Denvapost Exclusive : नरेंद्र मोदी ने तोड़ा इंदिरा गांधी का रिकॉर्ड, बने देश के दूसरे सबसे लंबे समय तक लगातार रहने वाले प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार, 25 जुलाई 2025 को भारतीय राजनीति में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि अपने नाम कर ली। वे अब भारत के दूसरे सबसे लंबे समय तक लगातार प्रधानमंत्री रहने वाले नेता बन गए हैं, और इस तरह उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिया है।

अधिकारियों के अनुसार, श्री मोदी ने शुक्रवार को अपने कार्यकाल के 4,078 दिन पूरे कर लिए। जबकि इंदिरा गांधी ने अपने पहले कार्यकाल में (24 जनवरी 1966 से 24 मार्च 1977) तक 4,077 दिन लगातार प्रधानमंत्री के रूप में सेवा दी थी।

पहली बार:

यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं।

स्वतंत्रता के बाद जन्मे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने यह कीर्तिमान रचा है।

एक गैर-हिंदी भाषी राज्य (गुजरात) से आने वाले सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता बने हैं।

अब तक के आंकड़े:

लगातार प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड अभी भी जवाहरलाल नेहरू के नाम है।

नरेंद्र मोदी नेहरू के बाद ऐसे दूसरे नेता बन गए हैं, जिन्होंने लगातार तीन लोकसभा चुनावों (2014, 2019, 2024) में अपनी पार्टी को बहुमत दिलाया।

सबसे लंबे समय तक निर्वाचित पद पर रहने वाले नेता:

श्री मोदी राज्य और केंद्र, दोनों स्तरों पर निर्वाचित पदों पर लगातार सेवा देने वाले सबसे लंबे कार्यकाल वाले नेता हैं। वे वर्ष 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने और 2014 तक इस पद पर रहे। इसके बाद उन्होंने केंद्र की सत्ता संभाली और दो पूर्ण कार्यकाल पूरे किए हैं।

6 लगातार चुनावों में जीत:

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया,

“मोदी देश के इकलौते ऐसे नेता हैं जिन्होंने एक ही पार्टी के नेता के रूप में लगातार 6 बड़े चुनावों में जीत दर्ज की —
गुजरात विधानसभा चुनाव 2002, 2007, 2012
और लोकसभा चुनाव 2014, 2019, 2024।”

यह रिकॉर्ड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक कद, संगठनात्मक पकड़ और जनाधार का प्रतीक माना जा रहा है। आगामी वर्षों में क्या वे नेहरू का भी रिकॉर्ड तोड़ेंगे — यह देखना बाकी है।




Denvapost Exclusive : उपराष्ट्रपति का इस्तीफा: सत्ता संरचना के भीतर बढ़ते तनाव का संकेत

भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफा भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए एक अप्रत्याशित झटका है। संविधान की सबसे ऊँची व्यवस्थाओं में से एक व्यक्ति का इस तरह जाना केवल “स्वास्थ्य कारणों” का मामला नहीं हो सकता, खासकर तब, जब वे संसद के मानसून सत्र के पहले दिन सक्रिय भूमिका में देखे गए हों और उनके कार्यालय ने पूरे सप्ताह के सार्वजनिक कार्यक्रम घोषित किए हों।

यह इस्तीफा केवल व्यक्तिगत या स्वास्थ्य से जुड़ा मामला नहीं है — यह कार्यपालिका और संसद के बीच गहराते अंतर्विरोधों, और सत्तारूढ़ दल के भीतर की खींचतान का स्पष्ट संकेत है।

धनखड़ का विद्रोह: संविधान की व्याख्या को लेकर संघर्ष

उपराष्ट्रपति रहते हुए जगदीप धनखड़ का रवैया शुरू से ही विवादास्पद रहा है। वे बार-बार संसदीय सर्वोच्चता की बात करते रहे और उन्होंने न्यायपालिका की भूमिका व स्वायत्तता पर सवाल उठाए। खासकर जब उन्होंने संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों की वैधता पर सार्वजनिक बहस की वकालत की — यह न सिर्फ एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से असामान्य था, बल्कि सीधे उस संवैधानिक मूल्य संरचना को चुनौती देना था, जिस पर गणराज्य टिका है।

हाल के दिनों में दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया को लेकर उपराष्ट्रपति और सरकार के बीच विचार टकराव की स्थिति बनी। कहा जा रहा है कि जिस तरह से धनखड़ ने संसदीय नियमों और प्रक्रिया के तहत विपक्ष के प्रस्ताव को स्वीकार किया, वह सरकार की रणनीति के अनुकूल नहीं था।

यह सिर्फ इस्तीफा नहीं, एक चेतावनी है

धनखड़ का इस्तीफा संवैधानिक संस्थानों के बीच संतुलन के संकट की ओर इशारा करता है। उपराष्ट्रपति का पद केवल प्रतीकात्मक नहीं होता; वह राज्यसभा का सभापति भी होता है — और ऐसे में उनका निष्पक्ष होना अनिवार्य है।

पिछले तीन वर्षों में, विपक्ष द्वारा उन पर पक्षपातपूर्ण रवैये का आरोप लगाया गया। यहाँ तक कि उनके खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाया गया — भारतीय संसदीय इतिहास में यह एक असाधारण घटना थी। लेकिन हाल के सप्ताहों में उनके फैसले संकेत देते हैं कि उन्होंने एक संविधानवादी रुख अपनाना शुरू कर दिया था, जिसने उन्हें सत्ता के केंद्रीय प्रतिष्ठान से अलग कर दिया।

सरकारी दबाव या वैचारिक मतभेद?

यह स्पष्ट नहीं है कि धनखड़ ने इस्तीफा सरकारी दबाव में दिया या वे संवैधानिक विवेक के तहत सत्ता के किसी आंतरिक टकराव का शिकार हुए। लेकिन दोनों ही स्थितियाँ भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता के लिए चिंताजनक हैं।

उपराष्ट्रपति का अचानक हट जाना उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा लगता है, जिसमें संविधान की आत्मा के स्थान पर राजनीतिक लाभ का वर्चस्व स्थापित किया जा रहा है। यह घटनाक्रम केवल संसदीय राजनीति की बात नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद पर उठ रहे प्रश्न हैं।

क्या यह लोकतंत्र के गिरते तापमान की चेतावनी है?

धनखड़ का इस्तीफा सिर्फ एक व्यक्ति का व्यक्तिगत निर्णय नहीं है। यह उन शक्तियों के टकराव की अभिव्यक्ति है जो आज भारत के लोकतंत्र को नई दिशा देने की कोशिश कर रही हैं — किसी को मजबूत करने की तो किसी को कमजोर।

यदि लोकतंत्र में संस्थानों की भूमिका केवल सत्ता की सुविधा तक सीमित कर दी जाएगी, तो वह लोकतंत्र आंकड़ों में तो जीवित रहेगा, पर आत्मा से मृतप्राय हो जाएगा।




Denvapost Exclusive : आदिदेव की नाराजगी से अधिकारी का हुआ स्थानांतरण

भगवान शिव आदि देव हैं। इनकी महिमा का पार पाना संभव नही है, जिस प्राणी पर भोलेनाथ की कृपा हो जाए फिर उसके लिए जीवन में सुख शांति, वैभव की कोई कमी नहीं होती। वही माखन नगर में भी एक ऐसा वेयरहाउस भी जिसका नाम भी आदिदेव जिसकी कृपा किसी अधिकारी पर हो जाए फिर उसके लिए जीवन में सुख शांति, वैभव की कोई कमी नहीं होती और नाराजगी ट्रांसफर तक कर सकती हैं। ठीक ऐसा ही माखन नगर MPWLC प्रबंधक स्वेता पावर के साथ हुआ उन्होंने सपने भी नहीं सोचा था कि आदिदेव वेयरहाउस कि शिकायत उच्च अधिकारी करना इतना भारी पड़ेगा कि मात्र चार माह में ही विदाई तय हो जाएगी। ऐसा लग रहा है अब इस देश में ईमानदारी से काम करना कठिन होता जा रहा है।

सत्य के साथ खड़ा होने वाले अफसरों का सरकार भी कभी अपेक्षित साथ नहीं देती है। इन्हें समाज भी आदर या सुरक्षा देने के लिए तैयार नहीं है। यह स्थिति सच में अत्यंत ही गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण है। ईमानदार अफसरों को जीवन भर भटकना ही पड़ता है। उन्हें भ्रष्ट राजनेताओं और उच्चाधिकारियों द्वारा प्रमोशन से अकारण वंचित किया जाता है। साथ ही ट्रांसफर की तलवार तो उन पर हमेशा लटकी ही रहती है।

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MPWLC प्रबंधक का क्षेत्रीय कार्यालय ट्रांसफर

MPWLC के पत्र क्रमांक मप्र वेलाका/ स्था / 2025/ 2477 के अनुसार प्रशासकिय
कार्य सुविधा की दृष्टि आगामी आदेश तक अस्थाई स्थानांतरण क्षेत्रीय कार्यालय नर्मदापुरम स्वेता पवार प्रबंधक (गुणवत्ता निरीक्षण) एवं हेमंत कुमार चंदेल ( कनिष्क सहायक) को माखन नगर के लिए आदेश जारी किया गया है। अब देखना यह है कि श्याम लाल हौसले का जब स्थानांतरण हो गया था तो उन्हें धान एवं गेहूं उपार्जन के बाद रिलीव किया गया था। वही क्या स्वेता पवार भी मूंग उपार्जन तक रहेंगी या चली जाएगी।

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शिकायत करना भारी पड़ा

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 16 जुलाई 25 को स्वेता पवार द्वारा MPWLC के क्षेत्रीय प्रबंधक पत्र लिखकर अवगत कराया जाता है कि माखन नगर शाखा अंतर्गत मूंग उपार्जन केंद्रों एवं MPWLC के कर्मचारियों पर दबाव बनाया जा रहा है। पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया कि उपार्जन के शुरुआत से ही सेवा सहकारी समिति बहारपुर , आदि देव वेयरहाउस पर अमानक स्तर की मूंग की तुलाई की जा रही है एवं निगम कर्मचारियों द्वारा विरोध करने पर उन्हे धमकी दी जा रही है। वही गोदाम का वीडियो नहीं बनाने का दबाव बनाया जा रहा है और उन्हें जान से मारने की धमकी दी जा रही है। जिसके किसी भी निगम कर्मचारियों उपार्जन केंद्र पर जाने से मना कर दिया है। सूत्रों की माने तो करीब बारह कर्मचारियों ने आदि देव वेयरहाउस पर जाने से मना कर दिया है। आदि देव वेयरहाउस कि शिकायत उच्च अधिकारी करना इतना भारी पड़ा कि उनका स्थानांतरण नर्मदापुरम हो गया। वही यह भी चर्चा है कि चेतन वेयरहाउस पर अमानक मूंग पर ताला खोलने का दबाव बनाया जा रहा है जिसका खामियाजा स्वेता पवार को भुगतना पड़ा है।

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आदि देव वेयरहाउस के स्टेक की होगी जांच

सूत्रों से यह दावा किया जा रहा है कि जिला उपार्जन समिति द्वारा सेवा सहकारी समिति बहारपुर जो मूंग का उपार्जन आदि देव वेयरहाउस में किया गया है उन स्टेको में Non FAQ माल रखा जिसकी शुक्रवार को जांच होना है। जिसके लिए सर्वेयर सुपर वाइजर को निर्देश दे दिए गए हैं।

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Makhannagar News : राजनीतिक दबाव के आगे सरकारी अफसर नतमस्तक , कार्रवाई के नाम पर सिर्फ हिदायत

राजनीति के आगे नतमस्तक हुआ मूंग खरीदी का ये सिस्टम, जब अधिकारी अपराधियों से नहीं, सत्ता संरक्षण से हार जाता है। जहां चाहकर भी कोई कार्रवाई नहीं कर पाता है। ऐसा ही कुछ माखन नगर की एक मूंग खरीदी कर रही सोसायटी में देखनो को मिल रहा है। जहां व्यापारियों और नेताओं की अमानक मूंग राजनीतिक संरक्षण में धड़ल्ले से खरीदी जा रही है, वही किसान परेशान हो रहे हैं।

अमानक मूंग तोलने को लेकर MPWCL के कर्मचारी से विवाद

सोमवार को बहारपुर सोसायटी में अमानक मूंग को लेकर MPWCL के कर्मचारी से एक किसान का विवाद हो गया ऐसी जानकारी मिली। लेकिन सूत्रों के हवाले से पता चला कि वह किसान नहीं बल्कि एक कथा कथित नेता हैं जो सोसायटी संचालक और सर्वेयर से मिलकर अपनी मूंग तुलवा रहा था। जिसका MPWCL के कर्मचारी तेजराम यादव द्वारा विरोध किया गया। तो उसे धमकी दी गई , जिसकी शिकायत तेजराम यादव द्वारा शाखा प्रबंधक को की गई। वैसे कर्मचारी कुछ भी बताने ने मना कर दिया। लेकिन जानकारी के अनुसार अधिकारियों के पास घटना के वीडियो एवं फोटो होने के बाद कर्मचारी से किसान का नाम मांगा जा रहा था।

कार्रवाई के नाम पर सिर्फ हिदायत

शिकायत के जिले के कई अधिकारी आदिदेव वेयरहाउस पहुंचते हैं। लेकिन देखने को यह मिला कि कार्रवाई के नाम पर सिर्फ हिदायत दी गई। सिर्फ एफ ए क्यू मूंग ही खरीदी जाए। जबकि एक दिन पहले दो वेयरहाउस में टीम पहुंची थी तो सर्वेयर से आंखों के सामने मूंग एफ ए क्यू करवाई थी। लेकिन जहां विवाद हुआ वहां अधिकारियों द्वारा ऐसा क्यों नहीं किया गया। जबकि जब अमानक मूंग में छनना लगाया जा रहा था जब किसान वही मौजूद था लेकिन सामने नहीं आया। यह इसबात का प्रमाण है कि राजनीतिक दबाव के आगे सरकारी अफसर भी नतमस्तक नजर आ रहे हैं और इस सेंटर पर किसानों की कम, नेता और व्यापारियों की ज्यादा चल रही हैं।

खराब मूंग है तो स्टेक फिर से खुलेगा

देनवापोस्ट को नाफेड डी एम देवेंद्र यादव ने बताया कि जिस अमानक मूंग को लेकर विवाद हुआ है उसमें किसान को छनना लगाने को कहा गया है वही अगर उसका कुछ माल तुल कर स्टेक में रखा गया है तो स्टेक खोलकर छनना लगाने को कहा गया है। लेकिन मंगलवार को खरीदी बंद होने तक स्टेक खोला नहीं गया था। सूत्रों की माने तो आदिदेव वेयरहाउस में करीब पांच हजार क्विंटन मूंग की खरीदी हो गई हैं। वही स्टेक की जांच की जाए तो ओर अमानक मूंग मिल सकती हैं। इसबात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सभी सेंटरों पर शाम के समय अमानक मूंग तोली जा रही है लेकिन बहारपुर समिति में जिस तरह का खेल चल रहा है, वह अपने आप में एक उदाहरण है। वही मंगलवार शाम को भी अमानक मूंग खरीदी गई।

एक दिन अधिकारी पहले सर्वेयर FAQ कराते हुए

ख़बर में जो कहां वह सही अधिकारी ने स्वयं की ख़बर की पुष्टि

DENVAPOST ने मंगलवार को एक खबर लगाई थी। माखन नगर के एक मूंग खरीदी केंद्र को विशेष छूट दी गई है और अन्य केंद्रों पर नहीं। इस खबर को लेकर एक अधिकारी द्वारा देनवापोस्ट के पत्रकार से कहा गया कि हम सभी सेंटरों पर जा रहे हैं फिर आप ऐसी खबर कैसे लगा सकते हैं। पत्रकार ने अधिकारी से पूछा सर आपने खबर पढ़ी है, अधिकारी ने कहा कि पढ़ी हैं । हम अभी जिस केंद्र में खड़े हैं उसी के बारे आपने लिखा हम कल यहां आय थे। हम देनवापोस्ट चक्षु पाठकों बताना चाहेंगे कि अधिकारी ने यह कहकर स्वयं हमारी ख़बर की पुष्टि कर दी। वह यह भूल गए कि खबर में किसी वेयरहाउस या सोसायटी के नाम का जिक्र ही नहीं किया गया और उन्होंने बहारपुर सोसायटी एवं आदिदेव वेयरहाउस में खड़े होकर यह कह कर यह सिद्ध कर दिया जो देनवापोस्ट कहा था वह सही है।




Makhannagar News : सरकारी अनदेखी के कारण अतिक्रमण की भेंट चढ़ा सरकारी स्कूल

एक समय शिक्षा की अलख जगाने वाला माखन नगर क्षेत्र में स्थित पंजराखुर्द गांव का प्राथमिक विद्यालय आज अतिक्रमण की मार झेल रहा है। कभी यहां बच्चों की पढ़ाई-लिखाई गूंजती थी, वहां अब अपने निजी कार्यों के लिए कब्जा जमा लिया है। स्कूल भवन में अब गोबर के उपले बनाए जा रहे हैं, लकड़ियां जमा की जा रही हैं और अन्य घरेलू काम किए जा रहे हैं।कभी चार कमरों वाले इस मिडिल विद्यालय में बच्चों की कक्षाएं लगती थीं, लेकिन सरकार की अनदेखी और प्रशासन की उदासीनता के चलते यह अब अतिक्रमण के आगोश में समा चुका है। स्थानीय लोगों के अनुसार, स्कूल में नामांकन शून्य हैं । हालांकि, इसी गांव से करीब 30 बच्चे अन्य स्कूल में पढ़ने जाते हैं। लेकिन अब ये स्कूल महज एक खंडहर बनकर रह गया है, जिस पर ग्रामीणों ने कब्जा जमा लिया है।

गांव के लोगों का कहना है कि सरकारी संपत्ति पर अवैध कब्जा कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब बात शिक्षा से जुड़ी हो, तो प्रशासन को तुरंत कदम उठाने चाहिए। स्थानीय निवासियों ने मांग की है कि शिक्षा विभाग और प्रशासन इस मामले पर संज्ञान ले और स्कूल को फिर से दुरुस्त कर बच्चों के लिए उपयोगी बनाए।वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी है।जन शिक्षक चंद्रशेखर मोरे ने denvapost को बताया कि वरिष्ठ अधिकारियों को स्कूल में अतिक्रमण के बारे में अवगत करा दिया गया कि विगत आठ माह से स्कूल में अतिक्रमण हैं ।मामला मेरे संज्ञान में आया हैबीआरसी एस एस पटेल का कहना है कि मामला मेरे संज्ञान में आया है अतिक्रमण हटाने के लिए तहसीलदार से शिकायत की जाएगी।




Denvapost Exclusive : तहसीलदार के ड्राइवर ने कार्यालय में की तोड़फोड़ साहब बने रहे मूक दर्शक

माखन नगर : तहसील कार्यालय में तहसीलदार के ड्राइवर ने शराब पीकर कार्यालय में तहसीलदार के डेस्क पर चढ़कर तोड़फोड़ की, वही करीब 12 दिन बीत जाने के बाद भी तहसीलदार द्वारा इस मामले में कोई एफआईआर नहीं की गई।

मामला माखन नगर तहसील का जो आजकल सुर्खियों में है लोग खुलकर तो बात नहीं कर रहे लेकिन चर्चा का विषय बना हुआ हैं। कि तहसीलदार के ड्राइवर ने कार्यालय में हंगामा किया लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई आखिर क्यों ? सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यह घटना 19 मई 2025 दिन सोमवार करीब शाम 6 बजे की हैं। जब तहसील कार्यालय में तहसीलदार का ड्राइवर विनोद कनोजिया आकर कंप्यूटर ऑपरेटर भविष्य बड़गूजर से शराब के नशे में आकर पेंडिंग केसों की जानकारी मांगता है। इस पर ऑपरेटर ने कहा कि मैने साहब को जानकारी दे दी है , तुम साहब से बात करो।

इसके बाद ड्राइवर तहसीलदार के पास डेस्क पर पहुंचता है और नशे की हालत में साहब से बात करता है। तहसीलदार अनिल पटेल स्टॉप से इसे बाहर करने को कहते हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ड्राइवर बहस करते हुए डेस्क पर चढ़ जाता है तो तहसीलदार वहां से उठकर अपने केबिन में आ जाते हैं। उसके बाद ड्राइवर विनोद गुस्से में डेस्क की कुर्सी को लात मारकर गिरा देता है। कुछ कर्मचारी उसे रोकने की कोशिश करते हैं तो धक्का मुक्की में कार्यालय का कम्प्यूटर मॉनिटर भी टूट गया।

स्टॉप ने घटना को लेकर चुप्पी साधी

वही जब Denvapost ने घटना को लेकर स्टॉप से बात करनी चाही तो कर्मचारी गोल मोल जवाब देते नजर आए। वही जब उनसे यह कहां गया कि जब कुछ हुआ ही नहीं तो मॉनिटर कैसे टूटा इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं था।

सीसीटीवी बंद क्यों ?

वैसे तो तहसील कार्यालय में सी सी टीवी कैमरे लगे हुए हैं। लेकिन यह घटना तहसीलदार के डेस्क की है जहां पर कैमरा लगा तो हैं लेकिन वह बंद है। आखिर ऐसा क्यों ? वही अन्य सी सी टीवी कैमरे में ड्राइवर को कार्यालय में नशे में आते जाते हुए देखे जा सकता है।

कार्रवाई नहीं करना कोई मजबूरी तो नहीं

अब सवाल यह उठता है कि इस घटना के 12 दिन बाद भी एफ आई आर क्यों नहीं हुई ? क्या तहसीलदार के प्राइवेट ड्राइवर को इतनी छूट हैं कि वह कार्यालय आकर केस की जानकारी ले ? हो सकता है कि कर्मचारी एवं शाखा प्रमुख को यह मामला छोटा लगता हो लेकिन कोर्ट के डेस्क पर जहां नेता भी नहीं जा सकते हैं वहां पर एक मामूली सा ड्राइवर जाकर हंगामा कर देता है और अधिकारी द्वारा कार्रवाई नहीं करना यह संशय पैदा कर हैं कि अधिकारी द्वारा ड्राइवर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना कही कोई मजबूरी तो नहीं ।

उसे हटा दिया गया है

तहसीलदार अनिल पटेल ने denvapost को बताया कि घटना के बाद ड्राइवर को हटा दिया गया है। डेस्क पर जाकर उसने कुछ किया है इसका अभी कोई प्रमाण नहीं है न ही किसी ने शिकायत की है इस कारण एफ आई आर नहीं की गई है।




Narmadapuram News : किसानों को लगा 24 करोड़ का चूना किसी को खबर ही नहीं , एक क्विंटल पर 400 ग्राम अधिक गेहूं ले रही समिति !

550 ग्राम हैं बोरे का वजन, 580 ग्राम तक लेना उचित, गेहूं खरीदी केन्द्रों पर ठगे जा रहे हैं किसान। प्राप्त जानकारी के अनुसार अभी तक करीब 23 करोड़ 80 लाख का चूना किसानों को लग चुका हैं , अगर ऐसी चुप्पी जिम्मेदारों ने आगे भी साध रखी तो किसानों ओर नुकसान होना तय है।

कर्ज लेकर खेत में फसल लगाने के लिए बीज व उर्वरक की व्यवस्था करने। मौसम के विपरीत माहौल के बावजूद आंखों में ढेरों उम्मीद लिए खेत में हाड़-तोड़ मेहनत कर तैयार फसल की कटाई और मड़ाई कर जब किसान खरीदी केन्द्रों पर ले जा रहे हैं तो वहां मौजूद कर्मचारी उनसे बोरे के वजन के नाम पर एक क्विंटल पर करीब 400 ग्राम अधिक गेहूं की तौल करा रहा है। यदि किसान ने 100 क्विंटल गेहूं की तौल कराया तो उसे चार क्विंटल गेहूं केन्द्र को देना पड़ रहा है। यदि यह दृश्य देखना है तो माखन नगर के किसी भी केन्द्र पर चले आइए, यहां खुलेआम किसानों से अधिक गेहूं की तौल की जा रही है। हालांकि जिले के माखन नगर तहसील के केन्द्र एक बानगी मात्र है। ऐसा दृश्य सभी केन्द्रों पर देखने को मिल सकते हैं।

कर्ज से दबने और कठिन परिश्रम के बीच किए गए संघर्षों के बाद तैयार उपज को गेहूं और बोरे के निर्धारित वजन से अधिक लिए जाने से किसानों में आक्रोश है। किसान राजनारायण व पप्पू की माने तो उक्त के अलावा उनसे सैंपल के नाम से तीन से चार किलो अतिरिक्त गेहूं लिए जा रहे हैं। किसानों की माने तो अधिकांश केन्द्रों पर पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है। यहां सांगाखेड़ा खुर्द सोसायटी पर मिले गेहूं खरीदी केंद्र प्रभारी गिरवर सिंह ने बताया कि किसानों से 50.800 किग्रा लेने के लिए ऊपर से ही आदेश मिले हैं। उधर इस संबंध में किसान नेता उदय पांडे ने बताया कि किसी भी किसान से 400 ग्राम अधिक गेहूं तौलने का कोई आदेश नहीं है। लेकिन फिर भी किसानों से अधिक गेहूं लिया जा रहा है। वही सोसायटी किसानों से सैंपल के नाम तीन किलो गेहूं अलग से ले रही है। मैने इसकी शिकायत कई बार कर चुका हूं। लेकिन कोई अधिकारी कार्रवाई ही नहीं करना चाहते हैं और किसान लुट रहे हैं।

जिले में अभी तक 278394 लाख क्विंटल की खरीदी

अगर हम जिले की बात करे तो अब तक 278394 लाख क्विंटल की खरीदी 26791 किसानों से हो चुकी है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उक्त खरीदी केंद्रों पर कितने क्विंटल अधिक गेहूं किसानों से लिए गए हैं। खास है की केन्द्र पर बिकने वाले गेहूं का समर्थन मूल्य 2600 रुपए हैं। ऐसे में कितने रुपए के गेहूं समिति ने किसानों से अब तक लिए हैं। इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल नहीं है।




डॉ. बी.आर. अंबेडकर जयंती पर विशेष : सामाजिक न्याय के निर्माता

संविधान महज एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, यह जीवन का माध्यम है, और इसकी आत्मा हमेशा युग की आत्मा होती है”।

~डॉ. बी.आर. अंबेडकर

इस वर्ष 14 अप्रैल को उनकी 135वीं जयंती मनाई जा रही है, जो डॉ. भीम राव अंबेडकर के सम्मान में है। इसे ‘समानता दिवस’ के रूप में जाना जाता है और असमानता को खत्म करने के लिए उनकी प्रतिबद्धता को याद किया जाता है।

अंबेडकर ने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की वकालत की जिसमें किसी व्यक्ति का दर्जा उसकी योग्यता और उपलब्धियों के आधार पर निर्धारित किया जाता है, और कोई भी व्यक्ति अपने जन्म के कारण महान या अछूत नहीं होता। उन्होंने देश की सामाजिक रूप से दलित और आर्थिक रूप से शोषित आबादी के साथ तरजीही व्यवहार के लिए तर्क दिया। उनके योगदान बहुआयामी थे, जिनमें कानूनी सुधारों से लेकर सामाजिक सक्रियता और राजनीतिक नेतृत्व तक शामिल थे।

डॉ. अंबेडकर ने भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई , यह सुनिश्चित करते हुए कि समानता, न्याय और अधिकार के सिद्धांत इसके ढांचे में निहित हों। उन्होंने दलितों (जिन्हें पहले अछूत कहा जाता था) और अन्य उत्पीड़ित समूहों के अधिकारों की वकालत की , सामाजिक उत्थान के लिए शिक्षा और सशक्तिकरण को महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में महत्व दिया।

उनका प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
भीमराव रामजी अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महू (डॉ अंबेडकर नगर, मध्य प्रदेश) के कस्बे और सैन्य छावनी में हुआ था।   अंबेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में सेवारत रहे थे, और उनके पिता महू छावनी में ब्रिटिश भारतीय सेना के सदस्य थे।

स्कूल जाने के बावजूद, अंबेडकर और अन्य अछूत बच्चों को अलग रखा जाता था और शिक्षकों से उन्हें बहुत कम ध्यान या सहायता मिलती थी। उन्हें पानी या उसे ले जाने वाले बर्तन को छूने की अनुमति नहीं थी। यह कार्य आम तौर पर युवा अंबेडकर के लिए स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था, और यदि चपरासी उपलब्ध नहीं होता था, तो उन्हें बिना पानी के रहना पड़ता था; बाद में उन्होंने अपने कार्यों में इस परिस्थिति का वर्णन “कोई चपरासी नहीं, कोई पानी नहीं” के रूप में किया।

1897 में, अंबेडकर का परिवार मुंबई में स्थानांतरित हो गया, और वह एलफिंस्टन हाई स्कूल में एकमात्र अछूत छात्र थे । 1906 में, लगभग 15 वर्ष की आयु में, उन्होंने 9 वर्षीय लड़की रमाबाई से विवाह किया। अंबेडकर को 1913 में न्यूयॉर्क शहर में कोलंबिया विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए बड़ौदा राज्य छात्रवृत्ति मिली , जब वह 22 वर्ष के थे। अंबेडकर ने 1927 में कोलंबिया से अर्थशास्त्र में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की ।

सामाजिक न्याय पर डॉ. अंबेडकर के विचार
अंबेडकर का सामाजिक न्याय का दृष्टिकोण सभी मनुष्यों की स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे को बढ़ावा देता है । एक तर्कवादी और मानवतावादी के रूप में, उन्होंने धर्म की आड़ में मनुष्य द्वारा मनुष्य के किसी भी प्रकार के पाखंड, अन्याय या शोषण की निंदा की। उन्होंने सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों पर आधारित एक धर्म की वकालत की जिसे सभी समय, स्थानों और जातियों पर लागू किया जा सकता है। इसे तर्क का पालन करना चाहिए और स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।

उन्होंने जाति व्यवस्था को हिंदू धर्म की समस्याओं का मूल कारण माना। उनके अनुसार, वर्ण व्यवस्था सभी असमानताओं का प्राथमिक कारण है, साथ ही जाति और अस्पृश्यता का स्रोत भी है। अंबेडकर ने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की वकालत की जिसमें किसी व्यक्ति का दर्जा उसकी योग्यता और उपलब्धियों के आधार पर निर्धारित किया जाता है, और कोई भी व्यक्ति अपने जन्म के कारण महान या अछूत नहीं होता है।

उन्होंने देश के वंचित और आर्थिक रूप से शोषित नागरिकों के साथ तरजीही व्यवहार के लिए तर्क दिया। उनकी देखरेख में तैयार किए गए भारतीय संविधान में सभी निवासियों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सुनिश्चित करने वाले खंड हैं । इसमें कई ऐसे उपाय भी शामिल हैं जो विभिन्न उद्योगों में उत्पीड़ित लोगों के लिए तरजीही व्यवहार सुनिश्चित करते हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करने की घोषणा करता है।

संविधान सभा में संविधान को मंजूरी देने के लिए दिए गए अपने भाषण में अंबेडकर ने कहा था: “मैंने अपना काम पूरा कर लिया है; मेरी इच्छा है कि कल भी सूर्योदय हो। नए भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल गई है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता का सूरज उगना अभी बाकी है।”

सामाजिक न्याय के लिए डॉ. बी.आर. अंबेडकर के प्रयास
उन्होंने अपना जीवन भारत में सामाजिक न्याय और हाशिए पर पड़े समुदायों के सशक्तिकरण के लिए समर्पित कर दिया। सामाजिक न्याय के लिए उनके प्रयास परिवर्तनकारी थे और उन्होंने भारत में हाशिए पर पड़े समुदायों के सशक्तिकरण और मुक्ति की नींव रखी। उनकी विरासत दुनिया भर में समानता, सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए आंदोलनों को प्रेरित करती रहती है।

इस उद्देश्य की दिशा में उनके द्वारा किये गए कुछ प्रमुख प्रयास और योगदान इस प्रकार हैं:

अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान

अंबेडकर को साउथबोरोह समिति के समक्ष गवाही देने के लिए बुलाया गया था , जो भारत सरकार अधिनियम 1919 का मसौदा तैयार कर रही थी । इस सुनवाई के दौरान, उन्होंने अछूतों और अन्य धार्मिक समूहों के लिए पृथक निर्वाचिका और आरक्षण की वकालत की।
बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत करते हुए उन्होंने अछूतों को शिक्षित करने और उनके उत्थान का प्रयास किया। उनका पहला संगठित प्रयास केंद्रीय संस्था “बहिष्कृत हितकारिणी सभा” की स्थापना करना था, जिसका उद्देश्य शिक्षा, सामाजिक-आर्थिक प्रगति और “बहिष्कृत जातियों” के कल्याण को बढ़ावा देना था , जिन्हें उस समय दलित वर्ग के रूप में भी जाना जाता था।
उन्होंने दलित अधिकारों की वकालत करने के लिए मूक नायक, बहिष्कृत भारत और इक्वालिटी जनता सहित कई पत्रिकाओं की स्थापना की।

संविधान का प्रारूप तैयार करना

संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ. अम्बेडकर ने भारत के संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि संविधान में मौलिक अधिकार, अस्पृश्यता उन्मूलन और सामाजिक रूप से वंचित समूहों के उत्थान के लिए सकारात्मक कार्रवाई के प्रावधान शामिल हों।

मंदिर प्रवेश आंदोलन

अम्बेडकर ने दलितों को हिंदू मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए आंदोलनों का नेतृत्व किया, जो जाति-आधारित भेदभाव के कारण अक्सर उनके लिए वर्जित थे।
उनके प्रयासों का उद्देश्य पारंपरिक जातिगत पदानुक्रम को चुनौती देना और सामाजिक समानता को बढ़ावा देना था।
उन्होंने सैकड़ों अनुयायियों के साथ मनुस्मृति की प्रतियां जलाने का नेतृत्व किया । इस प्रकार, अंबेडकरवादी और दलित हर साल 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिवस (मनुस्मृति दहन दिवस) मनाते हैं।

श्रम अधिकार और आर्थिक सुधार

अम्बेडकर ने श्रम अधिकारों की वकालत की और हाशिए पर पड़े समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए आर्थिक सुधारों की वकालत की।
उन्होंने जाति आधारित असमानताओं को दूर करने के लिए भूमि सुधार और आर्थिक सशक्तिकरण की आवश्यकता पर बल दिया।

आरक्षण नीति

अम्बेडकर ने दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए प्रतिनिधित्व और अवसर सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण नीतियां शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों को अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से आरक्षण नीतियों के लिए डॉ. अंबेडकर की वकालत आज भी प्रासंगिक है। इन नीतियों का उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को कम करना और सामाजिक गतिशीलता के अवसर प्रदान करना था।

बौद्ध धर्म में धर्मांतरण

1956 में, अंबेडकर ने जाति व्यवस्था और हिंदू सामाजिक पदानुक्रम की प्रतीकात्मक अस्वीकृति के रूप में दलितों के बौद्ध धर्म में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का नेतृत्व किया।
इस आंदोलन ने सामाजिक समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रति उनके दृष्टिकोण को उजागर किया।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर की सामाजिक न्याय की अवधारणा समकालीन सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए एक आधारभूत ढांचा प्रदान करती है। उनके दृष्टिकोण को अपनाने से सभी व्यक्तियों के लिए समानता, सम्मान और सशक्तिकरण के प्रति प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि उनकी विरासत एक अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज की दिशा में प्रयासों का मार्गदर्शन करती रहे।




Narmadapuram News : डांडीवाड़ा पंचायत के सरपंच-सचिव को नोटिस: पेवर ब्लाक की राशी के गबन का आरोप

Highlight

* पंचायत के सरपंच-सचिव एवं ठेकेदार को नोटिस।

* पेवर ब्लॉक की करीब तीन लाख की राशी के गबन का आरोप ।

* जनपद सीईओ ने जवाब देने के लिए तीन दिन का दिया समय।

जनपद पंचायत केसला की ग्राम पंचायत डांडीवाड़ा में सरपंच श्रीमती लीला बाई उइके, सचिव बलदेव कावड़े एवं ठेकेदार सुनील सराठे द्वारा पेवर ब्लाक लगाने में फर्जीवाड़ा करने का मामला सामने आया है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत में 24 – 25 पेवर ब्लाक लगने थे। वही ठेकेदार द्वारा सारी राशी का आहरण कर लिया लेकिन आज तक कोई काम नहीं किया गया।

पंचायत पर तीन लाख 71 हजार रुपए गबन का आरोप

केसला जनपद सीईओ एससी अग्रवाल ने denvapost को बताया कि ग्राम पंचायत डांडीवाड़ा को वर्ष 2024-25 में पेवर ब्लाक लगाने के लिए पांचवें वित्त से 3 लाख 71 हजार 868 की राशी दी गई थी। जब 11 अप्रैल 25 को पंचायत का निरीक्षण किया गया तो मौके पर कोई काम नहीं किया गया है। इस मामले में डांडीवाड़ा ग्राम पंचायत के सरपंच लीलाबाई उइके , सचिव बलदेव कावड़े और ठेकेदार सुनील सराठे को नोटिस जारी कर तीन दिन में जवाब मांगा है। जब इस संबंध में denvapost टीम ने सरपंच-सचिव एवं ठेकेदार से संपर्क करना चाहा तो सरपंच-सचिव का मोबाइल बंद आ रहा है वहीं ठेकेदार के मोबाइल पर घंटी तो जा रही है, लेकिन मोबाइल उठाया ही नहीं।




जयंती पर विशेष : छायावाद युग का वह चमकता सितारा जो ‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से हुआ प्रसिद्ध

Makhanlal Chaturvedi 136th Birth Anniversary : स्वतंत्रता संग्राम के कालखंड में हर क्रांतिकारी ने मातृभूमि को स्वतंत्र कराने का यथाशक्ति परिश्रम किया। किसी ने अहिंसा तो किसी ने अपनी ओजस्वी वाणी और कलम काे हथियार बनाकर विदेशी सत्ता काे झुकाने का काम किया। इसी कालखंड के लोकप्रहरी और कवियों की श्रेणी में एक नाम आता है बहुमुखी प्रतिभा के धनी माखनलाल चतुर्वेदी का। जिनकी अनेकों कविताएं देश के कई वीर और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं। माखनलाल ने तत्कालीन वीरों की अभिलाषा को पुष्प की अभिलाषा के रूप में पिरोकर जन-जन तक पहुंचाया। …

‘…मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर तुम देना फेंक। मातृ-भूमि पर शीश चढाने, जिस पथ जावें वीर अनेक।’ माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित ये वो पंक्तियां हैं जिन्हें 18 फरवरी 1922 को लिखा गया था। अर्थात् लगभग आठ दशक पहले। उस समय देश में पहुंओर आजादी का नारा ही गूंज रहा था। इसी संघर्ष के दौरान कई बारे ऐसे क्षण भी आएं जब माखनलाल चतुर्वेदी को जेल जाना पड़ा। आज हम भारत माता के इन्हीं सपूत जयंती मना रहे हैं।

माखनलाल चतुर्वेदी का परिचय: देशभक्त कवि माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म चार अप्रैल 1889 को  बाबई, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। 15 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह हो गया था। 17 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने खंडवा में अध्यापन प्रारंभ कर दिया। इसी दौरान उनका संपर्क क्रांतिकारियों से हुआ था। माखनलाल जी के व्यक्तित्व के कई पहलू देखने को मिलते हैं। जैसे एक पत्रकार जिन्होंने प्रभा, कर्मवीर और प्रताप का संपादन किया, एक क्रांतिकारी जिन्होंने असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसी गतिविधियों में बढ़-चढ़ भाग लिया। हालांकि जनता को स्वतंत्रता दिलाने के इस मार्ग पर उन्हें कई बार अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा प्रताड़ित किया, लेकिन इसके बावजूद वे अडिग रहे। माखनलाल चतुर्वेदी का नाम छायावाद की उन शख्सियतों में से एक है जिनके कारण वह एक युग अमर हो गया। इनकी कई रचनाएं ऐसी भी हैं जहां उन्होंने प्रकृति के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है। माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य का कलेवर तथा रहस्यात्मक प्रेम उनकी आत्मा रही। इसीलिए उन्हें एक भारतीय आत्मा के नाम से भी जाना जाता है।

जब निभाई ‘प्रताप’ के संपादक की भूमिका: माखनलाल चतुर्वेदी ने साल 1913 में ‘प्रभा पत्रिका’ का संपादन किया। इसी समय ये स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए, जिनसे ये बेहद प्रभावित हुए। इन्होंने साल 1918 में प्रसिद्ध ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ नाटक की रचना की और 1919 में जबलपुर में ‘कर्मयुद्ध’ का प्रकाशन किया। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण 1921 में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, इसके बाद 1922 में ये रिहा हुए। साल 1924 में गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ्तारी के बाद इन्होंने प्रताप का संपादन किया।

ये हैं प्रमुख रचनाएं: 20वीं सदी की शुरुआत में माखनलाल ने काव्य लेखन शुरू किया था। हिमकिरीटिनी, हिम तरंगिनी, युग चरण, समर्पण, मरण ज्वार, माता, वेणु लो गूंजे धरा, ‘बीजुरी काजल आंज रही’ जैसी प्रमुख कृतियों सहित कई अन्य रचनाएं कीं। महान साहित्यकार माखनलाल चतुर्वेदी ने 30 जनवरी, 1968 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।

…तो इसलिए छोड़ दिया था सीएम का पद: कवयित्री महादेवी वर्मा अपने साथियों को इनका एक किस्सा बताती थीं कि स्वतंत्रता संग्राम के समय माखनलाल चतुर्वेदी को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए चुना गया था। सूचना मिलने के उपरांत इन्होंने कहा कि “शिक्षक और साहित्यकार बनने के बाद मुख्यमंत्री बना तो मेरी पदावनति होगी।” ये कहकर मुख्यमंत्री के पद को पंडित जी ने ठुकरा दिया था।

उपलब्धियां:
पत्रकार परिषद के अध्यक्ष (1929)
म.प्र.हिंदी साहित्य सम्मेलन (रायपुर अधिवेशन) के सभापति
भारत छोड़ो आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता (1942) सागर वि.वि. से डी.लिट् की मानद उपाधि
हिमकिरीटिनी रचना के लिए 1943 में देव पुरस्कार
पुष्प की अभिलाषा और अमर राष्ट्र जैसी ओजस्वी रचनाओं के लिए 1959 में डी.लिट्. की मानद उपाधि
1963 में पद्मभूषण
हिमतरंगिणी के लिये उन्हें 1955  में साहित्य अकादमी पुरस्कार