
अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप का नाम आते ही सबसे पहले आक्रामक राष्ट्रवाद, संरक्षणवाद और टैरिफ युद्ध की छवि उभरती है। ट्रंप द्वारा आयातित वस्तुओं पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ बढ़ाने की धमकी या नीति केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह वैश्विक कूटनीति और मित्र देशों के साथ संबंधों की असलियत को उजागर करती है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह रवैया भारत जैसे रणनीतिक साझेदार देश के लिए वास्तव में “दोस्ताना” कहा जा सकता है?
टैरिफ: व्यापार नीति या दबाव की रणनीति?
टैरिफ किसी भी देश का वैध आर्थिक उपकरण हो सकता है, लेकिन जब इसकी दरें असामान्य और दंडात्मक स्तर तक पहुँचा दी जाएँ, तब यह व्यापार नीति नहीं बल्कि दबाव की रणनीति बन जाती है। ट्रंप प्रशासन के दौरान “अमेरिका फर्स्ट” के नाम पर जिस तरह स्टील, एल्यूमिनियम, दवाइयों और आईटी सेवाओं पर सख्त रुख अपनाया गया, उसने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में कड़वाहट पैदा की।
भारत को एक ओर रणनीतिक साझेदार बताया गया, वहीं दूसरी ओर भारतीय उत्पादों और वीज़ा नीतियों पर कठोर फैसले लिए गए। 500% टैरिफ जैसी नीति मित्रता से अधिक आर्थिक धमकी का संकेत देती है।
रणनीतिक मित्रता बनाम आर्थिक स्वार्थ
भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, इंडो-पैसिफिक रणनीति और चीन के प्रभाव को संतुलित करने जैसे साझा हित हैं। लेकिन ट्रंप की नीति यह स्पष्ट करती है कि उनके लिए रणनीतिक मित्रता भी तब तक ही मायने रखती है, जब तक वह अमेरिकी आर्थिक हितों के अधीन हो।
यह दोहरा रवैया सवाल खड़ा करता है।
क्या अमेरिका भारत को समान भागीदार मानता है, या केवल उपयोगी सहयोगी?
भारत पर संभावित प्रभाव
500% टैरिफ का सीधा असर भारतीय निर्यात, लघु उद्योगों और रोजगार पर पड़ सकता है। फार्मा, स्टील, टेक्सटाइल और आईटी जैसे क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। ऐसे कठोर शुल्क भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाज़ार से बाहर करने का प्रयास भी हो सकते हैं।
इसके साथ ही यह संदेश भी जाता है कि वैश्विक व्यापार नियमों और WTO जैसे संस्थानों की परवाह किए बिना अमेरिका अपनी शर्तें थोप सकता है।
क्या भारत को पुनर्विचार करना चाहिए?
भारत को अमेरिका के साथ संबंधों में भावनात्मक मित्रता के बजाय यथार्थवादी कूटनीति अपनाने की आवश्यकता है। आत्मनिर्भर भारत, वैकल्पिक बाज़ारों की तलाश और बहुपक्षीय व्यापार समझौतों को मजबूत करना समय की मांग है।
भारत को यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं।
एक्सपर्ट व्यू : डोनाल्ड ट्रंप का 500% टैरिफ बढ़ाने जैसा कदम भारत के प्रति किसी भी तरह से दोस्ताना रवैये का प्रतीक नहीं है। यह स्पष्ट रूप से बताता है कि जब बात अमेरिकी हितों की आती है, तो मित्रता, साझेदारी और कूटनीति सब पीछे छूट जाते हैं।
भारत के लिए यह एक चेतावनी भी है और अवसर भी—
चेतावनी इसलिए कि अंधी रणनीतिक मित्रता खतरनाक हो सकती है,
और अवसर इसलिए कि भारत अपने आर्थिक और कूटनीतिक आत्मविश्वास को और मजबूत कर सकता है।