ई-ऑफिस प्रणाली के सफल क्रियान्वयन में नर्मदापुरम जिला प्रदेश में द्वितीय स्थान पर

नर्मदापुरम | प्रदेश में शासकीय कार्यालयों में ई-ऑफिस प्रणाली को लागू करने और उसके प्रभावी क्रियान्वयन के क्षेत्र में नर्मदापुरम जिले ने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। इस नवाचारपूर्ण पहल के तहत नर्मदापुरम जिला प्रदेश स्तर पर द्वितीय स्थान पर रहा है।

जिला सूचना अधिकारी श्री मनीष गुणवान द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, जिले में अब तक 21,882 से अधिक ई-फाइलों का सृजन किया जा चुका है, जबकि 1,12,359 से अधिक ई-फाइलों का आदान-प्रदान विभिन्न प्रमुख शासकीय कार्यालयों के बीच किया गया है। इसके अतिरिक्त 51,629 ई-रिसिप्ट सृजित किए गए हैं तथा 3,33,568 ई-रिसिप्ट का आदान-प्रदान किया जा चुका है।

ई-ऑफिस प्रणाली के अंतर्गत वर्तमान में जिले के 51 शासकीय कार्यालय पूर्ण रूप से ऑनबोर्ड हो चुके हैं। साथ ही 22 विकासखंड स्तरीय कार्यालय एवं कलेक्टर कार्यालय के 38 अनुभाग भी इस प्रणाली से जोड़े गए हैं। इस प्रकार कुल 111 यूनिट को ई-ऑफिस प्लेटफॉर्म पर ऑनबोर्ड किया गया है। वहीं, 1061 अधिकारी-कर्मचारियों को ई-ऑफिस प्रणाली में पंजीकृत किया गया है।

उल्लेखनीय है कि कलेक्टर सोनिया मीना के निर्देशानुसार जिले के समस्त प्रमुख शासकीय कार्यालयों का संचालन ई-ऑफिस प्रणाली के माध्यम से किया जा रहा है। अब जिले की तहसीलों, अनुविभागीय कार्यालयों एवं जनपद पंचायत कार्यालयों में भी कार्यालयीन कार्य पूरी तरह ई-ऑफिस प्रणाली से संपादित हो रहे हैं।

ई-ऑफिस प्रणाली के क्रियान्वयन से कार्यालयीन कार्यों में पारदर्शिता, त्वरित निर्णय प्रक्रिया एवं कार्यकुशलता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे शासन की योजनाओं एवं जनकल्याणकारी कार्यक्रमों का तेज, प्रभावी और जवाबदेह क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सका है।

जिले की यह उपलब्धि डिजिटल गवर्नेंस की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।




Holashtak 2026: 24 फरवरी से लगेंगे होलाष्टक, जानें होली की तारीख और क्या करें–क्या न करें

फाल्गुन का महीना 2 फरवरी 2026 से शुरू हो जाएगा। इस महीने में पड़ने वाले महाशिवरात्रि और होली का लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता है। खासतौर पर होली से पहले आने वाले होलाष्टक के आठ दिन धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस अवधि में शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं और विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

होलाष्टक 2026 में कब से होंगे शुरू

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से होलाष्टक प्रारंभ होते हैं और पूर्णिमा तिथि यानी होलिका दहन तक रहते हैं।
साल 2026 में होलाष्टक 24 फरवरी से शुरू होकर 3 मार्च 2026 को होलिका दहन के साथ समाप्त होंगे।

बसंत पंचमी से ही होली की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन से लेकर होली तक बाबा महाकाल को गुलाल अर्पित किया जाता है। कई स्थानों पर इसी दिन होली का डंडा गाड़ने की परंपरा भी निभाई जाती है।

क्या है होलाष्टक का धार्मिक महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार राक्षसराज हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानता था और भगवान विष्णु के परम भक्त अपने पुत्र प्रह्लाद को अपने अधीन करना चाहता था। उसने प्रह्लाद को आठ दिनों तक घोर यातनाएं दीं। इन्हीं आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। मान्यता है कि इस दौरान नकारात्मक शक्तियां अधिक सक्रिय रहती हैं।

होलाष्टक में क्या नहीं करना चाहिए

शास्त्रों में होलाष्टक के दौरान 16 संस्कारों को करने की मनाही बताई गई है। इनमें शामिल हैं:

  • नामकरण संस्कार
  • जनेऊ संस्कार
  • गृह प्रवेश
  • विवाह संस्कार

इसके अलावा इस अवधि में हवन, यज्ञ और अन्य मांगलिक कार्य भी नहीं किए जाते। शास्त्रों के अनुसार जिन कन्याओं का विवाह हाल ही में हुआ हो, उन्हें इस दौरान मायके में रहने की परंपरा है।

होलाष्टक में बरतें विशेष सावधानी

मान्यता है कि होलाष्टक के दौरान नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव अधिक रहता है। इसलिए इस समय

  • किसी अनजान व्यक्ति से कोई चीज न लें और न खाएं
  • मानसिक और शारीरिक रूप से संयम बनाए रखें

होलिका दहन और होली 2026 की तिथि

  • होलिका दहन: 3 मार्च 2026
  • रंगों वाली होली: 4 मार्च 2026

होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शाम 6:22 बजे से रात 8:50 बजे तक रहेगा।

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि denvapost.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.




नर्मदा परिक्रमा: आस्था, आत्मशुद्धि और भारतीय जीवन-दर्शन की जीवंत यात्रा

भारत की पवित्र नदियों में नर्मदा का स्थान विशिष्ट है। गंगा जहाँ मोक्षदायिनी मानी जाती हैं, वहीं नर्मदा को स्वयं शिवस्वरूपा कहा गया है। नर्मदा परिक्रमा केवल नदी की यात्रा नहीं, बल्कि यह मन, विचार और जीवन के परिष्कार की साधना है। यह परिक्रमा व्यक्ति को भौतिकता से निकालकर प्रकृति, समाज और स्वयं से जोड़ती है।

नर्मदा: एक नदी नहीं, जीवंत देवी

पुराणों के अनुसार नर्मदा का अवतरण भगवान शिव के पसीने से हुआ माना जाता है। स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण और वायु पुराण में नर्मदा की महिमा का विस्तार से वर्णन है। मान्यता है कि नर्मदा के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है, और उसके जल के स्पर्श से आत्मा पवित्र होती है।

इसी कारण नर्मदा को रेवा, शंकरजा और महानदी भी कहा जाता है।

परिक्रमा की परंपरा और नियम

नर्मदा परिक्रमा लगभग 2600 किलोमीटर की पैदल यात्रा है, जो अमरकंटक से आरंभ होकर अरब सागर तक जाती है और पुनः अमरकंटक लौटती है। परिक्रमा का मूल नियम है—

  • नर्मदा को सदैव दाईं ओर रखना
  • नदी को पार न करना
  • पैदल यात्रा करना
  • संयम, सात्त्विक आहार और सेवा भाव रखना

यह नियम परिक्रमा को एक साधारण यात्रा से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक अनुशासन बना देते हैं।

आत्मशुद्धि और जीवन परिवर्तन की साधना

नर्मदा परिक्रमा को तपस्या कहा गया है। महीनों और वर्षों तक चलने वाली यह यात्रा व्यक्ति को—

  • धैर्य
  • सहनशीलता
  • त्याग
  • और आत्मनिरीक्षण
    सिखाती है।

परिक्रमा के दौरान व्यक्ति समाज के हर वर्ग से मिलता है—आदिवासी, किसान, संत, गृहस्थ—और जीवन को नए दृष्टिकोण से समझता है। यही कारण है कि कहा जाता है—
“नर्मदा परिक्रमा मनुष्य को बाहर नहीं, भीतर से बदलती है।”

सामाजिक समरसता की मिसाल

नर्मदा परिक्रमा भारतीय सामाजिक एकता का अनूठा उदाहरण है। मार्ग में बसे गाँवों के लोग बिना किसी भेदभाव के परिक्रमावासियों को—

  • भोजन
  • विश्राम
  • और सहयोग
    प्रदान करते हैं।

यह परंपरा आज भी जीवित है और बताती है कि भारतीय संस्कृति सेवा और सह-अस्तित्व पर आधारित है।

पर्यावरण चेतना की धरोहर

नर्मदा परिक्रमा प्रकृति के साथ सहजीवन का पाठ पढ़ाती है। परिक्रमावासी जंगलों, घाटों, पहाड़ियों और खेतों से गुजरते हुए यह अनुभव करते हैं कि—

  • नदी केवल जलधारा नहीं
  • बल्कि जीवन का आधार है

आज जब नर्मदा प्रदूषण, अवैध खनन और अतिक्रमण से जूझ रही है, तब परिक्रमा हमें नदी संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का संदेश देती है।

नर्मदा और मध्यप्रदेश की पहचान

नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवनरेखा है। अमरकंटक, मंडला, जबलपुर, नर्मदापुरम, ओंकारेश्वर, महेश्वर जैसे तीर्थ न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र हैं। नर्मदा परिक्रमा इन सभी स्थलों को एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरोती है।

आधुनिक युग में नर्मदा परिक्रमा का संदेश

आज के भागदौड़ भरे, उपभोक्तावादी जीवन में नर्मदा परिक्रमा हमें—

  • धीमे चलने
  • कम में जीने
  • और प्रकृति के साथ संतुलन बनाने
    का संदेश देती है।

यह यात्रा सिखाती है कि विकास का अर्थ केवल निर्माण नहीं, संरक्षण और संवेदना भी है।

नर्मदा परिक्रमा एक धार्मिक अनुष्ठान से कहीं आगे है। यह भारतीय जीवन दर्शन की चलती-फिरती पाठशाला है, जहाँ आस्था, पर्यावरण, समाज और आत्मा—सब एक साथ चलते हैं।

जब तक नर्मदा बहती रहेगी, तब तक परिक्रमा की यह परंपरा हमें याद दिलाती रहेगी कि— नदी को बचाना, जीवन को बचाना है।