
श्योपुर (मध्य प्रदेश): जिले के बड़ौदा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले चंद्रपुरा गांव में शनिवार को उस समय हंगामा खड़ा हो गया, जब स्वास्थ्य विभाग की टीम निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा दे रहे एक आयुर्वेदिक डॉक्टर (ayurvedic-doctor) के क्लिनिक को सील करने पहुंची।
टीम में ड्रग इंस्पेक्टर मनीष कुशवाह, नायब तहसीलदार सुरेश राठौर समेत अन्य अधिकारी शामिल थे। जैसे ही ग्रामीणों को इस कार्रवाई की जानकारी मिली, सैकड़ों ग्रामीण मौके पर एकत्र हो गए और टीम को घेर लिया। स्थिति बिगड़ते देख एसडीएम गगन मीणा, थाना प्रभारी सत्यम गुर्जर और पुलिस बल को मौके पर बुलाया गया।
हालांकि, पुलिस की सुरक्षा में ड्रग इंस्पेक्टर ने क्लिनिक को सील करने की कार्रवाई पूरी की, लेकिन इसके बाद ग्रामीणों में भारी नाराजगी फैल गई। लोगों का कहना है कि प्रशासन ने ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की है, जो बीते 30 वर्षों से 12 गांवों के लोगों को मुफ्त इलाज दे रहा था।
ग्रामीणों का समर्थन — “डॉक्टर साहब हमारी जान बचाते हैं”
ग्रामीणों के अनुसार, यह आयुर्वेदिक डॉक्टर (ayurvedic-doctor) बिना किसी फीस के इलाज करते हैं। यदि किसी गरीब के पास दवा या इलाज के पैसे नहीं होते, तो वे निःशुल्क दवा देते हैं और कई बार अपने वाहन से मरीज को जिला अस्पताल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उठाते हैं।
गांव के निवासी पवन नागर ने कहा — “हमारे डॉक्टर (ayurvedic-doctor) दिन-रात सेवा में लगे रहते हैं। कोरोना काल में जब सरकारी अस्पताल बंद जैसे थे, तब भी ये मरीजों को देखते रहे। किसी गरीब से पैसे नहीं लेते। अब प्रशासन ने उनकी क्लीनिक सील कर दी है, यह पूरे गांव के साथ अन्याय है।”
एक अन्य ग्रामीण नरेंद्र नगर ने कहा — “हमने देखा कि प्रशासन डॉक्टर (ayurvedic-doctor) साहब के खिलाफ कार्रवाई कर रहा था। हमें बहुत दुख हुआ। इतने सालों से उन्होंने किसी की जान नहीं ली, बल्कि जानें बचाई हैं। अब अगर कोई बीमार हुआ तो इलाज कौन करेगा?”
ग्रामीणों ने कहा कि अगर इस डॉक्टर (ayurvedic-doctor)की क्लीनिक बंद रही तो 12 गांवों के मरीजों को इलाज के लिए 30–40 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल तक जाना पड़ेगा। कई गांवों में न तो एम्बुलेंस की व्यवस्था है और न ही नियमित सरकारी डॉक्टर बैठते हैं।
ड्रग इंस्पेक्टर की कार्रवाई और ग्रामीणों की नाराजगी
ड्रग इंस्पेक्टर मनीष कुशवाह और टीम ने बताया कि क्लीनिक पर लाइसेंस और औषधि पंजीयन संबंधी कागजात नहीं मिले, इसलिए कार्रवाई की गई। वहीं ग्रामीणों ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि क्लीनिक पर कोई ट्रेंक्विलाइज़र या एलोपैथिक दवाएं नहीं मिलीं, सिर्फ आयुर्वेदिक दवाओं से इलाज होता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई करने में असफल रहा है, जबकि जो लोग निःस्वार्थ भाव से इलाज कर रहे हैं, उन्हीं को निशाना बनाया जा रहा है।
सुग्रीव बेरवा, जो मौके पर मौजूद थे, ने कहा —“मैं खुद इलाज कराने आया था। डॉक्टर (ayurvedic-doctor)साहब ने कई बार मेरी और मेरे परिवार की जान बचाई। अब प्रशासन ने क्लीनिक सील कर दी है। रात में अगर कोई बीमार पड़ जाए तो हम कहां जाएं? जिला अस्पताल में तो डॉक्टर मरीज को देखते ही नहीं।”
ग्रामीणों का आरोप: झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
ग्रामीणों ने प्रशासन पर पक्षपातपूर्ण कार्रवाई करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि जिले में कई झोलाछाप डॉक्टर खुलेआम क्लिनिक चला रहे हैं, लेकिन प्रशासन उन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करता।
ग्रामीणों ने उदाहरण देते हुए कहा कि बड़ौदा कस्बे में एक बंगाली डॉक्टर “56 सिंह पोद्दार” बिना किसी मान्यता या डिग्री के वर्षों से इलाज कर रहा है। कई बार उसकी दुकान सील हुई, परंतु राजनीतिक संरक्षण के कारण वह फिर से क्लिनिक खोल लेता है। वहीं, जो डॉक्टर गांवों में निःशुल्क सेवा कर रहे हैं, उन्हें टारगेट किया जा रहा है।
एक ग्रामीण ने कहा — “अगर प्रशासन को झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई करनी है, तो पहले उन लोगों पर करे जो बिना योग्यता के ऑपरेशन तक कर रहे हैं। हमारे डॉक्टर ने तो कभी किसी की जान नहीं ली, बल्कि लोगों की सेवा की है।”
30 सालों से आयुर्वेद(ayurvedic-doctor) से इलाज, कोई शिकायत नहीं
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि यह डॉक्टर तीन दशक से अधिक समय से आयुर्वेदिक चिकित्सा के माध्यम से लोगों का उपचार कर रहे हैं।
- अब तक कोई मरीज की मौत या गलत इलाज की शिकायत दर्ज नहीं हुई।
- कोरोना काल में डॉक्टर ने सैकड़ों ग्रामीणों की जान बचाई, जब सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं ठप थीं।
- कई ग्रामीण आज भी उनके द्वारा दी गई जड़ी-बूटी और काढ़ा चिकित्सा पर विश्वास करते हैं।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन ने कार्रवाई वापस नहीं ली तो वे कलेक्टर कार्यालय के सामने धरना देंगे और आयुर्वेदिक डॉक्टर (ayurvedic-doctor) को न्याय दिलाने की लड़ाई जारी रखेंगे।
प्रशासन की कार्रवाई से स्वास्थ्य संकट गहराया
क्लीनिक सील होने के बाद से 12 गांवों के मरीजों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है।
रात में किसी के बीमार पड़ने पर अब कोई चिकित्सा सुविधा नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर इलाज न मिलने से किसी की जान जाती है, तो उसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।पवन नागर ने कहा —“रात के समय जब कोई बीमार होता है, सरकारी डॉक्टर मिलते नहीं। ऐसे में हमारे डॉक्टर (ayurvedic-doctor)साहब ही आते थे। अब अगर क्लीनिक बंद हो गई, तो लोगों की जान पर बन आएगी।”
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल
इस घटना ने श्योपुर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी डॉक्टरों की भारी कमी है।
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नियमित रूप से नहीं बैठते।
- कई जगह एम्बुलेंस सेवा भी ठप है।
- मरीजों को इलाज के लिए 25–40 किमी दूर शहर तक जाना पड़ता है।
ऐसे में जब कोई डॉक्टर (ayurvedic-doctor)स्वेच्छा से आयुर्वेदिक इलाज कर रहा हो और ग्रामीणों को राहत दे रहा हो, तो उस पर कार्रवाई से आमजन में आक्रोश बढ़ना स्वाभाविक है।
श्योपुर के चंद्रपुरा गांव में निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा देने वाले आयुर्वेदिक डॉक्टर (ayurvedic-doctor) के क्लिनिक पर की गई कार्रवाई ने ग्रामीणों और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर दी है। जहां विभाग का कहना है कि बिना लाइसेंस क्लिनिक चलाना नियमों के विरुद्ध है, वहीं ग्रामीणों का कहना है कि यह डॉक्टर उनके लिए जीवनरक्षक हैं और इस कार्रवाई से गांव के लोगों की स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो गई हैं।
ग्रामीण अब इस कार्रवाई को वापस लेने और डॉक्टर को फिर से सेवा शुरू करने की अनुमति देने की मांग कर रहे हैं। यदि प्रशासन ने जल्द समाधान नहीं किया, तो यह मामला जिले से लेकर प्रदेश स्तर तक राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
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