाते हैं।

इससे खांसी और अस्थमा के दौरे पड़ सकते हैं। उच्च रक्तचाप, दिल का दौरा, स्ट्रोक जैसी बीमारी भी हो सकती है।




आम आदमी पार्टी को आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता

दिल्ली पुलिस ने दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के एक निजी सहयोगी को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि उनके सहयोगी ने आप की राज्यसभा सदस्य स्वाति मालीवाल पर हमला किया है। मालीवाल द्वारा अपने सहयोगी बिभव कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। एक सार्वजनिक बयान में उन्होंने कहा है कि बिभव ने उन्हें “बेरहमी से” पीटा और “थप्पड़ और लात मारी”। आप नेता संजय सिंह ने 14 मई को एक सार्वजनिक बयान में कहा था कि जब सुश्री मालीवाल केजरीवाल से मिलने उनके आधिकारिक आवास पर पहुंचीं तो उनके सहयोगी ने उनके साथ “दुर्व्यवहार” और “अभद्र व्यवहार” किया। सिंह ने आगे कहा कि केजरीवाल ने इस घटना का संज्ञान लिया है और “कड़ी कार्रवाई” की जाएगी। लेकिन घटनाक्रम वैसा नहीं हुआ। आप ने बिभव के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की और सुश्री मालीवाल ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अचानक अपना सुर बदलते हुए आप ने अब श्रीमती मालीवाल पर आरोप लगाया है कि वह दो दशकों से केजरीवाल की सहयोगी हैं और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का “मोहरा” हैं। भाजपा ने मुश्किल हालात में कदम रखा है और कांग्रेस ने केजरीवाल को याद दिलाया है कि उन्होंने ऐसे कानूनों के लिए अभियान चलाया था, जिसमें मारपीट के मामले में महिला के शब्दों को प्राथमिकता दी गई थी।

मीडिया ट्रायल या राजनीतिक रस्साकशी से सच्चाई का पता नहीं लगाया जा सकता। एक पेशेवर, निष्पक्ष जांच से यह पता लगाया जा सकता है। केंद्र में सत्ता में बैठी और दिल्ली पुलिस को नियंत्रित करने वाली भाजपा की स्थिति को जांच को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। वास्तव में, भाजपा का आक्रोश पाखंडपूर्ण है, क्योंकि उसने अपने सहयोगी जनता दल (सेक्युलर) के मौजूदा सांसद प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ अधिक गंभीर आरोपों पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी। केजरीवाल को भी इस मुद्दे पर बोलना चाहिए। भाजपा के खिलाफ लगातार चुप्पी या बयानबाजी करना इसका जवाब नहीं है। भारत में राजनीति के पतन के जवाब के रूप में प्रमुखता से उभरी आप आज उन आरोपों की सूची का सामना कर रही है जो उसने अन्य सभी दलों पर लगाए थे – भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से लेकर अधिनायकवाद और विषाक्त मर्दानगी तक। एक दशक से अधिक समय से अस्तित्व में होने के बावजूद, यह सार्वजनिक जांच या आंतरिक जवाबदेही से अछूता है। इसके पास निर्णय लेने का कोई संगठनात्मक ढांचा नहीं है, और अक्सर मनमाने उपायों का सहारा लेती है। मालीवाल मामले के परिणाम के बावजूद, और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए प्रवर्तन एजेंसियों का उपयोग करने की भाजपा की प्रवृत्ति से अलग, आप को कुछ गंभीर आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है।




विभाजनकारी प्रवृत्ति के खतरे,शीर्ष स्तर से चुनावी बयानबाजी

आम चुनाव के चौथे चरण के बाद 543 निर्वाचन क्षेत्रों में से 379 में मतदान समाप्त होने के साथ ही पार्टियों का चुनाव अभियान समाप्ति के करीब पहुंच गया है। हालांकि, चुनाव अभियान कैलेंडर में मतदाताओं की चिंताओं और अभियान की बयानबाजी – खासकर भाजपा के मुख्य नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की – के बीच का अंतर, दुर्भाग्य से, बरकरार है। जहां रोजगार सृजन, मुद्रास्फीति और विकास को मतदाताओं ने प्राथमिक मुद्दों के रूप में महत्व दिया है, वहीं श्री मोदी मुख्य रूप से अपने सरकार के 10 वर्षों के शासन के रिकॉर्ड पर चुनाव लड़ने और मुख्य चिंताओं को दूर करने के उपायों पर ध्यान केंद्रित करने के विचार से प्रेरित होने से इनकार करते हैं। इसके बजाय, वह वही करना चाहते हैं जिसमें उन्हें हमेशा आनंद आता है – विपक्ष पर सत्य, अर्धसत्य और बेबुनियाद बातों के साथ हमला करना। श्री मोदी के इस प्रयास में टेलीविजन और सोशल मीडिया का शोर भी सहायक है, जो उनके द्वारा इस्तेमाल की गई बयानबाजी से चिंताओं को दूर करने का एक उपयोगी साधन है, चाहे वह मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने वाला भाषण हो या हिंदुत्व के अनुयायियों से समर्थन हासिल करने के लिए कुत्ते की सीटी बजाना। कांग्रेस और उसके सार्वजनिक चेहरे राहुल गांधी सहित अन्य पार्टियाँ भी – भले ही उतनी हद तक नहीं – जाति की राजनीति से जुड़े पहचान के मुद्दों को उठाने के दोषी हैं। लेकिन श्री मोदी और उनके कुछ सहयोगियों ने चुनाव प्रचार के साधन के रूप में गाली-गलौज को नए स्तर पर पहुँचा दिया है। जौनपुर में अपनी रैली में उन्होंने उत्तर प्रदेश में विपक्ष, सपा और कांग्रेस पर आरोप लगाया कि जब उनके दक्षिणी सहयोगी यूपी के लोगों और “सनातन धर्म” के लिए “बेतुकी और अपमानजनक भाषा” का इस्तेमाल कर रहे थे, तब वे चुप रहे।

भारत ब्लॉक में उत्तरी क्षेत्र की कुछ पार्टियों ने सामाजिक न्याय पर अपने रुख पर जोर देते हुए और जाति पदानुक्रम के मुद्दे को उठाते हुए डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन की “सनातन धर्म” पर टिप्पणियों से सार्वजनिक रूप से असहमति जताई है। इन पार्टियों द्वारा समर्थित संघवाद और सामाजिक न्याय की राजनीति को जोड़ने वाली चीजें उन्हें विभाजित करने वाली चीजों से कहीं अधिक हैं – भाषाई राष्ट्रवाद से संबंधित प्रश्न जैसे कि अंग्रेजी को एक संपर्क भाषा के रूप में इस्तेमाल करने की आवश्यकता – लेकिन विभिन्न राजनीतिक दलों से बने गठबंधनों से इसकी अपेक्षा की जाती है। श्री मोदी को भाजपा और भारत ब्लॉक के बीच सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से निपटने के तरीके पर जोर देने में अंतर पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। लेकिन, इसके बजाय, हिंदी पट्टी को दक्षिणी दलों के खिलाफ भड़काने के लिए उनके द्वारा अर्ध-सत्य का हथियार के रूप में इस्तेमाल करना समस्याग्रस्त है, ऐसे समय में जब उत्तर-दक्षिण आर्थिक एकीकरण अधिक है, उत्तर से कामकाजी वर्ग के नागरिक रोजगार के लिए दक्षिण की ओर पलायन कर रहे हैं। हाल ही में, भाजपा ने मनीष कश्यप को शामिल किया, जो एक यूट्यूब कंटेंट क्रिएटर हैं, जिन्हें राज्य में बिहारी प्रवासियों पर हमले की झूठी खबर फैलाने के लिए तमिलनाडु में जेल भेजा गया था। ऐसी कार्रवाइयां विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा दे सकती हैं, जो समग्र रूप से भारतीय राष्ट्र के लिए लाभकारी नहीं है।




बदलाव की चाहत: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में चुनाव

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, विरासती सीमावर्ती राज्य जम्मू-कश्मीर से विभाजित केंद्र शासित प्रदेश, उन कुछ राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में से हैं जहां कई चरणों में मतदान हो रहा है। जम्मू में पहले और दूसरे चरण में मतदान हो चुका है, जबकि अनंतनाग-राजौरी निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव तीसरे से छठे चरण तक के लिए स्थगित कर दिया गया है।

जबकि उधमपुर (68.27%) और जम्मू (72.22%) में मतदान उत्साहजनक था और कमोबेश 2019 की भागीदारी के आंकड़ों के अनुरूप था, यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक उपलब्धि होगी यदि मतदाता कश्मीर में निर्वाचन क्षेत्रों में अच्छी संख्या में मतदान करते हैं। घाटी। श्रीनगर (14.43%), अनंतनाग (8.49%) और बारामूला (34.6%) में मतदान का आंकड़ा देश में सबसे कम था।

पूर्ववर्ती राज्य विधानसभा के विघटन पर मतदाताओं के बीच मोहभंग की भावना के कारण था। 2019 के बाद से, घाटी लगातार केंद्रीय शासन के अधीन रही है, जिसके कारण गंभीर दमन के चरण हुए हैं और इसके बाद इसकी राजनीति और चुनावी मानचित्र को फिर से व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया है। पूर्ववर्ती राज्य के लिए विशेष दर्जा ख़त्म करने और जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश के रूप में जारी रखने से अलगाव को दूर करने में मदद नहीं मिली है। लेकिन चुनाव निराश मतदाताओं को निर्णायक जनादेश के रूप में अपनी शिकायतें व्यक्त करने के लिए एक मंच प्रदान कर सकते हैं।

कश्मीरी राजनीति और नई दिल्ली के बीच स्थायी अविश्वास यह भी बताता है कि पूर्व में पारंपरिक पार्टियों ने मौसम की स्थिति के कारण अनंतनाग-राजौरी सीट पर चुनाव स्थगित करने का विरोध क्यों किया है।

लेकिन पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) सहित मुख्यधारा की कश्मीरी राजनीति, जो गुप्कर घोषणा के लिए पीपुल्स अलायंस बनाने के लिए अन्य लोगों के साथ आई थी, एकजुट नहीं हो सकी और लोकसभा चुनावों में एक के रूप में चुनाव नहीं लड़ सकी। एनसी और पीडीपी ने घाटी में अपनी राजनीतिक शत्रुता फिर से शुरू कर दी है; पूर्व भारतीय गुट के हिस्से के रूप में कांग्रेस के साथ गठबंधन में है। जहां तक ​​भारतीय जनता पार्टी का सवाल है, जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर देश को “एकीकृत” करने की उसकी

विजयी बात खोखली लगती है: उसने अपना मुकाबला हिंदू-बहुल जम्मू और बौद्ध-बहुल लद्दाख तक सीमित कर दिया है। लद्दाख में, कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के नेतृत्व में अभियान ने राज्य का दर्जा और पर्यावरण संबंधी चिंताओं को सामने ला दिया है। लेकिन यह विपक्ष को उत्तेजित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कांग्रेस और एनसी लद्दाख निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक आम सहमति वाले उम्मीदवार के साथ नहीं आ सके, जिसमें लेह और कारगिल क्षेत्र शामिल हैं, जिसके कारण कांग्रेस ने लेह से एक उम्मीदवार को मैदान में उतारा है, जबकि दोनों पार्टियों की कारगिल इकाइयां उस क्षेत्र से एक निर्दलीय उम्मीदवार का समर्थन कर रही हैं।




Denva Post Exclusive: कर्नाटक में प्रज्वल रेवन्ना मामला

कर्नाटक पुलिस और राज्य प्रशासन को उन महिलाओं की सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत संवेदनशीलता, व्यावसायिकता और तेजी से काम करना चाहिए। जिन्होंने अब निलंबित जनता दल (सेक्युलर) प्रज्वल रेवन्ना द्वारा बलात्कार और यौन उत्पीड़न के कई मामलों की शिकायत की है। पार्टी नेता, कर्नाटक के हासन से मौजूदा सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. के पोते।जबकि राज्य सरकार ने श्री रेवन्ना के राजनयिक पासपोर्ट को रद्द करने की मांग करके तुरंत कार्रवाई की, बलात्कार और यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन कथित जबरन यौन कृत्यों के वीडियो दिखाए जाएं।

कई महिलाओं के साथ श्री रेवन्ना को तुरंत हटा दिया गया और महिलाओं की पहचान सुरक्षित कर ली गई। पिछले कुछ वर्षों में, उच्च पद पर आसीन लोगों द्वारा यौन दुर्व्यवहार के आरोप चिंताजनक सुर्खियाँ बनी हैं। ये अत्यधिक असमान शक्ति गतिशीलता और राजनीतिक प्रभाव की याद दिलाते हैं जिससे अपराधियों को जवाबदेह ठहराना मुश्किल हो जाता है। उत्तर प्रदेश के कैसरगंज में भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह के खिलाफ कई शिकायतें और यह एक उदाहरण हैं।

यौन शोषण से बचे लोग शायद ही कभी शिकायत करने के लिए आगे आते हैं। और जब वे ऐसा करते हैं, तो अक्सर ऐसा तब होता है जब उनका आघात असहनीय होता है, या जब उन्हें पारिवारिक समर्थन प्राप्त होता है, या जब उन्हें विश्वास होता है कि न्याय मिलने की संभावना है, जबकि वे गोपनीयता और सुरक्षा चाहते हैं।

जब कोई पीड़ित शिकायत दर्ज करता है, तो यह दूसरों को बोलने के लिए प्रोत्साहित करता है, खासकर जब इसमें सिलसिलेवार अपराधी शामिल हों। पुलिस को वीडियो में दिख रही कई महिलाओं से शिकायत दर्ज कराने में दिक्कत हो रही है। कर्नाटक के होलेनरासीपुर के रेवन्ना को एसआईटी ने बुलाया है – प्रज्वल रेवन्ना को बलात्कार के आरोप में, और उसके पिता को एक कथित पीड़िता से शिकायतकर्ता के अपहरण के आरोप में। ऐसे गंभीर आरोपों को देखते हुए, जांच पूरी होने तक दोनों नेताओं के लिए सार्वजनिक पद से इस्तीफा देना उचित होगा।




Feroze Gandhi to Rahul Gandhi: कांग्रेस के साथ रायबरेली की कोशिश

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के रायबरेली से राहुल गांधी के आश्चर्यजनक नामांकन से वीवीआईपी सीट पर फिर से ध्यान केंद्रित हो गया है, जिसका लोकसभा में पहली बार प्रतिनिधित्व पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष के दादा फिरोज गांधी ने किया था, जिन्होंने आजादी के बाद पहले दो चुनावों में इस सीट पर कब्जा किया था। फ़िरोज़ गांधी ने निर्वाचन क्षेत्र में जो मजबूत नींव रखी, उसे बाद में उनकी पत्नी और पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने पोषित और मजबूत किया, जो 1967, 1971 और 1980 में इस सीट से जीतीं, जिसके बाद गांधी परिवार के दोस्तों और परिवार के सदस्यों ने भी इस सीट से जीत हासिल की।

इंदिरा गांधी ने 1980 में दो सीटों – रायबरेली और तेलंगाना में मेडक – से चुनाव लड़ा और मेडक सीट बरकरार रखने का फैसला किया। अरुण नेहरू ने 1980 और उसके बाद 1984 में उपचुनाव जीता।अरुण नेहरू, जो दिवंगत प्रधान मंत्री राजीव गांधी के दाहिने हाथ माने जाते थे, से लेकर शीला कौल, एक अन्य गांधी रिश्तेदार तक, रायबरेली ने गांधी परिवार के कई सदस्यों और सहयोगियों को लोकसभा में लौटाया।फ़िरोज़ गांधी के निधन के बाद 1960 के उपचुनाव में यह सीट कांग्रेस के आरपी सिंह के पास थी, और 1962 में एक अन्य कांग्रेस नेता बैज नाथ कुरील के पास थी।

इंदिरा गांधी की चाची शीला कौल ने 1989 और 1991 में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया।1999 में, गांधी परिवार के एक अन्य मित्र, सतीश शर्मा ने रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, जब तक कि सोनिया गांधी वहां से दावा नहीं किया।एकमात्र जब कांग्रेस ने इस सीट का प्रतिनिधित्व नहीं किया, वह 1977 में आपातकाल के बाद हुआ था जब जनता पार्टी के राज नारायण ने इंदिरा गांधी, जो उस समय प्रधान मंत्री थीं, और भाजपा के अशोक सिंह को 1996 और 1998 में हराया था।हालाँकि चुनावी राजनीति में प्रवेश करने पर सोनिया गांधी ने 1999 में पड़ोसी लोकसभा सीट अमेठी से चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया, यह सीट पहले उनके पति राजीव गांधी के पास थी, लेकिन जल्द ही उन्होंने 2004 में अपने बेटे राहुल के राजनीति में पदार्पण के लिए इसे खाली कर दिया।

इसके बाद सोनिया गांधी ने 2004 से 2019 के बीच चार बार रायबरेली का चुनाव जीता, हालांकि हाल ही में उनकी जीत का अंतर कम होने लगा।
राहुल को अमेठी के बजाय रायबरेली से मैदान में उतारने के पीछे पार्टी की गणना इस निष्कर्ष पर भी टिकी है कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष के लिए रायबरेली एक बेहतर, सुरक्षित सीट है, जो 2019 में भाजपा की स्मृति ईरानी से लगभग 50,000 वोटों से अमेठी हार गए थे।इस आलोचना के बीच कि कांग्रेस ने अमेठी में ईरानी को वॉकआउट कर दिया है, सूत्रों ने कहा, पार्टी ने अपने विवेक से माना कि गांधी परिवार के लिए रायबरेली का ऐतिहासिक, भावनात्मक और चुनावी महत्व अमेठी से अधिक है।

रायबरेली के लोगों को अपने विदाई संदेश में, सोनिया गांधी ने विश्वास जताया था कि जो सीट हमेशा उनके और गांधी परिवार के साथ रही है, वह भविष्य में भी उनके परिवार का समर्थन करना जारी रखेगी।15 फरवरी को संदेश में, पूर्व पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी ने अपने रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं को सूचित किया कि वह स्वास्थ्य और उम्र के मुद्दों के कारण आगामी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी।2004 से जिस क्षेत्र का वह प्रतिनिधित्व कर रही हैं, एक भावनात्मक संदेश में, 77 वर्षीय ने रायबरेली से अपने परिवार के एक सदस्य के संभावित प्रवेश के सूक्ष्म संकेत भी दिए।उन्होंने कहा, “मुझे यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि मैं आज जो कुछ भी हूं, आपकी वजह से हूं और मैंने हमेशा आपके विश्वास का सम्मान करने की पूरी कोशिश की है।

अब स्वास्थ्य और उम्र के मुद्दों के कारण, मैं अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ूंगी।” संदेश में उन्होंने कहा, “इस फैसले के बाद मुझे सीधे तौर पर आपकी सेवा करने का अवसर नहीं मिलेगा लेकिन मेरा दिल और आत्मा हमेशा आपके साथ रहेगी। मुझे पता है कि आप भविष्य में भी मेरे और मेरे परिवार के साथ खड़े रहेंगे, जैसा कि आप अतीत में करते थे।”मतदाताओं को यह संदेश राजस्थान से राज्यसभा सीट के लिए नामांकन दाखिल करने के एक दिन बाद आया।उन्होंने पहली बार राज्यसभा में प्रवेश किया और इंदिरा गांधी के बाद ऐसा करने वाली गांधी परिवार की दूसरी सदस्य थीं, जो 1964 से 1967 तक उच्च सदन की सदस्य थीं।

मतदाताओं को संदेश में सोनिया गांधी ने आगे कहा, “दिल्ली में मेरा परिवार आपके बिना अधूरा है। यह तब पूरा होता है जब मैं रायबरेली आती हूं और आप सभी से मिलती हूं। आपके साथ मेरे संबंध बहुत पुराने हैं।

ये संबंध मुझे विरासत में मिले हैं।” मेरे ससुराल वालों की ओर से सौभाग्य।”उन्होंने कहा कि रायबरेली के साथ उनके परिवार के रिश्ते ‘बहुत गहरे’ हैं, उन्होंने कहा कि आजादी के बाद हुए पहले आम चुनाव में रायबरेली ने उनके ससुर फिरोज गांधी को लोकसभा में भेजा था।उसके बाद, आपने मेरी सास इंदिरा गांधी को स्वीकार कर लिया, उन्होंने कहा, तब से, जीवन के उतार-चढ़ाव के बावजूद स्नेह की कठिन राह पर हमारा रिश्ता मजबूत हो गया और इस बंधन में हमारा विश्वास मजबूत हो गया।पूर्व कांग्रेस प्रमुख ने कहा, “आपने मुझे इस चमकदार रास्ते पर चलने की इजाजत दी। मैं अपनी सास और पति को खोने के बाद आपके पास आई और आपने मुझे खुली बांहों से स्वीकार किया।”उन्होंने अपने संदेश में बड़ों के प्रति सम्मान और युवाओं के प्रति प्यार जताते हुए कहा था, ”मैं जल्द ही आपसे मिलूंगी.”