पंचायत का बड़ा कारनामा! बंद पड़े स्कूल की बना दी बाउंड्री वॉल

boundary-wall

माखननगर। माखननगर जनपद की ग्राम पंचायत मोहसा में सरकारी धन के दुरुपयोग और कागजी विकास के गंभीर आरोपों वाला एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जिस प्राथमिक शाला धमासा में इस वर्ष नामांकन शून्य है और शिक्षा विभाग द्वारा बंद करने की प्रक्रिया में है, उसी स्कूल के लिए अचानक बाउंड्री वॉल (boundary-wall) निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया।

यह मामला गंभीर इसलिए है क्योंकि—बाउंड्री वॉल (boundary-wall) के लिए करीब ₹3,04,000 की राशि 10 फरवरी 2025 को जारी हुई और सूत्रों के अनुसार राशि निकाल ली गई, लेकिन निर्माण लंबे समय तक नहीं कराया गया।

अब जब शिकायतें उच्च अधिकारियों तक पहुंच गईं, तब आनन-फानन में बंद पड़े स्कूल में निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया—मानो सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा हो।

“शासन का पैसा कैसे उड़ाया जाता है”—धमासा इसका जीवंत उदाहरण

ग्राम पंचायत मोहसा की प्राथमिक शाला धमासा पिछले कुछ वर्षों से नामांकन संकट से जूझ रही है। बीआरसी श्याम सिंह पटेल ने स्वयं स्वीकार किया कि—“स्कूल में इस वर्ष जीरो नामांकन है, इसलिए शाला बंद करने की प्रक्रिया चल रही है।”

जब स्कूल बंद हो रहा हो, तो बाउंड्री वॉल (boundary-wall) जैसे कार्य की न कोई जरूरत है और न ही कोई औचित्य।लेकिन इसके बावजूद लाखों की राशि स्वीकृत और जारी कर दी गई — यही सबसे बड़ा सवाल है।

सूत्र बताते हैं कि— 10 फरवरी 2025 को ₹3,04,000 की राशी जारी हुई। वही पंचायत ने राशि निकाल ली लेकिन जमीन पर निर्माण ही नहीं कराया। न ही कोई निरीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध थी,न ही साइट पर निर्माण की शुरूआत दिखाई दी।यह सीधे तौर पर शासन की राशि के दुरुपयोग की ओर इशारा करता है।

शिकायत होते ही “रातों-रात विकास” — यह किसे को बचाने की कोशिश?

गाँव में चर्चा है कि जैसे ही मामले की शिकायत अधिकारियों तक पहुंची, पंचायत पर दबाव बढ़ा। इसके बाद अचानक—मजदूर बुलाए गए,ईंट-बालू डाल दिया गया,काम तेजी से शुरू कर दिया गया और बंद पड़े स्कूल के चारों ओर बाउंड्री (boundary-wall)खड़ी करने की पूरी तैयारी हो गई।

ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय तक स्कूल में एक ईंट तक नहीं लगी थी।अब शिकायत सामने आते ही काम शुरू कर दिया गया है ताकि “कागज और जमीन” को मिलाया जा सके। यह “फर्जी निर्माण” को बाद में असली दिखाने का एक पैटर्न प्रतीत होता है, जो पंचायत स्तर पर आम हो चला है।

स्कूल बंद, बच्चे नहीं — फिर अचानक बाउंड्री (boundary-wall) की इतनी ज़रूरत क्यों?

जब स्कूल में न विद्यार्थी हैं,न शैक्षणिक गतिविधि,न क्लास चल रही हैं और बंद करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।तो शासन के 3 लाख रुपये बाउंड्री वॉल (boundary-wall) पर क्यों खर्च किए गए?

क्या बच्चों की सुरक्षा का हवाला देकर यह निर्माण (boundary-wall) उचित ठहराया जा सकता है? या फिर यह निर्माण सिर्फ इसलिए किया जा रहा है कि — “निकाली गई राशि का हिसाब कहीं तो दिखाना पड़े!”

यह प्रश्न अब जनपद प्रशासन के गले की फांस बन चुका है।

ग्रामीणों का आरोप—“तीन लाख कागज में साफ हो गए, अब दिखावा किया जा रहा है” गाँव मोहसा और धमासा के ग्रामीण इस कार्य को लेकर अत्यंत नाराज़ हैं।

उन्होंने देवऩ्वापोस्ट से कहा—पैसा कब आया, कब निकला किसी को पता नहीं। स्कूल बंद पड़ा है, पर बाउंड्री (boundary-wall) बन रही है — किसका हित है इसमें? यह शासन की राशि का खुला दुरुपयोग है। शिकायत की गई तो काम कर रहे हैं, वरना कोई निर्माण नहीं होता।

स्थानीय लोगों का मानना है कि यह पूरा मामला एक बड़े घोटाले की तरफ इशारा कर रहा है। इस पूरे प्रकरण पर जनपद सीईओ से संपर्क किया गया, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी।

जांच की दिशा पर भी संशय — क्या ‘समाधान’ पहले से तय कर लिया गया है?

सूत्रों का दावा है कि पंचायत स्तर पर यह प्रयास भी हो रहा है कि किसी तरह कागजों में सब कुछ सही साबित किया जाए।अगर जल्दबाज़ी में निर्माण पूरा कर दिया गया,तो जांच अधिकारी को यही दिखाया जाएगा कि—boundary-wall निर्माण कार्य तो चल रहा था, राशि का उपयोग सही जगह हुआ है।यानी शिकायत को निरस्त करने का पूरा तंत्र सक्रिय हो चुका है।यह स्थिति पंचायत प्रशासन की पारदर्शिता पर गंभीर चोट करती है।

बड़ा सवाल — सरकार के विकास कार्यों में जनता का पैसा सुरक्षित है या नहीं?

प्राथमिक शाला धमासा का मामला सिर्फ एक स्कूल का मामला नहीं है।
यह उन सैकड़ों पंचायतों का उदाहरण है जहाँ—पैसे जारी होते हैं, राशी निकल जाती है,निर्माण नहीं होता और शिकायत आने पर फर्जी कार्य शुरू कर दिया जाता है।

यह घटना बताती है कि सिस्टम की निगरानी व्यवस्था कितनी कमजोर है।यदि किसी ग्रामीण ने शिकायत न की होती, तो यह मामला शायद कभी सामने नहीं आता।

क्या होगी कार्रवाई? क्या जिम्मेदारों पर गिरेगी गाज?

इस मामले की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, क्योंकि सवाल सिर्फ तीन लाख रुपये का नहीं है— यह सवाल है कि ग्राम पंचायतों में विकास के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं।अगर इस मामले में दोषी बच जाते हैं, तो यह आने वाले समय में और बड़े घोटालों को खुली छूट देने जैसा होगा।

यह मामला गांव की सच्चाई और शासन की नीयत दोनों पर प्रश्नचिह्न है

बंद स्कूल में लाखों रुपये की बाउंड्री वॉल निर्माण की यह ‘तत्काल पहल’वास्तव में वर्षों से चली आ रही लापरवाही और वित्तीय अनियमितता का परिणाम है।

धमासा की यह बाउंड्री वॉल केवल एक दीवार नहीं—
यह भ्रष्टाचार की दीवार है,जिसके नीचे शासन की योजनाएं, शिक्षा की गुणवत्ता और प्रशासन की जवाबदेही दब गई है।

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