नई दिल्ली। देश में छात्रों की आत्महत्याओं से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को नौ अहम निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने माना है कि उच्च शिक्षा के निजीकरण और तेज़ विस्तार के बावजूद गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है, जिसके चलते छात्र वित्तीय, सामाजिक, शैक्षणिक और सामाजिक अन्याय से जुड़ी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं।संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्रों की भलाई अब केवल नीतिगत मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। कोर्ट के नौ निर्देशों में से सात उच्च शिक्षा संस्थानों (HEI) में छात्र आत्महत्याओं से संबंधित रिकॉर्ड रखने, उनकी अनिवार्य रिपोर्टिंग और निगरानी प्रणाली विकसित करने से जुड़े हैं। अदालत का उद्देश्य है कि छात्र संकट के मामलों को छिपाया न जाए और समय रहते हस्तक्षेप किया जा सके।
फैकल्टी और प्रशासनिक रिक्तियों पर अदालत की चिंताकोर्ट के शेष दो निर्देशों में विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों में रजिस्ट्रार और वाइस-चांसलर जैसे शीर्ष पदों के साथ-साथ सभी खाली फैकल्टी पदों को तत्काल भरने के आदेश दिए गए हैं। अदालत ने साफ कहा कि बिना पर्याप्त शिक्षकों और मजबूत प्रशासनिक ढांचे के छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक गुणवत्ता को सुरक्षित नहीं किया जा सकता।देशभर में 50% तक खाली पद
ज़मीनी रिपोर्टिंग के अनुसार, देश के कई सरकारी विश्वविद्यालयों और HEI में 50 प्रतिशत तक फैकल्टी पद रिक्त हैं। यह स्थिति विशेष रूप से सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में चिंताजनक है, जहां सीमित संसाधनों में बड़ी छात्र आबादी को संभालना पड़ता है।मद्रास विश्वविद्यालय: एक केस स्टडी
तमिलनाडु का मद्रास विश्वविद्यालय इस संकट की एक अहम मिसाल है। राज्य, जो उच्च शिक्षा नामांकन और महिला शिक्षा में अग्रणी माना जाता है, वहीं इसका प्रमुख राज्य-प्रशासित विश्वविद्यालय आज गंभीर गिरावट का सामना कर रहा है। कभी गुणवत्तापूर्ण शोध और अकादमिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध रहा यह विश्वविद्यालय अब मुख्यतः संबद्ध कॉलेजों की परीक्षाएं आयोजित करने तक सीमित होता जा रहा है।पिछले एक दशक में विश्वविद्यालय में नई फैकल्टी नियुक्तियां लगभग ठप हैं और शिक्षण स्टाफ स्वीकृत पदों के आधे से भी कम रह गया है। दर्शनशास्त्र, वनस्पति विज्ञान और गणित जैसे विषयों में उन्नत अध्ययन केंद्र अपनी पूर्व प्रतिष्ठा खो चुके हैं। तमिलनाडु-केंद्रित मानविकी, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान शोध, जिससे राज्य सरकार नीतिगत लाभ उठा सकती थी, लगभग उपेक्षित हो गया है।
वाइस-चांसलर नियुक्ति में संवैधानिक उलझन
विश्वविद्यालयों में वाइस-चांसलर की नियुक्तियां राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकराव के कारण अटकी हुई हैं। राज्यपाल की शक्तियों से जुड़े राष्ट्रपति संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा पैदा की गई अस्पष्टता को दूर करना आवश्यक माना जा रहा है, ताकि प्रशासनिक रिक्तियों को शीघ्र भरा जा सके।भर्ती प्रक्रिया और गुणवत्ता की चुनौती
फैकल्टी पदों को भरने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है, जिसमें कम से कम छह महीने का समय और पर्याप्त बजटीय समर्थन चाहिए। इसमें केंद्र सरकार की सहायता महत्वपूर्ण हो सकती है। साथ ही, योग्य शिक्षकों की उपलब्धता, भ्रष्टाचार और राजनीतिक-वैचारिक नियुक्तियों जैसी समस्याएं भी गुणवत्ता को प्रभावित कर रही हैं।चार महीने की समयसीमा, पर स्पष्ट संदेश
हालांकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई चार महीने की समयसीमा को लागू करना व्यवहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन यह आदेश सार्वजनिक उच्च शिक्षा प्रणाली की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक स्पष्ट चेतावनी और आह्वान है। अदालत ने संकेत दिया है कि यदि देश को ‘विकसित भारत’ जैसे लक्ष्यों को गंभीरता से हासिल करना है, तो मजबूत, जवाबदेह और छात्र-केंद्रित सार्वजनिक उच्च शिक्षा व्यवस्था अनिवार्य है।